गुडलक कैफ़े, शहर के एक मशहूर सड़क की सबसे मशहूर कैफ़े। ये ख़ास तौर पर नौजवानों में ज्यादा चर्चित कैफ़े था। इनके बन मस्का और ईरानी चाय का लगभग पूरा शहर दीवाना था।
कहते हैं की इसका मालिक कुछ 70 साल पहले भारत आया था और पुणे शहर उसे काफी पसंद आ गया था। फिर तो वो पुणेकर ही बन गया। उसने यहाँ पर एक छोटी सी चाय की दूकान खोली थी इसी नाम से। वो बन मस्का और ईरानी चाय बना कर यहाँ बेचता था। ईरानी चाय इस शहर के लिए एक नया जायका था। यह जल्दी ही सबके जुबान पर चढ़ सा गया। पहले तो आर्मी के लोग यहाँ आया करते थे। धीरे धीरे पूरा शहर यहाँ उमड़ने लगा। जल्द ही ये एक छोटी दूकान से ये बड़ा cafeteria बन गया था। हालाँकि पिछले 60 - 65 वर्षों से यहाँ कोई और नया निर्माण नहीं हुआ था। उनका मानना था की वो कैफ़े की बिल्डिंग पर ध्यान देने के बजाय अपनी चाय पर ज्यादा ध्यान देंगे। आज भी वहां लगे बेंच और कुर्सियां 60 - 65 वर्ष पुराने थे।
दिवाकर जी यहाँ वर्षों से आ रहे थे। ठीक पाँच बजे वो यहाँ आते, सड़क की तरफ की खिड़की के पास लगे टेबल पर बैठते और दो कप ईरानी चाय मंगवाते, थोड़ी कम चीनी वाली। अपनी चाय पीते और कभी अपने सामने की कुर्सी को देख कर मुस्कुरा देते फिर खिड़की से बाहर आती जाती गाड़ियों और लोगों को जैसे पहचानने की कोशिश करते रहते। लगता वो किसी के साथ बैठ कर चाय पी रहे हों और बीच बीच में उसकी बातों पर मुस्कुरा देते हों। घंटे भर तक यही चलता और फिर वो अपनी चाय ख़तम कर के एक भरी ठंडी कप चाय वहीं छोड़ के चले जाते। आसपास के लोगों को लगता की शायद बुढ़ापे और अकेलेपन में वो सठिया गए हों। लेकिन कैफ़े का वेटर जानता था कि यह पागलपन नहीं, प्रेम है, इबादत है।
ऐसे ही एक शाम दिवाकर जी बैठे अपनी चाय पी रहते थे और खुद में ही खोये थे। पास ही एक जोड़ा बैठा अपनी बातों के बीच में उन्हें देख लेता था। थोड़ी देर तक तो वो बस दिवाकर जी को देखते रहे लेकिन फिर उनसे रहा नहीं गया। वो उनकी टेबल पर आ गए और बड़े ही स्नेह से पूछा, "बाबा मैं आपको कुछ दिनों से देख रहा हूँ, आप आते हैं, दो कप चाय मंगवाते हैं, एक कप पीते हैं और दूसरा छोड़ के निकल जाते हैं। आप किसी का इंतज़ार कर रहे हैं क्या?"
दिवाकर जी ने नज़रे उठाई, जैसे अपनी तन्द्रा से बाहर आये हों। अपना चश्मा उतारा और एक फीकी मुस्कान बिखेरी। बोले, "बेटा मैं और सरिता इसी रोड की कॉलेज में पढ़ते थे। यहाँ हम अक्सर आते, उसकी पसंद की चाय पीते और अपने अपने घर चले जाते। मैं उन दिनों चाय नहीं पीता था। सरिता ने मुझे चाय की आदत लगा दी थी। उन दिनों Love Marriage इतना आसान नहीं था। हमने जमाने से लड़ कर शादी की थी। 40 साल तक हमदोनो साथ थे। 3 साल पहले वो मुझे छोड़ कर कभी वापस नहीं आने के लिए चली गयी।" दिवाकर जी की आँखें थोड़ी नम हो गयी थी। अपनी आँखों के समुन्दर से पार पाते हुए बोले, "लेकिन मेरा दिल आज भी यह मानने को तैयार नहीं की वो अब मेरे साथ नहीं है। मैं रोज उसकी उपस्थिति अपने आसपास ही देखता हूँ। हम आज भी रोज साथ में यहाँ चाय पीते हैं। इस एक घंटे में वो मुझसे बाते करती है, मुझे हंसाती है, चिढ़ाती है, ढ़ेर सारी बाते करती है फिर जाने की ज़िद करने लगती है। बस उसके साथ ये एक घंटा रोज बिताने के लिए यहाँ आ जाता हूँ।"
दिवाकर जी बोलते बोलते अपनी कुर्सी से उठे, सामने की ठंडी हो चुकी प्याली को छूकर महसूस किया और बोले, "यह प्याली ठंडी जरूर हो गयी है लेकिन उसकी यादों की गर्माहट आज भी मैं इनमे महसूस करता हूँ।" बोलते बोलते वो वेटर को दो कप चाय के पैसे दिए और जाने लगे। जाते जाते सामने की कुर्सी को थोड़ा थपथपाया और हल्की आवाज में बोले, "कल फिर मिलेंगे, तुम नाराज़ मत होना।"
खन्ना जी ने चश्मा उतारा और भीगी नज़रों से उसे देखा। उन्होंने कहा, "बेटा, मेरी पत्नी को इलायची वाली कम चीनी की चाय बहुत पसंद थी। चालीस साल तक हमने साथ बैठकर चाय पी। पाँच साल पहले वो चली गई, पर मेरा दिल यह मानने को तैयार नहीं होता।"
वो नौजवान जोड़ा उन्हें जाते हुए बस देख रहा था। अपनी प्रेमिका को उस नौजवान ने कस के पकड़ लिया और बोला, "तुम मुझे छोड़ कर कभी मत जाना। मैं हमेशा तुम्हारे साथ बैठ कर चाय पीना चाहता हूँ।" लड़की की आँखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे।
- अमितेश