गुरुवार, 14 मई 2026

पौरुष

आकाश की असीम ऊंचाई से लगता कोई हमें चला रहा है,
किस्मत की बंद किताबों में,क्या लिखा, न कोई बता रहा है। 

हार के हम जब बैठ जाते, मान कर किस्मत में यही लिखा था,
अपनी नाक़ामियाँ हम अक्सर, मान लेते दैव था, सही था। 

भाग्य कहता - "तुम इंसान हो, मिट्टी के पुतले भर हो 
मेरी हाथ की कठपुतली हो, इशारों पे मेरे हिल भर लेते हो। 

मेरी कृपा पर जीना है तुमको, मेरी मंजूरी पर मरना है,
जो लिख दिया तेरे माथे पर, वही तुम्हे अब सहना है। 

तभी मन के रोशन कोने से, आवाज कर्म की आती है,
हाथों की बिखरी लकीरों में, एक नयी आस जगाती है। 

पसीने की हर एक बूंद से, नया इतिहास रचा जाता है,
जब इंसान ठान लेता है, भाग्य भी झुक जाता है। 

माना किस्मत में हाथों में, कुछ उलझी लकीरें उकेरी हैं,
माना रास्ते मुश्किल-से हैं, और राहों में जंजीरे दी है। 

पर इंसा में हौसला हो तो, सूरज भी निकल आएगा,
मेहनत की आग में तप कर, सोई किस्मत निखर जायेगा।  

प्रकृति भी रास्ता देती, जब पौरुष नहीं लड़खड़ाते हैं,
किस्मत के लिखे पन्ने भी, मेहनत से बदल जाते हैं। 

- अमितेश  

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