जयंतो दा पिछले 50 वर्षों से इस छोटे से चाय की दूकान से चाय और बातें बांट रहा था। उसकी ये दूकान एक पुरानी, जर्जर ईमारत के एक छोटे से खांचे में था। दुकान के नाम पर एक सायोनारा कंपनी की लकड़ी की रेडिओ, एक केरोसिन का स्टोव और 2 लकड़ी के बेंच लगे थे। दूकान की ये पूरी जायदाद जयंतो दा जितना ही पुराना था।
यह दूकान जिस ईमारत में थी, कहते हैं वह कभी डॉ कादम्बनी गांगुली की थी। डॉ गांगुली हिंदुस्तान की पहली महिला डॉक्टर थी। जयंतो दा अक्सर कहा करता था की डाक्टर दीदी को उसकी चाय बहुत पसंद थी। वो जब भी घर पे आती, एक चुक्का चाय उससे जरूर पीती थी।
यह दूकान शहर की भाग दौड़ से थोड़ा परे ही था। शोर के नाम पर इस दूकान की स्टोव का आवाज़ और रेडिओ से आती हुई गाने की आवाज़ के अलावा और कुछ नहीं था। रेडिओ भी गाने ऐसे बजता जैसे ये आखरी गाना बजा रहा हो बंद होने से पहले।
जयंतो दा हालाँकि अब 70 का हो गया था, पर अभी भी कलकत्ता के लोगों के लिए दादा ही था। अक्सर उसकी दूकान पर थोड़े पुराने लोग ही आते थे। गाहे बगाहे कोई जवान आ जाता तो चाय से ज्यादा जयंतो दा की बातों से प्रभावित हो जाता।
वो एक उमस भरी दोपहर थी। जयंतो दा की दूकान पे उस वक़्त कोई नहीं था। वो अकेला अपनी लुंगी ऊँची किये बेंच पर बैठा था। अलसायी रेडिओ किशोर दा का गाना पूरी ताकत लगा कर बजा रहा था। तभी एक बड़ी गाड़ी उसकी दूकान पे आ कर खड़ी हो गयी। सूट पहने एक चालीसेक साल का आदमी गाड़ी से उतरा और दूकान पे रखी दूसरी बेंच पर बैठ गया। वो परेशान सा लग रहा था और एकटक आकाश की ओर देख रहा था। ऐसा लग रहा था की ऊपर देख कर अपने आंसुओं को संभालने की कोशिश कर रहा हो।
जयंतो दा थोड़ी देर उससे देखता रहा। फिर उसके करीब आ कर बोला, "दादा चाय खाबे।"
उसने आसमान से नज़र फेर कर एक बार जयंतो दा की ओर देखा और फिर वापस आसमान पे केंद्रित हो गया। कोई जवाब नहीं दिया।
जयंतो दा ने थोड़ी और आत्मीयता से बोला, "दादा चाय भले थोड़ी कड़वी लगे लेकिन अभी थोड़ा सुकून देगी।"
वो थोड़ा खीज कर बोला, "मुझे चाय नहीं, पैसे की ज़रूरत है। मेरा पूरा बिज़नेस डूब गया है। मैं सड़क पे आ गया हूँ। शायद ये मेरे जीवन के कुछ आखरी पल हैं जो आपकी दूकान पर बिता रहा हूँ।" बोलते बोलते आंसुओं की एक झड़ी जो अब तक दबी थी अपना दायरा छोड़ बह गयी।
जयंतो दा ने उससे चाय का गिलास पकड़ाया और बोला, "दादा वो छोटा पौधा देख रहे हो जो मेरी दूकान की दरार में उग आया है।"
उसने इशारे से एक छोटे से पौधे को देखने को बोला जो उस जर्जर मकान के एक दिवार से अपना वजूद दर्ज कर रहा था।
"इस पौधे की ना तो अपनी जमीन है, ना मिट्टी, ना खाद। फिर भी वो उग गया है। उससे पता है की चाहे कुछ भी उसके पास ना हो, सूरज तो उसका है ना। वो उसे देख कर बढ़ रहा है। उसे यह भी नहीं पता कब तक बड़ा होगा, लेकिन उसने बढ़ना नहीं छोड़ा है। क्या तुम्हारे पास इतना हौसला भी नहीं की अपना सूरज तलाश कर बढ़ पाओ?"
जयंतो दा की इस बात ने उसपे गहरा असर किए। एक घूँट में पूरी चाय ख़तम की, और उठ खड़ा हुआ। अपनी जेब से 50 का नोट निकाला और जयंतो दा को देने लगा।
जयंतो दा ने वो नोट लिया, उसे तह किया और वापस उसकी जेब में रख दिया और बोलै, "अगली बार लूंगा, जब तुम मुस्कराते हुए मेरी दूकान पे आओगे।" और एक पहचानी सी मुस्कान बिखेर दी।
वो आदमी वापस अपनी कार की तरफ जाने लगा, लेकिन इस 10 मिनट ने उसमे एक गजब का आत्मविश्वास भर दिया था।
आज दो बरस बाद फिर वो आदमी जयंतो दा की दूकान पे अपनी पहले से भी बड़ी गाड़ी में आया। गाड़ी खड़ी की और एक भरी मुस्कान में जयंतो दा से बोला, "दादा एक कड़वी चाय पिलाना।"
जयंतो दा ने अपना चश्मा ठीक करते हुए उसे देखा पहचान गया। वो आदमी जयंतो दा के करीब जा कर उसके पैर को छुआ और एक लिफाफा निकाल कर जयंतो दा को देते हुए बोलै, "दादा ये आपके उस चाय का पैसा जिसने मुझे हारने नहीं दिया। आज मेरे पास पहले से ज्यादा पैसे हैं और उससे भी कीमती, आपका दिया हुआ हौसला है। बहुत धन्यवाद दादा। आपने मुझे एक नया जीवन दिया है।"
जयंतो दा ने लिफाफे से एक सिक्का निकाला और लिफाफा वापस उसे दे दिया। "मेरे चाय की कीमत तो तुम्हारे चेहरे पर फैली है, ये एक रुपया मेरा ईनाम है। जीते रहो बेटा।"
सायनोरा रेडिओ पर गाना बज रहा था, वो आदमी जयंतो दा के साथ बेंच पर बैठा चाय पी रहा था और रेडिओ के गाने से तेज उनके खिलखिलाने की आवाज़ उस शांत सी सड़क पर गूंज रही थी।
-अमितेश