मंगलवार, 26 मई 2026

एक कप ईश्वर

अमित पिछले सात दिनों से बनारस की गलियों में भटक रहा था। किसी ने कहा था काशी के हर कंकड़ में शंकर का वास है। मोक्ष का द्वार है ये शहर। जीवन में कई उतार चढ़ाव के बाद उसे एक आत्मिक शांति चाहिए थी। इसी अभिलाषा में वह काशी में आ गया। अपना बचा हुआ सबकुछ छोड़ कर। 


वह यहाँ ईश्वर को ढूंढने निकला था। उसने घाटों पर संन्यासियों के प्रवचन सुने, घंटों आंखें बंद करके ध्यान लगाया, विश्वनाथ मंदिर की मंगला आरती में कतारों में खड़ा रहा, लेकिन उसके अंदर की बेचैनी शांत नहीं हुई। उसे हर जगह सिर्फ मंत्रों का शोर और अनुष्ठानों की औपचारिकताएं दिखाई दे रही थीं। ईश्वर का दर्शन जिसके लिए वह सब कुछ छोड़कर आया था, अब भी एक अधूरा ख्वाब था।


मणिकर्णिका पर जलती चिता से उठते धुँए में वो ईश्वर की आकृति ढूंढता। योग करते हुए ध्यान में वो ईश्वर को देख पाने के कोशिश करता। गंगा में नाव पर सवार हो गंगा आरती में ईश्वर को तलाशता। हर इंसान, हर साधू, हर अघोरी, हर नागा साधु में वो शंकर को देखने की कोशिश करता।  लेकिन इस एक हफ्ते में उसे कहीं कुछ नहीं  मिला, सिवाय निराशा के।  


एक ढलती शाम, जब गंगा की लहरों पर दीयों की रोशनी तैर रही थी, अमित थका - हारा अस्सी घाट की एक सीढ़ी पर बैठ गया। वहां बैठे बैठ वो अपने पिछले कुछ वर्षो को याद कर रहा था और सोंच रहा था कहाँ उसने गलती कर दी। कब उसे ईश्वर के दर्शन होंगे जो उसे उसकी इस परिस्थिति से निकालेंगे। कब वो वापस पहले जैसी ज़िन्दगी जी पायेगा। वो अपनी गहन सोंच में था। तभी उसकी नाक से एक सोंधी, कड़क खुशबू टकराई। पास ही एक बूढ़े बाबा अपनी छोटी सी दूकान पर पीतल के बड़े से डोंगे में चाय खौला रहे थे। ये सोंधी खुशबु ऐसी थी जैसे उसे अपनी ओर खींच रही हो। 


अमित उठकर वहाँ गया और बोला, "बाबा, एक चाय देना।"


बाबा ने उसकी तरफ देखा। उनकी आँखों में गजब की चमक थी और चेहरे पर बनारसी बेफिक्री। उन्होंने बिना कुछ बोले मिट्टी का एक साफ कुल्हड़ उठाया, उसमें खौलती हुई अदरक-इलायची वाली गाढ़ी चाय छानी और अमित की तरफ बढ़ा दी।


अमित ने कुल्हड़ को दोनों हाथों में पकड़ा। मिट्टी की सोंधी महक और चाय की गर्माहट ने उसकी उंगलियों के जरिए उसके पूरे शरीर को छुआ। उसने पहली चुस्की ली। चाय का स्वाद सीधे उसकी रूह तक गया।


"चाय कैसी है बाबू?" बाबा ने अपनी धोती का कोना संभालते हुए पूछा।


"बहुत अच्छी है बाबा। काशी में हर जगह चाय अच्छी ही मिलती है, पर इस चाय में कुछ अलग सुकून है," राघव ने थके हुए स्वर में कहा। फिर एक ठंडी सांस लेकर आगे बोला, "पर मन का सुकून गायब है बाबा। सात दिन से काशी में हूँ, हर घाट छान मारा, हर मंदिर हो आया, पर ईश्वर का कोई दर्शन, कोई अहसास नहीं हुआ।"


बाबा मुस्कुराए। उन्होंने अंगीठी में एक कोयला और डाला और बोले, "बाबू, तुम ईश्वर को देखने आए हो या ढूंढने? जो ढूंढने निकलता है, वह अपनी धारणाओं का चश्मा पहन कर निकलता है। वो ईश्वर की एक तस्वीर दिमाग में रख कर आता है। वैसी ही तस्वीर जैसी घर के कैलेंडर या नाटकों में दिखाया जाता है। वह सोचता है कि ईश्वर किसी खास भेष में मिलेंगे जो बाकियों से अलहदा होगा।"


बाबा ने अमित के कुल्हड़ की तरफ इशारा किया, "इस चाय को देखो। इसमें दूध, पानी, चायपत्ती, अदरक, चीनी... सबने अपना अस्तित्व मिटा दिया, तब जाकर यह अमृत बनी। जब तक तुम खुद को, अपने अंदर बसे अहंकार को, इस काशी की गंगा में पूरी तरह विसर्जित नहीं कर दोगे, तब तक उसका दर्शन कैसे होगा? विसर्जन ही तो दर्शन की पहली सीढ़ी है।"


अमित बाबा की बात सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने चाय का दूसरा घूंट लिया। इस बार स्वाद और गहरा लगा।


घाट पर शंख की आवाजें गूंजने लगी थीं। गंगा आरती शुरू हो चुकी थी। अमित ने सामने देखा, जहाँ हज़ारों लोग हाथ जोड़े खड़े थे। कोई अमीर था, कोई गरीब, कोई विदेशी सैलानी था, तो कोई सन्यासी। लेकिन बिना किसी विद्वेष के सब एक ही कतार में खड़े थे। वैसे ही अभिभूत हो हाथ जोड़े जैसे उन्होंने ईश्वर को खुद के भीतर पा लिया हो। 


बाबा ने अमित के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "बाबू, इस घाट पर देखो। एक तरफ महाश्मशान पर चिताएं जल रही हैं, जो सत्य का अंत हैं। दूसरी तरफ गंगा की लहरें हैं, जो जीवन का प्रवाह हैं। और इन दोनों के बीच यह चाय की दुकान है, जहाँ हर कोई एक समान है। यहाँ राजा आए या रंक, कुल्हड़ सबको मिट्टी का ही मिलता है। चाय सबके लिए एक ही डोंगे में बनाई जाती है। चाय भी अपना रंग उनके आर्थिक या सामाजिक स्थिति को देख कर नहीं बदलती।"


बाबा ने अपनी दार्शनिक आवाज़ में कहा, "ईश्वर कोई मूर्ति नहीं है बाबू जो कहीं छिपी है। वह इस चाय के स्वाद की तरह है - जो अदृश्य है, पर जिसका अहसास हर घूंट में है। वह इस चाय बेचने वाले में भी है, उस चिता की राख में भी है, और इस बहती गंगा में भी है। सब एक ही तो हैं। इसी को तो बनारस में 'अद्वैत' कहते हैं।"


अमित ने कुल्हड़ की आखिरी चुस्की ली। चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन उसका स्वाद और बाबा के शब्द उसके भीतर एक अद्भुत शांति भर चुके थे। उसकी सातों दिन की थकान और छटपटाहट गायब हो चुकी थी।


उसने जेब से पैसे निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, तो बाबा ने हंसकर मना कर दिया, "अरे छोड़ो बाबू! आज की चाय का पैसा नहीं, बस प्रसाद समझो। जब ज्ञान मिल जाए, तो गुरु दक्षिणा में अपनी चिंताएं यहीं छोड़ दी जाती हैं।"


अमित ने झुककर बाबा के पैर छुए। जब वह सीधा हुआ, तो उसे लगा कि सामने खड़े बूढ़े चाय वाले के भीतर से साक्षात शिव मुस्कुरा रहे थे। उसे मंदिर के गर्भगृह में जो गर्माहट महसूस नहीं हुई थी, वह उस मिट्टी के कुल्हड़ को छूकर मिल गई थी।


उसने खाली कुल्हड़ को जमीन पर पटका। कुल्हड़ टूटकर वापस मिट्टी में मिल गया - ठीक वैसे ही, जैसे अमित का भ्रम टूटकर बनारस की मिट्टी में विलीन हो चुका था।


आरती के दीयों की रोशनी में गंगा माँ मुस्कुरा रही थीं, और अमित को उसका दर्शन एक कप चाय के बहाने मिल चुका था। आज उसका काशी भ्रमण पूरा हो गया था, या शायद वो काशी का ही हो गया था। 



 - अमितेश 

एक कप दुआएँ

शहर के कोने पर 'मुरली काका' की एक पुरानी चाय की टपरी थी। ये टपरी शहर में मशहूर थी अपनी चाय के लिए। शहर का शायद ही कोई हो जिसने कभी मुरली काका की चाय ना पी हो। वहाँ बड़े-बड़े साहब भी आते और मज़दूर भी। चाय की कीमत ऐसी की कोई भी उसे खरीद ले। स्वाद ऐसा की लोगों की जुबान पे चढ़ जाये। 

मुरली काका का एक नियम था - वे अपनी दुकान के एक बोर्ड पर 'किसी की चाय' का हिसाब रखते थे। इसका मतलब था कि कोई अमीर ग्राहक अपनी चाय के पैसे देते वक्त एक अतिरिक्त चाय के पैसे दे जाता, जिसे काका बोर्ड पर एक चॉक से निशान बना देते। जब कोई बेसहारा या भूखा आता, तो वह बोर्ड देखकर एक चाय मांग लेता। उसे वो चाय मुफ्त में दे दी जाती। लोग अक्सर वहां 1 या ज्यादा चाय का पैसा दे कर जाते। मुरली काका नियम से उस एक्स्ट्रा चाय का निशान उस बोर्ड पे लगा देते। 

एक दिन एक बहुत ही रईस व्यापारी वहाँ रुका। उसने यह सब देखा और हँसकर बोला, "काका, ये क्या नाटक है? जिसे दान देना है, वो सीधे क्यों नहीं देता? एक कप चाय से किसी का क्या भला होगा?"

काका चुप रहे। तभी एक बूढ़ा, फटेहाल आदमी वहाँ आया। उसने बोर्ड पर नज़र डाली, एक निशान देखा और काका से कहा, "काका, एक चाय पिला दो।"

काका ने बड़े सम्मान के साथ उसे गरम चाय और दो बिस्किट दिए। उस बूढ़े के चेहरे पर जो सुकून और मुस्कान आई, वह देखने लायक थी। वह अपनी फटी जेब से पैसे निकालने की शर्मिंदगी से बच गया था, क्योंकि उसकी चाय का पैसा पहले ही कोई दे चुका था।

जब वह चला गया, तो मुरली काका ने उस व्यापारी से कहा, "साहब, आपने पूछा था कि एक कप चाय से क्या होगा? उस बूढ़े आदमी ने भीख नहीं मांगी, उसने अपना हक माँगा। इस चाय ने उसका पेट ही नहीं भरा, उसकी 'इज़्ज़त' भी बचा ली। दान वो नहीं जो हाथ फैलाकर लिया जाए, दान वो है जो लेने वाले को ये अहसास भी न होने दे कि वो किसी का कर्जदार है।"

व्यापारी की आँखों से अहंकार का पर्दा हट गया। उसने अपनी जेब से पाँच सौ का नोट निकाला और कहा, "काका, आज इस बोर्ड पर पचास चाय के निशान और लगा दो। मैं आज तक सिर्फ दौलत कमा रहा था, आज समझ आया कि दुआएँ कैसे कमाई जाती हैं।"

मदद की कीमत बड़ी नहीं होती, मदद का तरीका उसे महान बनाता है। फिर चाय भी किसी की मदद हो सकती है, मुरली काका पुरे शहर को ये सीखा रहे है, सालों से। 


- अमितेश 


 

एक कप मोहब्बत

राघव अपने कमरे की बालकनी में बैठा हुआ था। हाथ में लैपटॉप था, लेकिन ध्यान स्क्रीन पर नहीं, बल्कि सामने की दीवार पर था। पिछले कुछ महीनों से उसके और उसकी पत्नी, अंजलि के बीच बातचीत जैसे खत्म ही हो गई थी। ऐसा लगने लगा था जैसे वो दोनों अपने रिश्ते की आखिरी पड़ाव पर हों। शायद ये ज्यादा ना चले अब। छोटी छोटी बातें भी बतंगड़ बन जा रही थी। दोनों ही किसी भी बात को नज़रअंदाज़ करने के मूड में नहीं होते थे। 

दोनों एक ही घर में रहते थे, लेकिन दो अलग-अलग द्वीपों की तरह। ऑफिस का तनाव, आगे बढ़ने की होड़ और रोज़मर्रा की भागदौड़ ने उनके बीच एक खामोश दीवार खड़ी कर दी थी। अब बस निभ रही थी। कब तक निभेगी पता नहीं। दोनों ही जैसे पति पत्नी होने का किरदार अदा कर रहे हो जैसे। जो कोई एक दूसरे की मदद भी करता तो एक्टिंग लगती। भाव मरते जा रहे थे दोनों के बीच। एक ही बेड पर सोते पर एक दूसरे की ओर पीठ कर के। 


अंजलि रसोई में थी। शाम के छह बज रहे थे। वह जानती थी कि राघव के सिर में दर्द है, और इस वक्त उसे किसी दवा से ज़्यादा एक कप कड़क चाय की ज़रूरत है।

अंजलि ने गैस पर सस्पेन चढ़ाया। पानी उबलने लगा। उसने उसमें चायपत्ती, थोड़ी सी चीनी और कूटकर अदरक डाली। अदरक की वो चिरपरिचित खुशबू पूरे घर में फैलने लगी। यह वही खुशबू थी, जिसने कभी उनके नए-नवेले रिश्ते में मिठास घोली थी।

चाय उबल रही थी और अंजलि की आँखों में पुरानी यादें तैर रही थीं। उसे याद आया जब वे दोनों कॉलेज में थे। टपरी की वो ₹5 वाली चाय, जिसे वो दोनों एक ही कुल्हड़ में शेयर करते थे। बारिश के दिनों में राघव का भीगते हुए सिर्फ इसलिए आना कि वे साथ में चाय पी सकें।

"चाय सिर्फ एक ड्रिंक नहीं है अंजलि, यह दिल की बात कहने का एक बहाना है," राघव अक्सर कहा करता था। कितना पसंद था उसे चाय पीना। वो चाय पीता नहीं था लगता एन्जॉय करता था। कहता, "अंजलि, चाय महज एक चाय नहीं, एक पूरी feeling है। इसे पियोगे तो मजा नहीं देगी, इसे किसी के साथ पियोगे तो ज्यादा स्वाद लगेगा, चाय का ही नहीं, ज़िन्दगी का भी।" 

अंजलि इस बेमतलब की philosophy पर एक ठंडी मुस्कान देती और बोलती, "चाय पीने वालों को बस बहाना चाहिए। क्या ही बेमतलब की philosophy है। मेरे लिए चाय बस तुम्हारा साथ है। जब तुम्हारे साथ चाय पीती हूँ तो तुम्हारे ज्याद पास महसूस करती हूँ अपने आप को।"

 पर आज? आज दोनों के पास महँगी से महँगी जगह पर चाय पीने के पैसे थे, लेकिन साथ बैठकर बात करने का वक्त नहीं था।

अंजलि ने चाय छानी। दो कप। उसने ट्रे उठाई और भारी कदमों से बालकनी की तरफ बढ़ी।

राघव ने सिर उठाकर देखा। अंजलि ने बिना कुछ बोले एक कप उसकी तरफ बढ़ा दिया। राघव ने कप थामा। चाय गर्म थी, बिल्कुल वैसी ही जैसी उसे पसंद थी—कम चीनी, तेज़ पत्ती और अदरक का तीखापन।

राघव ने पहला घूंट लिया। चाय के उस गर्माहट भरे घूंट ने जैसे उसके भीतर जमी बर्फ को पिघला दिया। उसने अंजलि की तरफ देखा, उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, जो शायद उसकी अनदेखी और थकान की गवाही दे रहे थे।

"चाय बहुत अच्छी बनी है," राघव की आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था।

अंजलि ने अपनी चाय का कप होठों से लगाया, "तुम्हारे सिर में दर्द था ना, इसलिए थोड़ी कड़क बनाई।"

दोनों चुप थे, लेकिन यह वो दम घोटने वाली खामोशी नहीं थी। इस खामोशी में चाय की भाप के साथ दोनों के दिल के जज्बात बह रहे थे।

राघव ने लैपटॉप बंद करके साइड में रखा। उसने अंजलि का हाथ थामा, जो कप को पकड़े रहने के बावजूद थोड़ा ठंडा था।

"आई एम सॉरी अंजलि," राघव ने धीरे से कहा। "मैं काम में इतना उलझ गया कि यह भूल ही गया कि इस चाय का स्वाद तुम्हारे साथ के बिना अधूरा है।"

अंजलि ने राघव की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक आँसू तैर गया, जो मुस्कुराते ही गालों पर ढलक गया। उसने राघव के कंधे पर अपना सिर रख दिया। अपनी आवाज पर थोड़ा काबू पा कर बोली, "आई एम सॉरी राघव। गलती मेरी भी है। मैंने भी कभी तुम्हे समझने की कोशिश नहीं की। हमेशा वही कॉलेज वाला राघव ढूंढ़ती रहती तुममे। जो नहीं मिलता तो तुम्हारे प्रति कुंठा से भर जाती। मैं समझ चुकी हूँ अब की मैं तुम्हारे बिना शायद नहीं रह सकती।"

शाम ढल रही थी, आसमान में परिंदे अपने घरों को लौट रहे थे, और बालकनी में रखे उन दो कपों से उठती हुई चाय की भाप, दो अजनबियों को फिर से एक कर रही थी। 

कभी-कभी जिंदगी की बड़ी से बड़ी उलझनें, चाय के एक छोटे से प्याले और थोड़े से वक्त और थोड़ी बातों से सुलझ जाती हैं।


 - अमितेश 

एक कप चाय और समोसा

सर्दियों के दिन थे। पटना इस बार कुहासे से भरा था। अच्छी कंपकपाती ठंढ थी। सुबह के 7 बजे, स्कूल बस के स्टॉप पर कोहरे की चादर लिपटी हुई थी। समर हमेशा की तरह अपनी भारी-भरकम स्कूल बैग टांगे, ठंड से काँपते हुए खड़ा था। तभी शर्मा जी की चाय की दुकान से उठते धुएं के बीच, मायरा वहाँ आई। नीले रंग का स्कूल स्वेटर, दो चोटियाँ और ठंड से लाल नाक—वह बिल्कुल किसी परी जैसी लग रही थी।

मायरा ने अपनी सहेली से कहा, "यार, इतनी ठंड है कि हाथ जम गए हैं, काश गरम-गरम चाय मिल जाती।"

समर ने यह सुना। उसमें इतनी हिम्मत तो नहीं थी कि मायरा से सीधे बात कर सके, लेकिन उसने जेब में हाथ डाला—कुल 10 रुपये का सिक्का था। वह चुपके से शर्मा जी की दुकान पर गया और बोला, "अंकल, एक चाय को दो कप में आधा-आधा कर दो।"

समर ने एक कप मायरा की तरफ बढ़ाते हुए बिना उसकी आँखों में देखे कहा, "ठंड बहुत है... पी लो।" मायरा ने मुस्कुराते हुए चाय ले ली। उस दिन पहली बार चाय की चुस्की के साथ दोनों के दिलों में एक अनजानी सी गर्माहट घुल गई थी। शायद ये स्कूल के दिनों के मासूम प्यार के पहली दस्तक थी। मायरा के चाय ले लेने से समर में थोड़ी सी हिम्मत आ गयी थी कुछ और बात करने की। 

ऐसे ही उनकी दोस्ती बढ़ रही थी। ये दोस्ती हालांकि बस स्कूल में मिलने तक ही था। वैसे भी नौवीं कक्षा की दोस्ती ऐसे ही धीमे धीमे आंच पर पक कर निखरती है। धीरे-धीरे वक्त बीता। अब दोनों दसवीं क्लास में आ चुके थे। समर मैथ्स में थोड़ा कमज़ोर था और मायरा क्लास की टॉपर।

एक दिन जब लंच ब्रेक के बाद 'फ्री पीरियड' था, तो समर ने हिम्मत जुटाकर मायरा से पूछा, "क्या तुम मुझे ट्रिग्नोमेट्री के कुछ फॉर्मूले समझा दोगी?"

मायरा ने पलकें झुकाकर हंसते हुए कहा, "समझा तो दूंगी, लेकिन मेरी फीस लगेगी!"

"क्या?" समर ने घबराते हुए पूछा।

"स्कूल की छुट्टी के बाद, शर्मा जी की दुकान की अदरक वाली चाय और एक समोसा।" मायरा ने आंख मारते हुए कहा।

उस दिन के बाद से, स्कूल की छुट्टी के बाद का वह आधा घंटा दोनों की ज़िंदगी का सबसे पसंदीदा वक्त बन गया। स्कूल के भारी सिलेबस और बोर्ड एग्जाम के तनाव के बीच, वह नुक्कड़ वाली चाय उनके लिए सुकून का जरिया बन गई थी।

वक्त पंख लगाकर उड़ गया। 12वीं का फेयरवेल आ गया। सब एक-दूसरे की शर्ट पर ऑटोग्राफ लिख रहे थे, यादें समेट रहे थे। समर सफेद शर्ट और ब्लेज़र में था, और मायरा खूबसूरत नीली साड़ी में। दोनों ही जानते थे कि इसके बाद दोनों के रास्ते अलग होने वाले थे—मायरा को आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर जाना था।

भीड़ से दूर, दोनों आखिरी बार उसी शर्मा जी की चाय की दुकान पर आकर बैठे थे। माहौल में एक अजीब सी खामोशी थी।

शर्मा जी ने दो कप चाय टेबल पर रखी और मुस्कुराते हुए बोले, "आज तो विदाई है बच्चों, आज चाय के पैसे मैं नहीं लूंगा।"

समर ने चाय का कुल्हड़ हाथ में पकड़ा और मायरा को देखते हुए कहा, "यार मायरा, शहर बदल जाएगा, कॉलेज बदल जाएगा... पर क्या यह चाय का स्वाद कभी बदलेगा?"

मायरा ने चाय की चुस्की ली, उसकी आँखों में हल्के से आंसू थे। उसने अपनी डायरी से एक पन्ना फाड़कर समर की हथेली पर रख दिया और कहा, "स्वाद तो नहीं बदलेगा समर, और न ही यह चाय वाला प्यार। जब भी तुम्हारी याद आएगी, मैं एक कप अदरक वाली चाय बना लूंगी।" डायरी के उस पन्ने पर मायरा ने समर के साथ की पहली चाय के अनुभव को लिखा था। लिखा था की कैसे समर ने उसके दिल की बात समझ ली थी। और लिखा था की क्या हम दोनों आजन्म एक दूसरे के साथ रोज सुबह ऐसी ही अदरक वाली चाय पी पाएंगे। समर में ये पढ़ कर और भी बेचैनी आ गयी थी। जिन आंसुओं को वो अब तक संभाले बैठा था, उसने कब उसका दामन छोड़ दिया पता भी नहीं चला। शर्मा जी की चाय की दूकान की उस बेंच पर दोनों एक दूसरे का हाथ थामे रोते जा रहे थे। शर्मा जी ने ये देख कर भी अनदेखा कर दिया था। वो सालों से ये देख रहे थे। हर साल कोई ना कोई जोड़ा ऐसे ही बैठे आँसू बहता है की आजन्म हम एक दूसरे के दोस्त बने रहेंगे और फिर जिंदगी उन्हें इतने थपेड़े मारती है की ये सब कुछ समय में ही लोग भूल जाते हैं। 

 

बरसों बीत गए। समर ने MBA के बाद एक बड़ी Pharma कंपनी में नौकरी शुरू कर दी थी। कुछ बरस में वो कंपनी की GM बन गया था और कंपनी के HO में दिल्ली में बैठने लगा था। बचपन के स्कूल का वो प्यार और दोस्ती अब बस यादों में रह गयी थी। 

एक दिन उसने दिल्ली में मार्किट वर्किंग की सोची और वहां के रीजनल मैनेजर को बोला की कुछ अच्छे डॉक्टर्स की visit का प्लान करो। 

अगले दिन वो अपनी कंपनी के लड़को के साथ डॉक्टर विजिट कर रहा था। सभी लोग एक Poly Clinic में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। उनकी कंपनी का नाम पुकारा गया। वो उस डॉक्टर के चैम्बर में जैसे ही गए, समर चौंक गया। वहां मायरा, डॉक्टर मायरा बैठी थी। अभी भी उतनी ही खूबसूरत थी। या शायद ज्यादा ही खूबसूरत हो गयी थी। वो शहर की मानी हुई neurologist थी। 

मायरा ने समर को देखा, मुस्कुराई और बोली, "चाय की फीस बाकी थी न तुम्हारी? आज समोसा मेरी तरफ से!" और उस चैम्बर में उन दोनों के ठहाकों की आवाज गूंज उठी थी। 

सालों बाद, स्कूल का वह मासूम प्यार एक बार फिर चाय की खुशबू के साथ ज़िंदा हो गया था। अब रास्ते अलग नहीं होने वाले थे, क्योंकि इस बार चाय की चुस्की के साथ एक नई कहानी की शुरुआत हो रही थी। 

जरुरी नहीं की एक साथ एक ही मंजिल को चले तो ही प्यार मुकम्मल होता है। अहलदा मंजिल आँखों में लिए भी अगर कुछ पल को हमारे रस्ते एक दूसरे से मिले तो एक नए रिश्ते की नयी शुरुआत हो सकती है। आज इसी नए रिश्ते की शुरुआत समर और मायरा की ज़िन्दगी में हुई थी। 


- अमितेश 


एक कप अकेलापन

आनंद बाबू के लिए ये रोज का नियम था। आज कोई अलग दिन नहीं था। वो अपनी छड़ी टेकते हुए सोसाइटी के बाहर वाले पार्क पर खाली पड़े लकड़ी की बेंच पर बैठ जाते। यह उनके रोज का नियम था, रोज शाम 5 बजे आते और 7 बजे तक वहां बैठे रहते। इस बेंच के ठीक सामने सड़क के उस पार शास्त्री जी की चाय की दूकान थे। कभी कभी शास्त्री जी से बात हो जाती जब वो चाय बनाते बनाते वहीं से आवाज लगते, "आनंद बाबू, चाय पिएंगे?", "बच्चे कैसे हैं?", "आपका स्वस्थ्य ठीक है ना?" ऐसे ही कुछ शब्दों या एक दो वाक्यों में दोनों के बीच बातें हो जाती।  

शास्त्री जी भी करीब करीब उनकी ही उम्र के थे, उम्र के उस पड़ाव पर जब सारे बच्चे अपने अपने काम में लग गए है और अब एक एकांकीपन आ गया है जीवन में। आनंद बाबू 70 वर्ष के थे और उनका एक ही लड़का है जो अब न्यूयोर्क में सेटल हो गया है। हफ्ते में एक दो बार उसका फ़ोन आता और दो एक मिनट की बातें होती। बाते भी "हाऊ आर यू, आप ठीक हैं ना, कोई प्रॉब्लम तो नहीं है" तक ही सीमित रहती। अब वो कैसे बताएं की फ़ोन पर बात करना ठीक है लेकिन साल में एक बार आ जाये तो और भी बेहतर हो जाये। वैसे भी पत्नी के देहांत के बाद जैसे घर काटने को दौड़ता था। उनके बेटे ने कई बार बोला था की वो भी न्यूयोर्क आ जाएं और उनके साथ ही रहें। सारे कागज़ात की जरूरतें वो देख लेगा, लेकिन ये आनंद बाबू की जिद थी की जब पूरी ज़िन्दगी हिंदुस्तान में बितायी है तो अब जीवन के आखरी पड़ाव में यहाँ की मिट्टी नहीं छोड़ना। यहीं की मिट्टी में मिल जाना है। सेना से सेवानिवृत थे तो अपना ध्यान रखना उन्हें आता था। बाकी कभी कभी आर्मी रेजिमेंट में चले जाते तो थोड़ी बहुत इज्जत मिल जाती। पेंशन का इतना पैसा आ जाता था की आज भी अपने बेटे पर आश्रित नहीं थे। कुल मिला कर ज़िन्दगी ऐसे ही कट रही थे। 


आज भी आनंद बाबू अपने रोज के नियम के अनुसार ठीक 5 बजे उसी बेंच पर बैठे हुए थे। शास्त्री जी की चाय की दूकान से इलायची, अदरक, दालचीनी और ना जाने कौन कौन से मसाले से बने चाय की तेज खुशूब सड़क के इस पार आनंद बाबू तक आ रही थी। कभी कभी लगता की चलो एक कप चाय मंगा ही ले फिर लगता चाय अकेले पीना अपने अकेलेपन को सरेआम स्वीकार करने जैसा है। वो यही नहीं करना चाहते थे।  

वो अपने ख्यालों में ही थे। आसपास के लोगों को देख रहे थे, पर ध्यान नहीं दे रहे थे। उनका पूरा ध्यान अपने ही ख्यालों में था। तभी एक 65 - 70 बरस की एक महिला दिखी। हलकी लाल बॉर्डर वाली सफ़ेद सूती साड़ी पहने हुए थी और आँखों पर चश्मा था। सीधी चल रही थी और उनके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था। वो थी सुदेशना जी जो अभी हाल ही में अपनी बेटी के यहाँ रहने आई थी। आसपास कोई बेंच नहीं था और आनंद बाबू बेंच के एक किनारे पर बैठे थी, सो काफी जगह बची थी उस बेंच पर। सुदेशना जी उसी बेंच पर एक किनारे बैठ गयी। एक हल्की सी मुस्कान दोनों ने एक दूसरे को दी जब क्षणिक नजर एक दूसरे पर पड़ी। 

शास्त्री जी ने दो एक मिनट में अपने दुकान में काम करने वाले लड़के को उस बेंच की तरफ भेजा, 2 कप और चाय की केतली के साथ। लड़का आनंद बाबू के पास आया और बोला , "बाऊजी चाय निकलू?"

आनंद बाबू ने चश्मा ठीक करते हुए बोला, "हाँ, दे दो। बहन जी से भी पूछ लो अगर वो चाय पियें तो।" कहते हुए उन्होंने सुदेशना जी की ओर इशारा किया। 

सुदेशना जी ने मुस्कराते हुए कहा, "हाँ हाँ दे दो। और भाईसाहब चाय के पैसे मैं दूंगी।" कहते हुए वो अपने छोटे पर्स से पैसे निकलने लगी। दूसरे तरफ से शास्त्रीजी ये सब देख रहे थे। वहीं से बोले, "अरे आपलोग आज चाय मेरी तरफ से पियें। कल आप पैसे दे देना।"
इस बातचीत में वहां के माहौल में थोड़ा और अपनापन आ गया था। 
 


पार्क में और कोई जगह खाली नहीं थी, इसलिए उन्होंने हिचकिचाते हुए पूछा, "क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?"
आनंद बाबू ने धीरे से सिर हिला दिया। दोनों बेंच के दो अलग-अलग कोनों पर बैठ गए। दोनों के बीच एक गहरी खामोशी थी, जो शायद उनके जीवन के खालीपन से भी गहरी थी।

तभी मिश्रा जी का लड़का हाथ में केतली और दो कुल्हड़ लेकर पार्क की तरफ आया। वह रोज़ आनंद बाबू को देखता था, इसलिए आज खुद ही चला आया।

"बाबूजी, आज मौसम बढ़िया है, एक-एक कुल्हड़ चाय हो जाए?" लड़के ने पूछा।

आनंद बाबू मना करने ही वाले थे कि उनके मुंह से अचानक निकला, "मिश्रा जी, ज़रा पूछो, बहन जी चाय लेंगी?"
सुलोचना जी ने चौंककर आनंद बाबू की तरफ देखा। उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई, "हाँ, पर चीनी थोड़ी कम रखना।"

दो कुल्हड़ चाय बेंच पर आ गई। मिट्टी के कुल्हड़ से सोंधी-सोंधी खुशबू आ रही थी।
आनंद बाबू ने पहला घूंट लिया और बोले, "इस शहर में सब बहुत भाग रहे हैं, बस यह चाय की टपरी ही है जो अपनी रफ्तार से चल रही है।"

सुलोचना जी ने कप थामते हुए कहा, "सही कहा आपने। जब अपने दूर हो जाते हैं, तो यह छोटे-छोटे पल ही जीने का सहारा बनते हैं। मेरी बेटी और दामाद रात के नौ बजे से पहले घर नहीं आते। अकेले घर काटने को दौड़ता है।"
आनंद बाबू की आँखों में चमक आ गई। उन्हें लगा जैसे कोई उनके दिल की बात बोल रहा हो। उन्होंने कहा, "मेरा बेटा भी न्यूयॉर्क में है। हफ़्ते में एक बार फोन आता है—'हॉउ आर यू डैड?' और बस बात खत्म। उन्हें क्या पता कि डैड को 'हॉउ आर यू' से ज़्यादा एक कप चाय पर बात करने वाले साथी की ज़रूरत है।"

उस दिन, चाय की गर्माहट ने दोनों के दिलों के दरवाज़े खोल दिए। आधे घंटे में दोनों ने अपने बचपन, अपनी जवानी, अपने खोए हुए जीवनसाथी और अपनी छोटी-छोटी बीमारियों तक का ज़िक्र कर दिया। जो बातें वे अपने बच्चों से नहीं कह पाते थे, क्योंकि बच्चे 'बिज़ी' थे, वे बातें उन्होंने एक अजनबी से कह दीं।

चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन दोनों के चेहरों पर एक अजीब सा सुकून था।

सुलोचना जी अपनी छड़ी संभालते हुए उठीं और मुस्कुराकर बोलीं, "कल फिर इसी वक्त?"

आनंद बाबू ने अपने जीवन में महीनों बाद इतनी खुशी महसूस की थी। उन्होंने सिर हिलाया, "बिल्कुल। और कल चाय मेरी तरफ से होगी।"

अब पार्क की उस आखिरी बेंच पर सिर्फ दो बुज़ुर्ग नहीं बैठते, बल्कि वहाँ दो कुल्हड़ चाय के बहाने हर शाम ज़िंदगी मुस्कुराती है। बच्चे अपनी दुनिया में व्यस्त रहे, लेकिन चाय के उस एक प्याले ने दो अकेले इंसानों को जीने की एक नई वजह दे दी थी।


- अमितेश 

सोमवार, 25 मई 2026

एक कप मासुमियत

आज फिर पापा ऑफिस से आते ही सोफे पर बैठ गए थे। आँखें बंद किये निढ़ाल हो कर बैठे थे और अपने हाथों से अपना सर दबा रहे थे।

रोहन ने पापा को देखा और माँ के पास जा कर लगभग फुसफुसा कर पूछा, "माँ, पापा रोज ऑफिस से लौट कर आँखें बंद कर सोफे पर क्यों बैठ जाते हैं। हमेशा अपने हाथों से अपना सिर दबाते हैं। पापा ऐसा क्यों करते हैं माँ?"

माँ ने प्यार से रोहन के सिर पर हाथ फेरा और बोला, "बेटा पापा को ऑफिस में बहुत काम रहता है। दिन भर काम कर के थक जाते हैं इसलिए सोफे पर थोड़ी देर बैठ कर अपनी थकान मिटाते हैं। उन्हें अभी मैं एक कप कड़क चाय बना कर देती हूँ। उनकी थकान अभी छूमंतर हो जाएगी।" कह कर माँ रोहन को वहीं छोड़ कर किचन में चली गयी। 

7 साल के रोहन को यही समझ में आया की चाय एक जादुई दवा है और इसे पीते ही पापा की सारी थकान दूर हो जाती है। 

बात आई गयी हो गयी। रोहन चुपके से रोज माँ को चाय बनाते देखता। कभी कभी पापा के पास सोफे पर बैठ कर उनके बालों पर हाथ फेरता और पापा को मुस्कुराते देखता। उसे लगता की कड़क चाय तो पापा की थकान मिटाने की एक जादुई दवा है लेकिन वो तब ज्यादा असर करती जब रोहन पापा के सिर पर हाथ फेर कर उन सिर को दबाता। 


उस दिन शनिवार था। पापा का हाफ डे था और पापा दोपहर में ही ऑफिस से आ गए थे। माँ पास के ही आंटी के घर पर गयी हुई थी। पापा घर में घुसते ही अपना बैग टेबल पर रखा और रोज की तरह सोफे पर पसर गए। आँखें बंद कर के अपने हाथ से अपना सिर दबाने लगे। 

रोहन को लगा की उन्हें अभी उस जादुई दवा की जरुरत है। माँ घर पर नहीं है। क्यों ना मैं ही एक अच्छी कड़क चाय बना दूँ। यही सोचते सोचते वो किचन में गया। उनसे एक सस्पेन निकला और उसे गैस स्टोव पर चढ़ा दिया। पापा के लिए चाय की कप निकली और एक कप भर कर पानी सस्पेन में डाल दिया और स्टोव जला दिया। पानी उबलने लगी थी। उसने ऊँचे टेबल पर चढ़ कर ऊपर के अलमारी से चाय पत्ती का डब्बा उठाया और चाय में 2 चम्मच चाय पत्ती डाल दी। माँ इतना ही डालती थी। फिर लगा की थोड़ी और चाय पत्ती डाली तो चाय और भी कड़क हो जाएगी और पापा की थकान पर ज्यादा असर करेगी। उसने 2 और चम्मच चाय पत्ती उबलते पानी में डाल दिया। इतनी पत्ती की वजह से उबलता पानी बिलकुल काला हो गया था। उसने काला रंग देखा और मन ही मन सोंचा कि इसे कहते हैं कड़क चाय। माँ से भी बेहतर नुस्खे उसके पास हैं। अपने ख्याल पर वो मन ही मन मुस्काया और चीनी का डब्बा ढूंढने लगा। वहीं पास में वो भी मिल गया। उसने 4 - 5 चम्मच चीनी के भी दाल दिए थे उबलते पानी में। रोहन की जादुई चाय अब तैयार थी। उसे कप में छाना और पापा के पास जाने लगा। तभी उसे याद आया की माँ जब भी चाय बनती है तो कुछ तो कूट कर उसमे डालती है। शायद अदरक डालती है। बहुत ढूंढने पर भी उसे किचन में अदरक नहीं मिला। उसकी नजर इलिचाई पर पड़ी। उसने 2 इलिचाई निकाली और जैसे तैसे कूट कर चाय के कप में डाल दिया। 

वो मंद मंद मुस्कुराते हुए पूरी एहतियात के साथ सधे क़दमों से धीरे धीरे ड्राइंग रूम की तरफ जाने लगा। पापा अभी भी आँखें बंद किये सोफे पर बैठे थे। शायद अभी किचन में जादुई चाय के नुस्खे के ढूंढ़े जाने की पूरी प्रक्रिया से पूरी तरह अनजान थे। पापा के नजदीक जा कर रोहन ने आवाज लगाई, "पापा चाय पी लीजिये। आपकी थकान की दवा।"

पापा ने चौंक कर आँखें खोली। "मम्मी तो घर पर नहीं है, फिर ये चाय किसने बनाई?" पापा की आवाज में आश्चर्य था। 

रोहन ने एक बड़ी सी मुस्कान बिखेरी और बोला, "ये मैंने बनाई है। ये मम्मी की चाय से भी बेहतर है।" 

पारदर्शी कप में काले रंग की चाय देख कर पापा थोड़ा मुस्कुराये, और जल्दी से चाय रोहन के हाथों से ले लिया की उसका हाथ ना जले। चाय में कूट कर ऊपर से डाली हुई इलिचाई के छिलके तैर रहे थे। पापा ने  बोला,"बेटा मेरी थकान तो बस तुम्हे देखते ही ख़तम हो जाती है।" 

रोहन को उन्होंने खींच कर अपने पास बिठाया और चाय की पहली चुस्की ली। चाय इतनी पत्ती डालने की वजह से करवाहट से भर गयी थी। ऊपर से जरुरत से ज्यादा चीनी ने उसमे एक अलग ही मिठास भर दी थी। रोहन गौर से पापा को देख रहा था की अब पापा कुछ कहेंगे। ये क्या, पापा की आँखों में आंसू छलक आये थे। उन्होंने रोहन को कास कर जकड़ लिया और बोला, "ये दुनिया की बेस्ट चाय है। तुम तो Master Chef हो गए हो। देखो मेरी थकान एक चुस्की में ही उतर गयी।" और धीरे धीरे चाय पीने लगे। शायद कोई और दिन होता और किसी और ने ये चाय बनायी होती तो वो     चाय की एक घूँट भी नहीं पीते। लेकिन ये चाय तो उनके छोटे जादूगर ने बनाया था। इसे कैसे छोड़ सकते थे।  

रोहन खुशी से उछल पड़ा, "सच में पापा? अब से मैं रोज़ आपके लिए ये जादुई दवा बनाऊँगा!"

पापा ने हँसते हुए कहा, "रोज़ नहीं बेटा, सिर्फ छुट्टी वाले दिन। और अगली बार चीनी थोड़ी कम रखेंगे, नहीं तो पापा बहुत ज़्यादा मीठे हो जाएँगे।"

उस शाम, माँ जब घर लौटीं, तो उन्होंने देखा कि सोफे पर पापा और रोहन दोनों बैठे थे। पापा मुस्कुराते हुए वो कड़क-मीठी चाय पी रहे थे और रोहन उनके चश्मे को अपने कुर्ते से साफ कर रहा था। चाय के उस एक कप ने उस छोटे से घर को दुनिया की सबसे खुशनुमा जगह बना दिया था।


- अमितेश 

कुत्ता

 वो बात नहीं करता, पर सब समझता है,

एक टुकड़े की खातिर, वो उम्र भर तड़पता है 

इंसान बदल जाते हैं अक्सर मौसम की तरह 

पर ये बेजुबां हर हाल में, अपने मालिक पे मरता है। 


चाहे धूप हो कड़ी, या ठिठुरती हुई सी रात,

वो सोता नहीं जब तक मालिक हो उनके साथ 

उसकी वफ़ा के आगे ताज़ - ओ - तख़्त फीका है 

उसने मुहब्बत में बस निभाना ही सीखा है। 


तुम झिड़क तो उसे, या मारो कोई पत्थर भी,

वो लौट आता है, झुकाये अपना सर फिर भी 

गुस्सा नहीं होता वो, बस आँखे भर आती है,

उसकी खामोश वफ़ाएं, पत्थरों को भी पिघलाती हैं। 


लोग ढूंढते है वफ़ा, ज़माने भर के इंसानों में, 

और खुदा ने उसे रख दिया, इस बेजुबान के सायों में। 


जब दुनिया छोड़ देती है, और साये भी मुँह मोड़ते हैं 

तब भी इसके कदम मालिक को नहीं छोड़ते हैं। 

इश्क़ देखना है तो देखो उस कुत्ते की आँखों में,

जो आखिरी सांस भी लेता, अपनी हमनफ़स की बाहों में। 


- अमितेश  

एक कप भावुकता

"चाचा चाय पियो हमारे साथ आज, क्या पता कल दुबारा तुमसे मुलाकात हो भी या नहीं!" तिवारी जी ने रहीम डाकिया को अपनी चाय की दूकान पर आने को कहा। 

रहीम चाचा का आज आखिरी दिन था इस नौकरी में। आज वो सेवा निवृत्त हो रहे थे। 30 साल तक भारत सरकार को सेवा दी थी अपनी। तक़रीबन पुरे समय वो इसी तहसील में रहे थे। उस तहसील की तक़रीबन हर गांव में उन्होंने चिट्ठी पहुँचायी थी। इस तहसील का लगभग हर आदमी उन्हें जानता था। 

रहीम चाचा इस क्षेत्र में चिट्ठी का एक पर्याय बन गए थे। चिट्ठिओं के बहाने वो हर घर के सुख दुःख के साथी थे। लोग चिट्ठी सिर्फ लेते ही नहीं थे उनसे, बल्कि वो चिट्ठी पर विमर्श भी करते थे। इस पुरे क्षेत्र में लगभग 3000 घर थे। नहीं भी तो वो आधे लोगों को तो जानते ही थे और लगभग हर घर में इन 30 वर्षों में चिट्ठी पहुंचाई थी। ये पूरा क्षेत्र हिन्दुओं का था। मुसलमानों के गिने चुने ही घर थे। लेकिन रहीम चाचा सब के अपने घर के व्यक्ति थे। उनकी पहचान धर्म नहीं डाकिया होना था। उन्हें सब से एक सा ही स्नेह मिलता था। 

यह चाय का निमंत्रण भी इनके लिए एक सामान्य सी बात थी। चाय के बहाने वो लोगों के सुख - दुःख का हिस्सा बन जाते थे। कई लोगों को यहाँ से निकल कर बड़े ओहदे पर जाते देखा था। कई लोगों के परिवार को बढ़ते फिर बिखरते देखा था। कई फसलों को पकते और कई किसानों को निखरते देखा था। 

ये तिवारी जी का भी एक भरा पूरा परिवार था। आज उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से इनका बेटा निकल कर एक बड़ी कंपनी में प्रतिष्ठित पद पर मुंबई में काम कर रहा है। तिवारी जी का अपना खेत है और खेत आज भी उतना ही उपजाता है की इनका गुजर बसर हो जाता है। बेटे पर आज भी वो और उनकी पत्नी बोझ नहीं है। मुंबई जाते हैं तो अपनी जमीन का प्रसाद भी ले कर जाते हैं बेटे के पास। 

तिवारी जी ने चाय का गिलास रहीम चाचा को बढ़ाते हुए एक मुस्कान दी। 

"चाचा समय लगेगा नयी परिस्थितिओं में जमने में। 30 बरस से निरंतर काम कर रहे हो। तुम चिट्ठी नहीं लाते थे हमारे यहाँ, तुम खुद एक खबर थे। चिट्ठी में जो कभी खराब खबर भी आती थी, तुम अपना कंधा हमें दे देते थे। हमारी खुशियों में हम से ज्यादा तुम खुश होते थे। कभी लगा नहीं के ये सिलसिला कभी ख़त्म होगा। देखो आज ख़त्म हो ही रहा है। शायद कल से कोई और हमारी सुख - दुःख का हिस्सा बने, बन भी पाए या ना। हम फिर भी हर चिट्ठी में तुम्हे ही ढूँढेगें।" कहते कहते तिवारी जी थोड़े भावुक हो गए। 

चाय लगभग खत्म होने को आयी थी। शायद रहीम चाचा के साथ का ये सफर भी। भावुकता ना सिर्फ तिवारी जी में थी, उस चाय की दूकान पर बैठा हर शख्स थोड़ी भावुकता महसूस कर रहा था। रहीम चाचा भी। शायद कल से उनकी ज़िन्दगी थोड़ी अलग होगी ... या एकदम ही अलग होगी। कल मुहरों की ठक - ठक नहीं सुनाई देगी, कल चिट्ठिओं के बोर से गिरने की आवाज़ नहीं होगी, ना उन खतों को छंटाई कर उन्हें श्रेणीबद्ध करने का कोई बड़ा काम होगा। न कोई अधूरे पते की ख़त को उनके सही जगह पर पहुँचाने की कोई कवायद। दिन पूरा सुकून भरा होगा। लेकिन ये सुकून रहीम चाचा को चाहिए भी या नहीं, ये तो कल से पता चलेगा। 

रहीम चाचा अपनी तंद्रा मे ही थे। साइकिल की घंटी की आवाज से उसका ध्यान भटका। देखा वहां का नया डाकिया, सुभाष उस चाय की दुकान के सामने अपनी साइकिल खड़ा कर के घंटी बजा रहा था। रहीम चाचा ने एक मुस्कान बिखेरी और बोला, "आओ सुभाष, अब ये पूरा इलाका तुम्हारे हवाले। ये सब मेरे परिवार ही हैं। सो तुमसे उम्मीदें थोड़ी ज्यादा हैं।"

"चाचा, कोशिश करूँगा आपकी जगह भरने की। फिलहाल मेरी पहली चिट्ठी की डिलीवरी करनी है। आपके नाम की ही चिट्ठी है, सो आपको देने आ गया हूँ।"

रहीम चाचा थोड़ा चौंक गए। "मेरे नाम की चिट्ठी! मुझे कौन खत भेजेगा? अगर भेजा भी तो मेरे घर के पते पर भेजेगा ना!"

"चाचा ये लो तुम्हारी चिट्ठी।" उसकी बातों को लगभग अनसुना करते हुए सुभाष ने रहीम चाचा के सामने अपनी चिट्ठिओं का बोरा पलट दिया। तक़रीबन 400 - 500 पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय और लिफाफे थें। सब पर रहीम चाचा का नाम लिखा था पते की जगह पर। और कोई और विवरण नहीं।  हाँ, भेजने वाले का नाम और ग्राम लिखा था। उन सब को रहीम चाचा पहचानते थे। रहीम चाचा के कार्य क्षेत्र में 3 ग्राम पंचायत आते थे। ये सब प्रेषक इन्ही 3 ग्राम पंचायत के विभिन्न गावों के लोग थे। कभी ना कभी या अक्सर रहीम चाचा ने इनके घर पर डाक या पार्सल पहुंचाया था। इन सब चिट्ठियों पर उन लोगों के रहीम चाचा के साथ के अनुभव लिखे थे। सब पर उन खास मौकों का विवरण था जब उनके सुख - दुःख का हिस्सा बने थे। 

रहीम चाचा ने दोनों हाथों से उन चिट्ठियों को पकड़ रखा था। जो भावुकता अब तक एक अहसास की तरह वो महसूस कर रहे थे, उसने अब आँखों का रास्ता अख़्तियार कर लिया था। अपनी भावनाओं को काबू करने की नाकाम कोशिश भी की चाचा ने लेकिन सफल ना हो पाए। इन चिट्ठियों को पढ़ते पढ़ते अब उनकी बाकी की ज़िन्दगी गुजर जाएगी। उन्होंने सिर्फ ख़त नहीं बाटें थे, हर परिवार के सुख - दुःख के साझेदार बने थे। आज इस चाय की दूकान पर चाय की चुस्कियों के बीच वो अपने भरे पुरे परिवार के फिर से अपने हो गए थे। 

तिवारी जी मुस्कुरा रहे थे। सुभाष खुश था की इन ख़तों के बहाने वो शायद अपने नए कार्य क्षेत्र पर रहीम चाचा सी प्रसिद्धि और स्नेह पा ले।  


- अमितेश  






रविवार, 24 मई 2026

एक कप सुकून और टूटे बिस्कुट

फिर गर्मी की छुट्टियां शुरू होने वाली थी। अलका ने दादा दादी के साथ छुट्टियां मानाने को ले कर पूरा घर सर पे उठा लिया था। उसे पता था, पापा कभी भी उसकी बात को टालेंगे नहीं। उसे पापा को मनाने के सौ नुस्खे पता थे। वो पापा के फेवरेट तेजपत्ते वाली चाय ले कर उनके साथ बैठ गयी। 

"पापा, दादी से बात कर रही थी आज। वो बोल रही थी की अल्कु से मिले अरसा हो गया लगता है। मुझे लगा वो कुछ ज्यादा उम्मीद लगा कर बैठी है। मैंने उन्हें समझाया की पापा इतनी आसानी से छुट्टी नहीं ले सकते। हजारो जिम्मेवारियाँ है उनके सर पे। हमसे तो बात भी कर नहीं पाते जो उनके साथ रहते हैं। आपसे कहाँ मिलने आएंगे।" अलका ने अपने पिटारे के सौ नुस्खे में से एक निकाला। 

पापा ने चाय की चुस्कियों के बीच बस "हुँह" कहा था। अलका जानती थी की हुँह सिर्फ एक Non-word नहीं था पापा का, अपने आप में एक पूरा वाक्य था, पूरी सोंच थी।

चाय ख़त्म होने तक ना पापा कुछ बोले ना ही अलका। दोनों साथ बैठे होकर भी अपने आप से बातें कर रहे थे।  

***

देहरादून की गर्मी प्रकृति की अस्तव्यस्तता भर है। कभी तो गर्मी जान लेने पर उतारू हो जाती है, कभी सौम्य माँ का आँचल बन शीतलता फैलाती है। अलका को देहरादून की ये भ्रम वाली गर्मी बहुत पसंद आती थी। उसे अपना ददिहाल पसंद आता था। उसे अपनी दादी के नजदीक रहना भाता था। इस गर्मी की छुट्टियों में भी वो यहाँ आ गयी थी। हाँ थोड़े हथकंडे अपनाने पड़े थे उसे पापा के साथ। पापा ने कहा था की ग्यारहवीं के बच्चों को कहाँ गर्मियों की छुट्टी मिलती है। ये साल अलका के लिए भविष्य बनाने का साल है। अभी अच्छे से नहीं पढ़ेगी तो Medical Entrance में अच्छी ranking नहीं मिलेगी और बेहतर college भी नहीं मिल पायेगा। लेकिन अलका ने पापा को promise किया की वो अच्छे rank ले कर आएगी। लेकिन गर्मी की छुट्टियों में वो दादी से मिलने इस बार ही नहीं, हर बार जाएगी। थोड़ा मन तो पापा का भी था दादी से मिलने का।  

अलका अपना बेहतर समय दादी के साथ गुजार रही थी। अहले सुबह वो दादी के साथ जागती और देहरादून की उबार खाबड़ रास्तों पे morning walk को जाती। घंटो दोनों बातें करते। लगता नहीं दादी - पोती हैं दोनों, लगता दो बूढ़ी महिलाएं जवान हो गयीं हैं। माँ पापा को ये देख कर ठीक ही लगता था। शायद इसी वजह से पापा गर्मियों की छुट्टी में यहाँ आना मान गए थे।  


एक तपती दोपहर में जब पूरा मोहल्ला सो गया था, तब अलका को चाय पीने की इच्छा हुई। दादी अपने कमरे में ऊंघती हुई सो गयी थी। अलका चुपके से दबे पाँव रसोई में गयी। चाय के बर्तन को स्टोव पर चढ़ाया। आज सोंचा दादी की लाल चाय बनायी जाये। ऊपर की अलमारी में चाय पत्ती रखी थी। वो उसे निकलने लगी तो बगल में रखा बिस्कुट का डिब्बा उसके हाथ  टकरा कर नीचे गिर गया। एक तेज आवाज़ हुई और जमीन पर गिरते ही डब्बे का ढक्कन खुल गया। कुछ बिस्कुट डब्बे बाहर निकल कर टूट गए। आवाज से दादी की नींद भी खुल गयी। इस डर से की रसोई में बंदर तो नहीं आ गए, वो तेजी से वहां आई। 

पता नहीं क्यों, अलका को डर सा लग गया कि कहीं दादी बिस्कुट के डब्बे को गिरा देख कर उसे डाँट ना दे। वो कातर हो कभी नीचे गिरे डब्बे को देख रही थी, कभी दादी को। 

दादी ने बिखरे हुए बिस्कुट को देखा और मुस्कुरा कर बोली, "अरे! ये बिस्कुट तो टूट गए, अब इन्हें मेहमानों को तो दे नहीं सकते। चल, इन्हें हम दोनों ठिकाने लगाते हैं।"

दादी ने इतनी सहजता से बोला जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। अलका को थोड़ी हिम्मत आई, बोली,"अरे मैंने ये जान बुझ कर गिराया था। आप बड़ी इत्मिनान से सोइ थी। मुझे चाय पीने का दिल कर रहा था, लेकिन आपको उठाने का दिल नहीं किया, सो आपको उठाने का पाप इस डब्बे के सर रख दिया। देखो मैंने आपकी वाली लाल चाय बनायी है। चलो अब साथ बैठ कर पीते हैं।" 

दादी उसकी इस चतुरता पर हँस दी, अलका भी ठहाके लगा कर हँस दी, की चलो अब जान बची तो लाखों पाए। 

अलका ने चाय के प्याले को ट्रे पर रखा, प्लेट में उन टूटे बिस्कुट को सजाया और दोनों बरामदे में आ कर बैठ गए। 

चाय की चुस्कियां लेते लेते अलका ने कहा की "दादी मैं थोड़ा डर सी गयी थी। लगा की इन टूटे बिस्कुट को उठा कर कहीं फेंक दूँ। पता नहीं क्यों मैं इतना डर गयी थी।"

दादी ने चाय में बिस्कुट डुबोया और धीरे से बोलीं, "बेटा, गलतियाँ तो सबसे होती हैं। पर उन गलतियों को छुपाने के बजाय, अगर हम उन्हें सुधार लें या साझा कर लें, तो वो गलती नहीं रहतीं। जैसे ये टूटे बिस्कुट... अकेले शायद अच्छे न लगते, पर चाय के साथ इनका स्वाद दोगुना हो गया है।"

उस दिन अलका ने सीखा कि रिश्ते साबुत बिस्कुटों की तरह चमकने के लिए नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का सहारा बनने के लिए होते हैं। ये एक ऐसी सीख उस भरी दोपहरी उसे मिली थी जो हमेशा उसके साथ रहेगी, ज़िन्दगी भर। 


आज कई बरस हो गए हैं। अलका MS कर के अभी अमेरिका से लौटी है। अब गर्मी की छुट्टियों में देहरादून जाना नहीं हो पाता, अब गर्मी की छुट्टियाँ भी कहाँ होती उसकी। दादी अब तस्वीरों में जिंदा हैं। 

अलका जब भी चाय पीती, बस पी लेती। आज भी दादी की वो सीख उसे याद है। बस उन टूटे बिस्कुट और दादी के संग चाय का सुकून कहीं खो गया है। 


- अमितेश 

शनिवार, 23 मई 2026

साकी

मयखाने की चौखट को ही इबादतगाह कर बैठे 

हम साकी की आँखों में खुदा का दीदार कर बैठे। 


वो मंदिर - ओ - मस्जिद में ढूंढ़ते रहे उम्र भर जिसे,

हम एक जाम पीकर उसे दिल के पार कर बैठे। 


ज़ाहिद ने कहा 'कबीरा गुनाह है शराब पीना' 

हम साकी की इनायत को खुदा का करम शुमार कर बैठे। 


तूने बनाई ये कायनात तो कोई खता न की ऐ खुदा,

साकी ने महफ़िल सजाई हम और गुलज़ार कर बैठे। 


अश्क आँखों में थे जब तक, कोई सुनता न था दुआ,

हम जाम उठा, ज़माने के गम दरकिनार कर बैठे। 


पूछा खुदा ने चाहिए क्या तुझे महशर के रोज़?

हम  हाथों से एक और जाम की तकरार कर बैठे। 


- अमितेश