कपूर साहब ने शहर का नाम रोशन कर दिया था। रायपुर जैसे छोटे शहर को दुनिया जानती तक नहीं थी। एक छोटी चक्की से 50 साल पहले इन्होने मसाले का व्यापार शुरू किया था यहाँ से। आज यही मसाले दुनिया भर में एक्सपोर्ट किये जाते हैं। कपूर साहब की कंपनी आज हिंदुस्तान की बड़ी कंपनियों में शुमार है। हजारो करोड़ का व्यापर है इनका। लेकिन अपने शहर से प्यार इतना की आज भी कंपनी का हेड ऑफिस रायपुर में ही रखा है। मालवीय रोड पर इनकी कंपनी का आलिशान ऑफिस है। कपूर साहब उम्रदराज़ होने के बावजूद आज भी कभी कभी शहर की मंडी में निकल जाते हैं अपने प्रोडक्ट का फीडबैक लेने के लिए।
आज उनका पोता अपनी पढाई पूरी कर के लंदन से रायपुर आ रहा था। कपूर साहब चाहते थे की उनका पोता उनकी बिज़नेस की पूरी जिम्मेदारी अब अपने सर पर ले ले। उनके बेटे का तो हाथ है ही बिज़नेस पर फिर भी चाहते थे की जैसे व्यापर करने का तरीका बदल रहा है, जरुरी है की नई पीढ़ी अब नए ग्राहक के लिए नए तरीके से व्यापार करे। पोता भी तैयार हो गया था अपने पारिवारिक व्यापार को सँभालने के लिए।
कपूर साहब का बंगला रायपुर का सबसे आलिशान बंगला था। राज्यपाल का बंगला भी इतना आलीशान नहीं था। एक सुबह वो अपने बंगले के गार्डन में बैठे चाय पी रहे थे अकेले। उनके सामने मेज पर दो कप चाय रखी थी। एक कप से भाप उठ रही थी जिससे कपूर साहब चाय पी रहे थे, और दूसरा कप धीरे-धीरे ठंडा हो रहा था।
पास ही खड़ा उनका पोता बड़े गौर से यह सब देख रहा था। मेज पर रखे दो कप को देख कर उसे लगा कि शायद दादाजी आज भी दादी को नहीं भूल पाए हैं और दूसरा कप उनके लिए ही मंगवाते हैं। पोता पास गया और सहानुभूति से बोला, "दादाजी, दादी को गुजरे अब दस साल हो गए। आप रोज़ उनके हिस्से की चाय मंगाकर खुद को दुखी क्यों करते हैं? वह तो अब इसे पीने नहीं आएंगी।"
कपूर साहब ने अपनी चाय का एक घूँट भरा और शांति से मुस्कुराए। उन्होंने कहा, "बेटा, मैं यह चाय तुम्हारी दादी के लिए नहीं मंगाता।"
पोता हैरान रह गया, "फिर किसके लिए? यहाँ तो आपके अलावा कोई और नहीं है। मैंने कल भी देखा था की एक कप चाय रखे रखे ही ठंडी हो गयी और हाउस हेल्प उसे ऐसे ही उठा कर ले गया था आपके खाली कप के साथ।"
कपूर साहब ने ठंडी हो चुकी दूसरी प्याली की ओर इशारा किया और बोले, "यह चाय मेरे अहंकार के लिए है। जब मैं अकेला बैठकर अपनी चाय पीता हूँ, तो यह दूसरा खाली कप मुझे याद दिलाता है कि इंसान चाहे कितना भी बड़ा बंगला बना ले, अपने व्यापार को कितना भी बड़ा कर ले, या कितना भी पैसा कमा ले, अगर उसके पास साथ बैठकर चाय पीने वाला कोई नहीं है, तो वह दुनिया का सबसे गरीब इंसान है, सबसे अकेला इंसान है।"
उन्होंने आगे कहा, "यह ठंडा कप मुझे हर दिन यह सिखाता है कि रिश्तों को वक्त रहते गरम रखना कितना ज़रूरी है, वरना एक दिन सिर्फ खाली कुर्सियाँ और ठंडी चाय और अपना अकेलापन ही बाकी रह जाती हैं।"
पोता खामोश हो गया। उसने तुरंत अपना फोन जेब में रखा, पास पड़ी खाली कुर्सी खींची और बोला, "दादाजी, कल से चाय के तीन कप आएंगे। तीसरा मेरे लिए... और मैं वादा करता हूँ, मेरी वाली प्याली कभी ठंडी नहीं होगी।"
कपूर साहब पोते की इस बात से अपनी खुशियों को समेट ही रहे थे की पोते ने कहा, "और हाँ दादा जी, ये एक एक्स्ट्रा कप मेरे लिए भी रहेगा कि मुझे हमेशा याद दिलाता रहे की आगे बढ़ने की होड़ में मैं कुछ रिश्ते पीछे ना छोड़ता चला जाऊँ।"
कपूर साहब को आज पोते के साथ चाय पीते हुए एक साझा सुकून का अनुभव हो रहा था, जो वो कई वर्षों पहले तक़रीबन भूल से गए थे।
शायद पैसे और सफलता आपको एक मानसिक संतुष्टि भले ही कुछ समय के लिए दे दे। आत्मिक संतुष्टि साथ में चाय पर बिताये हुए कुछ साझा पल ही दे सकते हैं जो किसी अपने के साथ बिताये गए हों।
- अमितेश