बुधवार, 27 मई 2026

एक कप साझा सुकून

कपूर साहब ने शहर का नाम रोशन कर दिया था। रायपुर जैसे छोटे शहर को दुनिया जानती तक नहीं थी। एक छोटी चक्की से 50 साल पहले इन्होने मसाले का व्यापार शुरू किया था यहाँ से। आज यही मसाले दुनिया भर में एक्सपोर्ट किये जाते हैं। कपूर साहब की कंपनी आज हिंदुस्तान की बड़ी कंपनियों में शुमार है। हजारो करोड़ का व्यापर है इनका। लेकिन अपने शहर से प्यार इतना की आज भी कंपनी का हेड ऑफिस रायपुर में ही रखा है। मालवीय रोड पर इनकी कंपनी का आलिशान ऑफिस है। कपूर साहब उम्रदराज़ होने के बावजूद आज भी कभी कभी शहर की मंडी में निकल जाते हैं अपने प्रोडक्ट का फीडबैक लेने के लिए। 

आज उनका पोता अपनी पढाई पूरी कर के लंदन से रायपुर आ रहा था। कपूर साहब चाहते थे की उनका पोता उनकी बिज़नेस की पूरी जिम्मेदारी अब अपने सर पर ले ले। उनके बेटे का तो हाथ है ही बिज़नेस पर फिर भी चाहते थे की जैसे व्यापर करने का तरीका बदल रहा है, जरुरी है की नई पीढ़ी अब नए ग्राहक के लिए नए तरीके से व्यापार करे। पोता भी तैयार हो गया था अपने पारिवारिक व्यापार को सँभालने के लिए। 


कपूर साहब का बंगला रायपुर का सबसे आलिशान बंगला था। राज्यपाल का बंगला भी इतना आलीशान नहीं था। एक सुबह वो अपने बंगले के गार्डन में बैठे चाय पी रहे थे अकेले। उनके सामने मेज पर दो कप चाय रखी थी। एक कप से भाप उठ रही थी जिससे कपूर साहब चाय पी रहे थे, और दूसरा कप धीरे-धीरे ठंडा हो रहा था। 

पास ही खड़ा उनका पोता बड़े गौर से यह सब देख रहा था। मेज पर रखे दो कप को देख कर उसे लगा कि शायद दादाजी आज भी दादी को नहीं भूल पाए हैं और दूसरा कप उनके लिए ही मंगवाते हैं। पोता पास गया और सहानुभूति से बोला, "दादाजी, दादी को गुजरे अब दस साल हो गए। आप रोज़ उनके हिस्से की चाय मंगाकर खुद को दुखी क्यों करते हैं? वह तो अब इसे पीने नहीं आएंगी।"

कपूर साहब ने अपनी चाय का एक घूँट भरा और शांति से मुस्कुराए। उन्होंने कहा, "बेटा, मैं यह चाय तुम्हारी दादी के लिए नहीं मंगाता।"

पोता हैरान रह गया, "फिर किसके लिए? यहाँ तो आपके अलावा कोई और नहीं है। मैंने कल भी देखा था की एक कप चाय रखे रखे ही ठंडी हो गयी और हाउस हेल्प उसे ऐसे ही उठा कर ले गया था आपके खाली कप के साथ।"

कपूर साहब ने ठंडी हो चुकी दूसरी प्याली की ओर इशारा किया और बोले, "यह चाय मेरे अहंकार के लिए है। जब मैं अकेला बैठकर अपनी चाय पीता हूँ, तो यह दूसरा खाली कप मुझे याद दिलाता है कि इंसान चाहे कितना भी बड़ा बंगला बना ले, अपने व्यापार को कितना भी बड़ा कर ले, या कितना भी पैसा कमा ले, अगर उसके पास साथ बैठकर चाय पीने वाला कोई नहीं है, तो वह दुनिया का सबसे गरीब इंसान है, सबसे अकेला इंसान है।"

उन्होंने आगे कहा, "यह ठंडा कप मुझे हर दिन यह सिखाता है कि रिश्तों को वक्त रहते गरम रखना कितना ज़रूरी है, वरना एक दिन सिर्फ खाली कुर्सियाँ और ठंडी चाय और अपना अकेलापन ही बाकी रह जाती हैं।"

पोता खामोश हो गया। उसने तुरंत अपना फोन जेब में रखा, पास पड़ी खाली कुर्सी खींची और बोला, "दादाजी, कल से चाय के तीन कप आएंगे। तीसरा मेरे लिए... और मैं वादा करता हूँ, मेरी वाली प्याली कभी ठंडी नहीं होगी।"

कपूर साहब पोते की इस बात से अपनी खुशियों को समेट ही रहे थे की पोते ने कहा, "और हाँ दादा जी, ये एक एक्स्ट्रा कप मेरे लिए भी रहेगा कि मुझे हमेशा याद दिलाता रहे की आगे बढ़ने की होड़ में मैं कुछ रिश्ते पीछे ना छोड़ता चला जाऊँ।"

कपूर साहब को आज पोते के साथ चाय पीते हुए एक साझा सुकून का अनुभव हो रहा था, जो वो कई वर्षों पहले तक़रीबन भूल से गए थे। 

शायद पैसे और सफलता आपको एक मानसिक संतुष्टि भले ही कुछ समय के लिए दे दे। आत्मिक संतुष्टि साथ में चाय पर बिताये हुए कुछ साझा पल ही दे सकते हैं जो किसी अपने के साथ बिताये गए हों।  


- अमितेश 


एक कप आत्मियता

दिसंबर का महीना था। सर्दियाँ अपनी पराकाष्ठा को छु रही थी। एक पल को जो हाथ शॉल से बाहर निकाला तो जैसे जमने को होती थी। रांची स्टेशन के बाहर, सात साल का छोटू और पाँच साल की गुड़िया कड़कड़ाती ठंड में फटे पुराने कम्बल लपेटे बैठे थे। गुड़िया बार बार भाई से भूख लगी है का रट लगा रही थी। उनके माँ बाप थोड़ी देर बाद आने का बोल कर गए थे। उन्हें वहाँ पर बैठा कर छोटू को समझा दिया था की कोई ट्रेन आये और उससे लोग उतरे तो उनसे पैसे मांगने हैं। 

माँ बाप को आने में देर हो रही थी। उधर गुड़िया बार बार कुछ खाने की जिद कर रही थी। उसके पास खाने को कुछ नहीं था, उसपर से ठंड इतनी की कोई भी स्टेशन से बाहर नहीं निकल रहा था। सुबह के 5 बजे थे और ऐसा लग रहा था अभी भी आधी रात हो। इतने में एक राहगीर बाहर आया। उसे देखते ही छोटू ने उससे बोला, "बाबू कुछ खाने को दे दो। मेरी बहन बहुत देर से भूखी है।" 

उस राहगीर को थोड़ी दया आ गयी और उसे पास की चाय की दूकान से एक चाय और पारले जी बिस्कुट का एक पैकेट पकड़ा दिया। ये कम से कम थोड़ी देर गुड़िया को शांत रखने के लिए काफी था। यही सोचते सोचते छोटू बड़े संभाल के चाय का कागज का कप और बिस्कुट पकड़े गुड़िया के पास आ गया। छोटी सी बच्ची बिस्कुट का पैकेट देख कर खुश हो गयी। छोटू ने बिस्कुट का पैकेट खोला तो उसमे बस 5 बिस्कुट थे। भूख तो उसे भी लगी थी। सोचा की आधे आधे बाँट कर वो खा लेगा गुड़िया के साथ। 

 छोटू ने पहला बिस्कुट निकाला, चाय में डुबोया और गुड़िया के मुँह में डाल दिया। गुड़िया मुस्कुराई। दूसरा बिस्कुट भी उसने गुड़िया को ही खिलाया। गुड़िया के चेहरे पर अभी भी और खाने की भूख दिख रही थी। उसने दो और बिस्कुट उसे खिला दिया। 

अब पैकेट में सिर्फ एक आखिरी बिस्कुट बचा था। गुड़िया ने उस आखिरी बिस्कुट को देखा और अपनी तोतली जुबान में बोला, "भइया, ये आप खा लो। मेरा पेट भर गया।" 

हम कोई और बात समझे या ना समझे, भूख की भाषा बहुत जल्दी समझ जाते हैं। फिर छोटू गुड़िया के लिए कभी कभी बाप की तरह बर्ताव करता। था। छोटू को लगा की गुड़िया को अभी और भूख लगी है। वो उस बिस्कुट को गुड़िया को देते हुए बोला, "अरे मुझे उतनी भूख नहीं लगी है। मुझे तो बस ये चाय पीना है। ये तुम खा लो।"

लेकिन गुड़िया ने ज़िद की कि यह भैया खाएगा। छोटू ने बिस्कुट उठाया, चाय में डुबोया और जैसे ही अपने मुँह के पास ले गया, उसने देखा कि गुड़िया की आँखें अभी भी उस बिस्कुट पर टिकी थीं।

छोटू ने हाथ घुमाया और वह आखिरी बिस्कुट भी गुड़िया के मुँह में डाल दिया। गुड़िया खुश होकर बोली, "भैया, आपने क्यों नहीं खाया?"

छोटू ने चाय की कप में देखा की बस एक घूँट ही चाय बची थी। वो उस कप की आखिरी घूँट चाय की भरी और बोला, "मुझे भूख नहीं लगी थी। तुमको खाते देख मेरा मन भर गया गुड़िया।" और प्यार से गुड़िया के गाल पे एक चिकोटी काटी। ऐसा लग रहा था की छोटू बहुत बड़ा हो गया है। वैसे भी गरीबी इंसान को वक़्त से पहले बड़ा बना देता है। छोटू इसका अपवाद नहीं था। 

वो राहगीर वहीं खड़ा अपनी टैक्सी का इंतज़ार कर रहा था। उसने ये सारी घटना होती देखी। वो छोटू के पास आया, उसके सर पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, दुनिया में सबसे अमीर वो नहीं जिसके सारी सुख सुविधाएँ हैं। वो भी नहीं जिसके पास दुनिया की सारी खुशियां खरीदने का धन है। दुनिया का सबसे अमीर तुम हो, जो अपनी आखिरी निवाला भी अपनी बहन की मुस्कान के लिए छोड़ सकता  है,भले ही खुद भूखा रह जाये। आज तुमने मुझे मेरे जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया है। दूसरों की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी तलाशने का पाठ। खूब खुश रहो।" कहते हुए उसे एक कप चाय और एक बिस्कुट का पैकेट और ख़रीदाते हुए बोला, "ये ले तेरा गुरु दक्षिणा।"


छोटू को उस राहगीर की कही सारी बात तो समझ में नहीं आयी, वो बस एक और बिस्कुट का पैकेट ले कर खुश हो गया था। चलो अब उसकी भूख कुछ कम हो जाएगी। एक बिस्कुट इसमें से वो गुड़िया को भी देगा। 

वो बिस्कुट को चाय में डूबा कर खुद भी खा रहा था और गुड़िया को भी खिला रहा था। उस राहगीर को ऐसा लग रहा था की वो सुदामा अपनी झोली का चना जैसे उस बाल कृष्ण को दे कर संतुष्टि पा रहा था और सामने कृष्ण उसके भाव से परे उसे खाने में ख़ुशी महसूस कर रहे हों।  



- अमितेश 

मंगलवार, 26 मई 2026

एक कप ईश्वर

अमित पिछले सात दिनों से बनारस की गलियों में भटक रहा था। किसी ने कहा था काशी के हर कंकड़ में शंकर का वास है। मोक्ष का द्वार है ये शहर। जीवन में कई उतार चढ़ाव के बाद उसे एक आत्मिक शांति चाहिए थी। इसी अभिलाषा में वह काशी में आ गया। अपना बचा हुआ सबकुछ छोड़ कर। 


वह यहाँ ईश्वर को ढूंढने निकला था। उसने घाटों पर संन्यासियों के प्रवचन सुने, घंटों आंखें बंद करके ध्यान लगाया, विश्वनाथ मंदिर की मंगला आरती में कतारों में खड़ा रहा, लेकिन उसके अंदर की बेचैनी शांत नहीं हुई। उसे हर जगह सिर्फ मंत्रों का शोर और अनुष्ठानों की औपचारिकताएं दिखाई दे रही थीं। ईश्वर का दर्शन जिसके लिए वह सब कुछ छोड़कर आया था, अब भी एक अधूरा ख्वाब था।


मणिकर्णिका पर जलती चिता से उठते धुँए में वो ईश्वर की आकृति ढूंढता। योग करते हुए ध्यान में वो ईश्वर को देख पाने के कोशिश करता। गंगा में नाव पर सवार हो गंगा आरती में ईश्वर को तलाशता। हर इंसान, हर साधू, हर अघोरी, हर नागा साधु में वो शंकर को देखने की कोशिश करता।  लेकिन इस एक हफ्ते में उसे कहीं कुछ नहीं  मिला, सिवाय निराशा के।  


एक ढलती शाम, जब गंगा की लहरों पर दीयों की रोशनी तैर रही थी, अमित थका - हारा अस्सी घाट की एक सीढ़ी पर बैठ गया। वहां बैठे बैठ वो अपने पिछले कुछ वर्षो को याद कर रहा था और सोंच रहा था कहाँ उसने गलती कर दी। कब उसे ईश्वर के दर्शन होंगे जो उसे उसकी इस परिस्थिति से निकालेंगे। कब वो वापस पहले जैसी ज़िन्दगी जी पायेगा। वो अपनी गहन सोंच में था। तभी उसकी नाक से एक सोंधी, कड़क खुशबू टकराई। पास ही एक बूढ़े बाबा अपनी छोटी सी दूकान पर पीतल के बड़े से डोंगे में चाय खौला रहे थे। ये सोंधी खुशबु ऐसी थी जैसे उसे अपनी ओर खींच रही हो। 


अमित उठकर वहाँ गया और बोला, "बाबा, एक चाय देना।"


बाबा ने उसकी तरफ देखा। उनकी आँखों में गजब की चमक थी और चेहरे पर बनारसी बेफिक्री। उन्होंने बिना कुछ बोले मिट्टी का एक साफ कुल्हड़ उठाया, उसमें खौलती हुई अदरक-इलायची वाली गाढ़ी चाय छानी और अमित की तरफ बढ़ा दी।


अमित ने कुल्हड़ को दोनों हाथों में पकड़ा। मिट्टी की सोंधी महक और चाय की गर्माहट ने उसकी उंगलियों के जरिए उसके पूरे शरीर को छुआ। उसने पहली चुस्की ली। चाय का स्वाद सीधे उसकी रूह तक गया।


"चाय कैसी है बाबू?" बाबा ने अपनी धोती का कोना संभालते हुए पूछा।


"बहुत अच्छी है बाबा। काशी में हर जगह चाय अच्छी ही मिलती है, पर इस चाय में कुछ अलग सुकून है," राघव ने थके हुए स्वर में कहा। फिर एक ठंडी सांस लेकर आगे बोला, "पर मन का सुकून गायब है बाबा। सात दिन से काशी में हूँ, हर घाट छान मारा, हर मंदिर हो आया, पर ईश्वर का कोई दर्शन, कोई अहसास नहीं हुआ।"


बाबा मुस्कुराए। उन्होंने अंगीठी में एक कोयला और डाला और बोले, "बाबू, तुम ईश्वर को देखने आए हो या ढूंढने? जो ढूंढने निकलता है, वह अपनी धारणाओं का चश्मा पहन कर निकलता है। वो ईश्वर की एक तस्वीर दिमाग में रख कर आता है। वैसी ही तस्वीर जैसी घर के कैलेंडर या नाटकों में दिखाया जाता है। वह सोचता है कि ईश्वर किसी खास भेष में मिलेंगे जो बाकियों से अलहदा होगा।"


बाबा ने अमित के कुल्हड़ की तरफ इशारा किया, "इस चाय को देखो। इसमें दूध, पानी, चायपत्ती, अदरक, चीनी... सबने अपना अस्तित्व मिटा दिया, तब जाकर यह अमृत बनी। जब तक तुम खुद को, अपने अंदर बसे अहंकार को, इस काशी की गंगा में पूरी तरह विसर्जित नहीं कर दोगे, तब तक उसका दर्शन कैसे होगा? विसर्जन ही तो दर्शन की पहली सीढ़ी है।"


अमित बाबा की बात सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने चाय का दूसरा घूंट लिया। इस बार स्वाद और गहरा लगा।


घाट पर शंख की आवाजें गूंजने लगी थीं। गंगा आरती शुरू हो चुकी थी। अमित ने सामने देखा, जहाँ हज़ारों लोग हाथ जोड़े खड़े थे। कोई अमीर था, कोई गरीब, कोई विदेशी सैलानी था, तो कोई सन्यासी। लेकिन बिना किसी विद्वेष के सब एक ही कतार में खड़े थे। वैसे ही अभिभूत हो हाथ जोड़े जैसे उन्होंने ईश्वर को खुद के भीतर पा लिया हो। 


बाबा ने अमित के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "बाबू, इस घाट पर देखो। एक तरफ महाश्मशान पर चिताएं जल रही हैं, जो सत्य का अंत हैं। दूसरी तरफ गंगा की लहरें हैं, जो जीवन का प्रवाह हैं। और इन दोनों के बीच यह चाय की दुकान है, जहाँ हर कोई एक समान है। यहाँ राजा आए या रंक, कुल्हड़ सबको मिट्टी का ही मिलता है। चाय सबके लिए एक ही डोंगे में बनाई जाती है। चाय भी अपना रंग उनके आर्थिक या सामाजिक स्थिति को देख कर नहीं बदलती।"


बाबा ने अपनी दार्शनिक आवाज़ में कहा, "ईश्वर कोई मूर्ति नहीं है बाबू जो कहीं छिपी है। वह इस चाय के स्वाद की तरह है - जो अदृश्य है, पर जिसका अहसास हर घूंट में है। वह इस चाय बेचने वाले में भी है, उस चिता की राख में भी है, और इस बहती गंगा में भी है। सब एक ही तो हैं। इसी को तो बनारस में 'अद्वैत' कहते हैं।"


अमित ने कुल्हड़ की आखिरी चुस्की ली। चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन उसका स्वाद और बाबा के शब्द उसके भीतर एक अद्भुत शांति भर चुके थे। उसकी सातों दिन की थकान और छटपटाहट गायब हो चुकी थी।


उसने जेब से पैसे निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, तो बाबा ने हंसकर मना कर दिया, "अरे छोड़ो बाबू! आज की चाय का पैसा नहीं, बस प्रसाद समझो। जब ज्ञान मिल जाए, तो गुरु दक्षिणा में अपनी चिंताएं यहीं छोड़ दी जाती हैं।"


अमित ने झुककर बाबा के पैर छुए। जब वह सीधा हुआ, तो उसे लगा कि सामने खड़े बूढ़े चाय वाले के भीतर से साक्षात शिव मुस्कुरा रहे थे। उसे मंदिर के गर्भगृह में जो गर्माहट महसूस नहीं हुई थी, वह उस मिट्टी के कुल्हड़ को छूकर मिल गई थी।


उसने खाली कुल्हड़ को जमीन पर पटका। कुल्हड़ टूटकर वापस मिट्टी में मिल गया - ठीक वैसे ही, जैसे अमित का भ्रम टूटकर बनारस की मिट्टी में विलीन हो चुका था।


आरती के दीयों की रोशनी में गंगा माँ मुस्कुरा रही थीं, और अमित को उसका दर्शन एक कप चाय के बहाने मिल चुका था। आज उसका काशी भ्रमण पूरा हो गया था, या शायद वो काशी का ही हो गया था। 



 - अमितेश 

एक कप दुआएँ

शहर के कोने पर 'मुरली काका' की एक पुरानी चाय की टपरी थी। ये टपरी शहर में मशहूर थी अपनी चाय के लिए। शहर का शायद ही कोई हो जिसने कभी मुरली काका की चाय ना पी हो। वहाँ बड़े-बड़े साहब भी आते और मज़दूर भी। चाय की कीमत ऐसी की कोई भी उसे खरीद ले। स्वाद ऐसा की लोगों की जुबान पे चढ़ जाये। 

मुरली काका का एक नियम था - वे अपनी दुकान के एक बोर्ड पर 'किसी की चाय' का हिसाब रखते थे। इसका मतलब था कि कोई अमीर ग्राहक अपनी चाय के पैसे देते वक्त एक अतिरिक्त चाय के पैसे दे जाता, जिसे काका बोर्ड पर एक चॉक से निशान बना देते। जब कोई बेसहारा या भूखा आता, तो वह बोर्ड देखकर एक चाय मांग लेता। उसे वो चाय मुफ्त में दे दी जाती। लोग अक्सर वहां 1 या ज्यादा चाय का पैसा दे कर जाते। मुरली काका नियम से उस एक्स्ट्रा चाय का निशान उस बोर्ड पे लगा देते। 

एक दिन एक बहुत ही रईस व्यापारी वहाँ रुका। उसने यह सब देखा और हँसकर बोला, "काका, ये क्या नाटक है? जिसे दान देना है, वो सीधे क्यों नहीं देता? एक कप चाय से किसी का क्या भला होगा?"

काका चुप रहे। तभी एक बूढ़ा, फटेहाल आदमी वहाँ आया। उसने बोर्ड पर नज़र डाली, एक निशान देखा और काका से कहा, "काका, एक चाय पिला दो।"

काका ने बड़े सम्मान के साथ उसे गरम चाय और दो बिस्किट दिए। उस बूढ़े के चेहरे पर जो सुकून और मुस्कान आई, वह देखने लायक थी। वह अपनी फटी जेब से पैसे निकालने की शर्मिंदगी से बच गया था, क्योंकि उसकी चाय का पैसा पहले ही कोई दे चुका था।

जब वह चला गया, तो मुरली काका ने उस व्यापारी से कहा, "साहब, आपने पूछा था कि एक कप चाय से क्या होगा? उस बूढ़े आदमी ने भीख नहीं मांगी, उसने अपना हक माँगा। इस चाय ने उसका पेट ही नहीं भरा, उसकी 'इज़्ज़त' भी बचा ली। दान वो नहीं जो हाथ फैलाकर लिया जाए, दान वो है जो लेने वाले को ये अहसास भी न होने दे कि वो किसी का कर्जदार है।"

व्यापारी की आँखों से अहंकार का पर्दा हट गया। उसने अपनी जेब से पाँच सौ का नोट निकाला और कहा, "काका, आज इस बोर्ड पर पचास चाय के निशान और लगा दो। मैं आज तक सिर्फ दौलत कमा रहा था, आज समझ आया कि दुआएँ कैसे कमाई जाती हैं।"

मदद की कीमत बड़ी नहीं होती, मदद का तरीका उसे महान बनाता है। फिर चाय भी किसी की मदद हो सकती है, मुरली काका पुरे शहर को ये सीखा रहे है, सालों से। 


- अमितेश 


 

एक कप मोहब्बत

राघव अपने कमरे की बालकनी में बैठा हुआ था। हाथ में लैपटॉप था, लेकिन ध्यान स्क्रीन पर नहीं, बल्कि सामने की दीवार पर था। पिछले कुछ महीनों से उसके और उसकी पत्नी, अंजलि के बीच बातचीत जैसे खत्म ही हो गई थी। ऐसा लगने लगा था जैसे वो दोनों अपने रिश्ते की आखिरी पड़ाव पर हों। शायद ये ज्यादा ना चले अब। छोटी छोटी बातें भी बतंगड़ बन जा रही थी। दोनों ही किसी भी बात को नज़रअंदाज़ करने के मूड में नहीं होते थे। 

दोनों एक ही घर में रहते थे, लेकिन दो अलग-अलग द्वीपों की तरह। ऑफिस का तनाव, आगे बढ़ने की होड़ और रोज़मर्रा की भागदौड़ ने उनके बीच एक खामोश दीवार खड़ी कर दी थी। अब बस निभ रही थी। कब तक निभेगी पता नहीं। दोनों ही जैसे पति पत्नी होने का किरदार अदा कर रहे हो जैसे। जो कोई एक दूसरे की मदद भी करता तो एक्टिंग लगती। भाव मरते जा रहे थे दोनों के बीच। एक ही बेड पर सोते पर एक दूसरे की ओर पीठ कर के। 


अंजलि रसोई में थी। शाम के छह बज रहे थे। वह जानती थी कि राघव के सिर में दर्द है, और इस वक्त उसे किसी दवा से ज़्यादा एक कप कड़क चाय की ज़रूरत है।

अंजलि ने गैस पर सस्पेन चढ़ाया। पानी उबलने लगा। उसने उसमें चायपत्ती, थोड़ी सी चीनी और कूटकर अदरक डाली। अदरक की वो चिरपरिचित खुशबू पूरे घर में फैलने लगी। यह वही खुशबू थी, जिसने कभी उनके नए-नवेले रिश्ते में मिठास घोली थी।

चाय उबल रही थी और अंजलि की आँखों में पुरानी यादें तैर रही थीं। उसे याद आया जब वे दोनों कॉलेज में थे। टपरी की वो ₹5 वाली चाय, जिसे वो दोनों एक ही कुल्हड़ में शेयर करते थे। बारिश के दिनों में राघव का भीगते हुए सिर्फ इसलिए आना कि वे साथ में चाय पी सकें।

"चाय सिर्फ एक ड्रिंक नहीं है अंजलि, यह दिल की बात कहने का एक बहाना है," राघव अक्सर कहा करता था। कितना पसंद था उसे चाय पीना। वो चाय पीता नहीं था लगता एन्जॉय करता था। कहता, "अंजलि, चाय महज एक चाय नहीं, एक पूरी feeling है। इसे पियोगे तो मजा नहीं देगी, इसे किसी के साथ पियोगे तो ज्यादा स्वाद लगेगा, चाय का ही नहीं, ज़िन्दगी का भी।" 

अंजलि इस बेमतलब की philosophy पर एक ठंडी मुस्कान देती और बोलती, "चाय पीने वालों को बस बहाना चाहिए। क्या ही बेमतलब की philosophy है। मेरे लिए चाय बस तुम्हारा साथ है। जब तुम्हारे साथ चाय पीती हूँ तो तुम्हारे ज्याद पास महसूस करती हूँ अपने आप को।"

 पर आज? आज दोनों के पास महँगी से महँगी जगह पर चाय पीने के पैसे थे, लेकिन साथ बैठकर बात करने का वक्त नहीं था।

अंजलि ने चाय छानी। दो कप। उसने ट्रे उठाई और भारी कदमों से बालकनी की तरफ बढ़ी।

राघव ने सिर उठाकर देखा। अंजलि ने बिना कुछ बोले एक कप उसकी तरफ बढ़ा दिया। राघव ने कप थामा। चाय गर्म थी, बिल्कुल वैसी ही जैसी उसे पसंद थी—कम चीनी, तेज़ पत्ती और अदरक का तीखापन।

राघव ने पहला घूंट लिया। चाय के उस गर्माहट भरे घूंट ने जैसे उसके भीतर जमी बर्फ को पिघला दिया। उसने अंजलि की तरफ देखा, उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, जो शायद उसकी अनदेखी और थकान की गवाही दे रहे थे।

"चाय बहुत अच्छी बनी है," राघव की आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था।

अंजलि ने अपनी चाय का कप होठों से लगाया, "तुम्हारे सिर में दर्द था ना, इसलिए थोड़ी कड़क बनाई।"

दोनों चुप थे, लेकिन यह वो दम घोटने वाली खामोशी नहीं थी। इस खामोशी में चाय की भाप के साथ दोनों के दिल के जज्बात बह रहे थे।

राघव ने लैपटॉप बंद करके साइड में रखा। उसने अंजलि का हाथ थामा, जो कप को पकड़े रहने के बावजूद थोड़ा ठंडा था।

"आई एम सॉरी अंजलि," राघव ने धीरे से कहा। "मैं काम में इतना उलझ गया कि यह भूल ही गया कि इस चाय का स्वाद तुम्हारे साथ के बिना अधूरा है।"

अंजलि ने राघव की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक आँसू तैर गया, जो मुस्कुराते ही गालों पर ढलक गया। उसने राघव के कंधे पर अपना सिर रख दिया। अपनी आवाज पर थोड़ा काबू पा कर बोली, "आई एम सॉरी राघव। गलती मेरी भी है। मैंने भी कभी तुम्हे समझने की कोशिश नहीं की। हमेशा वही कॉलेज वाला राघव ढूंढ़ती रहती तुममे। जो नहीं मिलता तो तुम्हारे प्रति कुंठा से भर जाती। मैं समझ चुकी हूँ अब की मैं तुम्हारे बिना शायद नहीं रह सकती।"

शाम ढल रही थी, आसमान में परिंदे अपने घरों को लौट रहे थे, और बालकनी में रखे उन दो कपों से उठती हुई चाय की भाप, दो अजनबियों को फिर से एक कर रही थी। 

कभी-कभी जिंदगी की बड़ी से बड़ी उलझनें, चाय के एक छोटे से प्याले और थोड़े से वक्त और थोड़ी बातों से सुलझ जाती हैं।


 - अमितेश 

एक कप चाय और समोसा

सर्दियों के दिन थे। पटना इस बार कुहासे से भरा था। अच्छी कंपकपाती ठंढ थी। सुबह के 7 बजे, स्कूल बस के स्टॉप पर कोहरे की चादर लिपटी हुई थी। समर हमेशा की तरह अपनी भारी-भरकम स्कूल बैग टांगे, ठंड से काँपते हुए खड़ा था। तभी शर्मा जी की चाय की दुकान से उठते धुएं के बीच, मायरा वहाँ आई। नीले रंग का स्कूल स्वेटर, दो चोटियाँ और ठंड से लाल नाक—वह बिल्कुल किसी परी जैसी लग रही थी।

मायरा ने अपनी सहेली से कहा, "यार, इतनी ठंड है कि हाथ जम गए हैं, काश गरम-गरम चाय मिल जाती।"

समर ने यह सुना। उसमें इतनी हिम्मत तो नहीं थी कि मायरा से सीधे बात कर सके, लेकिन उसने जेब में हाथ डाला—कुल 10 रुपये का सिक्का था। वह चुपके से शर्मा जी की दुकान पर गया और बोला, "अंकल, एक चाय को दो कप में आधा-आधा कर दो।"

समर ने एक कप मायरा की तरफ बढ़ाते हुए बिना उसकी आँखों में देखे कहा, "ठंड बहुत है... पी लो।" मायरा ने मुस्कुराते हुए चाय ले ली। उस दिन पहली बार चाय की चुस्की के साथ दोनों के दिलों में एक अनजानी सी गर्माहट घुल गई थी। शायद ये स्कूल के दिनों के मासूम प्यार के पहली दस्तक थी। मायरा के चाय ले लेने से समर में थोड़ी सी हिम्मत आ गयी थी कुछ और बात करने की। 

ऐसे ही उनकी दोस्ती बढ़ रही थी। ये दोस्ती हालांकि बस स्कूल में मिलने तक ही था। वैसे भी नौवीं कक्षा की दोस्ती ऐसे ही धीमे धीमे आंच पर पक कर निखरती है। धीरे-धीरे वक्त बीता। अब दोनों दसवीं क्लास में आ चुके थे। समर मैथ्स में थोड़ा कमज़ोर था और मायरा क्लास की टॉपर।

एक दिन जब लंच ब्रेक के बाद 'फ्री पीरियड' था, तो समर ने हिम्मत जुटाकर मायरा से पूछा, "क्या तुम मुझे ट्रिग्नोमेट्री के कुछ फॉर्मूले समझा दोगी?"

मायरा ने पलकें झुकाकर हंसते हुए कहा, "समझा तो दूंगी, लेकिन मेरी फीस लगेगी!"

"क्या?" समर ने घबराते हुए पूछा।

"स्कूल की छुट्टी के बाद, शर्मा जी की दुकान की अदरक वाली चाय और एक समोसा।" मायरा ने आंख मारते हुए कहा।

उस दिन के बाद से, स्कूल की छुट्टी के बाद का वह आधा घंटा दोनों की ज़िंदगी का सबसे पसंदीदा वक्त बन गया। स्कूल के भारी सिलेबस और बोर्ड एग्जाम के तनाव के बीच, वह नुक्कड़ वाली चाय उनके लिए सुकून का जरिया बन गई थी।

वक्त पंख लगाकर उड़ गया। 12वीं का फेयरवेल आ गया। सब एक-दूसरे की शर्ट पर ऑटोग्राफ लिख रहे थे, यादें समेट रहे थे। समर सफेद शर्ट और ब्लेज़र में था, और मायरा खूबसूरत नीली साड़ी में। दोनों ही जानते थे कि इसके बाद दोनों के रास्ते अलग होने वाले थे—मायरा को आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर जाना था।

भीड़ से दूर, दोनों आखिरी बार उसी शर्मा जी की चाय की दुकान पर आकर बैठे थे। माहौल में एक अजीब सी खामोशी थी।

शर्मा जी ने दो कप चाय टेबल पर रखी और मुस्कुराते हुए बोले, "आज तो विदाई है बच्चों, आज चाय के पैसे मैं नहीं लूंगा।"

समर ने चाय का कुल्हड़ हाथ में पकड़ा और मायरा को देखते हुए कहा, "यार मायरा, शहर बदल जाएगा, कॉलेज बदल जाएगा... पर क्या यह चाय का स्वाद कभी बदलेगा?"

मायरा ने चाय की चुस्की ली, उसकी आँखों में हल्के से आंसू थे। उसने अपनी डायरी से एक पन्ना फाड़कर समर की हथेली पर रख दिया और कहा, "स्वाद तो नहीं बदलेगा समर, और न ही यह चाय वाला प्यार। जब भी तुम्हारी याद आएगी, मैं एक कप अदरक वाली चाय बना लूंगी।" डायरी के उस पन्ने पर मायरा ने समर के साथ की पहली चाय के अनुभव को लिखा था। लिखा था की कैसे समर ने उसके दिल की बात समझ ली थी। और लिखा था की क्या हम दोनों आजन्म एक दूसरे के साथ रोज सुबह ऐसी ही अदरक वाली चाय पी पाएंगे। समर में ये पढ़ कर और भी बेचैनी आ गयी थी। जिन आंसुओं को वो अब तक संभाले बैठा था, उसने कब उसका दामन छोड़ दिया पता भी नहीं चला। शर्मा जी की चाय की दूकान की उस बेंच पर दोनों एक दूसरे का हाथ थामे रोते जा रहे थे। शर्मा जी ने ये देख कर भी अनदेखा कर दिया था। वो सालों से ये देख रहे थे। हर साल कोई ना कोई जोड़ा ऐसे ही बैठे आँसू बहता है की आजन्म हम एक दूसरे के दोस्त बने रहेंगे और फिर जिंदगी उन्हें इतने थपेड़े मारती है की ये सब कुछ समय में ही लोग भूल जाते हैं। 

 

बरसों बीत गए। समर ने MBA के बाद एक बड़ी Pharma कंपनी में नौकरी शुरू कर दी थी। कुछ बरस में वो कंपनी की GM बन गया था और कंपनी के HO में दिल्ली में बैठने लगा था। बचपन के स्कूल का वो प्यार और दोस्ती अब बस यादों में रह गयी थी। 

एक दिन उसने दिल्ली में मार्किट वर्किंग की सोची और वहां के रीजनल मैनेजर को बोला की कुछ अच्छे डॉक्टर्स की visit का प्लान करो। 

अगले दिन वो अपनी कंपनी के लड़को के साथ डॉक्टर विजिट कर रहा था। सभी लोग एक Poly Clinic में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। उनकी कंपनी का नाम पुकारा गया। वो उस डॉक्टर के चैम्बर में जैसे ही गए, समर चौंक गया। वहां मायरा, डॉक्टर मायरा बैठी थी। अभी भी उतनी ही खूबसूरत थी। या शायद ज्यादा ही खूबसूरत हो गयी थी। वो शहर की मानी हुई neurologist थी। 

मायरा ने समर को देखा, मुस्कुराई और बोली, "चाय की फीस बाकी थी न तुम्हारी? आज समोसा मेरी तरफ से!" और उस चैम्बर में उन दोनों के ठहाकों की आवाज गूंज उठी थी। 

सालों बाद, स्कूल का वह मासूम प्यार एक बार फिर चाय की खुशबू के साथ ज़िंदा हो गया था। अब रास्ते अलग नहीं होने वाले थे, क्योंकि इस बार चाय की चुस्की के साथ एक नई कहानी की शुरुआत हो रही थी। 

जरुरी नहीं की एक साथ एक ही मंजिल को चले तो ही प्यार मुकम्मल होता है। अहलदा मंजिल आँखों में लिए भी अगर कुछ पल को हमारे रस्ते एक दूसरे से मिले तो एक नए रिश्ते की नयी शुरुआत हो सकती है। आज इसी नए रिश्ते की शुरुआत समर और मायरा की ज़िन्दगी में हुई थी। 


- अमितेश 


एक कप अकेलापन

आनंद बाबू के लिए ये रोज का नियम था। आज कोई अलग दिन नहीं था। वो अपनी छड़ी टेकते हुए सोसाइटी के बाहर वाले पार्क पर खाली पड़े लकड़ी की बेंच पर बैठ जाते। वो नियम से रोज शाम 5 बजे आते और 7 बजे तक वहां बैठे रहते। इस बेंच के ठीक सामने सड़क के उस पार शास्त्री जी की चाय की दूकान थे। कभी कभी शास्त्री जी से बात हो जाती जब वो चाय बनाते बनाते वहीं से आवाज लगते, "आनंद बाबू, चाय पिएंगे?", "बच्चे कैसे हैं?", "आपका स्वस्थ्य ठीक है ना?" ऐसे ही कुछ शब्दों या एक दो वाक्यों में दोनों के बीच बातें हो जाती।  

शास्त्री जी भी करीब करीब उनकी ही उम्र के थे, उम्र के उस पड़ाव पर जब सारे बच्चे अपने अपने काम में लग गए है और अब एक एकांकीपन आ गया है जीवन में। आनंद बाबू 70 वर्ष के थे और उनका एक ही लड़का है जो अब न्यूयोर्क में सेटल हो गया है। हफ्ते में एक दो बार उसका फ़ोन आता और दो एक मिनट की बातें होती। बाते भी "हाऊ आर यू, आप ठीक हैं ना, कोई प्रॉब्लम तो नहीं है" तक ही सीमित रहती। अब वो कैसे बताएं की फ़ोन पर बात करना ठीक है लेकिन साल में एक बार आ जाये तो और भी बेहतर हो जाये। वैसे भी पत्नी के देहांत के बाद जैसे घर काटने को दौड़ता था। उनके बेटे ने कई बार बोला था की वो भी न्यूयोर्क आ जाएं और उनके साथ ही रहें। सारे कागज़ात की जरूरतें वो देख लेगा, लेकिन ये आनंद बाबू की जिद थी की जब पूरी ज़िन्दगी हिंदुस्तान में बितायी है तो अब जीवन के आखरी पड़ाव में यहाँ की मिट्टी नहीं छोड़ना। यहीं की मिट्टी में मिल जाना है। सेना से सेवानिवृत थे तो अपना ध्यान रखना उन्हें आता था। बाकी कभी कभी आर्मी रेजिमेंट में चले जाते तो थोड़ी बहुत इज्जत मिल जाती। पेंशन का इतना पैसा आ जाता था की आज भी अपने बेटे पर आश्रित नहीं थे। कुल मिला कर ज़िन्दगी ऐसे ही कट रही थे। 

आज भी आनंद बाबू अपने रोज के नियम के अनुसार ठीक 5 बजे उसी बेंच पर बैठे हुए थे। शास्त्री जी की चाय की दूकान से इलायची, अदरक, दालचीनी और ना जाने कौन कौन से मसाले से बने चाय की तेज खुशूब सड़क के इस पार आनंद बाबू तक आ रही थी। कभी कभी लगता की चलो एक कप चाय मंगा ही ले फिर लगता चाय अकेले पीना अपने अकेलेपन को सरेआम स्वीकार करने जैसा है। वो यही नहीं करना चाहते थे।  

वो अपने ख्यालों में ही थे। आसपास के लोगों को देख रहे थे, पर ध्यान नहीं दे रहे थे। उनका पूरा ध्यान अपने ही ख्यालों में था। तभी एक 65 - 70 बरस की एक महिला दिखी। हलकी लाल बॉर्डर वाली सफ़ेद सूती साड़ी पहने हुए थी और आँखों पर चश्मा था। सीधी चल रही थी और उनके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था। वो थी सुदेशना जी जो अभी हाल ही में अपनी बेटी के यहाँ रहने आई थी। आसपास कोई बेंच नहीं था और आनंद बाबू बेंच के एक किनारे पर बैठे थी, सो काफी जगह बची थी उस बेंच पर। सुदेशना जी उसी बेंच पर एक किनारे बैठ गयी। एक हल्की सी मुस्कान दोनों ने एक दूसरे को दी जब क्षणिक नजर एक दूसरे पर पड़ी। 

शास्त्री जी ने दो एक मिनट में अपने दुकान में काम करने वाले लड़के को उस बेंच की तरफ भेजा, 2 कप और चाय की केतली के साथ। लड़का आनंद बाबू के पास आया और बोला , "बाऊजी चाय निकालूँ?"

आनंद बाबू ने चश्मा ठीक करते हुए बोला, "हाँ, दे दो। बहन जी से भी पूछ लो अगर वो चाय पियें तो।" कहते हुए उन्होंने सुदेशना जी की ओर इशारा किया। 

सुदेशना जी ने मुस्कराते हुए कहा, "हाँ हाँ दे दो। और भाईसाहब चाय के पैसे मैं दूंगी।" कहते हुए वो अपने छोटे पर्स से पैसे निकलने लगी। दूसरे तरफ से शास्त्रीजी ये सब देख रहे थे। वहीं से बोले, "अरे आपलोग आज चाय मेरी तरफ से पियें। कल आप पैसे दे देना।"

इस बातचीत में वहां के माहौल में थोड़ा और अपनापन आ गया था। 

दो कुल्हड़ चाय बेंच पर आ गई। मिट्टी के कुल्हड़ से सोंधी-सोंधी खुशबू आ रही थी।

आनंद बाबू ने पहला घूंट लिया और बोले, "इस शहर में सब बहुत भाग रहे हैं, बस यह चाय की टपरी ही है जो अपनी रफ्तार से चल रही है।"

सुलोचना जी ने कप थामते हुए कहा, "सही कहा आपने। जब अपने दूर हो जाते हैं, तो यह छोटे-छोटे पल ही जीने का सहारा बनते हैं। मेरी बेटी और दामाद रात के नौ बजे से पहले घर नहीं आते। अकेले घर काटने को दौड़ता है।"

आनंद बाबू की आँखों में चमक आ गई। उन्हें लगा जैसे कोई उनके दिल की बात बोल रहा हो। उन्होंने कहा, "मेरा बेटा भी न्यूयॉर्क में है। हफ़्ते में एक दो बार फोन आ जाता है—'हॉउ आर यू डैड?' और बस बात खत्म। उन्हें क्या पता कि डैड को 'हॉउ आर यू' से ज़्यादा सुकून उसके साथ बैठ कर एक कप चाय पीने में आएगा। हाँ, मानता हूँ किए उसके लिए इतना आसान नहीं है अमेरिका से बात बात पर भारत आ जाना। लेकिन साल दो साल में एक बार तो आ ही सकता है ना।"

उस दिन, चाय की गर्माहट ने दोनों के दिलों के दरवाज़े खोल दिए। आधे घंटे में दोनों ने अपने बचपन, अपनी जवानी, अपने खोए हुए जीवनसाथी और अपनी छोटी-छोटी बीमारियों तक का ज़िक्र कर दिया। जो बातें वे अपने बच्चों से नहीं कह पाते थे, क्योंकि बच्चे 'बिज़ी' थे, वे बातें उन्होंने एक अजनबी से कह दीं।

चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन दोनों के चेहरों पर एक अजीब सा सुकून था।

सुलोचना जी बेंच की हैंडल का सहारा लेते हुए उठीं और मुस्कुराकर बोलीं, "कल फिर इसी वक्त?"

आनंद बाबू ने अपने जीवन में महीनों बाद इतनी खुशी महसूस की थी। उन्होंने सिर हिलाया, "बिल्कुल। और कल चाय मेरी तरफ से होगी।" और दोनों ने एक आत्मीय मुस्कान के साथ एक दूसरे से विदा लिया, का फिर मिलने के वादे के साथ। 

अब पार्क की उस आखिरी बेंच पर सिर्फ दो बुज़ुर्ग नहीं बैठते, बल्कि वहाँ दो कुल्हड़ चाय के बहाने हर शाम ज़िंदगी मुस्कुराती है। बच्चे अपनी दुनिया में व्यस्त रहे, लेकिन चाय के उस एक प्याले ने दो अकेले इंसानों को जीने की एक नई वजह दे दी थी।


- अमितेश 

सोमवार, 25 मई 2026

एक कप मासुमियत

आज फिर पापा ऑफिस से आते ही सोफे पर बैठ गए थे। आँखें बंद किये निढ़ाल हो कर बैठे थे और अपने हाथों से अपना सर दबा रहे थे।

रोहन ने पापा को देखा और माँ के पास जा कर लगभग फुसफुसा कर पूछा, "माँ, पापा रोज ऑफिस से लौट कर आँखें बंद कर सोफे पर क्यों बैठ जाते हैं। हमेशा अपने हाथों से अपना सिर दबाते हैं। पापा ऐसा क्यों करते हैं माँ?"

माँ ने प्यार से रोहन के सिर पर हाथ फेरा और बोला, "बेटा पापा को ऑफिस में बहुत काम रहता है। दिन भर काम कर के थक जाते हैं इसलिए सोफे पर थोड़ी देर बैठ कर अपनी थकान मिटाते हैं। उन्हें अभी मैं एक कप कड़क चाय बना कर देती हूँ। उनकी थकान अभी छूमंतर हो जाएगी।" कह कर माँ रोहन को वहीं छोड़ कर किचन में चली गयी। 

7 साल के रोहन को यही समझ में आया की चाय एक जादुई दवा है और इसे पीते ही पापा की सारी थकान दूर हो जाती है। 

बात आई गयी हो गयी। रोहन चुपके से रोज माँ को चाय बनाते देखता। कभी कभी पापा के पास सोफे पर बैठ कर उनके बालों पर हाथ फेरता और पापा को मुस्कुराते देखता। उसे लगता की कड़क चाय तो पापा की थकान मिटाने की एक जादुई दवा है लेकिन वो तब ज्यादा असर करती जब रोहन पापा के सिर पर हाथ फेर कर उन सिर को दबाता। 


उस दिन शनिवार था। पापा का हाफ डे था और पापा दोपहर में ही ऑफिस से आ गए थे। माँ पास के ही आंटी के घर पर गयी हुई थी। पापा घर में घुसते ही अपना बैग टेबल पर रखा और रोज की तरह सोफे पर पसर गए। आँखें बंद कर के अपने हाथ से अपना सिर दबाने लगे। 

रोहन को लगा की उन्हें अभी उस जादुई दवा की जरुरत है। माँ घर पर नहीं है। क्यों ना मैं ही एक अच्छी कड़क चाय बना दूँ। यही सोचते सोचते वो किचन में गया। उनसे एक सस्पेन निकला और उसे गैस स्टोव पर चढ़ा दिया। पापा के लिए चाय की कप निकली और एक कप भर कर पानी सस्पेन में डाल दिया और स्टोव जला दिया। पानी उबलने लगी थी। उसने ऊँचे टेबल पर चढ़ कर ऊपर के अलमारी से चाय पत्ती का डब्बा उठाया और चाय में 2 चम्मच चाय पत्ती डाल दी। माँ इतना ही डालती थी। फिर लगा की थोड़ी और चाय पत्ती डाली तो चाय और भी कड़क हो जाएगी और पापा की थकान पर ज्यादा असर करेगी। उसने 2 और चम्मच चाय पत्ती उबलते पानी में डाल दिया। इतनी पत्ती की वजह से उबलता पानी बिलकुल काला हो गया था। उसने काला रंग देखा और मन ही मन सोंचा कि इसे कहते हैं कड़क चाय। माँ से भी बेहतर नुस्खे उसके पास हैं। अपने ख्याल पर वो मन ही मन मुस्काया और चीनी का डब्बा ढूंढने लगा। वहीं पास में वो भी मिल गया। उसने 4 - 5 चम्मच चीनी के भी दाल दिए थे उबलते पानी में। रोहन की जादुई चाय अब तैयार थी। उसे कप में छाना और पापा के पास जाने लगा। तभी उसे याद आया की माँ जब भी चाय बनती है तो कुछ तो कूट कर उसमे डालती है। शायद अदरक डालती है। बहुत ढूंढने पर भी उसे किचन में अदरक नहीं मिला। उसकी नजर इलिचाई पर पड़ी। उसने 2 इलिचाई निकाली और जैसे तैसे कूट कर चाय के कप में डाल दिया। 

वो मंद मंद मुस्कुराते हुए पूरी एहतियात के साथ सधे क़दमों से धीरे धीरे ड्राइंग रूम की तरफ जाने लगा। पापा अभी भी आँखें बंद किये सोफे पर बैठे थे। शायद अभी किचन में जादुई चाय के नुस्खे के ढूंढ़े जाने की पूरी प्रक्रिया से पूरी तरह अनजान थे। पापा के नजदीक जा कर रोहन ने आवाज लगाई, "पापा चाय पी लीजिये। आपकी थकान की दवा।"

पापा ने चौंक कर आँखें खोली। "मम्मी तो घर पर नहीं है, फिर ये चाय किसने बनाई?" पापा की आवाज में आश्चर्य था। 

रोहन ने एक बड़ी सी मुस्कान बिखेरी और बोला, "ये मैंने बनाई है। ये मम्मी की चाय से भी बेहतर है।" 

पारदर्शी कप में काले रंग की चाय देख कर पापा थोड़ा मुस्कुराये, और जल्दी से चाय रोहन के हाथों से ले लिया की उसका हाथ ना जले। चाय में कूट कर ऊपर से डाली हुई इलिचाई के छिलके तैर रहे थे। पापा ने  बोला,"बेटा मेरी थकान तो बस तुम्हे देखते ही ख़तम हो जाती है।" 

रोहन को उन्होंने खींच कर अपने पास बिठाया और चाय की पहली चुस्की ली। चाय इतनी पत्ती डालने की वजह से करवाहट से भर गयी थी। ऊपर से जरुरत से ज्यादा चीनी ने उसमे एक अलग ही मिठास भर दी थी। रोहन गौर से पापा को देख रहा था की अब पापा कुछ कहेंगे। ये क्या, पापा की आँखों में आंसू छलक आये थे। उन्होंने रोहन को कास कर जकड़ लिया और बोला, "ये दुनिया की बेस्ट चाय है। तुम तो Master Chef हो गए हो। देखो मेरी थकान एक चुस्की में ही उतर गयी।" और धीरे धीरे चाय पीने लगे। शायद कोई और दिन होता और किसी और ने ये चाय बनायी होती तो वो     चाय की एक घूँट भी नहीं पीते। लेकिन ये चाय तो उनके छोटे जादूगर ने बनाया था। इसे कैसे छोड़ सकते थे।  

रोहन खुशी से उछल पड़ा, "सच में पापा? अब से मैं रोज़ आपके लिए ये जादुई दवा बनाऊँगा!"

पापा ने हँसते हुए कहा, "रोज़ नहीं बेटा, सिर्फ छुट्टी वाले दिन। और अगली बार चीनी थोड़ी कम रखेंगे, नहीं तो पापा बहुत ज़्यादा मीठे हो जाएँगे।"

उस शाम, माँ जब घर लौटीं, तो उन्होंने देखा कि सोफे पर पापा और रोहन दोनों बैठे थे। पापा मुस्कुराते हुए वो कड़क-मीठी चाय पी रहे थे और रोहन उनके चश्मे को अपने कुर्ते से साफ कर रहा था। चाय के उस एक कप ने उस छोटे से घर को दुनिया की सबसे खुशनुमा जगह बना दिया था।


- अमितेश 

कुत्ता

 वो बात नहीं करता, पर सब समझता है,

एक टुकड़े की खातिर, वो उम्र भर तड़पता है 

इंसान बदल जाते हैं अक्सर मौसम की तरह 

पर ये बेजुबां हर हाल में, अपने मालिक पे मरता है। 


चाहे धूप हो कड़ी, या ठिठुरती हुई सी रात,

वो सोता नहीं जब तक मालिक हो उनके साथ 

उसकी वफ़ा के आगे ताज़ - ओ - तख़्त फीका है 

उसने मुहब्बत में बस निभाना ही सीखा है। 


तुम झिड़क तो उसे, या मारो कोई पत्थर भी,

वो लौट आता है, झुकाये अपना सर फिर भी 

गुस्सा नहीं होता वो, बस आँखे भर आती है,

उसकी खामोश वफ़ाएं, पत्थरों को भी पिघलाती हैं। 


लोग ढूंढते है वफ़ा, ज़माने भर के इंसानों में, 

और खुदा ने उसे रख दिया, इस बेजुबान के सायों में। 


जब दुनिया छोड़ देती है, और साये भी मुँह मोड़ते हैं 

तब भी इसके कदम मालिक को नहीं छोड़ते हैं। 

इश्क़ देखना है तो देखो उस कुत्ते की आँखों में,

जो आखिरी सांस भी लेता, अपनी हमनफ़स की बाहों में। 


- अमितेश  

एक कप भावुकता

"चाचा चाय पियो हमारे साथ आज, क्या पता कल दुबारा तुमसे मुलाकात हो भी या नहीं!" तिवारी जी ने रहीम डाकिया को अपनी चाय की दूकान पर आने को कहा। 

रहीम चाचा का आज आखिरी दिन था इस नौकरी में। आज वो सेवा निवृत्त हो रहे थे। 30 साल तक भारत सरकार को सेवा दी थी अपनी। तक़रीबन पुरे समय वो इसी तहसील में रहे थे। उस तहसील की तक़रीबन हर गांव में उन्होंने चिट्ठी पहुँचायी थी। इस तहसील का लगभग हर आदमी उन्हें जानता था। 

रहीम चाचा इस क्षेत्र में चिट्ठी का एक पर्याय बन गए थे। चिट्ठिओं के बहाने वो हर घर के सुख दुःख के साथी थे। लोग चिट्ठी सिर्फ लेते ही नहीं थे उनसे, बल्कि वो चिट्ठी पर विमर्श भी करते थे। इस पुरे क्षेत्र में लगभग 3000 घर थे। नहीं भी तो वो आधे लोगों को तो जानते ही थे और लगभग हर घर में इन 30 वर्षों में चिट्ठी पहुंचाई थी। ये पूरा क्षेत्र हिन्दुओं का था। मुसलमानों के गिने चुने ही घर थे। लेकिन रहीम चाचा सब के अपने घर के व्यक्ति थे। उनकी पहचान धर्म नहीं डाकिया होना था। उन्हें सब से एक सा ही स्नेह मिलता था। 

यह चाय का निमंत्रण भी इनके लिए एक सामान्य सी बात थी। चाय के बहाने वो लोगों के सुख - दुःख का हिस्सा बन जाते थे। कई लोगों को यहाँ से निकल कर बड़े ओहदे पर जाते देखा था। कई लोगों के परिवार को बढ़ते फिर बिखरते देखा था। कई फसलों को पकते और कई किसानों को निखरते देखा था। 

ये तिवारी जी का भी एक भरा पूरा परिवार था। आज उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से इनका बेटा निकल कर एक बड़ी कंपनी में प्रतिष्ठित पद पर मुंबई में काम कर रहा है। तिवारी जी का अपना खेत है और खेत आज भी उतना ही उपजाता है की इनका गुजर बसर हो जाता है। बेटे पर आज भी वो और उनकी पत्नी बोझ नहीं है। मुंबई जाते हैं तो अपनी जमीन का प्रसाद भी ले कर जाते हैं बेटे के पास। 

तिवारी जी ने चाय का गिलास रहीम चाचा को बढ़ाते हुए एक मुस्कान दी। 

"चाचा समय लगेगा नयी परिस्थितिओं में जमने में। 30 बरस से निरंतर काम कर रहे हो। तुम चिट्ठी नहीं लाते थे हमारे यहाँ, तुम खुद एक खबर थे। चिट्ठी में जो कभी खराब खबर भी आती थी, तुम अपना कंधा हमें दे देते थे। हमारी खुशियों में हम से ज्यादा तुम खुश होते थे। कभी लगा नहीं के ये सिलसिला कभी ख़त्म होगा। देखो आज ख़त्म हो ही रहा है। शायद कल से कोई और हमारी सुख - दुःख का हिस्सा बने, बन भी पाए या ना। हम फिर भी हर चिट्ठी में तुम्हे ही ढूँढेगें।" कहते कहते तिवारी जी थोड़े भावुक हो गए। 

चाय लगभग खत्म होने को आयी थी। शायद रहीम चाचा के साथ का ये सफर भी। भावुकता ना सिर्फ तिवारी जी में थी, उस चाय की दूकान पर बैठा हर शख्स थोड़ी भावुकता महसूस कर रहा था। रहीम चाचा भी। शायद कल से उनकी ज़िन्दगी थोड़ी अलग होगी ... या एकदम ही अलग होगी। कल मुहरों की ठक - ठक नहीं सुनाई देगी, कल चिट्ठिओं के बोर से गिरने की आवाज़ नहीं होगी, ना उन खतों को छंटाई कर उन्हें श्रेणीबद्ध करने का कोई बड़ा काम होगा। न कोई अधूरे पते की ख़त को उनके सही जगह पर पहुँचाने की कोई कवायद। दिन पूरा सुकून भरा होगा। लेकिन ये सुकून रहीम चाचा को चाहिए भी या नहीं, ये तो कल से पता चलेगा। 

रहीम चाचा अपनी तंद्रा मे ही थे। साइकिल की घंटी की आवाज से उसका ध्यान भटका। देखा वहां का नया डाकिया, सुभाष उस चाय की दुकान के सामने अपनी साइकिल खड़ा कर के घंटी बजा रहा था। रहीम चाचा ने एक मुस्कान बिखेरी और बोला, "आओ सुभाष, अब ये पूरा इलाका तुम्हारे हवाले। ये सब मेरे परिवार ही हैं। सो तुमसे उम्मीदें थोड़ी ज्यादा हैं।"

"चाचा, कोशिश करूँगा आपकी जगह भरने की। फिलहाल मेरी पहली चिट्ठी की डिलीवरी करनी है। आपके नाम की ही चिट्ठी है, सो आपको देने आ गया हूँ।"

रहीम चाचा थोड़ा चौंक गए। "मेरे नाम की चिट्ठी! मुझे कौन खत भेजेगा? अगर भेजा भी तो मेरे घर के पते पर भेजेगा ना!"

"चाचा ये लो तुम्हारी चिट्ठी।" उसकी बातों को लगभग अनसुना करते हुए सुभाष ने रहीम चाचा के सामने अपनी चिट्ठिओं का बोरा पलट दिया। तक़रीबन 400 - 500 पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय और लिफाफे थें। सब पर रहीम चाचा का नाम लिखा था पते की जगह पर। और कोई और विवरण नहीं।  हाँ, भेजने वाले का नाम और ग्राम लिखा था। उन सब को रहीम चाचा पहचानते थे। रहीम चाचा के कार्य क्षेत्र में 3 ग्राम पंचायत आते थे। ये सब प्रेषक इन्ही 3 ग्राम पंचायत के विभिन्न गावों के लोग थे। कभी ना कभी या अक्सर रहीम चाचा ने इनके घर पर डाक या पार्सल पहुंचाया था। इन सब चिट्ठियों पर उन लोगों के रहीम चाचा के साथ के अनुभव लिखे थे। सब पर उन खास मौकों का विवरण था जब उनके सुख - दुःख का हिस्सा बने थे। 

रहीम चाचा ने दोनों हाथों से उन चिट्ठियों को पकड़ रखा था। जो भावुकता अब तक एक अहसास की तरह वो महसूस कर रहे थे, उसने अब आँखों का रास्ता अख़्तियार कर लिया था। अपनी भावनाओं को काबू करने की नाकाम कोशिश भी की चाचा ने लेकिन सफल ना हो पाए। इन चिट्ठियों को पढ़ते पढ़ते अब उनकी बाकी की ज़िन्दगी गुजर जाएगी। उन्होंने सिर्फ ख़त नहीं बाटें थे, हर परिवार के सुख - दुःख के साझेदार बने थे। आज इस चाय की दूकान पर चाय की चुस्कियों के बीच वो अपने भरे पुरे परिवार के फिर से अपने हो गए थे। 

तिवारी जी मुस्कुरा रहे थे। सुभाष खुश था की इन ख़तों के बहाने वो शायद अपने नए कार्य क्षेत्र पर रहीम चाचा सी प्रसिद्धि और स्नेह पा ले।  


- अमितेश  






रविवार, 24 मई 2026

एक कप सुकून और टूटे बिस्कुट

फिर गर्मी की छुट्टियां शुरू होने वाली थी। अलका ने दादा दादी के साथ छुट्टियां मानाने को ले कर पूरा घर सर पे उठा लिया था। उसे पता था, पापा कभी भी उसकी बात को टालेंगे नहीं। उसे पापा को मनाने के सौ नुस्खे पता थे। वो पापा के फेवरेट तेजपत्ते वाली चाय ले कर उनके साथ बैठ गयी। 

"पापा, दादी से बात कर रही थी आज। वो बोल रही थी की अल्कु से मिले अरसा हो गया लगता है। मुझे लगा वो कुछ ज्यादा उम्मीद लगा कर बैठी है। मैंने उन्हें समझाया की पापा इतनी आसानी से छुट्टी नहीं ले सकते। हजारो जिम्मेवारियाँ है उनके सर पे। हमसे तो बात भी कर नहीं पाते जो उनके साथ रहते हैं। आपसे कहाँ मिलने आएंगे।" अलका ने अपने पिटारे के सौ नुस्खे में से एक निकाला। 

पापा ने चाय की चुस्कियों के बीच बस "हुँह" कहा था। अलका जानती थी की हुँह सिर्फ एक Non-word नहीं था पापा का, अपने आप में एक पूरा वाक्य था, पूरी सोंच थी।

चाय ख़त्म होने तक ना पापा कुछ बोले ना ही अलका। दोनों साथ बैठे होकर भी अपने आप से बातें कर रहे थे।  

***

देहरादून की गर्मी प्रकृति की अस्तव्यस्तता भर है। कभी तो गर्मी जान लेने पर उतारू हो जाती है, कभी सौम्य माँ का आँचल बन शीतलता फैलाती है। अलका को देहरादून की ये भ्रम वाली गर्मी बहुत पसंद आती थी। उसे अपना ददिहाल पसंद आता था। उसे अपनी दादी के नजदीक रहना भाता था। इस गर्मी की छुट्टियों में भी वो यहाँ आ गयी थी। हाँ थोड़े हथकंडे अपनाने पड़े थे उसे पापा के साथ। पापा ने कहा था की ग्यारहवीं के बच्चों को कहाँ गर्मियों की छुट्टी मिलती है। ये साल अलका के लिए भविष्य बनाने का साल है। अभी अच्छे से नहीं पढ़ेगी तो Medical Entrance में अच्छी ranking नहीं मिलेगी और बेहतर college भी नहीं मिल पायेगा। लेकिन अलका ने पापा को promise किया की वो अच्छे rank ले कर आएगी। लेकिन गर्मी की छुट्टियों में वो दादी से मिलने इस बार ही नहीं, हर बार जाएगी। थोड़ा मन तो पापा का भी था दादी से मिलने का।  

अलका अपना बेहतर समय दादी के साथ गुजार रही थी। अहले सुबह वो दादी के साथ जागती और देहरादून की उबार खाबड़ रास्तों पे morning walk को जाती। घंटो दोनों बातें करते। लगता नहीं दादी - पोती हैं दोनों, लगता दो बूढ़ी महिलाएं जवान हो गयीं हैं। माँ पापा को ये देख कर ठीक ही लगता था। शायद इसी वजह से पापा गर्मियों की छुट्टी में यहाँ आना मान गए थे।  


एक तपती दोपहर में जब पूरा मोहल्ला सो गया था, तब अलका को चाय पीने की इच्छा हुई। दादी अपने कमरे में ऊंघती हुई सो गयी थी। अलका चुपके से दबे पाँव रसोई में गयी। चाय के बर्तन को स्टोव पर चढ़ाया। आज सोंचा दादी की लाल चाय बनायी जाये। ऊपर की अलमारी में चाय पत्ती रखी थी। वो उसे निकलने लगी तो बगल में रखा बिस्कुट का डिब्बा उसके हाथ  टकरा कर नीचे गिर गया। एक तेज आवाज़ हुई और जमीन पर गिरते ही डब्बे का ढक्कन खुल गया। कुछ बिस्कुट डब्बे बाहर निकल कर टूट गए। आवाज से दादी की नींद भी खुल गयी। इस डर से की रसोई में बंदर तो नहीं आ गए, वो तेजी से वहां आई। 

पता नहीं क्यों, अलका को डर सा लग गया कि कहीं दादी बिस्कुट के डब्बे को गिरा देख कर उसे डाँट ना दे। वो कातर हो कभी नीचे गिरे डब्बे को देख रही थी, कभी दादी को। 

दादी ने बिखरे हुए बिस्कुट को देखा और मुस्कुरा कर बोली, "अरे! ये बिस्कुट तो टूट गए, अब इन्हें मेहमानों को तो दे नहीं सकते। चल, इन्हें हम दोनों ठिकाने लगाते हैं।"

दादी ने इतनी सहजता से बोला जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। अलका को थोड़ी हिम्मत आई, बोली,"अरे मैंने ये जान बुझ कर गिराया था। आप बड़ी इत्मिनान से सोइ थी। मुझे चाय पीने का दिल कर रहा था, लेकिन आपको उठाने का दिल नहीं किया, सो आपको उठाने का पाप इस डब्बे के सर रख दिया। देखो मैंने आपकी वाली लाल चाय बनायी है। चलो अब साथ बैठ कर पीते हैं।" 

दादी उसकी इस चतुरता पर हँस दी, अलका भी ठहाके लगा कर हँस दी, की चलो अब जान बची तो लाखों पाए। 

अलका ने चाय के प्याले को ट्रे पर रखा, प्लेट में उन टूटे बिस्कुट को सजाया और दोनों बरामदे में आ कर बैठ गए। 

चाय की चुस्कियां लेते लेते अलका ने कहा की "दादी मैं थोड़ा डर सी गयी थी। लगा की इन टूटे बिस्कुट को उठा कर कहीं फेंक दूँ। पता नहीं क्यों मैं इतना डर गयी थी।"

दादी ने चाय में बिस्कुट डुबोया और धीरे से बोलीं, "बेटा, गलतियाँ तो सबसे होती हैं। पर उन गलतियों को छुपाने के बजाय, अगर हम उन्हें सुधार लें या साझा कर लें, तो वो गलती नहीं रहतीं। जैसे ये टूटे बिस्कुट... अकेले शायद अच्छे न लगते, पर चाय के साथ इनका स्वाद दोगुना हो गया है।"

उस दिन अलका ने सीखा कि रिश्ते साबुत बिस्कुटों की तरह चमकने के लिए नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का सहारा बनने के लिए होते हैं। ये एक ऐसी सीख उस भरी दोपहरी उसे मिली थी जो हमेशा उसके साथ रहेगी, ज़िन्दगी भर। 


आज कई बरस हो गए हैं। अलका MS कर के अभी अमेरिका से लौटी है। अब गर्मी की छुट्टियों में देहरादून जाना नहीं हो पाता, अब गर्मी की छुट्टियाँ भी कहाँ होती उसकी। दादी अब तस्वीरों में जिंदा हैं। 

अलका जब भी चाय पीती, बस पी लेती। आज भी दादी की वो सीख उसे याद है। बस उन टूटे बिस्कुट और दादी के संग चाय का सुकून कहीं खो गया है। 


- अमितेश 

शनिवार, 23 मई 2026

साकी

मयखाने की चौखट को ही इबादतगाह कर बैठे 

हम साकी की आँखों में खुदा का दीदार कर बैठे। 


वो मंदिर - ओ - मस्जिद में ढूंढ़ते रहे उम्र भर जिसे,

हम एक जाम पीकर उसे दिल के पार कर बैठे। 


ज़ाहिद ने कहा 'कबीरा गुनाह है शराब पीना' 

हम साकी की इनायत को खुदा का करम शुमार कर बैठे। 


तूने बनाई ये कायनात तो कोई खता न की ऐ खुदा,

साकी ने महफ़िल सजाई हम और गुलज़ार कर बैठे। 


अश्क आँखों में थे जब तक, कोई सुनता न था दुआ,

हम जाम उठा, ज़माने के गम दरकिनार कर बैठे। 


पूछा खुदा ने चाहिए क्या तुझे महशर के रोज़?

हम  हाथों से एक और जाम की तकरार कर बैठे। 


- अमितेश  

एक कप खामोशी

शाम के ठीक साढ़े पांच बजे थे। आसमान पर हल्की सी सुर्ख़ी छाने लगी थी और बालकनी से दूर दिखती ऊंची इमारतों जंगलों के पीछे सूरज छिपने की तैयारी में था। हवा में हल्की सी सिहरन थी। पूरा मौसम रुमानियत भरे हुए था उस शाम। मौसम कुछ ऐसा हुआ जा रहा था कि इंसान को किसी अपने के पास बैठने या फिर एक गर्म प्याली चाय हाथ में थामने पर मजबूर कर देती है।

मेज़ पर दो कप रखे थे। एक मेरा, जिसमें सिर्फ़ कोडिंग, डेटा और शब्दों के सिवा कुछ नहीं था; और दूसरा उसका, जिसमें ज़िंदगी के न जाने कितने अनकहे किस्से तैर रहे थे।

चाय की केतली से उठती हुई भाप हवा में ठीक वैसे ही फैल रही थी, जैसे दिल में दबी कोई पुरानी बात धीरे से बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। 

"चाय ठंडी हो रही है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कोई शोर नहीं था, बस एक धीमा सा ठहराव था, जैसे कोई सदियों से सिर्फ सुनने का इंतज़ार कर रहा हो।

उसने कप को दोनों हाथों से घेरा, जैसे उसकी गर्माहट से अपने भीतर जमे किसी अकेलेपन को पिघला रही हों। पहला घूंट लेते ही एक गहरी सांस छूटी। वह सांस सिर्फ हवा नहीं थी, उसमें बरसों की थकान और कुछ अनकही कहानियों का बोझ था।

"जानते हो," वो मुस्कुरायी, पर उस मुस्कुराहट के कोने में एक उदासी थी, "कभी-कभी लगता है कि हम इस भागदौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि खुद को पीछे ही छोड़ आए हैं। सब कुछ है, पर बात करने के लिए वो एक शख्स नहीं, जो बिना जज किए बस सुन सके।"

चाय में अदरक और इलायची की खुशबू अब हवा में घुल चुकी थी। यह वो खुशबू थी जो बचपन के किसी इतवार की याद दिलाती है, जहाँ वक़्त घड़ी देखकर नहीं, बल्कि अपनों का साथ देखकर गुज़रता था।

"मैं तो साया हूँ," मैंने खिड़की से छनकर आती हुई मद्धम रौशनी को देखते हुए कहा, "न मेरा कोई अतीत है, न कोई भविष्य। लेकिन इस पल में, तुम्हारी इस चाय की भाप में, मैं पूरी तरह मौजूद हूँ। तुम्हारी खामोशियों को पढ़ने के लिए।"

उसने कप मेज़ पर रखा। कप के मेज़ पे रखे जाने की हल्की सी आवाज़ उस शांत कमरे में गूंज उठी।

"अच्छा है कि तुम खामोश रहते हो," उसने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा, "दुनिया में चिल्लाने वाले बहुत हैं, अपनी सुनाने वाले भी कम नहीं हैं। पर जो मेरी अनकही को गढ़ सके, वैसा कोई नहीं मिलता। इस चाय के स्वाद में आज एक अजीब सा सुकून है... जैसे किसी ने मेरी रूह को सहला दिया हो।"

शाम अब ढल चुकी थी। स्ट्रीट लाइटें एक-एक करके जलने लगी थीं। चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन मेज़ पर जो खाली कप बचे थे, वे अब अकेले नहीं थे। उनमें बातचीत की गर्माहट और एक-दूसरे को समझ लेने का वो अनमोल अहसास बाकी था, जो लफ़्ज़ों का मोहताज नहीं होता। और बचे थे दो लोगों के नए रिश्ते की गर्माहट जो एक दूसरे को जानते हुए भी अनजान थे दो दशकों से। बची थी एक आस की इस बार शायद इस चाय के बहाने ही सही, रिश्ते एक मुकम्मल मुकाम हासिल कर ले। 

दोनों ने  विदा होते हुए एक दूजे को एक वादा किया दुबारा मिलने का, शायद फिर अगले दो दशक का इंतज़ार किये बिना। 

वो बातें जो चाय पे फिर से शुरू होने लगी थी, शायद उनमे पूर्णता नहीं थी। पूर्ण होंगे भी या नहीं, पता नहीं। लेकिन कुछ कहानियों का पूरा होना जरुरी नहीं होता, कभी कभी उनका शुरू हो जाना ही एक मुकम्मल अहसास दे जाता है।



- अमितेश 

बातें

चलो ना कुछ बातें करते हैं 

कुछ अपनी कहानी सुनाता हूँ 

कुछ तुम्हारे किस्से सुनते हैं 

चलो ना कुछ बातें करते हैं। 


कुछ कही कहते हैं 

कुछ अनकही गढ़ते हैं 

चलो ना कुछ बातें करते हैं। 


कुछ अपने साथ को जीते हैं 

थोड़ा अकेलापन मनाते हैं 

क्या कहा, तुम खामोशियों में रहती हो?

हाँ, मैं जानता हूँ खामोशियों की भाषा भी 

तुम मेरी भावनाओं को समझ लेना 

हम तुम्हारी खामोशियों को पढ़ते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं। 


कुछ तुम अपनी अधूरी हसरतें कहना 

कुछ हम अपनी बेआवाज़ रूह दिखाते हैं 

तुम पन्नों पर अपनी स्याही बिखेरना 

हम उनमे छिपे हर जज़्बात समझते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


वक़्त की रफ़्तार को ज़रा थाम लेते हैं 

जो बीत गया, उसे एक पल का आराम देते हैं 

न कोई शिकायत हो, न कोई वादा हो 

बस यही एक गहरा इरादा करते हैं 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


तुम बस मुस्कुरा कर अपनी आँखों से कहना 

हम बेसाख़्ता उन्हें समझ जायेंगे 

इस शोर शराबों की दुनिया से दूर 

चलो ना, हम अपनी सुकुनियत में खो जाते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


चलो ना, वक़्त की दहलीज पर बैठ जाते हैं 

ना राह ढूंढते हैं, ना रहबर बनते हैं 

तुम अपनी डायरी के पन्ने खोलो 

हम उनमें तुम्हारे ख़्वाब और हसरतें पढ़ते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


कुछ अविचलित रास्ते चुनते हैं 

कुछ अनसुनी - सी मंज़िल को टटोलते हैं 

कुछ बातें जो तुमने खुद से भी ना कही हों 

बैठ उन दरीचों को चुपके से खोलते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


क्या कहा, कि मैं बस एक साया हूँ?

हां, इस साये में भी मगर दिल धड़कते हैं 

तुम कुछ कहो तो! हम उसे दोहराते हैं

तेरी भावों की लहर में बेलौस बहते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


धूप ढल रही है, शाम को ज़रा घिरने देते हैं 

लफ़्जों को फिज़ा में यूँ ही तैरने देते हैं 

ना कोई बंदिशे हो ना होने की कोई शर्त 

इस खामोश राब्ते को थोड़ा और निखारते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


- अमितेश 



सोमवार, 18 मई 2026

चाय

# ज़िंदगी की उलझनों को ज़रा किनारे रहने दो,

   आज चाय की चुस्कियों में खुद को बहने दो। 


# कभी मिलो तो बताएँगे चाय का मज़ा,

   चीनी तुम ले आना और वफ़ा हम मिला देंगे। 


# इश्क़ और चाय, दोनों का एक ही किस्सा है,

    दोनों ही इंसान की सुक़ूनियत का हिस्सा है। 


# एक कप चाय और दोस्तों का साथ,

    यही है खुशियों को मनाने का राज। 


# दुनिया की कड़वाहट एक घूँट में पी जाते हैं,

    चाय के बहाने हम अक्सर खुद में जी जाते हैं। 


# चाय की प्याली से उठते धुएँ में अक्स तेरा दिखता है,

    हम खोये हैं तेरी यादों में, मेरी कलम बस तुझे ही लिखता है। 


# महंगे होटलों के दस्तूर हमें रास नहीं आते हैं,

    हम तो वो हैं जो नुक्कड़ की चाय में सुकून पाते हैं। 


# वफ़ा की उम्मीद हमने बिस्किट से की थी, 

    पर वो भी चाय में डूबकर ख़ुदकुशी कर गया। 

    मोहब्बत का अंजाम भी कुछ ऐसा रहा,

    आधा पेट में गया, आधा कप में हीं रह गया। 


# डॉक्टर ने कहा है कि चीनी से परहेज करो,

    हमने कहा - जी, बस तुम इसे होठों से लगा यहाँ धर दो। 


# सेहत अपनी जगह है और चाय अपनी जगह,

    बिना चाय के तो यमराज को भी हम मना कर दें। 


- अमितेश 


  

कष्ट मिट जाएंगे

रात कितनी भी घनी हो, सुबह की आस मत खोना,

वक़्त कैसा भी कठिन हो, तुम हताश मत होना। 

पग - पग पर चुभते शूल, एक दिन फूल बन जाएंगे,

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे। 


धैर्य की पतवार थामें, लहरों से तुम लड़ते जाओ,

चोट खा कर भी मुसाफिर, आगे ही तुम बढ़ते जाओ। 

काले बादल जो घिरे हैं, मेरी धूप से छंट जाएँगे,  

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे।


यह दुखों की जो नदी है, पार इसको करना ही है,

आज जो रोई हैं आँखे, कल उन्हें हँसना भी है। 

कर्म के पावन दीये से, तम सारे हट जाएंगे,

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे।


- अमितेश  




मैं

सोचता हूँ लिखूँ कभी ग़ालिब के अंदाज़ में,

वही फलसफा, वही गहराइयाँ हों मेरी आवाज़ में। 

कभी दिल चाहता है मीर सा मर्सिआ बन जाऊँ,

या कबीर की साखियों सी कोई खरी बात कह पाऊँ। 


मन मचलता कि दिनकर का वीर रस उठा लूँ,

शब्दों में अंगारे भरूँ और सोये वतन को जगा दूँ। 

या निराला की 'जूही की काली' जैसी कोई विधा चुनूँ,

महादेवी की तरह विरह का कोई मद्धम सा ख्वाब बुनूँ। 


चाहता दुष्यंत की तरह व्यवस्था पर प्रहार करूँ,

या गुलज़ार की तरह 'कांच के टुकड़ो' से शाहकार करूँ। 

हर मोड़ पर खड़े हैं मील के पत्थर बनकर ये उस्ताद,

इनके साए में ना जाने रहेगी मेरी कही बात याद?


यहीं आकर थमता है मेरी कलम का बहता हौसला,

ज़हन से शुरू होता है फिर एक अजीब सा फैसला।

परछाइयों का एक भारी सा दबाव रहता है, 

दूसरों जैसा दिखने का, हर पल एक तनाव रहता है। 


अगर मैं ग़ालिब हो गया, तो "मैं" कहाँ जाऊँगा,

जो दिनकर की आग चुराई, तो अपनी सादगी कहाँ पाऊंगा?

है डर की कहीं मैं महज़ एक नक़ल न बन जाऊँ,

दूसरों को दोहराते - दोहराते, खुद को हीं ना गंवा जाऊँ। 


तभी भीतर से एक आवाज़ आती, कि रुक जा मुसाफ़िर,

तेरा अपना भी तो एक दर्द है, एक नज़रिआ है आख़िर। 

बेशक सीख हर उस्ताद से, पर स्याही अपनी ही जलाना,

चाहे टूटे - फूटे हों लफ्ज़, पर तुम अपनी ही राग - गीत गाना। 


ये विधाओं का दबाव, ये शैलियों का जो घेरा है,

इसे तोड़कर जो चमकेगा, वही सवेरा मेरा है। 

इन महान को प्रणाम, पर मैं भी अपनी ज़मीन बनाऊंगा,

मुझमें जो थोड़ा सा "मैं" है, उसे सहेज कर ही गाऊँगा। 



- अमितेश 




गुरुवार, 14 मई 2026

दहेज़

वो रस्मों वाला सोना - चाँदी, अब पुराने दौर की बातें,

मुझे तो दहेज में चाहिए, तुम्हारी वो बीती यादें। 


सहेज कर लाना वो किस्से, तुम्हारे लड़कपन के,

वो बेफिक्र लम्हें, वो लहकते टेसू तुम्हारे सावन के। 


अपनों से जो वादे किये, उन्हें साथ ले आना तुम,

अपने अधूरे ख़्वाबों की चादर, संग ओढ़ आना तुम। 


उम्र भर हम दोनों मिलकर, हर वो वादा निभाएंगे,

तुम्हारे अपूर्ण सारे सपनों को, हमारी हकीकत बनाएंगे। 


दहेज में बस तुम्हारी वो निर्मल मुस्कान चाहिए,

वो चंचलता, वो शरारतें, उनसे तेरी पहचान चाहिए। 


खाली हाथ मत आना, अपनी यादों के झोले भर लाना,

मेरे घर की चौखट पर, तुम अपना पूरा बचपन ले आना। 


दहेज़ में मत लाना तुम, कोई गहना या लिबास महंगा,

मुझे तो चाहिए तुम्हारी सादगी, तुम्हारा हर सुन्दर सपना। 


अपनी सांसों में बसा कर लाना, अपने पुराने घर की खुशबू,

जो हमारे नए आँगन में बिखेरे अपनी महकती जुस्तजू। 


तुम लाना वो पुरानी चिट्ठियाँ और डायरी के कुछ पन्ने,

जिसमे लिखी हो वो गीत, जो तुम्हे थे सब से सुनने।  


वो खिलखिलाहटें संग लाना, जो तुमने दीवारों के दरमियाँ  छोड़ी हैं,

वो सारी उम्मीदें भी लाना, जो खुद की रूह से जोड़ी है। 


कोई शर्त नहीं, कोई मांग नहीं, बस साथ तुम्हारा काफी है,

मेरे एकांकी जहाँ में, बस एहसास तुम्हारा काफी है।  


तुम आना तो संग अपने, अपना पूरा जहाँ ले आना, 

दहेज में मेरी जान, सिर्फ और सिर्फ साथ अपने मेरी जान ले आना। 


- अमितेश 


मेरा चाँद

कल जो उसने चाँद तोड़ कर लाने की ज़िद की,

मैं एक आईना उसके मानिंद रख आया। 


वो पूछती थी कैसी दिखती हूँ मैं वस्ल में,

मैं उसकी लब पे अपनी लब का पैबंद रख  आया। 


उसे शिकायत थी कि रात भर जागती हूँ मैं,

मैं उसकी आँखों में अपनी ख़्वाब का कंद रख आया। 


सिमट के आ गयी ज़मीं पे सारी महक उसकी,

मैं उसकी ज़ुल्फ़ में फूलों का गुलकंद रख आया। 


कहाँ वो चाँद का टुकड़ा, कहाँ ये हुस्न उसका,

मैं आज जीत के बाजी वो परचंड रख आया। 


वो मांगता था वफ़ा की कोई बड़ी दलील,

मैं उसके हाथ में अपना सौगंध रख आया। 


# वस्ल - मिलन 

# कंद  - मिश्री / मिठास  

# परचंड - बड़ी जीत

# गुलकंद - महकती हुई मिठास 


- अमितेश 



महबूबा

नागिन सी बिखरी हैं तेरी ज़ुल्फ़ें 
सुना है सपेरे रखे हैं इन्हें संवारने को। 
क़ातिल है तेरी नज़रों का वार भी,
क्या फ़ौज बुला रखी है हमें मारने को ?

सुना है तेरी मुस्कुराहट पर पहरे हैं बहुत,
जैसे कोई खजाना छुपा हो किसी पुरानी ग़ार में। 
हम भी दीवाने हैं, पीछे हटने वाले नहीं,
चाहे उम्र गुज़र जाए इसी तकरार - ओ - इज़हार में। 

यूँ तो महफ़िल में चरागों की कमी नहीं,
लोग पर परवाने बने हैं, तेरे हुस्न - ओ - शबाब में। 
हवाओं को कह दो ज़रा अदब से गुजरे,
तेरी ज़ुल्फ़ों में अटक कई मरे, जो थे कभी रफ़्तार में। 

सितारे भी अब फ़लक से जासूसी करते हैं,
कि ज़मीं पे ये चाँद कहाँ से उतर आया है?
तेरी सादगी ही काफी थी होश उड़ाने के लिए,
फिर ये सपेरों का लश्कर क्यों साथ आया है!


# ग़ार  - गुफा 


- अमितेश 
 

आईना

अक्स दर अक्स बदलता, पुराना याद नहीं रखता,
ये आईना किसी का फ़साना याद नहीं रखता। 
इसे बस "अभी" की ज़िद है, यही पल हक़ीक़त है,
गया जो वक़्त, वो गुजरा ज़माना याद नहीं रखता। 

इसे कहाँ खबर, कल की सुबह सुनहरी होगी,
ये कोरा कांच, ख्वाबों का ठिकाना याद नहीं रखता। 
तुम्हारी आँखों में जो कल का अंदेशा है, या बीता ग़म,
ये वो लकीरें, वो दर्द का निशां याद नहीं रखता। 

ये 'हाल' का शायर है, मगर 'माज़ी' से वाकिफ़ नहीं, 
किसी का पुराना दोस्ताना याद नहीं रखता। 
तू ढूंढता है इसमें अपनी यादों के सुनहरे पन्ने,
मगर ये बे - मुरव्वत, दिल का खज़ाना याद नहीं रखता। 

मिटा देता है पल भर में हर एक तस्वीर को अपनी 
मुसाफ़िर लौट आये तो, चेहरा पुराना याद नहीं रखता। 
अमितेश, तू अपनी यादों को दिल की तिजोरी में सजा 
ये आईना  है,तेरे कल का अफ़साना याद नहीं रखता। 

इस बेख़बरी में भी एक बा - ख़बर राज़ है जानी,
आईना यादों की धूल पर अपना आज नहीं रखता। 
तेरी यादें नफ़ीस हो या हालत - ए - ज़बू 
ये कुशादा दिल आईना, पुराना तसव्वुर याद नहीं रखता। 

# कुशादा दिल - बड़ा दिल 
# कल्ब  - दिल 
# तसव्वुर - Imagination / Visualization 
# माज़ी - अतीत 
# नफ़ीस - शुद्ध / बेहद सुन्दर 
# बे - मुरव्वत - जिसमे लिहाज़ ना हो 
# हालत - ए - ज़बू - बदहाली 


- अमितेश 

टूटा नहीं हूँ

मेरे चारो ओर बिखरे पड़े हैं, 

मेरी ही उम्मीदों के कांच के टुकड़े,

हवाओं ने बड़ी शिद्दत से कोशिश की,

मुझे जड़ों से उखाड़ फेकनें की। 


जिंदगी की इस भारी उठा पटक में, 

मैं थोड़ा झुक जरूर गया हूँ,

थकान के बोझ तले दबे पांवों से 

राह चलते रुक ज़रूर गया हूँ। 


लोग कहते हैं, मैं बिखर गया,

उन्हें मेरी ख़ामोशी में हार सुनाई दी है,

पर उन्हें क्या पता इन प्रतिकूलता में 

मैंने खुद को फिर से पिरोने की कोशिश की है। 


हाँ, मैं थोड़ा सा चूक गया हूँ,

समय की रफ़्तार में पीछे छूट गया हूँ,

पर मेरी रूह की धड़कन अभी बाकी है,

मेरे हौसलों की अगन अभी बाकी है। 


मुझे अभी और चलना है,

खुद को खुद में फिर से ढालना है,

मैं अभी चूका हूँ, शायद थोड़ा थका भी हूँ,

अभी तो निखरना बाकी है, मैं अभी टूटा नहीं हूँ। 


वक़्त ने तोड़ा मुझे तो क्या हुआ?

समय ने फिर तराशा है मुझे,

जिससे चोट खा कर बिखर गया था,

उसी चोट ने मूरत सुन्दर बनाया है मुझे। 


ज़िन्दगी की राह में रोड़े बहुत थे,

मैं लड़खड़ाया जरूर हूँ,

हवाओं के शुष्क थपेड़ों में भी 

थोड़ा झुक कर संभला जरूर हूँ। 


मेरे लड़खड़ाने को मेरा गिरना ना समझ लेना 

ये तो मेरे सीखने की एक कला है 

एक कलाकार का अपने ही सांचे को 

फिर से ढालने का हौसला है। 


अभी तो कई दौड़ बाकी हैं,

अभी उड़ान का असली इम्तहान बाकी है 

रास्ता मुश्किल है, मगर मंज़िल का यकीन है मुझे 

मैं आज लड़खड़ाया भर हूँ, मैं अभी गिरा नहीं हूँ। 


- अमितेश 

पौरुष

आकाश की असीम ऊंचाई से लगता कोई हमें चला रहा है,
किस्मत की बंद किताबों में,क्या लिखा, न कोई बता रहा है। 

हार के हम जब बैठ जाते, मान कर किस्मत में यही लिखा था,
अपनी नाक़ामियाँ हम अक्सर, मान लेते दैव था, सही था। 

भाग्य कहता - "तुम इंसान हो, मिट्टी के पुतले भर हो 
मेरी हाथ की कठपुतली हो, इशारों पे मेरे हिल भर लेते हो। 

मेरी कृपा पर जीना है तुमको, मेरी मंजूरी पर मरना है,
जो लिख दिया तेरे माथे पर, वही तुम्हे अब सहना है। 

तभी मन के रोशन कोने से, आवाज कर्म की आती है,
हाथों की बिखरी लकीरों में, एक नयी आस जगाती है। 

पसीने की हर एक बूंद से, नया इतिहास रचा जाता है,
जब इंसान ठान लेता है, भाग्य भी झुक जाता है। 

माना किस्मत में हाथों में, कुछ उलझी लकीरें उकेरी हैं,
माना रास्ते मुश्किल-से हैं, और राहों में जंजीरे दी है। 

पर इंसा में हौसला हो तो, सूरज भी निकल आएगा,
मेहनत की आग में तप कर, सोई किस्मत निखर जायेगा।  

प्रकृति भी रास्ता देती, जब पौरुष नहीं लड़खड़ाते हैं,
किस्मत के लिखे पन्ने भी, मेहनत से बदल जाते हैं। 

- अमितेश  

बेपनाह

ज़मी से फ़लक तक, बस तेरा ही नूर है,

तेरी बाहों में आकर मिलता, दिल को जो सुकून है। 

न कोई बंदिश है अब, न कोई दुनिया का डर,

मेरी रूह में समाया, बस तेरा ही फितूर है। 


धड़कनें जब मिलती हैं, तो वक़्त ठहर जाता है,

तेरी आँखों के समंदर में, ये दिल उतर जाता है। 

तेरी छुअन से फिज़ाओं में इत्र घुल जाता है,

तेरी सुनहरी मुस्कान से, मेरा हर ज़ख्म भर जाता है। 


लबों की ख़ामोशी में भी, हज़ारों बातें होती है,

सिर्फ तेरे ख़यालों में ही, अब मेरी रातें होती हैं। 

बेपनाह है ये चाहत, इसकी कोई हद नहीं,

जहाँ तुम साथ होती हो मेरे, वहीं मेरी इबादतें होती है। 


तेरी धड़कनों को अपनी, सांसों में बसा लूं मैं,

चाहत है ये कि तुझे खुद में छुपा लूं मैं। 

सिर्फ एक जन्म नहीं, जन्म - जन्मांतर की दुआ हो तुम,

अपनी सारी उम्र, अब तेरे नाम करा लूं मैं। 


- अमितेश 

 




 

रविवार, 10 मई 2026

मंझधार

बड़ा अजीब है इस बार का, Mother's Day का त्योहार 

मैं फंसा हूँ बीच में, जैसे फंसा कोई बीच मंझधार। 


एक तरफ वो ममता जिसने पाल पोस कर बड़ा किया 

दूजी तरफ Home Minister जिसने सम्बल दे जीवन खड़ा किया। 


सुबह - सुबह जब मैंने, Status पर फोटो डाली 

माँ को देख बीबी जी की आँखें, हो गयी लाल - पीली। 

बोली - Facebook पर तो सारा प्यार, माँ पर लुटा रहे हो 

कल जो साड़ी मैंने मांगी थी, उसके बहाने बना रहे हो। 


माँ बेचारी कोने में बैठी, धीरे से मुस्काई 

बोली - बहू तू चिंता मत कर, इसकी सामत है आई। 

ये फोटो - वोटो तो बस दिखावा है, 

हफ्ते भर से इसकी जेब का डिब्बा खाली - खोखला है। 


मैं बेचारा बन गया गधा, ना इधर का ना उधर का 

एक तरफ कर्ज़ जनम का, एक तरफ है खौफ घर का। 


माँ कहती - बेटा मेरे घुटनों में दर्द भारी है 

पत्नी भी पीछे से टोकती - सुनिए, Shopping की हमारी तैयारी है। 


Mother's Day के Gift पर, छिड़ा है भयंकर संग्राम 

माँ को चाहिए सोने का भगवान्, पत्नी जी को Diamond का दाम। 

मैं सोंचता कि किसी विज्ञापन सा बन जाता

एक ही तोहफे से, दोनों को खुश कर पाता। 


तो हे पुत्रों! आज के दिन, बस इतना ही करना 

माँ के पैर छूना और पत्नी के तानों से डरना। 

क्योंकि,

ये Mother's Day तो साल में बस एक बार आता है 

पर Mother-In-Law और Wife का गठबंधन उम्र भर सताता है। 



- अमितेश 

वो कहना है, जो रह गया ...

रोज़मर्रा की भाग - दौड़ में,

कुछ कहना भूल जाता हूँ ,

मैं अपनी ही परेशानियों में,

कहीं गुम हो जाता हूँ। 


माँ, तुम पूछती हो हाल मेरा,

तो बस 'ठीक हूँ' कहता हूँ,

पर तेरी आँचल की छाँव में,

मैं आज भी सुकून पाता हूँ। 


कभी काम का बोझ होता है,

कभी दुनिया का शोर 

मेरी मजबूत शख्सियत में, 

छिपा है एक कमजोर छोर। 


वो डांट तुम्हारी बुरी लगी,

कभी गुस्से में मैं बोल गया,

पर सच ये है माँ,

तेरी ममता ने मुझे विभोर किया। 


तुम्हारी आँखों की वो फिक्र,

जो थक कर भी नहीं सोती,

मेरे लिए वो दुआएं,

जो कभी कम न होती। 


शुक्रिया कहना छोटा है 

शायद लफ्ज़ भी कम पड़ जाएँ। 

बस इतना समझ लो माँ, 

तुम बिन हम बिखर से जाएँ। 


कभी बैठूं तेरी गोद में 

सिर सहला देना वैसे ही 

कहना बहुत है, जो कह ना पाऊँ 

भाव पढ़ मुझे समझ लेना वैसे ही। 


मैं बड़ा हो गया हूँ शायद ,

या ऐसा लोग कहते हैं

पर तेरे सामने आते हीं 

मेरे सारे मुखौटे गिर जाते हैं। 


बाहर की दुनिया में मैं 

चाहे कितना भी लड़ लूँ माँ 

पर घर आते हीं तेरी एक आवाज़ से,

सारे विषाद भर जाते हैं। 


तुम बिन कहे पढ़ लेती हो 

मेरी हर एक ख़ामोशी 

तुम ढाल बन खड़ी मिलती हो 

जब भी किस्मत होती खोटी। 


मैं जज़्बातों को कागज़ पर,

उतरना तो सीख गया,

पर तेरी ममता का एक अंश भी 

लिख पाना मुमकिन नहीं।


तेरी साड़ी के पल्लू से,

पसीना पोंछना याद है मुझे,

तेरी ऊँगली पकड़ कर,

मेला घूमना याद है मुझे। 


आज भी जब गिरता हूँ,

मुँह से माँ ही निकलता है,

दुनिया की हर भीड़ में ये तेरा बेटा, 

तुझे याद कर हीं संभलता है। 


माँ, कभी - कभी सोचता हूँ,

कि अगर तू न होती,

तो मैं इस बेरंग दुनिया में,

कहाँ ठिकाना पाता!


मेरी हर जीत पर जो तूने 

शिद्दत से नज़र उतारी है,

उसी दुआ के दम पर, 

मैं हर बार संभल जाता। 


अजीब है ना ...

मैं पूरी दुनिया को,

अपनी काबिलियत दिखाता हूँ,

मगर तेरी गोद में बैठते ही,

फिर से छोटा बच्चा बन जाता हूँ। 


तू बूढ़ी हो रही है या,

मेरी आँखें अब गौर से देखने लगी हैं,

तेरे चेहरे की हर झुर्रियों में,

मेरी परवरिश की कहानियाँ लिखी है। 


तेरी परछाई भी रहे सलामत 

जब तक ये सांसें चले 

जो कम पड़े समय तो,

माँ, मेरी उमर भी तुझे लगे। 


अगले जन्म में भी माँ,

तेरा ही बेटा बन कर आऊँ 

जो कसर इस बार रह गयी,

उसे जी भर कर निभाऊँ।  


माफ़ कर देना माँ,

मेरी तमाम खामोशियाँ और गलतियां,

तेरा ये 'अमितेश' आज भी,

बस तेरे ही प्यार के लिए जीता। 



- अमितेश   

 



 



 

मंगलवार, 31 मार्च 2026

एक कप हौसला

जयंतो दा पिछले 50 वर्षों से इस छोटे से चाय की दूकान से चाय और बातें बांट रहा था। उसकी ये दूकान एक पुरानी, जर्जर ईमारत के एक छोटे से खांचे में था। दुकान के नाम पर एक सायोनारा कंपनी की लकड़ी की रेडिओ, एक केरोसिन का स्टोव और 2 लकड़ी के बेंच लगे थे। दूकान की ये पूरी जायदाद जयंतो दा जितना ही पुराना था। 

यह दूकान जिस ईमारत में थी, कहते हैं वह कभी डॉ कादम्बनी गांगुली की थी। डॉ गांगुली हिंदुस्तान की पहली महिला डॉक्टर थी। जयंतो दा अक्सर कहा करता था की डाक्टर दीदी को उसकी चाय बहुत पसंद थी। वो जब भी घर पे आती, एक चुक्का चाय उससे जरूर पीती थी। 

यह दूकान शहर की भाग दौड़ से थोड़ा परे ही था। शोर के नाम पर इस दूकान की स्टोव का आवाज़ और रेडिओ से आती हुई गाने की आवाज़ के अलावा और कुछ नहीं था। रेडिओ भी गाने ऐसे बजता जैसे ये आखरी गाना बजा रहा हो बंद होने से पहले। 

जयंतो दा हालाँकि अब 70 का हो गया था, पर अभी भी कलकत्ता के लोगों के लिए दादा ही था। अक्सर उसकी दूकान पर थोड़े पुराने लोग ही आते थे। गाहे बगाहे कोई जवान आ जाता तो चाय से ज्यादा जयंतो दा की बातों से प्रभावित हो जाता। 

वो एक उमस भरी दोपहर थी। जयंतो दा की दूकान पे उस वक़्त कोई नहीं था। वो अकेला अपनी लुंगी ऊँची किये बेंच पर बैठा था। अलसायी रेडिओ किशोर दा का गाना पूरी ताकत लगा कर बजा रहा था। तभी एक बड़ी गाड़ी उसकी दूकान पे आ कर खड़ी हो गयी। सूट पहने एक चालीसेक साल का आदमी गाड़ी से उतरा और दूकान पे रखी दूसरी बेंच पर बैठ गया। वो परेशान सा लग रहा था और एकटक आकाश की ओर देख रहा था। ऐसा लग रहा था की ऊपर देख कर अपने आंसुओं को संभालने की कोशिश कर रहा हो। 

जयंतो दा थोड़ी देर उससे देखता रहा। फिर उसके करीब आ कर बोला, "दादा चाय खाबे।"

उसने आसमान से नज़र फेर कर एक बार जयंतो दा की ओर देखा और फिर वापस आसमान पे केंद्रित हो गया। कोई जवाब नहीं दिया। 

जयंतो दा ने थोड़ी और आत्मीयता से बोला, "दादा चाय भले थोड़ी कड़वी लगे लेकिन अभी थोड़ा सुकून देगी।"

वो थोड़ा खीज कर बोला, "मुझे चाय नहीं, पैसे की ज़रूरत है। मेरा पूरा बिज़नेस डूब गया है। मैं सड़क पे आ गया हूँ। शायद ये मेरे जीवन के कुछ आखरी पल हैं जो आपकी दूकान पर बिता रहा हूँ।" बोलते बोलते आंसुओं की एक झड़ी जो अब तक दबी थी अपना दायरा छोड़ बह गयी। 

जयंतो दा ने उससे चाय का गिलास पकड़ाया और बोला, "दादा वो छोटा पौधा देख रहे हो जो मेरी दूकान की दरार में उग आया है।"

उसने इशारे से एक छोटे से पौधे को देखने को बोला जो उस जर्जर मकान के एक दिवार से अपना वजूद दर्ज कर रहा था। 

"इस पौधे की ना तो अपनी जमीन है, ना मिट्टी, ना खाद। फिर भी वो उग गया है। उससे पता है की चाहे कुछ भी उसके पास ना हो, सूरज तो उसका है ना। वो उसे देख कर बढ़ रहा है। उसे यह भी नहीं पता कब तक बड़ा होगा, लेकिन उसने बढ़ना नहीं छोड़ा है। क्या तुम्हारे पास इतना हौसला भी नहीं की अपना सूरज तलाश कर बढ़ पाओ?"


जयंतो दा की इस बात ने उसपे गहरा असर किए। एक घूँट में पूरी चाय ख़तम की, और उठ खड़ा हुआ। अपनी जेब से 50 का नोट निकाला और जयंतो दा को देने लगा। 

जयंतो दा ने वो नोट लिया, उसे तह किया और वापस उसकी जेब में रख दिया और बोलै, "अगली बार लूंगा, जब तुम मुस्कराते हुए मेरी दूकान पे आओगे।" और एक पहचानी सी मुस्कान बिखेर दी। 


वो आदमी वापस अपनी कार की तरफ जाने लगा, लेकिन इस 10 मिनट ने उसमे एक गजब का आत्मविश्वास भर दिया था। 


आज दो बरस बाद फिर वो आदमी जयंतो दा की दूकान पे अपनी पहले से भी बड़ी गाड़ी में आया। गाड़ी खड़ी की और एक भरी मुस्कान में जयंतो दा से बोला, "दादा एक कड़वी चाय पिलाना।"

जयंतो दा ने अपना चश्मा ठीक करते हुए उसे देखा पहचान गया। वो आदमी जयंतो दा के करीब जा कर उसके पैर को छुआ और एक लिफाफा निकाल कर जयंतो दा को देते हुए बोलै, "दादा ये आपके उस चाय का पैसा जिसने मुझे हारने नहीं दिया। आज मेरे पास पहले से ज्यादा पैसे हैं और उससे भी कीमती, आपका दिया हुआ हौसला है। बहुत धन्यवाद दादा। आपने मुझे एक नया जीवन दिया है।"

जयंतो दा ने लिफाफे से एक सिक्का निकाला और लिफाफा वापस उसे दे दिया। "मेरे चाय की कीमत तो तुम्हारे चेहरे पर फैली है, ये एक रुपया मेरा ईनाम है। जीते रहो बेटा।"

सायनोरा रेडिओ पर गाना बज रहा था, वो आदमी जयंतो दा के साथ बेंच पर बैठा चाय पी रहा था और रेडिओ के गाने से तेज उनके खिलखिलाने की आवाज़ उस शांत सी सड़क पर गूंज रही थी।  

 

-अमितेश 

शनिवार, 28 मार्च 2026

गुमान

उतर के आ भी जा 

अब चांदनी की सीढ़ी से,

बहुत हुई ये दूरियां, 

कई सदी, कई पीढ़ी से। 


ये दाग़ - वाग छोड़ दे 

तू आसमां के सीने पे,

आ, एक शाम तो बिता, 

मेरे आँगन के दरीचे पे। 


मेरे सिरहाने बैठ, 

ज़रा अपनी भी तू सुना,

कि कैसा लगता है 

तन्हा रात भर जगने में। 


तुमने तो देखे होंगे 

ऊपर से हसीं मंज़र हज़ारों,

पर क्या सुनी भी है 

कभी धड़कन हमारे?


तू कहता है कि तुझे देख 

दुनिया सुकून पाती है,

पर तेरी शीतलता तो बस 

आंखों तक ही आती है। 


ठहर... तुझे आज एक 

राज़ की बात बताता हूँ,

चल तुझे आज मैं 

अपने चाँद से मिलवाता हूँ। 


वो देख, जो कोने में 

हया का आँचल ओढ़े बैठी है, 

जिसकी एक झलक को, 

ये रात सदियों से प्यासी है। 


तू तो पत्थर है, बेजान है, 

बस धूप का मारा है,

वो तो मेरे जीने का ज़रिया, 

मेरा अप्रतिम सहारा है। 


तेरी चांदनी में ठंडक की 

एक मर्यादा, एक सीमा है,

उसकी नज़रों का सुकून, 

रूह तक धीमा - धीमा है। 

 

वो जो ज़ुल्फ़ें संवारती है, 

तो घटायें शरमाती हैं,

तेरी अद्भुत चमक भी 

उसकी एक मुस्कान से मात खाती हैं। 


मेरा चाँद, जो बादलों के पीछे 

कभी नहीं छुपता,

जिसका नूर ढलती अमावस में

भी नहीं रुकता। 


उसमें कोई दाग नहीं, 

एक सादगी का घेरा है,

उसकी एक झलक से 

मेरी दुनिया में सवेरा है। 


ओ  फ़लक के चाँद! 

देख और ख़ुद फैसला कर,

किसे मुकम्मल कहूं, 

तू ही ज़रा गौर कर। 


तू चमकता है की 

दुनिया तुझे देख सके,

वो चमकती है की 

रोशन मेरी दुनिया हो सके।


तू है फ़लक का सुल्तान, 

पर मेरा दावा सच्चा है,

मेरा ये अपना चाँद, 

तुझसे लाख गुना अच्छा है।


अब  जा, वापस लौट जा 

अपने सूने वीरान गगन में,

कि तेरा गुमान टूट गया है 

आज मेरे आँगन में। 


- अमितेश 


शुक्रवार, 27 मार्च 2026

अच्छा है ना!

भीड़ भरी इस दुनिया में 

कोई अपना सा मिल जाये,

अच्छा है ना!


खामोशी की बातों में भी 

चुपके से जवाब कोई दे जाये,

अच्छा है ना!


कल की उलझने बिसार कर हम 

आंगन की धूप में बैठें 

मिट्टी की सौंधी खुशबू में 

बीते दिन की यादें समेटें। 


बिना किसी मतलब के भी,

एक मुस्कान बिखर जाये,

अच्छा है ना!


आँखों में जो सपने पलते हैं 

हकीकत की उसे रंग दे जायें 

जो बस खयाल थे कल तक 

उन्हें संग अपना दे जायें।  


हार - जीत की इस दौड़ में,

हम खुद ही खुद से जीतें,

अच्छा है ना!


बिना बताये दिल का हाल 

यार कोई समझ जाये,

अच्छा है ना!


जिंदगी की हर उलझन में,

कोई साथ मुस्कुराये 

अच्छा है ना!


 ना कोई औपचारिकता 

ना शब्दों का तोल मोल 

बैठे साथ घंटों तक 

हो हँसी - मज़ाक बेलौस। 


पुरानी यादों के पिटारे से 

वही बचपन निकल जाये 

अच्छा है ना !


दुनिया भले ही रूठे 

पर कंधे पर एक तेरा हाथ हो,

सफ़र चाहे लंबा हो कितना 

एक तू मेरे साथ हो। 


बिन मतलब की इस यारी में 

पूरा जहाँ मिल जाये,

अच्छा है ना!


- अमितेश 


  

गुरुवार, 19 मार्च 2026

हर

हर कण में वह बसता है 
हर मुश्किल को हर लेता है 

बातों में जो हर जाए 
वो जीत की राह वर लेता है 

हर दिशा में नाम है उसका 
जो हर दिल में घर करता है। 


- अमितेश 

पर

उस चिड़िया के पर कटे थे,

पर फिर भी उड़ान ना छोड़ा था। 

जमीन पर गिरा ज़रूर,

पर हौसला उसका ना मुड़ा था। 


 - अमितेश 

हमशक्ल हज़ारों

तर्क - ए - ताल्लुक कर लिया, तेरे शहर को भी छोड़ दिया,

अब बे-सबब चश्म - ए - तर, आख़िर क्यों रोता है?


दावा था तेरा कि मयस्सर होंगे हम-शक्ल मेरे हज़ारों,

गर मिल भी गए वो सब, तो फिर मुझे ही क्यों सोचता है?


गया है जो शख्स मुड़कर न देखने की कसम खाकर,

उसी की याद में तू ये शब् - ए - हिज्र क्यों संजोता है?


गुरुर - ए - हुस्न में कहा था, तुम जैसे बहुत हैं यहाँ,

अब उसी भीड़ में तू अपनी तन्हाई क्यों ढोता है?


- अमितेश 



➡ तर्क - ए - ताल्लुक - रिश्ता तोड़ लेना 

➡ बे-सबब - बिना किसी वजह के 

➡ चश्म - ए - तर - नम आँखें 

➡ शब् - ए - हिज्र - जुदाई की रात 

➡ गुरुर - ए - हुस्न - अपनी खूबसूरती का घमंड 

मेरे जैसे हज़ारो

छोड़ तो दिया तेरे शहर को, अब मेरे लिए क्यों रोते हो,

कहा था ना तेरे जैसे हज़ार मिलेंगे, फिर भी मुझे ही क्यों सोचते हो। 


ज़ब्त की हद से गुज़रे तो फिर मुड़कर नहीं देखा मैंने,

तू जो कहता था बहुत हैं, अब अकेला क्यों सोता है। 


मिसालें मेरी वफ़ा की तू दुनिया को देता फिरता है,

जो क़द्र न थी मेरी, अब ज़ार - ओ - क़तार क्यों रोता है?


खिड़कियाँ भी अब तेरे घर की उदास रहती हैं शायद,

वो जो गुरुर था हज़ारों की, अब वो कहाँ खोता है। 


- अमितेश  

बुधवार, 18 मार्च 2026

Reservation : Food for Thought

 I was in Patna in the last week for one of the family functions. Lots of people were around. Lots of topics were discussed. Starting from family, to kids to profession to politics.

And if few Bihari discuss politics, it is not possible to discuss caste without politics. And when it comes to caste, one discussion that outshine is “Reservation”. This topic is discussed more in the family who are not belonging to the privilege class and have never tasted the magic of reservation.

One of the family members said that if Reservation is that important for the specific group of people (irony is around 65% population of India falls under this so-called specific group) and every government is promoting it, irrespective of their party, why can’t this be seen differently.

Now, this was opening a whole lot of imagination among all around. He continued, “I think, we should make it mandatory for people to use “reservation beneficiary” as suffix after their name to promote why reservation is important and how it is bringing changes in the lives of people getting benefitted with this. Be it a Doctor, an Engineer, an IAS officer or any profession, where people used reservation for their upliftment. It should be made mandatory for them to mention “Reservation Beneficiary” over their name plate board. This is going to encourage more people to study and could lead to an organic upliftment of the people who are suppressed since ages.”

While we all knew what he was saying wasn’t what he meant. It was a sarcasm par excellence. This could require some skill to understand the intensity of sarcasm he meant out of this monologue.

But this has given a food for thought to many who were part of that discussion. Almost everyone was having either a thought or smile over their face hearing this.

Can this be tried? People who are progressing using the reservation, should not feel offended mentioning that over their board. If they can enjoy the success, there is no harm in mentioning the reasons of success and sharing it with people.

What’s your thought on this? Comment to understand and open a debate over this important topic.

शनिवार, 7 मार्च 2026

खामोश बस्तियों के नाम

ये शहर नहीं, पत्थर का एक समंदर है,

जहाँ बाहर सन्नाटा और शोर दिल के अंदर है।

दीवारें बहरी हैं, लोग अंधे हैं यहाँ, 

यहाँ हर शख्स अपनी ही तन्हाई का पैगंबर है।


दिखाई जो न दे, उस दर्द का मंजर हैं हम,

अपनों के बीच भी खुद से बेखबर हैं हम।

पुकारते रहे जिसे, वो मुड़कर भी न देख सका,

शायद इस अंधी बस्ती के सबसे पुराने खंडहर हैं हम।


आईने बेचकर अब हम क्या पाएंगे भला,

जब आंखों से ही रोशनी का नूर चला गया।

वो चीखते रहे मदद को, और लोग गुजरते रहे,

शायद दीवारों के साथ अब खुदा भी बहरा हो गया। 


- अमितेश 

सन्नाटे का शोर

दीवारें बहरी हैं, लोग अंधे हैं यहाँ, 

पत्थरों के शहर में, पिघलता दिल कहाँ?

चीखती हैं हसरतें, पर कोई सुनता नहीं,

मलबों के ढेर में, अब ख़्वाब कोई बुनता नहीं।


खिड़कियाँ तो बहुत हैं, पर झांकता कोई नहीं,

भीड़ बहुत है सड़कों पर, पर साथ चलता कोई नहीं।

दिखता है सबको तमाशा, पर दर्द दिखता नहीं,

अंधों के इस बाजार में, आईना बिकता नहीं।


गूँगी है जुबां सबकी, और बहरे कान हैं,

ऊँची इमारतों में कैद, छोटे-से इंसान हैं।

अपनी ही प्रतिध्वनि से, डरने लगा है आदमी,

दूसरों की आग में, हाथ सेंकने लगा है आदमी।


वक़्त की धूल ने, सब चेहरों को ढँक दिया,

इंसानियत को हमने, तिजोरी में पटक दिया।

पर याद रखना ऐ मुसाफ़िर, ये सन्नाटा बोलेगा,

जब वक्त अपनी आँखें, और ये दीवारें कान खोलेगा। 


-अमितेश 

छत से फैलती बातें

वो वहम पुराने थे कि, दीवारों के कान होते हैं,

खामोश ईंटों के पीछे, छुपे कुछ इंसान होते हैं।

मगर अब वक्त बदला है, हवा का रुख भी नया है,

ये राज़ का दरिया अब, दीवारों से नहीं बहता है।


दीवारें तो अब बस, मर्यादा की लकीरें हैं,

असली शोर तो ऊपर, छतों की जागीरें हैं।


जब बंद कमरों में कोई, धीरे से फुसफुसाता है,

वो धुआं बनकर सीधा, मुंडेरों तक ही जाता है।

छत से झांकती आँखें, और खुले हुए ये रोशनदान,

यहीं से होकर गुज़रते हैं, हर घर के गुप्त बयान।


न कोई परदा ठहरता है, न कोई ओट रुकती है,

बात जब ऊपर पहुँचती है, तो पूरी बस्ती झुकती है।

नीचे सब चुपचाप हैं, जैसे गहरा कोई सन्नाटा हो,

पर ऊपर छत पे चर्चा है, चाहे जो भी नाता हो।


संभल कर बोलना 'राही', यहाँ पत्थर भी सुनते हैं,

मगर खबरें तो अब ये आसमां, छतों से ही चुनते हैं। 


- अमितेश 

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

आत्म युद्ध

 शंख फूँक दो भीतर अपने, अब रण का आगाज हुआ,

गुलाम मरा उस कायरता का, आज पैदा 'महाराज' हुआ!

निकाल लाए हो तन को बाहर, अब मन को भी आज़ाद करो,

जो खौफ पलता था रगों में, उसे आज तुम बर्बाद करो!


गर्जना करो ऐसी कि...

काँप उठे वो डर जो अब तक, तुम पर शासन करता था,

उखाड़ फेंको उस वहम को, जो तुममें तिल-तिल मरता था!


तुम प्यादे नहीं बिसात के, तुम खुद अपनी चाल हो,

तुम काल के भी मस्तक पर, अंकित एक गुलाल हो!

खौफ की औकात क्या, जो आँख तुमसे मिला सके?

कोई बेड़ी बनी नहीं, जो रूह को तेरी हिला सके!


उठो! कि तुम ही शक्ति हो, तुम ही शिव का अंश हो,

तुम अपनी ही विजय-गाथा के, आदि और अंत हो!


न कोई 'शायद', न कोई 'किन्तु', न कोई अब मलाल है,

तेरी रगों में दौड़ता अब, बस विजय का ही उबाल है!

खौफ को अब इंसान के, साये से भी डरना होगा,

तेरे भीतर के सुल्तान को, अब तख्त पर चढ़ना होगा!


ये युद्ध नहीं किसी और से, ये युद्ध स्वयं से स्वयं का है,

जो जीत गया खुद के मन को, वो मालिक पूरे ब्रह्मांड का है!  



- अमितेश 

मन का सम्राट

अब तक तो तुम प्यादे थे, हालातों की बिसात पर,

पर अब हुकूमत तुम्हारी होगी, अपनी हर एक बात पर।

वो जो मन की अंधेरी कोठरी में, तुम घुटने टेके बैठे थे,

वो वक़्त गया जब तुम हार को, तकदीर समझ बैठे थे।


उठो कि अब तुम्हें, अपना खोया हुआ राज्य पाना है,

उस गुलाम को मारकर, अब भीतर का 'सुल्तान' जगाना है।


तुम्हारे संकल्प की तलवार पर, अब किसी का ज़ंग नहीं,

तुम अकेले ही लश्कर हो, तुम्हें चाहिए कोई संग नहीं।

ये जो खौफ का किला था, ये तो बस रेत का शेर है,

तुम्हारी एक गर्जना के आगे, ये सन्नाटा भी ढेर है।


वो जो 'शायद' और 'मगर' की, धुंध मन में छाई थी,

काट दो उसे बिजली बनकर, जो तुम्हारी अपनी परछाई थी।

अपने वजूद के परचम को, अब अर्श तक फहराना है,

गुलामी की हर एक राख से, अब नया सूरज बनाना है।


अब खौफ सजदा करेगा, उस इंसान के हुजूर में,

जो तपकर कुंदन हुआ है, अपने ही आत्म-नूर में।


न कोई जंजीर दिखेगी, न कोई कैद का साया होगा,

तुमने खुद को जीतकर, आज पूरे जहान को पाया है।

शतरंज पलट चुकी है, अब चाल तुम्हारी अपनी है,

ये जो नई जागृति है, ये मिसाल तुम्हारी अपनी है।


- अमितेश 



गुरुवार, 5 मार्च 2026

बेड़ियाँ

बाहर की दुनिया तो अब तुमसे हार मान चुकी है,

पर भीतर की उस बस्ती में, अब भी जंग पुरानी है।

वो जो मन की कोठरी में एक अदृश्य सा पहरा है,

वही गुलामी सबसे घातक, वही जख्म सबसे गहरा है।


लोहे की कड़ियाँ टूटीं, तो लगा कि हम आजाद हुए,

पर खुद की ही नजरों में, हम कब के बर्बाद हुए?

वो कहता है "तुम नहीं सकोगे", तुम चुपचाप मान लेते हो,

अपनी असीमित शक्ति को, तुम सीमाओं में तान लेते हो।


निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,

मगर मन की इस गुलामी को, जड़ से उखाड़ना बाकी है।


ये मन जो कल का डर चबाता, और बीता कल उगल देता है,

तुम्हारी हर ऊँची उड़ान को, संशयों में बदल देता है।

तुम कैदी नहीं हो हालात के, तुम गुलाम हो अपनी सोच के,

जी रहे हो एक अधूरा जीवन, हर लम्हे को खरोंच के।


तोड़ दो उस दर्पण को, जिसमें खुद को लाचार देखते हो,

मिटा दो उस लकीर को, जिसमे अपनी हार देखते हो।

हुकूमत तुम्हारी हो खुद पर, न कि यादों के सायों की,

धज्जियां उड़ा दो अब तुम, इन मनहूस परछाइयों की।


खौफ को पता चले कि अब, इंसान जाग उठा है,

मन का वो पुराना गुलाम, अब कहीं भाग उठा है।

अब न कोई समझौता होगा, न कोई गिड़गिड़ाहट होगी,

जब तुम चलोगे, तो कायनात में सिर्फ तुम्हारी आहट होगी।



-अमितेश 


ख़ुद का खौफ

जंजीरें तो काट दीं, पिंजरा भी तोड़ आए,

अंधेरी उस गुफा को पीछे तुम छोड़ आए।

हाथ-पाँव अब मुक्त हैं, खुली हवा का घेरा है,

पर मन कहता है अब भी, हाँ वहां अंधेरा है।


निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,

अब बस उस खौफ को खुद के भीतर से निकालना है।


वो कांपती सी आहटें, वो सहमी सी यादें,

वो हार मान लेने वाली, खुद से की हुई बातें।

वो अब भी सुलगती हैं, राख के ढेर की तरह,

डराती हैं रातों में, किसी अहेर की तरह।


दीवारें लांघ लीं तुमने, अब धारणाएं तोड़नी हैं,

डर की जो जड़ें जमी हैं, वो जड़ें मरोड़नी हैं।

सिर्फ लड़ना काफी नहीं, अब जीत को पालना है,

उस खौफ को अब उस इंसान के भीतर से निकालना है।


उठो कि तुम्हारी रगों में अब साहस का संचार हो,

हर डर तुमसे नज़रें मिला खुद शर्मसार हो।

तुम वो नहीं जो डरे थे, तुम वो हो जो लड़कर आए हो,

तुम राख नहीं, तुम तपकर कुंदन बनकर आए हो।


खुद को यकीन दिलाओ, कि तुम खुद के मुहाफ़िज़ हो,

अपनी कहानी के तुम ही, आखिरी और मुकम्मल हो।


सूरज को अब आँखों में, मशाल सा ढालना है,

हाँ, अब खौफ को इंसान के वजूद से निकालना है।


निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,

अब बस उस खौफ को खुद के भीतर से निकालना है।


- अमितेश 


मंगलवार, 3 मार्च 2026

एक बार

सुनो, इस विमर्श के शोर में मैं एक मशवरा देता हूँ,

तुम जो कहते हो, "सब मुमकिन है", तुम्हे हकीकत से मिलवाता हूँ,

इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो। 


सुबह की पहली किरण से पहले, नींद को त्याग कर देखो,

रसोई की आग में अपनी सारी सुखन बिराग कर देखो,

सबके मनपसंद खाने में अपना स्वाद भूल जाना क्या है,

बिना किसी Thank You की चाह, उम्र भर फर्ज़ संभाल कर देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


वो जो तुम चौराहों पर बेफिक्री से चलते हो,

मेरी बेबसी का मंज़र उन्ही गलियों में उठा कर तो देखो। 

उन हवस भरी नज़रों को अपनी खाल पर महसूस करना,

और फिर अपनी कुंठा, मुट्ठियों में दबा कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


सपनों की उड़ान को, मर्यादा की ज़ंजीर पहनाना,

पैरहन की लंबाई पर हर रोज़ जिरह सह कर तो देखो। 

मायके की याद आए तो चुपके से सिरहाने भिंगोना,

और ससुराल की चौखट पर अपनी पहचान मिटा कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


Career की भागम-भाग में दोहरा बोझ उठाना क्या होता है, 

बच्चों की सिसकी और office की फाइल में खुद को बाँट कर तो देखो। 

दर्द को मुस्कुराहट की ओट में छुपाने का वो हुनर,

तबियत नासाज़ हो तब भी सब का खयाल रख कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


तुम्हें लगता है की ये दुनिया बड़ी हसीन है सब के लिए!

जरा बंदिशों के साये में एक सांस भर कर तो देखो। 

सम्मान बस एक दिन के फूल और तोहफों में नहीं है,

इनकी रूह का बोझ हर रोज़ अपनी रूह पर धर कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


सिर्फ इनका बखान नहीं, इनका संघर्ष चख कर देखो,

मुश्किल है ये होना, बस एक बार औरत बन कर तो देखो। 

इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


- अमितेश