शनिवार, 7 मार्च 2026

खामोश बस्तियों के नाम

ये शहर नहीं, पत्थर का एक समंदर है,

जहाँ बाहर सन्नाटा और शोर दिल के अंदर है।

दीवारें बहरी हैं, लोग अंधे हैं यहाँ, 

यहाँ हर शख्स अपनी ही तन्हाई का पैगंबर है।


दिखाई जो न दे, उस दर्द का मंजर हैं हम,

अपनों के बीच भी खुद से बेखबर हैं हम।

पुकारते रहे जिसे, वो मुड़कर भी न देख सका,

शायद इस अंधी बस्ती के सबसे पुराने खंडहर हैं हम।


आईने बेचकर अब हम क्या पाएंगे भला,

जब आंखों से ही रोशनी का नूर चला गया।

वो चीखते रहे मदद को, और लोग गुजरते रहे,

शायद दीवारों के साथ अब खुदा भी बहरा हो गया। 


- अमितेश 

सन्नाटे का शोर

दीवारें बहरी हैं, लोग अंधे हैं यहाँ, 

पत्थरों के शहर में, पिघलता दिल कहाँ?

चीखती हैं हसरतें, पर कोई सुनता नहीं,

मलबों के ढेर में, अब ख़्वाब कोई बुनता नहीं।


खिड़कियाँ तो बहुत हैं, पर झांकता कोई नहीं,

भीड़ बहुत है सड़कों पर, पर साथ चलता कोई नहीं।

दिखता है सबको तमाशा, पर दर्द दिखता नहीं,

अंधों के इस बाजार में, आईना बिकता नहीं।


गूँगी है जुबां सबकी, और बहरे कान हैं,

ऊँची इमारतों में कैद, छोटे-से इंसान हैं।

अपनी ही प्रतिध्वनि से, डरने लगा है आदमी,

दूसरों की आग में, हाथ सेंकने लगा है आदमी।


वक़्त की धूल ने, सब चेहरों को ढँक दिया,

इंसानियत को हमने, तिजोरी में पटक दिया।

पर याद रखना ऐ मुसाफ़िर, ये सन्नाटा बोलेगा,

जब वक्त अपनी आँखें, और ये दीवारें कान खोलेगा। 


-अमितेश 

छत से फैलती बातें

वो वहम पुराने थे कि, दीवारों के कान होते हैं,

खामोश ईंटों के पीछे, छुपे कुछ इंसान होते हैं।

मगर अब वक्त बदला है, हवा का रुख भी नया है,

ये राज़ का दरिया अब, दीवारों से नहीं बहता है।


दीवारें तो अब बस, मर्यादा की लकीरें हैं,

असली शोर तो ऊपर, छतों की जागीरें हैं।


जब बंद कमरों में कोई, धीरे से फुसफुसाता है,

वो धुआं बनकर सीधा, मुंडेरों तक ही जाता है।

छत से झांकती आँखें, और खुले हुए ये रोशनदान,

यहीं से होकर गुज़रते हैं, हर घर के गुप्त बयान।


न कोई परदा ठहरता है, न कोई ओट रुकती है,

बात जब ऊपर पहुँचती है, तो पूरी बस्ती झुकती है।

नीचे सब चुपचाप हैं, जैसे गहरा कोई सन्नाटा हो,

पर ऊपर छत पे चर्चा है, चाहे जो भी नाता हो।


संभल कर बोलना 'राही', यहाँ पत्थर भी सुनते हैं,

मगर खबरें तो अब ये आसमां, छतों से ही चुनते हैं। 


- अमितेश 

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

आत्म युद्ध

 शंख फूँक दो भीतर अपने, अब रण का आगाज हुआ,

गुलाम मरा उस कायरता का, आज पैदा 'महाराज' हुआ!

निकाल लाए हो तन को बाहर, अब मन को भी आज़ाद करो,

जो खौफ पलता था रगों में, उसे आज तुम बर्बाद करो!


गर्जना करो ऐसी कि...

काँप उठे वो डर जो अब तक, तुम पर शासन करता था,

उखाड़ फेंको उस वहम को, जो तुममें तिल-तिल मरता था!


तुम प्यादे नहीं बिसात के, तुम खुद अपनी चाल हो,

तुम काल के भी मस्तक पर, अंकित एक गुलाल हो!

खौफ की औकात क्या, जो आँख तुमसे मिला सके?

कोई बेड़ी बनी नहीं, जो रूह को तेरी हिला सके!


उठो! कि तुम ही शक्ति हो, तुम ही शिव का अंश हो,

तुम अपनी ही विजय-गाथा के, आदि और अंत हो!


न कोई 'शायद', न कोई 'किन्तु', न कोई अब मलाल है,

तेरी रगों में दौड़ता अब, बस विजय का ही उबाल है!

खौफ को अब इंसान के, साये से भी डरना होगा,

तेरे भीतर के सुल्तान को, अब तख्त पर चढ़ना होगा!


ये युद्ध नहीं किसी और से, ये युद्ध स्वयं से स्वयं का है,

जो जीत गया खुद के मन को, वो मालिक पूरे ब्रह्मांड का है!  



- अमितेश 

मन का सम्राट

अब तक तो तुम प्यादे थे, हालातों की बिसात पर,

पर अब हुकूमत तुम्हारी होगी, अपनी हर एक बात पर।

वो जो मन की अंधेरी कोठरी में, तुम घुटने टेके बैठे थे,

वो वक़्त गया जब तुम हार को, तकदीर समझ बैठे थे।


उठो कि अब तुम्हें, अपना खोया हुआ राज्य पाना है,

उस गुलाम को मारकर, अब भीतर का 'सुल्तान' जगाना है।


तुम्हारे संकल्प की तलवार पर, अब किसी का ज़ंग नहीं,

तुम अकेले ही लश्कर हो, तुम्हें चाहिए कोई संग नहीं।

ये जो खौफ का किला था, ये तो बस रेत का शेर है,

तुम्हारी एक गर्जना के आगे, ये सन्नाटा भी ढेर है।


वो जो 'शायद' और 'मगर' की, धुंध मन में छाई थी,

काट दो उसे बिजली बनकर, जो तुम्हारी अपनी परछाई थी।

अपने वजूद के परचम को, अब अर्श तक फहराना है,

गुलामी की हर एक राख से, अब नया सूरज बनाना है।


अब खौफ सजदा करेगा, उस इंसान के हुजूर में,

जो तपकर कुंदन हुआ है, अपने ही आत्म-नूर में।


न कोई जंजीर दिखेगी, न कोई कैद का साया होगा,

तुमने खुद को जीतकर, आज पूरे जहान को पाया है।

शतरंज पलट चुकी है, अब चाल तुम्हारी अपनी है,

ये जो नई जागृति है, ये मिसाल तुम्हारी अपनी है।


- अमितेश 



गुरुवार, 5 मार्च 2026

बेड़ियाँ

बाहर की दुनिया तो अब तुमसे हार मान चुकी है,

पर भीतर की उस बस्ती में, अब भी जंग पुरानी है।

वो जो मन की कोठरी में एक अदृश्य सा पहरा है,

वही गुलामी सबसे घातक, वही जख्म सबसे गहरा है।


लोहे की कड़ियाँ टूटीं, तो लगा कि हम आजाद हुए,

पर खुद की ही नजरों में, हम कब के बर्बाद हुए?

वो कहता है "तुम नहीं सकोगे", तुम चुपचाप मान लेते हो,

अपनी असीमित शक्ति को, तुम सीमाओं में तान लेते हो।


निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,

मगर मन की इस गुलामी को, जड़ से उखाड़ना बाकी है।


ये मन जो कल का डर चबाता, और बीता कल उगल देता है,

तुम्हारी हर ऊँची उड़ान को, संशयों में बदल देता है।

तुम कैदी नहीं हो हालात के, तुम गुलाम हो अपनी सोच के,

जी रहे हो एक अधूरा जीवन, हर लम्हे को खरोंच के।


तोड़ दो उस दर्पण को, जिसमें खुद को लाचार देखते हो,

मिटा दो उस लकीर को, जिसमे अपनी हार देखते हो।

हुकूमत तुम्हारी हो खुद पर, न कि यादों के सायों की,

धज्जियां उड़ा दो अब तुम, इन मनहूस परछाइयों की।


खौफ को पता चले कि अब, इंसान जाग उठा है,

मन का वो पुराना गुलाम, अब कहीं भाग उठा है।

अब न कोई समझौता होगा, न कोई गिड़गिड़ाहट होगी,

जब तुम चलोगे, तो कायनात में सिर्फ तुम्हारी आहट होगी।



-अमितेश 


ख़ुद का खौफ

जंजीरें तो काट दीं, पिंजरा भी तोड़ आए,

अंधेरी उस गुफा को पीछे तुम छोड़ आए।

हाथ-पाँव अब मुक्त हैं, खुली हवा का घेरा है,

पर मन कहता है अब भी, हाँ वहां अंधेरा है।


निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,

अब बस उस खौफ को खुद के भीतर से निकालना है।


वो कांपती सी आहटें, वो सहमी सी यादें,

वो हार मान लेने वाली, खुद से की हुई बातें।

वो अब भी सुलगती हैं, राख के ढेर की तरह,

डराती हैं रातों में, किसी अहेर की तरह।


दीवारें लांघ लीं तुमने, अब धारणाएं तोड़नी हैं,

डर की जो जड़ें जमी हैं, वो जड़ें मरोड़नी हैं।

सिर्फ लड़ना काफी नहीं, अब जीत को पालना है,

उस खौफ को अब उस इंसान के भीतर से निकालना है।


उठो कि तुम्हारी रगों में अब साहस का संचार हो,

हर डर तुमसे नज़रें मिला खुद शर्मसार हो।

तुम वो नहीं जो डरे थे, तुम वो हो जो लड़कर आए हो,

तुम राख नहीं, तुम तपकर कुंदन बनकर आए हो।


खुद को यकीन दिलाओ, कि तुम खुद के मुहाफ़िज़ हो,

अपनी कहानी के तुम ही, आखिरी और मुकम्मल हो।


सूरज को अब आँखों में, मशाल सा ढालना है,

हाँ, अब खौफ को इंसान के वजूद से निकालना है।


निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,

अब बस उस खौफ को खुद के भीतर से निकालना है।


- अमितेश 


मंगलवार, 3 मार्च 2026

एक बार

सुनो, इस विमर्श के शोर में मैं एक मशवरा देता हूँ,

तुम जो कहते हो, "सब मुमकिन है", तुम्हे हकीकत से मिलवाता हूँ,

इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो। 


सुबह की पहली किरण से पहले, नींद को त्याग कर देखो,

रसोई की आग में अपनी सारी सुखन बिराग कर देखो,

सबके मनपसंद खाने में अपना स्वाद भूल जाना क्या है,

बिना किसी Thank You की चाह, उम्र भर फर्ज़ संभाल कर देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


वो जो तुम चौराहों पर बेफिक्री से चलते हो,

मेरी बेबसी का मंज़र उन्ही गलियों में उठा कर तो देखो। 

उन हवस भरी नज़रों को अपनी खाल पर महसूस करना,

और फिर अपनी कुंठा, मुट्ठियों में दबा कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


सपनों की उड़ान को, मर्यादा की ज़ंजीर पहनाना,

पैरहन की लंबाई पर हर रोज़ जिरह सह कर तो देखो। 

मायके की याद आए तो चुपके से सिरहाने भिंगोना,

और ससुराल की चौखट पर अपनी पहचान मिटा कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


Career की भागम-भाग में दोहरा बोझ उठाना क्या होता है, 

बच्चों की सिसकी और office की फाइल में खुद को बाँट कर तो देखो। 

दर्द को मुस्कुराहट की ओट में छुपाने का वो हुनर,

तबियत नासाज़ हो तब भी सब का खयाल रख कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


तुम्हें लगता है की ये दुनिया बड़ी हसीन है सब के लिए!

जरा बंदिशों के साये में एक सांस भर कर तो देखो। 

सम्मान बस एक दिन के फूल और तोहफों में नहीं है,

इनकी रूह का बोझ हर रोज़ अपनी रूह पर धर कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


सिर्फ इनका बखान नहीं, इनका संघर्ष चख कर देखो,

मुश्किल है ये होना, बस एक बार औरत बन कर तो देखो। 

इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


- अमितेश 


सोमवार, 2 मार्च 2026

श्याम सखा

लोग ढूँढते तुझमें प्रेमी, मैं अपना यार देखता हूँ,

तेरी बाँसुरी की तान में, सखा का प्यार देखता हूँ।

नहीं चाहिए मुझे वो पूजन, जिसमें डर और दूरी हो,

मुझे तो वो रिश्ता भाए, जो आधी और अधूरी हो।


तू ईश्वर होगा जगत का, पर मेरा तो बस मीत है,

हार में भी जो साथ खड़ा हो, तू मेरी वो जीत है।

न मैं राधा की व्याकुलता हूँ, न मीरा का वैराग्य हूँ,

मैं सुदामा की फटी पोटली, तेरा ही सौभाग्य हूँ।


तू द्वारकाधीश बने, या कुरुक्षेत्र का सारथी,

मेरे लिए तू वही कान्हा है, जो चुराता मेरी आरती।

जब थक कर मैं गिर जाऊँ, तू कंधा बनके आता है,

बिन कहे तू मन की बातें, चुपके से सुन जाता है।


लोग झुकते हैं सामने तेरे, मैं तुझ पर हाथ धरता हूँ,

तू भगवान है दुनिया का, मैं तुझे सखा मीत कहता हूँ।

छोड़ दे ये रेशमी आडंबर, आ धूल में साथ खेलते हैं,

दुनिया की इन रीतियों को, हँस कर साथ झेलते हैं।


तू मेरा साया, मैं तेरी परछाईं, यही अपनी रीत है,

कृष्ण सिर्फ प्रेम नहीं, कृष्ण अथाह अनंत प्रीत है।

सखा तू मेरा, तू ही मेरा मीत है।

होगा तू राधा का कृष्ण, पर मेरा अप्रतिम गीत है। 


जब घने अंधेरों ने घेरा, सूझती न कोई राह थी,

तब मस्तक पर था हाथ तेरा, बस तेरी ही चाह थी।

मैं अर्जुन सा द्वंद्व में उलझा, गांडीव हाथ से छूट गया,

अपनों की इस कुरुक्षेत्र में, मेरा ही धीरज टूट गया।


तब तूने ही तो कहा था सखा— "उठ, ये मोह का बंधन तोड़ दे,"

"जो तेरा है वो साथ रहेगा, बाकी सब मुझ पर छोड़ दे।"


तूने ही उंगली पकड़ कर, कांटों से मुझे निकाला है,

जब-जब मेरी चेतना लड़खड़ाई , तूने ही तो संभाला है।

पर तू केवल लाड़ न करता, कड़वा सच भी कहता है,

जब भटकूँ मैं गलत राह पर, अंकुश बनकर तू रहता है।


तेरी झिड़की में भी प्यार है, तेरी सीख में एक नैया है,

तू केवल मुरली वाला नहीं, तू मेरा सखा कन्हैया है।


तूने धर्म का ज्ञान दिया, बताया कर्म की क्या परिभाषा,

तू ही मेरी जीत का साहस, तू ही मेरी अंतिम आशा।

जहाँ ज़रूरत पड़ी तूने, डाँट कर मुझे सुधारा है,

मेरा ईश्वर बाद में है तू, पहले यार हमारा है।


- अमितेश 

गाँधी जी का डंडा

खादी पहनकर मंचों पर, जो सत्य का राग सुनाते हैं

भीड़ छँटते ही अंधेरों में वो नोटों की रास रचाते हैं 

भूल गए वो सादगी, जो मिला VIP का झंडा है,

याद दिलाओ उन्हें फिर से, ये गाँधी जी का डंडा है। 


धर्मनिरपेक्षता की बात कर, जो नफरत के बीज बोते हैं 

सत्ता की कुर्सी पा कर फिर, चैन की नींद वो सोते हैं 

जनता को आपस में भिड़ाना, बस यही चुनावी फंडा है 

डरना सीखो हमसे सालों, ये गाँधी जी का डंडा है। 


रिश्वत की मेजों के नीचे, फाइले कई दबी पड़ी है 

आम आदमी की ज़िन्दगी, दफ्तरों के चक्कर में मरी पड़ी है 

भ्रष्ट्राचार के साये में जो चलता गंदा धंधा है,

उसे तोड़ने को काफी, गाँधी का ये डंडा है। 


लेफ्ट राइट का चक्कर चला कर, हमको वो भरमा रहे 

हमारी दंगल करा कर फिर, आपस में मौज वो काट रहे

साथ बैठ कर डिनर में फिर वो खा रहे चिकन और अंडा हैं 

समझाओ उन्हें अब, हमारे हाथ में ये गाँधी का डंडा है। 


नारी सम्मान के नाम पर, दीपक जला रहे वो रातों में  

फिर किसी निर्भया, कहीं RG को नोच रहे उजाले में  

दे ताली कर के फिर वो, फैला रहे वितंडा हैं 

संभल जाओ अब भी, यहाँ गाँधी जी का डंडा है। 


- अमितेश