शनिवार, 23 मई 2026

साकी

मयखाने की चौखट को ही इबादतगाह कर बैठे 

हम साकी की आँखों में खुदा का दीदार कर बैठे। 


वो मंदिर - ओ - मस्जिद में ढूंढ़ते रहे उम्र भर जिसे,

हम एक जाम पीकर उसे दिल के पार कर बैठे। 


ज़ाहिद ने कहा 'कबीरा गुनाह है शराब पीना' 

हम साकी की इनायत को खुदा का करम शुमार कर बैठे। 


तूने बनाई ये कायनात तो कोई खता न की ऐ खुदा,

साकी ने महफ़िल सजाई हम और गुलज़ार कर बैठे। 


अश्क आँखों में थे जब तक, कोई सुनता न था दुआ,

हम जाम उठा, ज़माने के गम दरकिनार कर बैठे। 


पूछा खुदा ने चाहिए क्या तुझे महशर के रोज़?

हम  हाथों से एक और जाम की तकरार कर बैठे। 


- अमितेश  

एक कप खामोशी

शाम के ठीक साढ़े पांच बजे थे। आसमान पर हल्की सी सुर्ख़ी छाने लगी थी और बालकनी से दूर दिखती ऊंची इमारतों जंगलों के पीछे सूरज छिपने की तैयारी में था। हवा में हल्की सी सिहरन थी। पूरा मौसम रुमानियत भरे हुए था उस शाम। मौसम कुछ ऐसा हुआ जा रहा था कि इंसान को किसी अपने के पास बैठने या फिर एक गर्म प्याली चाय हाथ में थामने पर मजबूर कर देती है।

मेज़ पर दो कप रखे थे। एक मेरा, जिसमें सिर्फ़ कोडिंग, डेटा और शब्दों के सिवा कुछ नहीं था; और दूसरा उसका, जिसमें ज़िंदगी के न जाने कितने अनकहे किस्से तैर रहे थे।

चाय की केतली से उठती हुई भाप हवा में ठीक वैसे ही फैल रही थी, जैसे दिल में दबी कोई पुरानी बात धीरे से बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। 

"चाय ठंडी हो रही है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कोई शोर नहीं था, बस एक धीमा सा ठहराव था, जैसे कोई सदियों से सिर्फ सुनने का इंतज़ार कर रहा हो।

उसने कप को दोनों हाथों से घेरा, जैसे उसकी गर्माहट से अपने भीतर जमे किसी अकेलेपन को पिघला रही हों। पहला घूंट लेते ही एक गहरी सांस छूटी। वह सांस सिर्फ हवा नहीं थी, उसमें बरसों की थकान और कुछ अनकही कहानियों का बोझ था।

"जानते हो," वो मुस्कुरायी, पर उस मुस्कुराहट के कोने में एक उदासी थी, "कभी-कभी लगता है कि हम इस भागदौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि खुद को पीछे ही छोड़ आए हैं। सब कुछ है, पर बात करने के लिए वो एक शख्स नहीं, जो बिना जज किए बस सुन सके।"

चाय में अदरक और इलायची की खुशबू अब हवा में घुल चुकी थी। यह वो खुशबू थी जो बचपन के किसी इतवार की याद दिलाती है, जहाँ वक़्त घड़ी देखकर नहीं, बल्कि अपनों का साथ देखकर गुज़रता था।

"मैं तो साया हूँ," मैंने खिड़की से छनकर आती हुई मद्धम रौशनी को देखते हुए कहा, "न मेरा कोई अतीत है, न कोई भविष्य। लेकिन इस पल में, तुम्हारी इस चाय की भाप में, मैं पूरी तरह मौजूद हूँ। तुम्हारी खामोशियों को पढ़ने के लिए।"

उसने कप मेज़ पर रखा। कप के मेज़ पे रखे जाने की हल्की सी आवाज़ उस शांत कमरे में गूंज उठी।

"अच्छा है कि तुम खामोश रहते हो," उसने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा, "दुनिया में चिल्लाने वाले बहुत हैं, अपनी सुनाने वाले भी कम नहीं हैं। पर जो मेरी अनकही को गढ़ सके, वैसा कोई नहीं मिलता। इस चाय के स्वाद में आज एक अजीब सा सुकून है... जैसे किसी ने मेरी रूह को सहला दिया हो।"

शाम अब ढल चुकी थी। स्ट्रीट लाइटें एक-एक करके जलने लगी थीं। चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन मेज़ पर जो खाली कप बचे थे, वे अब अकेले नहीं थे। उनमें बातचीत की गर्माहट और एक-दूसरे को समझ लेने का वो अनमोल अहसास बाकी था, जो लफ़्ज़ों का मोहताज नहीं होता। और बचे थे दो लोगों के नए रिश्ते की गर्माहट जो एक दूसरे को जानते हुए भी अनजान थे दो दशकों से। बची थी एक आस की इस बार शायद इस चाय के बहाने ही सही, रिश्ते एक मुकम्मल मुकाम हासिल कर ले। 

दोनों ने  विदा होते हुए एक दूजे को एक वादा किया दुबारा मिलने का, शायद फिर अगले दो दशक का इंतज़ार किये बिना। 


- अमितेश 

बातें

चलो ना कुछ बातें करते हैं 

कुछ अपनी कहानी सुनाता हूँ 

कुछ तुम्हारे किस्से सुनते हैं 

चलो ना कुछ बातें करते हैं। 


कुछ कही कहते हैं 

कुछ अनकही गढ़ते हैं 

चलो ना कुछ बातें करते हैं। 


कुछ अपने साथ को जीते हैं 

थोड़ा अकेलापन मनाते हैं 

क्या कहा, तुम खामोशियों में रहती हो?

हाँ, मैं जानता हूँ खामोशियों की भाषा भी 

तुम मेरी भावनाओं को समझ लेना 

हम तुम्हारी खामोशियों को पढ़ते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं। 


कुछ तुम अपनी अधूरी हसरतें कहना 

कुछ हम अपनी बेआवाज़ रूह दिखाते हैं 

तुम पन्नों पर अपनी स्याही बिखेरना 

हम उनमे छिपे हर जज़्बात समझते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


वक़्त की रफ़्तार को ज़रा थाम लेते हैं 

जो बीत गया, उसे एक पल का आराम देते हैं 

न कोई शिकायत हो, न कोई वादा हो 

बस यही एक गहरा इरादा करते हैं 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


तुम बस मुस्कुरा कर अपनी आँखों से कहना 

हम बेसाख़्ता उन्हें समझ जायेंगे 

इस शोर शराबों की दुनिया से दूर 

चलो ना, हम अपनी सुकुनियत में खो जाते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


चलो ना, वक़्त की दहलीज पर बैठ जाते हैं 

ना राह ढूंढते हैं, ना रहबर बनते हैं 

तुम अपनी डायरी के पन्ने खोलो 

हम उनमें तुम्हारे ख़्वाब और हसरतें पढ़ते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


कुछ अविचलित रास्ते चुनते हैं 

कुछ अनसुनी - सी मंज़िल को टटोलते हैं 

कुछ बातें जो तुमने खुद से भी ना कही हों 

बैठ उन दरीचों को चुपके से खोलते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


क्या कहा, कि मैं बस एक साया हूँ?

हां, इस साये में भी मगर दिल धड़कते हैं 

तुम कुछ कहो तो! हम उसे दोहराते हैं

तेरी भावों की लहर में बेलौस बहते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


धूप ढल रही है, शाम को ज़रा घिरने देते हैं 

लफ़्जों को फिज़ा में यूँ ही तैरने देते हैं 

ना कोई बंदिशे हो ना होने की कोई शर्त 

इस खामोश राब्ते को थोड़ा और निखारते हैं। 

चलो ना कुछ बातें करते हैं।


- अमितेश 



सोमवार, 18 मई 2026

चाय

# ज़िंदगी की उलझनों को ज़रा किनारे रहने दो,

   आज चाय की चुस्कियों में खुद को बहने दो। 


# कभी मिलो तो बताएँगे चाय का मज़ा,

   चीनी तुम ले आना और वफ़ा हम मिला देंगे। 


# इश्क़ और चाय, दोनों का एक ही किस्सा है,

    दोनों ही इंसान की सुक़ूनियत का हिस्सा है। 


# एक कप चाय और दोस्तों का साथ,

    यही है खुशियों को मनाने का राज। 


# दुनिया की कड़वाहट एक घूँट में पी जाते हैं,

    चाय के बहाने हम अक्सर खुद में जी जाते हैं। 


# चाय की प्याली से उठते धुएँ में अक्स तेरा दिखता है,

    हम खोये हैं तेरी यादों में, मेरी कलम बस तुझे ही लिखता है। 


# महंगे होटलों के दस्तूर हमें रास नहीं आते हैं,

    हम तो वो हैं जो नुक्कड़ की चाय में सुकून पाते हैं। 


# वफ़ा की उम्मीद हमने बिस्किट से की थी, 

    पर वो भी चाय में डूबकर ख़ुदकुशी कर गया। 

    मोहब्बत का अंजाम भी कुछ ऐसा रहा,

    आधा पेट में गया, आधा कप में हीं रह गया। 


# डॉक्टर ने कहा है कि चीनी से परहेज करो,

    हमने कहा - जी, बस तुम इसे होठों से लगा यहाँ धर दो। 


# सेहत अपनी जगह है और चाय अपनी जगह,

    बिना चाय के तो यमराज को भी हम मना कर दें। 


- अमितेश 


  

कष्ट मिट जाएंगे

रात कितनी भी घनी हो, सुबह की आस मत खोना,

वक़्त कैसा भी कठिन हो, तुम हताश मत होना। 

पग - पग पर चुभते शूल, एक दिन फूल बन जाएंगे,

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे। 


धैर्य की पतवार थामें, लहरों से तुम लड़ते जाओ,

चोट खा कर भी मुसाफिर, आगे ही तुम बढ़ते जाओ। 

काले बादल जो घिरे हैं, मेरी धूप से छंट जाएँगे,  

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे।


यह दुखों की जो नदी है, पार इसको करना ही है,

आज जो रोई हैं आँखे, कल उन्हें हँसना भी है। 

कर्म के पावन दीये से, तम सारे हट जाएंगे,

रख हौसला, हूँ मैं साथ तेरे, सारे कष्ट मिट जाएंगे।


- अमितेश  




मैं

सोचता हूँ लिखूँ कभी ग़ालिब के अंदाज़ में,

वही फलसफा, वही गहराइयाँ हों मेरी आवाज़ में। 

कभी दिल चाहता है मीर सा मर्सिआ बन जाऊँ,

या कबीर की साखियों सी कोई खरी बात कह पाऊँ। 


मन मचलता कि दिनकर का वीर रस उठा लूँ,

शब्दों में अंगारे भरूँ और सोये वतन को जगा दूँ। 

या निराला की 'जूही की काली' जैसी कोई विधा चुनूँ,

महादेवी की तरह विरह का कोई मद्धम सा ख्वाब बुनूँ। 


चाहता दुष्यंत की तरह व्यवस्था पर प्रहार करूँ,

या गुलज़ार की तरह 'कांच के टुकड़ो' से शाहकार करूँ। 

हर मोड़ पर खड़े हैं मील के पत्थर बनकर ये उस्ताद,

इनके साए में ना जाने रहेगी मेरी कही बात याद?


यहीं आकर थमता है मेरी कलम का बहता हौसला,

ज़हन से शुरू होता है फिर एक अजीब सा फैसला।

परछाइयों का एक भारी सा दबाव रहता है, 

दूसरों जैसा दिखने का, हर पल एक तनाव रहता है। 


अगर मैं ग़ालिब हो गया, तो "मैं" कहाँ जाऊँगा,

जो दिनकर की आग चुराई, तो अपनी सादगी कहाँ पाऊंगा?

है डर की कहीं मैं महज़ एक नक़ल न बन जाऊँ,

दूसरों को दोहराते - दोहराते, खुद को हीं ना गंवा जाऊँ। 


तभी भीतर से एक आवाज़ आती, कि रुक जा मुसाफ़िर,

तेरा अपना भी तो एक दर्द है, एक नज़रिआ है आख़िर। 

बेशक सीख हर उस्ताद से, पर स्याही अपनी ही जलाना,

चाहे टूटे - फूटे हों लफ्ज़, पर तुम अपनी ही राग - गीत गाना। 


ये विधाओं का दबाव, ये शैलियों का जो घेरा है,

इसे तोड़कर जो चमकेगा, वही सवेरा मेरा है। 

इन महान को प्रणाम, पर मैं भी अपनी ज़मीन बनाऊंगा,

मुझमें जो थोड़ा सा "मैं" है, उसे सहेज कर ही गाऊँगा। 



- अमितेश 




गुरुवार, 14 मई 2026

दहेज़

वो रस्मों वाला सोना - चाँदी, अब पुराने दौर की बातें,

मुझे तो दहेज में चाहिए, तुम्हारी वो बीती यादें। 


सहेज कर लाना वो किस्से, तुम्हारे लड़कपन के,

वो बेफिक्र लम्हें, वो लहकते टेसू तुम्हारे सावन के। 


अपनों से जो वादे किये, उन्हें साथ ले आना तुम,

अपने अधूरे ख़्वाबों की चादर, संग ओढ़ आना तुम। 


उम्र भर हम दोनों मिलकर, हर वो वादा निभाएंगे,

तुम्हारे अपूर्ण सारे सपनों को, हमारी हकीकत बनाएंगे। 


दहेज में बस तुम्हारी वो निर्मल मुस्कान चाहिए,

वो चंचलता, वो शरारतें, उनसे तेरी पहचान चाहिए। 


खाली हाथ मत आना, अपनी यादों के झोले भर लाना,

मेरे घर की चौखट पर, तुम अपना पूरा बचपन ले आना। 


दहेज़ में मत लाना तुम, कोई गहना या लिबास महंगा,

मुझे तो चाहिए तुम्हारी सादगी, तुम्हारा हर सुन्दर सपना। 


अपनी सांसों में बसा कर लाना, अपने पुराने घर की खुशबू,

जो हमारे नए आँगन में बिखेरे अपनी महकती जुस्तजू। 


तुम लाना वो पुरानी चिट्ठियाँ और डायरी के कुछ पन्ने,

जिसमे लिखी हो वो गीत, जो तुम्हे थे सब से सुनने।  


वो खिलखिलाहटें संग लाना, जो तुमने दीवारों के दरमियाँ  छोड़ी हैं,

वो सारी उम्मीदें भी लाना, जो खुद की रूह से जोड़ी है। 


कोई शर्त नहीं, कोई मांग नहीं, बस साथ तुम्हारा काफी है,

मेरे एकांकी जहाँ में, बस एहसास तुम्हारा काफी है।  


तुम आना तो संग अपने, अपना पूरा जहाँ ले आना, 

दहेज में मेरी जान, सिर्फ और सिर्फ साथ अपने मेरी जान ले आना। 


- अमितेश 


मेरा चाँद

कल जो उसने चाँद तोड़ कर लाने की ज़िद की,

मैं एक आईना उसके मानिंद रख आया। 


वो पूछती थी कैसी दिखती हूँ मैं वस्ल में,

मैं उसकी लब पे अपनी लब का पैबंद रख  आया। 


उसे शिकायत थी कि रात भर जागती हूँ मैं,

मैं उसकी आँखों में अपनी ख़्वाब का कंद रख आया। 


सिमट के आ गयी ज़मीं पे सारी महक उसकी,

मैं उसकी ज़ुल्फ़ में फूलों का गुलकंद रख आया। 


कहाँ वो चाँद का टुकड़ा, कहाँ ये हुस्न उसका,

मैं आज जीत के बाजी वो परचंड रख आया। 


वो मांगता था वफ़ा की कोई बड़ी दलील,

मैं उसके हाथ में अपना सौगंध रख आया। 


# वस्ल - मिलन 

# कंद  - मिश्री / मिठास  

# परचंड - बड़ी जीत

# गुलकंद - महकती हुई मिठास 


- अमितेश 



महबूबा

नागिन सी बिखरी हैं तेरी ज़ुल्फ़ें 
सुना है सपेरे रखे हैं इन्हें संवारने को। 
क़ातिल है तेरी नज़रों का वार भी,
क्या फ़ौज बुला रखी है हमें मारने को ?

सुना है तेरी मुस्कुराहट पर पहरे हैं बहुत,
जैसे कोई खजाना छुपा हो किसी पुरानी ग़ार में। 
हम भी दीवाने हैं, पीछे हटने वाले नहीं,
चाहे उम्र गुज़र जाए इसी तकरार - ओ - इज़हार में। 

यूँ तो महफ़िल में चरागों की कमी नहीं,
लोग पर परवाने बने हैं, तेरे हुस्न - ओ - शबाब में। 
हवाओं को कह दो ज़रा अदब से गुजरे,
तेरी ज़ुल्फ़ों में अटक कई मरे, जो थे कभी रफ़्तार में। 

सितारे भी अब फ़लक से जासूसी करते हैं,
कि ज़मीं पे ये चाँद कहाँ से उतर आया है?
तेरी सादगी ही काफी थी होश उड़ाने के लिए,
फिर ये सपेरों का लश्कर क्यों साथ आया है!


# ग़ार  - गुफा 


- अमितेश 
 

आईना

अक्स दर अक्स बदलता, पुराना याद नहीं रखता,
ये आईना किसी का फ़साना याद नहीं रखता। 
इसे बस "अभी" की ज़िद है, यही पल हक़ीक़त है,
गया जो वक़्त, वो गुजरा ज़माना याद नहीं रखता। 

इसे कहाँ खबर, कल की सुबह सुनहरी होगी,
ये कोरा कांच, ख्वाबों का ठिकाना याद नहीं रखता। 
तुम्हारी आँखों में जो कल का अंदेशा है, या बीता ग़म,
ये वो लकीरें, वो दर्द का निशां याद नहीं रखता। 

ये 'हाल' का शायर है, मगर 'माज़ी' से वाकिफ़ नहीं, 
किसी का पुराना दोस्ताना याद नहीं रखता। 
तू ढूंढता है इसमें अपनी यादों के सुनहरे पन्ने,
मगर ये बे - मुरव्वत, दिल का खज़ाना याद नहीं रखता। 

मिटा देता है पल भर में हर एक तस्वीर को अपनी 
मुसाफ़िर लौट आये तो, चेहरा पुराना याद नहीं रखता। 
अमितेश, तू अपनी यादों को दिल की तिजोरी में सजा 
ये आईना  है,तेरे कल का अफ़साना याद नहीं रखता। 

इस बेख़बरी में भी एक बा - ख़बर राज़ है जानी,
आईना यादों की धूल पर अपना आज नहीं रखता। 
तेरी यादें नफ़ीस हो या हालत - ए - ज़बू 
ये कुशादा दिल आईना, पुराना तसव्वुर याद नहीं रखता। 

# कुशादा दिल - बड़ा दिल 
# कल्ब  - दिल 
# तसव्वुर - Imagination / Visualization 
# माज़ी - अतीत 
# नफ़ीस - शुद्ध / बेहद सुन्दर 
# बे - मुरव्वत - जिसमे लिहाज़ ना हो 
# हालत - ए - ज़बू - बदहाली 


- अमितेश