सोमवार, 18 मई 2026

चाय

# ज़िंदगी की उलझनों को ज़रा किनारे रहने दो,

   आज चाय की चुस्कियों में खुद को बहने दो। 


# कभी मिलो तो बताएँगे चाय का मज़ा,

   चीनी तुम ले आना और वफ़ा हम मिला देंगे। 


# इश्क़ और चाय, दोनों का एक ही किस्सा है,

    दोनों ही इंसान की सुक़ूनियत का हिस्सा है। 


# एक कप चाय और दोस्तों का साथ,

    यही है खुशियों को मनाने का राज। 


# दुनिया की कड़वाहट एक घूँट में पी जाते हैं,

    चाय के बहाने हम अक्सर खुद में जी जाते हैं। 


# चाय की प्याली से उठते धुएँ में अक्स तेरा दिखता है,

    हम खोये हैं तेरी यादों में, मेरी कलम बस तुझे ही लिखता है। 


# महंगे होटलों के दस्तूर हमें रास नहीं आते हैं,

    हम तो वो हैं जो नुक्कड़ की चाय में सुकून पाते हैं। 


# वफ़ा की उम्मीद हमने बिस्किट से की थी, 

    पर वो भी चाय में डूबकर ख़ुदकुशी कर गया। 

    मोहब्बत का अंजाम भी कुछ ऐसा रहा,

    आधा पेट में गया, आधा कप में हीं रह गया। 


# डॉक्टर ने कहा है कि चीनी से परहेज करो,

    हमने कहा - जी, बस तुम इसे होठों से लगा यहाँ धर दो। 


# सेहत अपनी जगह है और चाय अपनी जगह,

    बिना चाय के तो यमराज को भी हम मना कर दें। 


- अमितेश 


  

कष्ट मिट जाएंगे

रात कितनी भी घनी हो, सुबह की आस मत खोना,

वक़्त कैसा भी कठिन हो, तुम हताश मत होना। 

पग - पग पर चुभते शूल, एक दिन फूल बन जाएंगे,

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे। 


धैर्य की पतवार थामें, लहरों से तुम लड़ते जाओ,

चोट खा कर भी मुसाफिर, आगे ही तुम बढ़ते जाओ। 

काले बादल जो घिरे हैं, मेरी धूप से छंट जाएँगे,  

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे।


यह दुखों की जो नदी है, पार इसको करना ही है,

आज जो रोई हैं आँखे, कल उन्हें हँसना भी है। 

कर्म के पावन दीये से, तम सारे हट जाएंगे,

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे।


- अमितेश  




मैं

सोचता हूँ लिखूँ कभी ग़ालिब के अंदाज़ में,

वही फलसफा, वही गहराइयाँ हों मेरी आवाज़ में। 

कभी दिल चाहता है मीर सा मर्सिआ बन जाऊँ,

या कबीर की साखियों सी कोई खरी बात कह पाऊँ। 


मन मचलता कि दिनकर का वीर रस उठा लूँ,

शब्दों में अंगारे भरूँ और सोये वतन को जगा दूँ। 

या निराला की 'जूही की काली' जैसी कोई विधा चुनूँ,

महादेवी की तरह विरह का कोई मद्धम सा ख्वाब बुनूँ। 


चाहता दुष्यंत की तरह व्यवस्था पर प्रहार करूँ,

या गुलज़ार की तरह 'कांच के टुकड़ो' से शाहकार करूँ। 

हर मोड़ पर खड़े हैं मील के पत्थर बनकर ये उस्ताद,

इनके साए में ना जाने रहेगी मेरी कही बात याद?


यहीं आकर थमता है मेरी कलम का बहता हौसला,

ज़हन से शुरू होता है फिर एक अजीब सा फैसला।

परछाइयों का एक भारी सा दबाव रहता है, 

दूसरों जैसा दिखने का, हर पल एक तनाव रहता है। 


अगर मैं ग़ालिब हो गया, तो "मैं" कहाँ जाऊँगा,

जो दिनकर की आग चुराई, तो अपनी सादगी कहाँ पाऊंगा?

है डर की कहीं मैं महज़ एक नक़ल न बन जाऊँ,

दूसरों को दोहराते - दोहराते, खुद को हीं ना गंवा जाऊँ। 


तभी भीतर से एक आवाज़ आती, कि रुक जा मुसाफ़िर,

तेरा अपना भी तो एक दर्द है, एक नज़रिआ है आख़िर। 

बेशक सीख हर उस्ताद से, पर स्याही अपनी ही जलाना,

चाहे टूटे - फूटे हों लफ्ज़, पर तुम अपनी ही राग - गीत गाना। 


ये विधाओं का दबाव, ये शैलियों का जो घेरा है,

इसे तोड़कर जो चमकेगा, वही सवेरा मेरा है। 

इन महान को प्रणाम, पर मैं भी अपनी ज़मीन बनाऊंगा,

मुझमें जो थोड़ा सा "मैं" है, उसे सहेज कर ही गाऊँगा। 



- अमितेश 




गुरुवार, 14 मई 2026

दहेज़

वो रस्मों वाला सोना - चाँदी, अब पुराने दौर की बातें,

मुझे तो दहेज में चाहिए, तुम्हारी वो बीती यादें। 


सहेज कर लाना वो किस्से, तुम्हारे लड़कपन के,

वो बेफिक्र लम्हें, वो लहकते टेसू तुम्हारे सावन के। 


अपनों से जो वादे किये, उन्हें साथ ले आना तुम,

अपने अधूरे ख़्वाबों की चादर, संग ओढ़ आना तुम। 


उम्र भर हम दोनों मिलकर, हर वो वादा निभाएंगे,

तुम्हारे अपूर्ण सारे सपनों को, हमारी हकीकत बनाएंगे। 


दहेज में बस तुम्हारी वो निर्मल मुस्कान चाहिए,

वो चंचलता, वो शरारतें, उनसे तेरी पहचान चाहिए। 


खाली हाथ मत आना, अपनी यादों के झोले भर लाना,

मेरे घर की चौखट पर, तुम अपना पूरा बचपन ले आना। 


दहेज़ में मत लाना तुम, कोई गहना या लिबास महंगा,

मुझे तो चाहिए तुम्हारी सादगी, तुम्हारा हर सुन्दर सपना। 


अपनी सांसों में बसा कर लाना, अपने पुराने घर की खुशबू,

जो हमारे नए आँगन में बिखेरे अपनी महकती जुस्तजू। 


तुम लाना वो पुरानी चिट्ठियाँ और डायरी के कुछ पन्ने,

जिसमे लिखी हो वो गीत, जो तुम्हे थे सब से सुनने।  


वो खिलखिलाहटें संग लाना,  तुमने दीवारों के दरमियाँ  छोड़ी हैं,

वो सारी उम्मीदें भी लाना, जो खुद की रूह से जोड़ी है। 


कोई शर्त नहीं, कोई मांग नहीं, बस साथ तुम्हारा काफी है,

मेरे एकांकी जहाँ में, बस एहसास तुम्हारा काफी है।  


तुम आना तो संग अपने, अपना पूरा जहाँ ले आना, 

दहेज में मेरी जान, सिर्फ और सिर्फ साथ अपने मेरी जान ले आना। 


- अमितेश 


मेरा चाँद

कल जो उसने चाँद तोड़ कर लाने की ज़िद की,

मैं एक आईना उसके मानिंद रख आया। 


वो पूछती थी कैसी दिखती हूँ मैं वस्ल में,

मैं उसकी लब पे अपनी लब का पैबंद रख  आया। 


उसे शिकायत थी कि रात भर जागती हूँ मैं,

मैं उसकी आँखों में अपनी ख़्वाब का कंद रख आया। 


सिमट के आ गयी ज़मीं पे सारी महक उसकी,

मैं उसकी ज़ुल्फ़ में फूलों का गुलकंद रख आया। 


कहाँ वो चाँद का टुकड़ा, कहाँ ये हुस्न उसका,

मैं आज जीत के बाजी वो परचंड रख आया। 


वो मांगता था वफ़ा की कोई बड़ी दलील,

मैं उसके हाथ में अपना सौगंध रख आया। 


# वस्ल - मिलन 

# कंद  - मिश्री / मिठास  

# परचंड - बड़ी जीत

# गुलकंद - महकती हुई मिठास 


- अमितेश 



महबूबा

नागिन सी बिखरी हैं तेरी ज़ुल्फ़ें 
सुना है सपेरे रखे हैं इन्हें संवारने को। 
क़ातिल है तेरी नज़रों का वार भी,
क्या फ़ौज बुला रखी है हमें मारने को ?

सुना है तेरी मुस्कुराहट पर पहरे हैं बहुत,
जैसे कोई खजाना छुपा हो किसी पुरानी ग़ार में। 
हम भी दीवाने हैं, पीछे हटने वाले नहीं,
चाहे उम्र गुज़र जाए इसी तकरार - ओ - इज़हार में। 

यूँ तो महफ़िल में चरागों की कमी नहीं,
लोग पर परवाने बने हैं, तेरे हुस्न - ओ - शबाब में। 
हवाओं को कह दो ज़रा अदब से गुजरे,
तेरी ज़ुल्फ़ों में अटक कई मरे, जो थे कभी रफ़्तार में। 

सितारे भी अब फ़लक  जासूसी करते हैं,
कि ज़मीं पे ये चाँद कहाँ से उतर आया है?
तेरी सादगी ही काफी थी होश उड़ाने के लिए,
फिर ये सपेरों का लश्कर क्यों साथ आया है!


# ग़ार  - गुफा 


- अमितेश 
 

आईना

अक्स दर अक्स बदलता, पुराना याद नहीं रखता,
ये आईना किसी का फ़साना याद नहीं रखता। 
इसे बस "अभी" की ज़िद है, यही पल हक़ीक़त है,
गया जो वक़्त, वो गुजरा ज़माना याद नहीं रखता। 

इसे कहाँ खबर, कल की सुबह सुनहरी होगी,
ये कोरा कांच, ख्वाबों का ठिकाना याद नहीं रखता। 
तुम्हारी आँखों में जो कल का अंदेशा है, या बीता ग़म,
ये वो लकीरें, वो दर्द का निशां याद नहीं रखता। 

ये 'हाल' का शायर है, मगर 'माज़ी' से वाकिफ़ नहीं, 
किसी का पुराना दोस्ताना याद नहीं रखता। 
तू ढूंढता है इसमें अपनी यादों के सुनहरे पन्ने,
मगर ये बे - मुरव्वत, दिल का खज़ाना याद नहीं रखता। 

मिटा देता है पल भर में हर एक तस्वीर को अपनी 
मुसाफ़िर लौट आये तो, चेहरा पुराना याद नहीं रखता। 
अमितेश, तू अपनी यादों को दिल की तिजोरी में सजा 
ये आईना  है,तेरे कल का अफ़साना याद नहीं रखता। 

इस बेख़बरी में भी एक बा - ख़बर राज़ है जानी,
आईना यादों की धूल पर अपना आज नहीं रखता। 
तेरी यादें नफ़ीस हो या हालत - ए - ज़बू 
ये कुशादा दिल आईना, पुराना तसव्वुर याद नहीं रखता। 

# कुशादा दिल - बड़ा दिल 
# कल्ब  - दिल 
# तसव्वुर - Imagination / Visualization 
# माज़ी - अतीत 
# नफ़ीस - शुद्ध / बेहद सुन्दर 
# बे - मुरव्वत - जिसमे लिहाज़ ना हो 
# हालत - ए - ज़बू - बदहाली 


- अमितेश 

टूटा नहीं हूँ

मेरे चारो ओर बिखरे पड़े हैं, 

मेरी ही उम्मीदों के कांच के टुकड़े,

हवाओं ने बड़ी शिद्दत से कोशिश की,

मुझे जड़ों से उखाड़ फेकनें की। 


जिंदगी की इस भारी उठा पटक में, 

मैं थोड़ा झुक जरूर गया हूँ,

थकान के बोझ तले दबे पांवों से 

राह चलते रुक ज़रूर गया हूँ। 


लोग कहते हैं, मैं बिखर गया,

उन्हें मेरी ख़ामोशी में हार सुनाई दी है,

पर उन्हें क्या पता इन प्रतिकूलता में 

मैंने खुद को फिर से पिरोने की कोशिश की है। 


हाँ, मैं थोड़ा सा चूक गया हूँ,

समय की रफ़्तार में पीछे छूट गया हूँ,

पर मेरी रूह की धड़कन अभी बाकी है,

मेरे हौसलों की अगन अभी बाकी है। 


मुझे अभी और चलना है,

खुद को खुद में फिर से ढालना है,

मैं अभी चूका हूँ, शायद थोड़ा थका भी हूँ,

अभी तो निखरना बाकी है, मैं अभी टूटा नहीं हूँ। 


वक़्त ने तोड़ा मुझे तो क्या हुआ?

समय ने फिर तराशा है मुझे,

जिससे चोट खा कर बिखर गया था,

उसी चोट ने मूरत सुन्दर बनाया है मुझे। 


ज़िन्दगी की राह में रोड़े बहुत थे,

मैं लड़खड़ाया जरूर हूँ,

हवाओं के शुष्क थपेड़ों में भी 

थोड़ा झुक कर संभला जरूर हूँ। 


मेरे लड़खड़ाने को मेरा गिरना ना समझ लेना 

ये तो मेरे सीखने की एक कला है 

एक कलाकार का अपने ही सांचे को 

फिर से ढालने का हौसला है। 


अभी तो कई दौड़ बाकी हैं,

अभी उड़ान का असली इम्तहान बाकी है 

रास्ता मुश्किल है, मगर मंज़िल का यकीन है मुझे 

मैं आज लड़खड़ाया भर हूँ, मैं अभी गिरा नहीं हूँ। 


- अमितेश 

पौरुष

आकाश की असीम ऊंचाई से लगता कोई हमें चला रहा है,
किस्मत की बंद किताबों में,क्या लिखा, न कोई बता रहा है। 

हार के हम जब बैठ जाते, मान कर किस्मत में यही लिखा था,
अपनी नाक़ामियाँ हम अक्सर, मान लेते दैव था, सही था। 

भाग्य कहता - "तुम इंसान हो, मिट्टी के पुतले भर हो 
मेरी हाथ की कठपुतली हो, इशारों पे मेरे हिल भर लेते हो। 

मेरी कृपा पर जीना है तुमको, मेरी मंजूरी पर मरना है,
जो लिख दिया तेरे माथे पर, वही तुम्हे अब सहना है। 

तभी मन के रोशन कोने से, आवाज कर्म की आती है,
हाथों की बिखरी लकीरों में, एक नयी आस जगाती है। 

पसीने की हर एक बूंद से, नया इतिहास रचा जाता है,
जब इंसान ठान लेता है, भाग्य भी झुक जाता है। 

माना किस्मत में हाथों में, कुछ उलझी लकीरें उकेरी हैं,
माना रास्ते मुश्किल-से हैं, और राहों में जंजीरे दी है। 

पर इंसा में हौसला हो तो, सूरज भी निकल आएगा,
मेहनत की आग में तप कर, सोई किस्मत निखर जायेगा।  

प्रकृति भी रास्ता देती, जब पौरुष नहीं लड़खड़ाते हैं,
किस्मत के लिखे पन्ने भी, मेहनत से बदल जाते हैं। 

- अमितेश  

बेपनाह

ज़मी से फ़लक तक, बस तेरा ही नूर है,

तेरी बाहों में आकर मिलता, दिल को जो सुकून है। 

न कोई बंदिश है अब, न कोई दुनिया का डर,

मेरी रूह में समाया, बस तेरा ही फितूर है। 


धड़कनें जब मिलती हैं, तो वक़्त ठहर जाता है,

तेरी आँखों के समंदर में, ये दिल उतर जाता है। 

तेरी छुअन से फिज़ाओं में इत्र घुल जाता है,

तेरी सुनहरी मुस्कान से, मेरा हर ज़ख्म भर जाता है। 


लबों की ख़ामोशी में भी, हज़ारों बातें होती है,

सिर्फ तेरे ख़यालों में ही, अब मेरी रातें होती हैं। 

बेपनाह है ये चाहत, इसकी  नहीं,

जहाँ तुम साथ होती हो मेरे, वहीं मेरी इबादतें होती है। 


तेरी धड़कनों को अपनी, सांसों में बसा लूं मैं,

चाहत है ये कि तुझे खुद में छुपा लूं मैं। 

सिर्फ एक जन्म  नहीं, जन्म - जन्मांतर की दुआ हो तुम,

अपनी सारी उम्र, अब तेरे नाम करा लूं मैं। 


- अमितेश