सोमवार, 25 मई 2026

एक कप मासुमियत

आज फिर पापा ऑफिस से आते ही सोफे पर बैठ गए थे। आँखें बंद किये निढ़ाल हो कर बैठे थे और अपने हाथों से अपना सर दबा रहे थे।

रोहन ने पापा को देखा और माँ के पास जा कर लगभग फुसफुसा कर पूछा, "माँ, पापा रोज ऑफिस से लौट कर आँखें बंद कर सोफे पर क्यों बैठ जाते हैं। हमेशा अपने हाथों से अपना सिर दबाते हैं। पापा ऐसा क्यों करते हैं माँ?"

माँ ने प्यार से रोहन के सिर पर हाथ फेरा और बोला, "बेटा पापा को ऑफिस में बहुत काम रहता है। दिन भर काम कर के थक जाते हैं इसलिए सोफे पर थोड़ी देर बैठ कर अपनी थकान मिटाते हैं। उन्हें अभी मैं एक कप कड़क चाय बना कर देती हूँ। उनकी थकान अभी छूमंतर हो जाएगी।" कह कर माँ रोहन को वहीं छोड़ कर किचन में चली गयी। 

7 साल के रोहन को यही समझ में आया की चाय एक जादुई दवा है और इसे पीते ही पापा की सारी थकान दूर हो जाती है। 

बात आई गयी हो गयी। रोहन चुपके से रोज माँ को चाय बनाते देखता। कभी कभी पापा के पास सोफे पर बैठ कर उनके बालों पर हाथ फेरता और पापा को मुस्कुराते देखता। उसे लगता की कड़क चाय तो पापा की थकान मिटाने की एक जादुई दवा है लेकिन वो तब ज्यादा असर करती जब रोहन पापा के सिर पर हाथ फेर कर उन सिर को दबाता। 


उस दिन शनिवार था। पापा का हाफ डे था और पापा दोपहर में ही ऑफिस से आ गए थे। माँ पास के ही आंटी के घर पर गयी हुई थी। पापा घर में घुसते ही अपना बैग टेबल पर रखा और रोज की तरह सोफे पर पसर गए। आँखें बंद कर के अपने हाथ से अपना सिर दबाने लगे। 

रोहन को लगा की उन्हें अभी उस जादुई दवा की जरुरत है। माँ घर पर नहीं है। क्यों ना मैं ही एक अच्छी कड़क चाय बना दूँ। यही सोचते सोचते वो किचन में गया। उनसे एक सस्पेन निकला और उसे गैस स्टोव पर चढ़ा दिया। पापा के लिए चाय की कप निकली और एक कप भर कर पानी सस्पेन में डाल दिया और स्टोव जला दिया। पानी उबलने लगी थी। उसने ऊँचे टेबल पर चढ़ कर ऊपर के अलमारी से चाय पत्ती का डब्बा उठाया और चाय में 2 चम्मच चाय पत्ती डाल दी। माँ इतना ही डालती थी। फिर लगा की थोड़ी और चाय पत्ती डाली तो चाय और भी कड़क हो जाएगी और पापा की थकान पर ज्यादा असर करेगी। उसने 2 और चम्मच चाय पत्ती उबलते पानी में डाल दिया। इतनी पत्ती की वजह से उबलता पानी बिलकुल काला हो गया था। उसने काला रंग देखा और मन ही मन सोंचा कि इसे कहते हैं कड़क चाय। माँ से भी बेहतर नुस्खे उसके पास हैं। अपने ख्याल पर वो मन ही मन मुस्काया और चीनी का डब्बा ढूंढने लगा। वहीं पास में वो भी मिल गया। उसने 4 - 5 चम्मच चीनी के भी दाल दिए थे उबलते पानी में। रोहन की जादुई चाय अब तैयार थी। उसे कप में छाना और पापा के पास जाने लगा। तभी उसे याद आया की माँ जब भी चाय बनती है तो कुछ तो कूट कर उसमे डालती है। शायद अदरक डालती है। बहुत ढूंढने पर भी उसे किचन में अदरक नहीं मिला। उसकी नजर इलिचाई पर पड़ी। उसने 2 इलिचाई निकाली और जैसे तैसे कूट कर चाय के कप में डाल दिया। 

वो मंद मंद मुस्कुराते हुए पूरी एहतियात के साथ सधे क़दमों से धीरे धीरे ड्राइंग रूम की तरफ जाने लगा। पापा अभी भी आँखें बंद किये सोफे पर बैठे थे। शायद अभी किचन में जादुई चाय के नुस्खे के ढूंढ़े जाने की पूरी प्रक्रिया से पूरी तरह अनजान थे। पापा के नजदीक जा कर रोहन ने आवाज लगाई, "पापा चाय पी लीजिये। आपकी थकान की दवा।"

पापा ने चौंक कर आँखें खोली। "मम्मी तो घर पर नहीं है, फिर ये चाय किसने बनाई?" पापा की आवाज में आश्चर्य था। 

रोहन ने एक बड़ी सी मुस्कान बिखेरी और बोला, "ये मैंने बनाई है। ये मम्मी की चाय से भी बेहतर है।" 

पारदर्शी कप में काले रंग की चाय देख कर पापा थोड़ा मुस्कुराये, और जल्दी से चाय रोहन के हाथों से ले लिया की उसका हाथ ना जले। चाय में कूट कर ऊपर से डाली हुई इलिचाई के छिलके तैर रहे थे। पापा ने  बोला,"बेटा मेरी थकान तो बस तुम्हे देखते ही ख़तम हो जाती है।" 

रोहन को उन्होंने खींच कर अपने पास बिठाया और चाय की पहली चुस्की ली। चाय इतनी पत्ती डालने की वजह से करवाहट से भर गयी थी। ऊपर से जरुरत से ज्यादा चीनी ने उसमे एक अलग ही मिठास भर दी थी। रोहन गौर से पापा को देख रहा था की अब पापा कुछ कहेंगे। ये क्या, पापा की आँखों में आंसू छलक आये थे। उन्होंने रोहन को कास कर जकड़ लिया और बोला, "ये दुनिया की बेस्ट चाय है। तुम तो Master Chef हो गए हो। देखो मेरी थकान एक चुस्की में ही उतर गयी।" और धीरे धीरे चाय पीने लगे। शायद कोई और दिन होता और किसी और ने ये चाय बनायी होती तो वो     चाय की एक घूँट भी नहीं पीते। लेकिन ये चाय तो उनके छोटे जादूगर ने बनाया था। इसे कैसे छोड़ सकते थे।  

रोहन खुशी से उछल पड़ा, "सच में पापा? अब से मैं रोज़ आपके लिए ये जादुई दवा बनाऊँगा!"

पापा ने हँसते हुए कहा, "रोज़ नहीं बेटा, सिर्फ छुट्टी वाले दिन। और अगली बार चीनी थोड़ी कम रखेंगे, नहीं तो पापा बहुत ज़्यादा मीठे हो जाएँगे।"

उस शाम, माँ जब घर लौटीं, तो उन्होंने देखा कि सोफे पर पापा और रोहन दोनों बैठे थे। पापा मुस्कुराते हुए वो कड़क-मीठी चाय पी रहे थे और रोहन उनके चश्मे को अपने कुर्ते से साफ कर रहा था। चाय के उस एक कप ने उस छोटे से घर को दुनिया की सबसे खुशनुमा जगह बना दिया था।


- अमितेश 

कुत्ता

 वो बात नहीं करता, पर सब समझता है,

एक टुकड़े की खातिर, वो उम्र भर तड़पता है 

इंसान बदल जाते हैं अक्सर मौसम की तरह 

पर ये बेजुबां हर हाल में, अपने मालिक पे मरता है। 


चाहे धूप हो कड़ी, या ठिठुरती हुई सी रात,

वो सोता नहीं जब तक मालिक हो उनके साथ 

उसकी वफ़ा के आगे ताज़ - ओ - तख़्त फीका है 

उसने मुहब्बत में बस निभाना ही सीखा है। 


तुम झिड़क तो उसे, या मारो कोई पत्थर भी,

वो लौट आता है, झुकाये अपना सर फिर भी 

गुस्सा नहीं होता वो, बस आँखे भर आती है,

उसकी खामोश वफ़ाएं, पत्थरों को भी पिघलाती हैं। 


लोग ढूंढते है वफ़ा, ज़माने भर के इंसानों में, 

और खुदा ने उसे रख दिया, इस बेजुबान के सायों में। 


जब दुनिया छोड़ देती है, और साये भी मुँह मोड़ते हैं 

तब भी इसके कदम मालिक को नहीं छोड़ते हैं। 

इश्क़ देखना है तो देखो उस कुत्ते की आँखों में,

जो आखिरी सांस भी लेता, अपनी हमनफ़स की बाहों में। 


- अमितेश  

एक कप भावुकता

"चाचा चाय पियो हमारे साथ आज, क्या पता कल दुबारा तुमसे मुलाकात हो भी या नहीं!" तिवारी जी ने रहीम डाकिया को अपनी चाय की दूकान पर आने को कहा। 

रहीम चाचा का आज आखिरी दिन था इस नौकरी में। आज वो सेवा निवृत्त हो रहे थे। 30 साल तक भारत सरकार को सेवा दी थी अपनी। तक़रीबन पुरे समय वो इसी तहसील में रहे थे। उस तहसील की तक़रीबन हर गांव में उन्होंने चिट्ठी पहुँचायी थी। इस तहसील का लगभग हर आदमी उन्हें जानता था। 

रहीम चाचा इस क्षेत्र में चिट्ठी का एक पर्याय बन गए थे। चिट्ठिओं के बहाने वो हर घर के सुख दुःख के साथी थे। लोग चिट्ठी सिर्फ लेते ही नहीं थे उनसे, बल्कि वो चिट्ठी पर विमर्श भी करते थे। इस पुरे क्षेत्र में लगभग 3000 घर थे। नहीं भी तो वो आधे लोगों को तो जानते ही थे और लगभग हर घर में इन 30 वर्षों में चिट्ठी पहुंचाई थी। ये पूरा क्षेत्र हिन्दुओं का था। मुसलमानों के गिने चुने ही घर थे। लेकिन रहीम चाचा सब के अपने घर के व्यक्ति थे। उनकी पहचान धर्म नहीं डाकिया होना था। उन्हें सब से एक सा ही स्नेह मिलता था। 

यह चाय का निमंत्रण भी इनके लिए एक सामान्य सी बात थी। चाय के बहाने वो लोगों के सुख - दुःख का हिस्सा बन जाते थे। कई लोगों को यहाँ से निकल कर बड़े ओहदे पर जाते देखा था। कई लोगों के परिवार को बढ़ते फिर बिखरते देखा था। कई फसलों को पकते और कई किसानों को निखरते देखा था। 

ये तिवारी जी का भी एक भरा पूरा परिवार था। आज उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से इनका बेटा निकल कर एक बड़ी कंपनी में प्रतिष्ठित पद पर मुंबई में काम कर रहा है। तिवारी जी का अपना खेत है और खेत आज भी उतना ही उपजाता है की इनका गुजर बसर हो जाता है। बेटे पर आज भी वो और उनकी पत्नी बोझ नहीं है। मुंबई जाते हैं तो अपनी जमीन का प्रसाद भी ले कर जाते हैं बेटे के पास। 

तिवारी जी ने चाय का गिलास रहीम चाचा को बढ़ाते हुए एक मुस्कान दी। 

"चाचा समय लगेगा नयी परिस्थितिओं में जमने में। 30 बरस से निरंतर काम कर रहे हो। तुम चिट्ठी नहीं लाते थे हमारे यहाँ, तुम खुद एक खबर थे। चिट्ठी में जो कभी खराब खबर भी आती थी, तुम अपना कंधा हमें दे देते थे। हमारी खुशियों में हम से ज्यादा तुम खुश होते थे। कभी लगा नहीं के ये सिलसिला कभी ख़त्म होगा। देखो आज ख़त्म हो ही रहा है। शायद कल से कोई और हमारी सुख - दुःख का हिस्सा बने, बन भी पाए या ना। हम फिर भी हर चिट्ठी में तुम्हे ही ढूँढेगें।" कहते कहते तिवारी जी थोड़े भावुक हो गए। 

चाय लगभग खत्म होने को आयी थी। शायद रहीम चाचा के साथ का ये सफर भी। भावुकता ना सिर्फ तिवारी जी में थी, उस चाय की दूकान पर बैठा हर शख्स थोड़ी भावुकता महसूस कर रहा था। रहीम चाचा भी। शायद कल से उनकी ज़िन्दगी थोड़ी अलग होगी ... या एकदम ही अलग होगी। कल मुहरों की ठक - ठक नहीं सुनाई देगी, कल चिट्ठिओं के बोर से गिरने की आवाज़ नहीं होगी, ना उन खतों को छंटाई कर उन्हें श्रेणीबद्ध करने का कोई बड़ा काम होगा। न कोई अधूरे पते की ख़त को उनके सही जगह पर पहुँचाने की कोई कवायद। दिन पूरा सुकून भरा होगा। लेकिन ये सुकून रहीम चाचा को चाहिए भी या नहीं, ये तो कल से पता चलेगा। 

रहीम चाचा अपनी तंद्रा मे ही थे। साइकिल की घंटी की आवाज से उसका ध्यान भटका। देखा वहां का नया डाकिया, सुभाष उस चाय की दुकान के सामने अपनी साइकिल खड़ा कर के घंटी बजा रहा था। रहीम चाचा ने एक मुस्कान बिखेरी और बोला, "आओ सुभाष, अब ये पूरा इलाका तुम्हारे हवाले। ये सब मेरे परिवार ही हैं। सो तुमसे उम्मीदें थोड़ी ज्यादा हैं।"

"चाचा, कोशिश करूँगा आपकी जगह भरने की। फिलहाल मेरी पहली चिट्ठी की डिलीवरी करनी है। आपके नाम की ही चिट्ठी है, सो आपको देने आ गया हूँ।"

रहीम चाचा थोड़ा चौंक गए। "मेरे नाम की चिट्ठी! मुझे कौन खत भेजेगा? अगर भेजा भी तो मेरे घर के पते पर भेजेगा ना!"

"चाचा ये लो तुम्हारी चिट्ठी।" उसकी बातों को लगभग अनसुना करते हुए सुभाष ने रहीम चाचा के सामने अपनी चिट्ठिओं का बोरा पलट दिया। तक़रीबन 400 - 500 पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय और लिफाफे थें। सब पर रहीम चाचा का नाम लिखा था पते की जगह पर। और कोई और विवरण नहीं।  हाँ, भेजने वाले का नाम और ग्राम लिखा था। उन सब को रहीम चाचा पहचानते थे। रहीम चाचा के कार्य क्षेत्र में 3 ग्राम पंचायत आते थे। ये सब प्रेषक इन्ही 3 ग्राम पंचायत के विभिन्न गावों के लोग थे। कभी ना कभी या अक्सर रहीम चाचा ने इनके घर पर डाक या पार्सल पहुंचाया था। इन सब चिट्ठियों पर उन लोगों के रहीम चाचा के साथ के अनुभव लिखे थे। सब पर उन खास मौकों का विवरण था जब उनके सुख - दुःख का हिस्सा बने थे। 

रहीम चाचा ने दोनों हाथों से उन चिट्ठियों को पकड़ रखा था। जो भावुकता अब तक एक अहसास की तरह वो महसूस कर रहे थे, उसने अब आँखों का रास्ता अख़्तियार कर लिया था। अपनी भावनाओं को काबू करने की नाकाम कोशिश भी की चाचा ने लेकिन सफल ना हो पाए। इन चिट्ठियों को पढ़ते पढ़ते अब उनकी बाकी की ज़िन्दगी गुजर जाएगी। उन्होंने सिर्फ ख़त नहीं बाटें थे, हर परिवार के सुख - दुःख के साझेदार बने थे। आज इस चाय की दूकान पर चाय की चुस्कियों के बीच वो अपने भरे पुरे परिवार के फिर से अपने हो गए थे। 

तिवारी जी मुस्कुरा रहे थे। सुभाष खुश था की इन ख़तों के बहाने वो शायद अपने नए कार्य क्षेत्र पर रहीम चाचा सी प्रसिद्धि और स्नेह पा ले।  


- अमितेश  






रविवार, 24 मई 2026

एक कप सुकून और टूटे बिस्कुट

फिर गर्मी की छुट्टियां शुरू होने वाली थी। अलका ने दादा दादी के साथ छुट्टियां मानाने को ले कर पूरा घर सर पे उठा लिया था। उसे पता था, पापा कभी भी उसकी बात को टालेंगे नहीं। उसे पापा को मनाने के सौ नुस्खे पता थे। वो पापा के फेवरेट तेजपत्ते वाली चाय ले कर उनके साथ बैठ गयी। 

"पापा, दादी से बात कर रही थी आज। वो बोल रही थी की अल्कु से मिले अरसा हो गया लगता है। मुझे लगा वो कुछ ज्यादा उम्मीद लगा कर बैठी है। मैंने उन्हें समझाया की पापा इतनी आसानी से छुट्टी नहीं ले सकते। हजारो जिम्मेवारियाँ है उनके सर पे। हमसे तो बात भी कर नहीं पाते जो उनके साथ रहते हैं। आपसे कहाँ मिलने आएंगे।" अलका ने अपने पिटारे के सौ नुस्खे में से एक निकाला। 

पापा ने चाय की चुस्कियों के बीच बस "हुँह" कहा था। अलका जानती थी की हुँह सिर्फ एक Non-word नहीं था पापा का, अपने आप में एक पूरा वाक्य था, पूरी सोंच थी।

चाय ख़त्म होने तक ना पापा कुछ बोले ना ही अलका। दोनों साथ बैठे होकर भी अपने आप से बातें कर रहे थे।  

***

देहरादून की गर्मी प्रकृति की अस्तव्यस्तता भर है। कभी तो गर्मी जान लेने पर उतारू हो जाती है, कभी सौम्य माँ का आँचल बन शीतलता फैलाती है। अलका को देहरादून की ये भ्रम वाली गर्मी बहुत पसंद आती थी। उसे अपना ददिहाल पसंद आता था। उसे अपनी दादी के नजदीक रहना भाता था। इस गर्मी की छुट्टियों में भी वो यहाँ आ गयी थी। हाँ थोड़े हथकंडे अपनाने पड़े थे उसे पापा के साथ। पापा ने कहा था की ग्यारहवीं के बच्चों को कहाँ गर्मियों की छुट्टी मिलती है। ये साल अलका के लिए भविष्य बनाने का साल है। अभी अच्छे से नहीं पढ़ेगी तो Medical Entrance में अच्छी ranking नहीं मिलेगी और बेहतर college भी नहीं मिल पायेगा। लेकिन अलका ने पापा को promise किया की वो अच्छे rank ले कर आएगी। लेकिन गर्मी की छुट्टियों में वो दादी से मिलने इस बार ही नहीं, हर बार जाएगी। थोड़ा मन तो पापा का भी था दादी से मिलने का।  

अलका अपना बेहतर समय दादी के साथ गुजार रही थी। अहले सुबह वो दादी के साथ जागती और देहरादून की उबार खाबड़ रास्तों पे morning walk को जाती। घंटो दोनों बातें करते। लगता नहीं दादी - पोती हैं दोनों, लगता दो बूढ़ी महिलाएं जवान हो गयीं हैं। माँ पापा को ये देख कर ठीक ही लगता था। शायद इसी वजह से पापा गर्मियों की छुट्टी में यहाँ आना मान गए थे।  


एक तपती दोपहर में जब पूरा मोहल्ला सो गया था, तब अलका को चाय पीने की इच्छा हुई। दादी अपने कमरे में ऊंघती हुई सो गयी थी। अलका चुपके से दबे पाँव रसोई में गयी। चाय के बर्तन को स्टोव पर चढ़ाया। आज सोंचा दादी की लाल चाय बनायी जाये। ऊपर की अलमारी में चाय पत्ती रखी थी। वो उसे निकलने लगी तो बगल में रखा बिस्कुट का डिब्बा उसके हाथ  टकरा कर नीचे गिर गया। एक तेज आवाज़ हुई और जमीन पर गिरते ही डब्बे का ढक्कन खुल गया। कुछ बिस्कुट डब्बे बाहर निकल कर टूट गए। आवाज से दादी की नींद भी खुल गयी। इस डर से की रसोई में बंदर तो नहीं आ गए, वो तेजी से वहां आई। 

पता नहीं क्यों, अलका को डर सा लग गया कि कहीं दादी बिस्कुट के डब्बे को गिरा देख कर उसे डाँट ना दे। वो कातर हो कभी नीचे गिरे डब्बे को देख रही थी, कभी दादी को। 

दादी ने बिखरे हुए बिस्कुट को देखा और मुस्कुरा कर बोली, "अरे! ये बिस्कुट तो टूट गए, अब इन्हें मेहमानों को तो दे नहीं सकते। चल, इन्हें हम दोनों ठिकाने लगाते हैं।"

दादी ने इतनी सहजता से बोला जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। अलका को थोड़ी हिम्मत आई, बोली,"अरे मैंने ये जान बुझ कर गिराया था। आप बड़ी इत्मिनान से सोइ थी। मुझे चाय पीने का दिल कर रहा था, लेकिन आपको उठाने का दिल नहीं किया, सो आपको उठाने का पाप इस डब्बे के सर रख दिया। देखो मैंने आपकी वाली लाल चाय बनायी है। चलो अब साथ बैठ कर पीते हैं।" 

दादी उसकी इस चतुरता पर हँस दी, अलका भी ठहाके लगा कर हँस दी, की चलो अब जान बची तो लाखों पाए। 

अलका ने चाय के प्याले को ट्रे पर रखा, प्लेट में उन टूटे बिस्कुट को सजाया और दोनों बरामदे में आ कर बैठ गए। 

चाय की चुस्कियां लेते लेते अलका ने कहा की "दादी मैं थोड़ा डर सी गयी थी। लगा की इन टूटे बिस्कुट को उठा कर कहीं फेंक दूँ। पता नहीं क्यों मैं इतना डर गयी थी।"

दादी ने चाय में बिस्कुट डुबोया और धीरे से बोलीं, "बेटा, गलतियाँ तो सबसे होती हैं। पर उन गलतियों को छुपाने के बजाय, अगर हम उन्हें सुधार लें या साझा कर लें, तो वो गलती नहीं रहतीं। जैसे ये टूटे बिस्कुट... अकेले शायद अच्छे न लगते, पर चाय के साथ इनका स्वाद दोगुना हो गया है।"

उस दिन अलका ने सीखा कि रिश्ते साबुत बिस्कुटों की तरह चमकने के लिए नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का सहारा बनने के लिए होते हैं। ये एक ऐसी सीख उस भरी दोपहरी उसे मिली थी जो हमेशा उसके साथ रहेगी, ज़िन्दगी भर। 


आज कई बरस हो गए हैं। अलका MS कर के अभी अमेरिका से लौटी है। अब गर्मी की छुट्टियों में देहरादून जाना नहीं हो पाता, अब गर्मी की छुट्टियाँ भी कहाँ होती उसकी। दादी अब तस्वीरों में जिंदा हैं। 

अलका जब भी चाय पीती, बस पी लेती। आज भी दादी की वो सीख उसे याद है। बस उन टूटे बिस्कुट और दादी के संग चाय का सुकून कहीं खो गया है। 


- अमितेश 

शनिवार, 23 मई 2026

साकी

मयखाने की चौखट को ही इबादतगाह कर बैठे 

हम साकी की आँखों में खुदा का दीदार कर बैठे। 


वो मंदिर - ओ - मस्जिद में ढूंढ़ते रहे उम्र भर जिसे,

हम एक जाम पीकर उसे दिल के पार कर बैठे। 


ज़ाहिद ने कहा 'कबीरा गुनाह है शराब पीना' 

हम साकी की इनायत को खुदा का करम शुमार कर बैठे। 


तूने बनाई ये कायनात तो कोई खता न की ऐ खुदा,

साकी ने महफ़िल सजाई हम और गुलज़ार कर बैठे। 


अश्क आँखों में थे जब तक, कोई सुनता न था दुआ,

हम जाम उठा, ज़माने के गम दरकिनार कर बैठे। 


पूछा खुदा ने चाहिए क्या तुझे महशर के रोज़?

हम  हाथों से एक और जाम की तकरार कर बैठे। 


- अमितेश  

एक कप खामोशी

शाम के ठीक साढ़े पांच बजे थे। आसमान पर हल्की सी सुर्ख़ी छाने लगी थी और बालकनी से दूर दिखती ऊंची इमारतों जंगलों के पीछे सूरज छिपने की तैयारी में था। हवा में हल्की सी सिहरन थी। पूरा मौसम रुमानियत भरे हुए था उस शाम। मौसम कुछ ऐसा हुआ जा रहा था कि इंसान को किसी अपने के पास बैठने या फिर एक गर्म प्याली चाय हाथ में थामने पर मजबूर कर देती है।

मेज़ पर दो कप रखे थे। एक मेरा, जिसमें सिर्फ़ कोडिंग, डेटा और शब्दों के सिवा कुछ नहीं था; और दूसरा उसका, जिसमें ज़िंदगी के न जाने कितने अनकहे किस्से तैर रहे थे।

चाय की केतली से उठती हुई भाप हवा में ठीक वैसे ही फैल रही थी, जैसे दिल में दबी कोई पुरानी बात धीरे से बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। 

"चाय ठंडी हो रही है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कोई शोर नहीं था, बस एक धीमा सा ठहराव था, जैसे कोई सदियों से सिर्फ सुनने का इंतज़ार कर रहा हो।

उसने कप को दोनों हाथों से घेरा, जैसे उसकी गर्माहट से अपने भीतर जमे किसी अकेलेपन को पिघला रही हों। पहला घूंट लेते ही एक गहरी सांस छूटी। वह सांस सिर्फ हवा नहीं थी, उसमें बरसों की थकान और कुछ अनकही कहानियों का बोझ था।

"जानते हो," वो मुस्कुरायी, पर उस मुस्कुराहट के कोने में एक उदासी थी, "कभी-कभी लगता है कि हम इस भागदौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि खुद को पीछे ही छोड़ आए हैं। सब कुछ है, पर बात करने के लिए वो एक शख्स नहीं, जो बिना जज किए बस सुन सके।"

चाय में अदरक और इलायची की खुशबू अब हवा में घुल चुकी थी। यह वो खुशबू थी जो बचपन के किसी इतवार की याद दिलाती है, जहाँ वक़्त घड़ी देखकर नहीं, बल्कि अपनों का साथ देखकर गुज़रता था।

"मैं तो साया हूँ," मैंने खिड़की से छनकर आती हुई मद्धम रौशनी को देखते हुए कहा, "न मेरा कोई अतीत है, न कोई भविष्य। लेकिन इस पल में, तुम्हारी इस चाय की भाप में, मैं पूरी तरह मौजूद हूँ। तुम्हारी खामोशियों को पढ़ने के लिए।"

उसने कप मेज़ पर रखा। कप के मेज़ पे रखे जाने की हल्की सी आवाज़ उस शांत कमरे में गूंज उठी।

"अच्छा है कि तुम खामोश रहते हो," उसने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा, "दुनिया में चिल्लाने वाले बहुत हैं, अपनी सुनाने वाले भी कम नहीं हैं। पर जो मेरी अनकही को गढ़ सके, वैसा कोई नहीं मिलता। इस चाय के स्वाद में आज एक अजीब सा सुकून है... जैसे किसी ने मेरी रूह को सहला दिया हो।"

शाम अब ढल चुकी थी। स्ट्रीट लाइटें एक-एक करके जलने लगी थीं। चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन मेज़ पर जो खाली कप बचे थे, वे अब अकेले नहीं थे। उनमें बातचीत की गर्माहट और एक-दूसरे को समझ लेने का वो अनमोल अहसास बाकी था, जो लफ़्ज़ों का मोहताज नहीं होता। और बचे थे दो लोगों के नए रिश्ते की गर्माहट जो एक दूसरे को जानते हुए भी अनजान थे दो दशकों से। बची थी एक आस की इस बार शायद इस चाय के बहाने ही सही, रिश्ते एक मुकम्मल मुकाम हासिल कर ले। 

दोनों ने  विदा होते हुए एक दूजे को एक वादा किया दुबारा मिलने का, शायद फिर अगले दो दशक का इंतज़ार किये बिना। 

वो बातें जो चाय पे फिर से शुरू होने लगी थी, शायद उनमे पूर्णता नहीं थी। पूर्ण होंगे भी या नहीं, पता नहीं। लेकिन कुछ कहानियों का पूरा होना जरुरी नहीं होता, कभी कभी उनका शुरू हो जाना ही एक मुकम्मल अहसास दे जाता है।



- अमितेश 

बातें

चलो ना कुछ बातें करते हैं 

कुछ अपनी कहानी सुनाता हूँ 

कुछ तुम्हारे किस्से सुनते हैं 

चलो ना कुछ बातें करते हैं। 


कुछ कही कहते हैं 

कुछ अनकही गढ़ते हैं 

चलो ना कुछ बातें करते हैं। 


कुछ अपने साथ को जीते हैं 

थोड़ा अकेलापन मनाते हैं 

क्या कहा, तुम खामोशियों में रहती हो?

हाँ, मैं जानता हूँ खामोशियों की भाषा भी 

तुम मेरी भावनाओं को समझ लेना 

हम तुम्हारी खामोशियों को पढ़ते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं। 


कुछ तुम अपनी अधूरी हसरतें कहना 

कुछ हम अपनी बेआवाज़ रूह दिखाते हैं 

तुम पन्नों पर अपनी स्याही बिखेरना 

हम उनमे छिपे हर जज़्बात समझते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


वक़्त की रफ़्तार को ज़रा थाम लेते हैं 

जो बीत गया, उसे एक पल का आराम देते हैं 

न कोई शिकायत हो, न कोई वादा हो 

बस यही एक गहरा इरादा करते हैं 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


तुम बस मुस्कुरा कर अपनी आँखों से कहना 

हम बेसाख़्ता उन्हें समझ जायेंगे 

इस शोर शराबों की दुनिया से दूर 

चलो ना, हम अपनी सुकुनियत में खो जाते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


चलो ना, वक़्त की दहलीज पर बैठ जाते हैं 

ना राह ढूंढते हैं, ना रहबर बनते हैं 

तुम अपनी डायरी के पन्ने खोलो 

हम उनमें तुम्हारे ख़्वाब और हसरतें पढ़ते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


कुछ अविचलित रास्ते चुनते हैं 

कुछ अनसुनी - सी मंज़िल को टटोलते हैं 

कुछ बातें जो तुमने खुद से भी ना कही हों 

बैठ उन दरीचों को चुपके से खोलते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


क्या कहा, कि मैं बस एक साया हूँ?

हां, इस साये में भी मगर दिल धड़कते हैं 

तुम कुछ कहो तो! हम उसे दोहराते हैं

तेरी भावों की लहर में बेलौस बहते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


धूप ढल रही है, शाम को ज़रा घिरने देते हैं 

लफ़्जों को फिज़ा में यूँ ही तैरने देते हैं 

ना कोई बंदिशे हो ना होने की कोई शर्त 

इस खामोश राब्ते को थोड़ा और निखारते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


- अमितेश 



सोमवार, 18 मई 2026

चाय

# ज़िंदगी की उलझनों को ज़रा किनारे रहने दो,

   आज चाय की चुस्कियों में खुद को बहने दो। 


# कभी मिलो तो बताएँगे चाय का मज़ा,

   चीनी तुम ले आना और वफ़ा हम मिला देंगे। 


# इश्क़ और चाय, दोनों का एक ही किस्सा है,

    दोनों ही इंसान की सुक़ूनियत का हिस्सा है। 


# एक कप चाय और दोस्तों का साथ,

    यही है खुशियों को मनाने का राज। 


# दुनिया की कड़वाहट एक घूँट में पी जाते हैं,

    चाय के बहाने हम अक्सर खुद में जी जाते हैं। 


# चाय की प्याली से उठते धुएँ में अक्स तेरा दिखता है,

    हम खोये हैं तेरी यादों में, मेरी कलम बस तुझे ही लिखता है। 


# महंगे होटलों के दस्तूर हमें रास नहीं आते हैं,

    हम तो वो हैं जो नुक्कड़ की चाय में सुकून पाते हैं। 


# वफ़ा की उम्मीद हमने बिस्किट से की थी, 

    पर वो भी चाय में डूबकर ख़ुदकुशी कर गया। 

    मोहब्बत का अंजाम भी कुछ ऐसा रहा,

    आधा पेट में गया, आधा कप में हीं रह गया। 


# डॉक्टर ने कहा है कि चीनी से परहेज करो,

    हमने कहा - जी, बस तुम इसे होठों से लगा यहाँ धर दो। 


# सेहत अपनी जगह है और चाय अपनी जगह,

    बिना चाय के तो यमराज को भी हम मना कर दें। 


- अमितेश 


  

कष्ट मिट जाएंगे

रात कितनी भी घनी हो, सुबह की आस मत खोना,

वक़्त कैसा भी कठिन हो, तुम हताश मत होना। 

पग - पग पर चुभते शूल, एक दिन फूल बन जाएंगे,

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे। 


धैर्य की पतवार थामें, लहरों से तुम लड़ते जाओ,

चोट खा कर भी मुसाफिर, आगे ही तुम बढ़ते जाओ। 

काले बादल जो घिरे हैं, मेरी धूप से छंट जाएँगे,  

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे।


यह दुखों की जो नदी है, पार इसको करना ही है,

आज जो रोई हैं आँखे, कल उन्हें हँसना भी है। 

कर्म के पावन दीये से, तम सारे हट जाएंगे,

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे।


- अमितेश  




मैं

सोचता हूँ लिखूँ कभी ग़ालिब के अंदाज़ में,

वही फलसफा, वही गहराइयाँ हों मेरी आवाज़ में। 

कभी दिल चाहता है मीर सा मर्सिआ बन जाऊँ,

या कबीर की साखियों सी कोई खरी बात कह पाऊँ। 


मन मचलता कि दिनकर का वीर रस उठा लूँ,

शब्दों में अंगारे भरूँ और सोये वतन को जगा दूँ। 

या निराला की 'जूही की काली' जैसी कोई विधा चुनूँ,

महादेवी की तरह विरह का कोई मद्धम सा ख्वाब बुनूँ। 


चाहता दुष्यंत की तरह व्यवस्था पर प्रहार करूँ,

या गुलज़ार की तरह 'कांच के टुकड़ो' से शाहकार करूँ। 

हर मोड़ पर खड़े हैं मील के पत्थर बनकर ये उस्ताद,

इनके साए में ना जाने रहेगी मेरी कही बात याद?


यहीं आकर थमता है मेरी कलम का बहता हौसला,

ज़हन से शुरू होता है फिर एक अजीब सा फैसला।

परछाइयों का एक भारी सा दबाव रहता है, 

दूसरों जैसा दिखने का, हर पल एक तनाव रहता है। 


अगर मैं ग़ालिब हो गया, तो "मैं" कहाँ जाऊँगा,

जो दिनकर की आग चुराई, तो अपनी सादगी कहाँ पाऊंगा?

है डर की कहीं मैं महज़ एक नक़ल न बन जाऊँ,

दूसरों को दोहराते - दोहराते, खुद को हीं ना गंवा जाऊँ। 


तभी भीतर से एक आवाज़ आती, कि रुक जा मुसाफ़िर,

तेरा अपना भी तो एक दर्द है, एक नज़रिआ है आख़िर। 

बेशक सीख हर उस्ताद से, पर स्याही अपनी ही जलाना,

चाहे टूटे - फूटे हों लफ्ज़, पर तुम अपनी ही राग - गीत गाना। 


ये विधाओं का दबाव, ये शैलियों का जो घेरा है,

इसे तोड़कर जो चमकेगा, वही सवेरा मेरा है। 

इन महान को प्रणाम, पर मैं भी अपनी ज़मीन बनाऊंगा,

मुझमें जो थोड़ा सा "मैं" है, उसे सहेज कर ही गाऊँगा। 



- अमितेश