सोमवार, 2 मार्च 2026

श्याम सखा

लोग ढूँढते हैं तुझमें प्रेमी, मैं अपना यार देखता हूँ,

तेरी बाँसुरी की तान में, सखा का प्यार देखता हूँ।

नहीं चाहिए मुझे वो पूजन, जिसमें डर और दूरी हो,

मुझे तो वो रिश्ता भाए, जो आधा और अधूरा हो।


तू ईश्वर होगा जगत का, पर मेरा तो बस मीत है,

हार में जो साथ खड़ा हो, तू मेरी वो जीत है।

न मैं राधा की व्याकुलता हूँ, न मीरा का वैराग्य हूँ,

मैं सुदामा की फटी पोटली, तेरा ही सौभाग्य हूँ।


तू द्वारकाधीश बने, या कुरुक्षेत्र का सारथी,

मेरे लिए तू वही कान्हा है, जो चुराता मेरी आरती।

जब थक कर मैं गिर जाऊँ, तू कंधा बनके आता है,

बिन कहे तू मन की बातें, चुपके से सुन जाता है।


लोग झुकते हैं सामने तेरे, मैं तुझ पर हाथ धरता हूँ,

तू भगवान है दुनिया का, मैं तुझे सखा मीत कहता हूँ।

छोड़ दे ये रेशमी आडंबर, आ धूल में साथ खेलते हैं,

दुनिया की इन रीतियों को, हँस कर साथ झेलते हैं।


तू मेरा साया, मैं तेरी परछाईं, यही अपनी रीत है,

कृष्ण सिर्फ प्रेम नहीं, कृष्ण सबसे गहरी प्रीत है।

सखा तू मेरा, तू ही मेरा मीत है।

होगा तू राधा का कृष्ण, पर मेरा तो अप्रतिम गीत है। 


जब घने अंधेरों ने घेरा, और सूझती न कोई राह थी,

तब मस्तक पर था हाथ तेरा, बस तेरी ही चाह थी।

मैं अर्जुन सा द्वंद्व में उलझा, गांडीव हाथ से छूट गया,

अपनों की इस कुरुक्षेत्र में, मेरा ही धीरज टूट गया।


तब तूने ही तो कहा था सखा— "उठ, ये मोह का बंधन तोड़ दे,"

"जो तेरा है वो साथ रहेगा, बाकी सब मुझ पर छोड़ दे।"


तूने ही उंगली पकड़ कर, कांटों से मुझे निकाला है,

जब-जब मैं लड़खड़ाया हूँ, तूने ही तो संभाला है।

पर तू केवल लाड़ न करता, तू कड़वी सच्चाई भी कहता है,

जब भटकूँ मैं गलत राह पर, अंकुश बनकर तू रहता है।


तेरी झिड़की में भी प्यार है, तेरी सीख में एक नैया है,

तू केवल मुरली वाला नहीं, तू मेरा सखा कन्हैया है।


तूने धर्म का ज्ञान दिया, और बताया कर्म की क्या परिभाषा,

तू ही मेरी जीत का साहस, तू ही मेरी अंतिम आशा।

जहाँ ज़रूरत पड़ी तूने, डाँट कर मुझे सुधारा है,

मेरा ईश्वर बाद में है तू, पहले यार हमारा है।


- अमितेश 

गाँधी जी का डंडा

खादी पहनकर मंचों पर, जो सत्य का राग सुनाते हैं

भीड़ छँटते ही अंधेरों में वो नोटों की रास रचाते हैं 

भूल गए वो सादगी, जो मिला VIP का झंडा है,

याद दिलाओ उन्हें फिर से, ये गाँधी जी का डंडा है। 


धर्मनिरपेक्षता की बात कर, जो नफरत के बीज बोते हैं 

सत्ता की कुर्सी पा कर फिर, चैन की नींद वो सोते हैं 

जनता को आपस में भिड़ाना, बस यही चुनावी फंडा है 

डरना सीखो हमसे सालों, ये गाँधी जी का डंडा है। 


रिश्वत की मेजों के नीचे, फाइले कई दबी पड़ी है 

आम आदमी की ज़िन्दगी, दफ्तरों के चक्कर में मरी पड़ी है 

भ्रष्ट्राचार के साये में जो चलता गंदा धंधा है,

उसे तोड़ने को काफी, गाँधी का ये डंडा है। 


लेफ्ट राइट का चक्कर चला कर, हमको वो भरमा रहे 

हमारी दंगल करा कर फिर, आपस में मौज वो काट रहे

साथ बैठ कर डिनर में फिर वो खा रहे चिकन और अंडा हैं 

समझाओ उन्हें अब, हमारे हाथ में ये गाँधी का डंडा है। 


नारी सम्मान के नाम पर, दीपक जला रहे वो रातों में  

फिर किसी निर्भया, कहीं RG को नोच रहे उजाले में  

दे ताली कर के फिर वो, फैला रहे वितंडा हैं 

संभल जाओ अब भी, यहाँ गाँधी जी का डंडा है। 


- अमितेश