सर्दियों के दिन थे। पटना इस बार कुहासे से भरा था। अच्छी कंपकपाती ठंढ थी। सुबह के 7 बजे, स्कूल बस के स्टॉप पर कोहरे की चादर लिपटी हुई थी। समर हमेशा की तरह अपनी भारी-भरकम स्कूल बैग टांगे, ठंड से काँपते हुए खड़ा था। तभी शर्मा जी की चाय की दुकान से उठते धुएं के बीच, मायरा वहाँ आई। नीले रंग का स्कूल स्वेटर, दो चोटियाँ और ठंड से लाल नाक—वह बिल्कुल किसी परी जैसी लग रही थी।
मायरा ने अपनी सहेली से कहा, "यार, इतनी ठंड है कि हाथ जम गए हैं, काश गरम-गरम चाय मिल जाती।"
समर ने यह सुना। उसमें इतनी हिम्मत तो नहीं थी कि मायरा से सीधे बात कर सके, लेकिन उसने जेब में हाथ डाला—कुल 10 रुपये का सिक्का था। वह चुपके से शर्मा जी की दुकान पर गया और बोला, "अंकल, एक चाय को दो कप में आधा-आधा कर दो।"
समर ने एक कप मायरा की तरफ बढ़ाते हुए बिना उसकी आँखों में देखे कहा, "ठंड बहुत है... पी लो।" मायरा ने मुस्कुराते हुए चाय ले ली। उस दिन पहली बार चाय की चुस्की के साथ दोनों के दिलों में एक अनजानी सी गर्माहट घुल गई थी। शायद ये स्कूल के दिनों के मासूम प्यार के पहली दस्तक थी। मायरा के चाय ले लेने से समर में थोड़ी सी हिम्मत आ गयी थी कुछ और बात करने की।
ऐसे ही उनकी दोस्ती बढ़ रही थी। ये दोस्ती हालांकि बस स्कूल में मिलने तक ही था। वैसे भी नौवीं कक्षा की दोस्ती ऐसे ही धीमे धीमे आंच पर पक कर निखरती है। धीरे-धीरे वक्त बीता। अब दोनों दसवीं क्लास में आ चुके थे। समर मैथ्स में थोड़ा कमज़ोर था और मायरा क्लास की टॉपर।
एक दिन जब लंच ब्रेक के बाद 'फ्री पीरियड' था, तो समर ने हिम्मत जुटाकर मायरा से पूछा, "क्या तुम मुझे ट्रिग्नोमेट्री के कुछ फॉर्मूले समझा दोगी?"
मायरा ने पलकें झुकाकर हंसते हुए कहा, "समझा तो दूंगी, लेकिन मेरी फीस लगेगी!"
"क्या?" समर ने घबराते हुए पूछा।
"स्कूल की छुट्टी के बाद, शर्मा जी की दुकान की अदरक वाली चाय और एक समोसा।" मायरा ने आंख मारते हुए कहा।
उस दिन के बाद से, स्कूल की छुट्टी के बाद का वह आधा घंटा दोनों की ज़िंदगी का सबसे पसंदीदा वक्त बन गया। स्कूल के भारी सिलेबस और बोर्ड एग्जाम के तनाव के बीच, वह नुक्कड़ वाली चाय उनके लिए सुकून का जरिया बन गई थी।
वक्त पंख लगाकर उड़ गया। 12वीं का फेयरवेल आ गया। सब एक-दूसरे की शर्ट पर ऑटोग्राफ लिख रहे थे, यादें समेट रहे थे। समर सफेद शर्ट और ब्लेज़र में था, और मायरा खूबसूरत नीली साड़ी में। दोनों ही जानते थे कि इसके बाद दोनों के रास्ते अलग होने वाले थे—मायरा को आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर जाना था।
भीड़ से दूर, दोनों आखिरी बार उसी शर्मा जी की चाय की दुकान पर आकर बैठे थे। माहौल में एक अजीब सी खामोशी थी।
शर्मा जी ने दो कप चाय टेबल पर रखी और मुस्कुराते हुए बोले, "आज तो विदाई है बच्चों, आज चाय के पैसे मैं नहीं लूंगा।"
समर ने चाय का कुल्हड़ हाथ में पकड़ा और मायरा को देखते हुए कहा, "यार मायरा, शहर बदल जाएगा, कॉलेज बदल जाएगा... पर क्या यह चाय का स्वाद कभी बदलेगा?"
मायरा ने चाय की चुस्की ली, उसकी आँखों में हल्के से आंसू थे। उसने अपनी डायरी से एक पन्ना फाड़कर समर की हथेली पर रख दिया और कहा, "स्वाद तो नहीं बदलेगा समर, और न ही यह चाय वाला प्यार। जब भी तुम्हारी याद आएगी, मैं एक कप अदरक वाली चाय बना लूंगी।" डायरी के उस पन्ने पर मायरा ने समर के साथ की पहली चाय के अनुभव को लिखा था। लिखा था की कैसे समर ने उसके दिल की बात समझ ली थी। और लिखा था की क्या हम दोनों आजन्म एक दूसरे के साथ रोज सुबह ऐसी ही अदरक वाली चाय पी पाएंगे। समर में ये पढ़ कर और भी बेचैनी आ गयी थी। जिन आंसुओं को वो अब तक संभाले बैठा था, उसने कब उसका दामन छोड़ दिया पता भी नहीं चला। शर्मा जी की चाय की दूकान की उस बेंच पर दोनों एक दूसरे का हाथ थामे रोते जा रहे थे। शर्मा जी ने ये देख कर भी अनदेखा कर दिया था। वो सालों से ये देख रहे थे। हर साल कोई ना कोई जोड़ा ऐसे ही बैठे आँसू बहता है की आजन्म हम एक दूसरे के दोस्त बने रहेंगे और फिर जिंदगी उन्हें इतने थपेड़े मारती है की ये सब कुछ समय में ही लोग भूल जाते हैं।
बरसों बीत गए। समर ने MBA के बाद एक बड़ी Pharma कंपनी में नौकरी शुरू कर दी थी। कुछ बरस में वो कंपनी की GM बन गया था और कंपनी के HO में दिल्ली में बैठने लगा था। बचपन के स्कूल का वो प्यार और दोस्ती अब बस यादों में रह गयी थी।
एक दिन उसने दिल्ली में मार्किट वर्किंग की सोची और वहां के रीजनल मैनेजर को बोला की कुछ अच्छे डॉक्टर्स की visit का प्लान करो।
अगले दिन वो अपनी कंपनी के लड़को के साथ डॉक्टर विजिट कर रहा था। सभी लोग एक Poly Clinic में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। उनकी कंपनी का नाम पुकारा गया। वो उस डॉक्टर के चैम्बर में जैसे ही गए, समर चौंक गया। वहां मायरा, डॉक्टर मायरा बैठी थी। अभी भी उतनी ही खूबसूरत थी। या शायद ज्यादा ही खूबसूरत हो गयी थी। वो शहर की मानी हुई neurologist थी।
मायरा ने समर को देखा, मुस्कुराई और बोली, "चाय की फीस बाकी थी न तुम्हारी? आज समोसा मेरी तरफ से!" और उस चैम्बर में उन दोनों के ठहाकों की आवाज गूंज उठी थी।
सालों बाद, स्कूल का वह मासूम प्यार एक बार फिर चाय की खुशबू के साथ ज़िंदा हो गया था। अब रास्ते अलग नहीं होने वाले थे, क्योंकि इस बार चाय की चुस्की के साथ एक नई कहानी की शुरुआत हो रही थी।
जरुरी नहीं की एक साथ एक ही मंजिल को चले तो ही प्यार मुकम्मल होता है। अहलदा मंजिल आँखों में लिए भी अगर कुछ पल को हमारे रस्ते एक दूसरे से मिले तो एक नए रिश्ते की नयी शुरुआत हो सकती है। आज इसी नए रिश्ते की शुरुआत समर और मायरा की ज़िन्दगी में हुई थी।
- अमितेश
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