गुरुवार, 14 मई 2026

दहेज़

वो रस्मों वाला सोना - चाँदी, अब पुराने दौर की बातें,

मुझे तो दहेज में चाहिए, तुम्हारी वो बीती यादें। 


सहेज कर लाना वो किस्से, तुम्हारे लड़कपन के,

वो बेफिक्र लम्हें, वो लहकते टेसू तुम्हारे सावन के। 


अपनों से जो वादे किये, उन्हें साथ ले आना तुम,

अपने अधूरे ख़्वाबों की चादर, संग ओढ़ आना तुम। 


उम्र भर हम दोनों मिलकर, हर वो वादा निभाएंगे,

तुम्हारे अपूर्ण सारे सपनों को, हमारी हकीकत बनाएंगे। 


दहेज में बस तुम्हारी वो निर्मल मुस्कान चाहिए,

वो चंचलता, वो शरारतें, उनसे तेरी पहचान चाहिए। 


खाली हाथ मत आना, अपनी यादों के झोले भर लाना,

मेरे घर की चौखट पर, तुम अपना पूरा बचपन ले आना। 


दहेज़ में मत लाना तुम, कोई गहना या लिबास महंगा,

मुझे तो चाहिए तुम्हारी सादगी, तुम्हारा हर सुन्दर सपना। 


अपनी सांसों में बसा कर लाना, अपने पुराने घर की खुशबू,

जो हमारे नए आँगन में बिखेरे अपनी महकती जुस्तजू। 


तुम लाना वो पुरानी चिट्ठियाँ और डायरी के कुछ पन्ने,

जिसमे लिखी हो वो गीत, जो तुम्हे थे सब से सुनने।  


वो खिलखिलाहटें संग लाना,  तुमने दीवारों के दरमियाँ  छोड़ी हैं,

वो सारी उम्मीदें भी लाना, जो खुद की रूह से जोड़ी है। 


कोई शर्त नहीं, कोई मांग नहीं, बस साथ तुम्हारा काफी है,

मेरे एकांकी जहाँ में, बस एहसास तुम्हारा काफी है।  


तुम आना तो संग अपने, अपना पूरा जहाँ ले आना, 

दहेज में मेरी जान, सिर्फ और सिर्फ साथ अपने मेरी जान ले आना। 


- अमितेश 


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