गुरुवार, 14 मई 2026

महबूबा

नागिन सी बिखरी हैं तेरी ज़ुल्फ़ें 
सुना है सपेरे रखे हैं इन्हें संवारने को। 
क़ातिल है तेरी नज़रों का वार भी,
क्या फ़ौज बुला रखी है हमें मारने को ?

सुना है तेरी मुस्कुराहट पर पहरे हैं बहुत,
जैसे कोई खजाना छुपा हो किसी पुरानी ग़ार में। 
हम भी दीवाने हैं, पीछे हटने वाले नहीं,
चाहे उम्र गुज़र जाए इसी तकरार - ओ - इज़हार में। 

यूँ तो महफ़िल में चरागों की कमी नहीं,
लोग पर परवाने बने हैं, तेरे हुस्न - ओ - शबाब में। 
हवाओं को कह दो ज़रा अदब से गुजरे,
तेरी ज़ुल्फ़ों में अटक कई मरे, जो थे कभी रफ़्तार में। 

सितारे भी अब फ़लक  जासूसी करते हैं,
कि ज़मीं पे ये चाँद कहाँ से उतर आया है?
तेरी सादगी ही काफी थी होश उड़ाने के लिए,
फिर ये सपेरों का लश्कर क्यों साथ आया है!


# ग़ार  - गुफा 


- अमितेश 
 

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