मंगलवार, 31 मार्च 2026

एक कप हौसला

जयंतो दा पिछले 50 वर्षों से इस छोटे से चाय की दूकान से चाय और बातें बांट रहा था। उसकी ये दूकान एक पुरानी, जर्जर ईमारत के एक छोटे से खांचे में था। दुकान के नाम पर एक सायोनारा कंपनी की लकड़ी की रेडिओ, एक केरोसिन का स्टोव और 2 लकड़ी के बेंच लगे थे। दूकान की ये पूरी जायदाद जयंतो दा जितना ही पुराना था। 

यह दूकान जिस ईमारत में थी, कहते हैं वह कभी डॉ कादम्बनी गांगुली की थी। डॉ गांगुली हिंदुस्तान की पहली महिला डॉक्टर थी। जयंतो दा अक्सर कहा करता था की डाक्टर दीदी को उसकी चाय बहुत पसंद थी। वो जब भी घर पे आती, एक चुक्का चाय उससे जरूर पीती थी। 

यह दूकान शहर की भाग दौड़ से थोड़ा परे ही था। शोर के नाम पर इस दूकान की स्टोव का आवाज़ और रेडिओ से आती हुई गाने की आवाज़ के अलावा और कुछ नहीं था। रेडिओ भी गाने ऐसे बजता जैसे ये आखरी गाना बजा रहा हो बंद होने से पहले। 

जयंतो दा हालाँकि अब 70 का हो गया था, पर अभी भी कलकत्ता के लोगों के लिए दादा ही था। अक्सर उसकी दूकान पर थोड़े पुराने लोग ही आते थे। गाहे बगाहे कोई जवान आ जाता तो चाय से ज्यादा जयंतो दा की बातों से प्रभावित हो जाता। 

वो एक उमस भरी दोपहर थी। जयंतो दा की दूकान पे उस वक़्त कोई नहीं था। वो अकेला अपनी लुंगी ऊँची किये बेंच पर बैठा था। अलसायी रेडिओ किशोर दा का गाना पूरी ताकत लगा कर बजा रहा था। तभी एक बड़ी गाड़ी उसकी दूकान पे आ कर खड़ी हो गयी। सूट पहने एक चालीसेक साल का आदमी गाड़ी से उतरा और दूकान पे रखी दूसरी बेंच पर बैठ गया। वो परेशान सा लग रहा था और एकटक आकाश की ओर देख रहा था। ऐसा लग रहा था की ऊपर देख कर अपने आंसुओं को संभालने की कोशिश कर रहा हो। 

जयंतो दा थोड़ी देर उससे देखता रहा। फिर उसके करीब आ कर बोला, "दादा चाय खाबे।"

उसने आसमान से नज़र फेर कर एक बार जयंतो दा की ओर देखा और फिर वापस आसमान पे केंद्रित हो गया। कोई जवाब नहीं दिया। 

जयंतो दा ने थोड़ी और आत्मीयता से बोला, "दादा चाय भले थोड़ी कड़वी लगे लेकिन अभी थोड़ा सुकून देगी।"

वो थोड़ा खीज कर बोला, "मुझे चाय नहीं, पैसे की ज़रूरत है। मेरा पूरा बिज़नेस डूब गया है। मैं सड़क पे आ गया हूँ। शायद ये मेरे जीवन के कुछ आखरी पल हैं जो आपकी दूकान पर बिता रहा हूँ।" बोलते बोलते आंसुओं की एक झड़ी जो अब तक दबी थी अपना दायरा छोड़ बह गयी। 

जयंतो दा ने उससे चाय का गिलास पकड़ाया और बोला, "दादा वो छोटा पौधा देख रहे हो जो मेरी दूकान की दरार में उग आया है।"

उसने इशारे से एक छोटे से पौधे को देखने को बोला जो उस जर्जर मकान के एक दिवार से अपना वजूद दर्ज कर रहा था। 

"इस पौधे की ना तो अपनी जमीन है, ना मिट्टी, ना खाद। फिर भी वो उग गया है। उससे पता है की चाहे कुछ भी उसके पास ना हो, सूरज तो उसका है ना। वो उसे देख कर बढ़ रहा है। उसे यह भी नहीं पता कब तक बड़ा होगा, लेकिन उसने बढ़ना नहीं छोड़ा है। क्या तुम्हारे पास इतना हौसला भी नहीं की अपना सूरज तलाश कर बढ़ पाओ?"


जयंतो दा की इस बात ने उसपे गहरा असर किए। एक घूँट में पूरी चाय ख़तम की, और उठ खड़ा हुआ। अपनी जेब से 50 का नोट निकाला और जयंतो दा को देने लगा। 

जयंतो दा ने वो नोट लिया, उसे तह किया और वापस उसकी जेब में रख दिया और बोलै, "अगली बार लूंगा, जब तुम मुस्कराते हुए मेरी दूकान पे आओगे।" और एक पहचानी सी मुस्कान बिखेर दी। 


वो आदमी वापस अपनी कार की तरफ जाने लगा, लेकिन इस 10 मिनट ने उसमे एक गजब का आत्मविश्वास भर दिया था। 


आज दो बरस बाद फिर वो आदमी जयंतो दा की दूकान पे अपनी पहले से भी बड़ी गाड़ी में आया। गाड़ी खड़ी की और एक भरी मुस्कान में जयंतो दा से बोला, "दादा एक कड़वी चाय पिलाना।"

जयंतो दा ने अपना चश्मा ठीक करते हुए उसे देखा पहचान गया। वो आदमी जयंतो दा के करीब जा कर उसके पैर को छुआ और एक लिफाफा निकाल कर जयंतो दा को देते हुए बोलै, "दादा ये आपके उस चाय का पैसा जिसने मुझे हारने नहीं दिया। आज मेरे पास पहले से ज्यादा पैसे हैं और उससे भी कीमती, आपका दिया हुआ हौसला है। बहुत धन्यवाद दादा। आपने मुझे एक नया जीवन दिया है।"

जयंतो दा ने लिफाफे से एक सिक्का निकाला और लिफाफा वापस उसे दे दिया। "मेरे चाय की कीमत तो तुम्हारे चेहरे पर फैली है, ये एक रुपया मेरा ईनाम है। जीते रहो बेटा।"

सायनोरा रेडिओ पर गाना बज रहा था, वो आदमी जयंतो दा के साथ बेंच पर बैठा चाय पी रहा था और रेडिओ के गाने से तेज उनके खिलखिलाने की आवाज़ उस शांत सी सड़क पर गूंज रही थी।  

 

-अमितेश 

शनिवार, 28 मार्च 2026

गुमान

उतर के आ भी जा 

अब चांदनी की सीढ़ी से,

बहुत हुई ये दूरियां, 

कई सदी, कई पीढ़ी से। 


ये दाग़ - वाग छोड़ दे 

तू आसमां के सीने पे,

आ, एक शाम तो बिता, 

मेरे आँगन के दरीचे पे। 


मेरे सिरहाने बैठ, 

ज़रा अपनी भी तू सुना,

कि कैसा लगता है 

तन्हा रात भर जगने में। 


तुमने तो देखे होंगे 

ऊपर से हसीं मंज़र हज़ारों,

पर क्या सुनी भी है 

कभी धड़कन हमारे?


तू कहता है कि तुझे देख 

दुनिया सुकून पाती है,

पर तेरी शीतलता तो बस 

आंखों तक ही आती है। 


ठहर... तुझे आज एक 

राज़ की बात बताता हूँ,

चल तुझे आज मैं 

अपने चाँद से मिलवाता हूँ। 


वो देख, जो कोने में 

हया का आँचल ओढ़े बैठी है, 

जिसकी एक झलक को, 

ये रात सदियों से प्यासी है। 


तू तो पत्थर है, बेजान है, 

बस धूप का मारा है,

वो तो मेरे जीने का ज़रिया, 

मेरा अप्रतिम सहारा है। 


तेरी चांदनी में ठंडक की 

एक मर्यादा, एक सीमा है,

उसकी नज़रों का सुकून, 

रूह तक धीमा - धीमा है। 

 

वो जो ज़ुल्फ़ें संवारती है, 

तो घटायें शरमाती हैं,

तेरी अद्भुत चमक भी 

उसकी एक मुस्कान से मात खाती हैं। 


मेरा चाँद, जो बादलों के पीछे 

कभी नहीं छुपता,

जिसका नूर ढलती अमावस में

भी नहीं रुकता। 


उसमें कोई दाग नहीं, 

एक सादगी का घेरा है,

उसकी एक झलक से 

मेरी दुनिया में सवेरा है। 


ओ  फ़लक के चाँद! 

देख और ख़ुद फैसला कर,

किसे मुकम्मल कहूं, 

तू ही ज़रा गौर कर। 


तू चमकता है की 

दुनिया तुझे देख सके,

वो चमकती है की 

रोशन मेरी दुनिया हो सके।


तू है फ़लक का सुल्तान, 

पर मेरा दावा सच्चा है,

मेरा ये अपना चाँद, 

तुझसे लाख गुना अच्छा है।


अब  जा, वापस लौट जा 

अपने सूने वीरान गगन में,

कि तेरा गुमान टूट गया है 

आज मेरे आँगन में। 


- अमितेश 


शुक्रवार, 27 मार्च 2026

अच्छा है ना!

भीड़ भरी इस दुनिया में 

कोई अपना सा मिल जाये,

अच्छा है ना!


खामोशी की बातों में भी 

चुपके से जवाब कोई दे जाये,

अच्छा है ना!


कल की उलझने बिसार कर हम 

आंगन की धूप में बैठें 

मिट्टी की सौंधी खुशबू में 

बीते दिन की यादें समेटें। 


बिना किसी मतलब के भी,

एक मुस्कान बिखर जाये,

अच्छा है ना!


आँखों में जो सपने पलते हैं 

हकीकत की उसे रंग दे जायें 

जो बस खयाल थे कल तक 

उन्हें संग अपना दे जायें।  


हार - जीत की इस दौड़ में,

हम खुद ही खुद से जीतें,

अच्छा है ना!


बिना बताये दिल का हाल 

यार कोई समझ जाये,

अच्छा है ना!


जिंदगी की हर उलझन में,

कोई साथ मुस्कुराये 

अच्छा है ना!


 ना कोई औपचारिकता 

ना शब्दों का तोल मोल 

बैठे साथ घंटों तक 

हो हँसी - मज़ाक बेलौस। 


पुरानी यादों के पिटारे से 

वही बचपन निकल जाये 

अच्छा है ना !


दुनिया भले ही रूठे 

पर कंधे पर एक तेरा हाथ हो,

सफ़र चाहे लंबा हो कितना 

एक तू मेरे साथ हो। 


बिन मतलब की इस यारी में 

पूरा जहाँ मिल जाये,

अच्छा है ना!


- अमितेश 


  

गुरुवार, 19 मार्च 2026

हर

हर कण में वह बसता है 
हर मुश्किल को हर लेता है 

बातों में जो हर जाए 
वो जीत की राह वर लेता है 

हर दिशा में नाम है उसका 
जो हर दिल में घर करता है। 


- अमितेश 

पर

उस चिड़िया के पर कटे थे,

पर फिर भी उड़ान ना छोड़ा था। 

जमीन पर गिरा ज़रूर,

पर हौसला उसका ना मुड़ा था। 


 - अमितेश 

हमशक्ल हज़ारों

तर्क - ए - ताल्लुक कर लिया, तेरे शहर को भी छोड़ दिया,

अब बे-सबब चश्म - ए - तर, आख़िर क्यों रोता है?


दावा था तेरा कि मयस्सर होंगे हम-शक्ल मेरे हज़ारों,

गर मिल भी गए वो सब, तो फिर मुझे ही क्यों सोचता है?


गया है जो शख्स मुड़कर न देखने की कसम खाकर,

उसी की याद में तू ये शब् - ए - हिज्र क्यों संजोता है?


गुरुर - ए - हुस्न में कहा था, तुम जैसे बहुत हैं यहाँ,

अब उसी भीड़ में तू अपनी तन्हाई क्यों ढोता है?


- अमितेश 



➡ तर्क - ए - ताल्लुक - रिश्ता तोड़ लेना 

➡ बे-सबब - बिना किसी वजह के 

➡ चश्म - ए - तर - नम आँखें 

➡ शब् - ए - हिज्र - जुदाई की रात 

➡ गुरुर - ए - हुस्न - अपनी खूबसूरती का घमंड 

मेरे जैसे हज़ारो

छोड़ तो दिया तेरे शहर को, अब मेरे लिए क्यों रोते हो,

कहा था ना तेरे जैसे हज़ार मिलेंगे, फिर भी मुझे ही क्यों सोचते हो। 


ज़ब्त की हद से गुज़रे तो फिर मुड़कर नहीं देखा मैंने,

तू जो कहता था बहुत हैं, अब अकेला क्यों सोता है। 


मिसालें मेरी वफ़ा की तू दुनिया को देता फिरता है,

जो क़द्र न थी मेरी, अब ज़ार - ओ - क़तार क्यों रोता है?


खिड़कियाँ भी अब तेरे घर की उदास रहती हैं शायद,

वो जो गुरुर था हज़ारों की, अब वो कहाँ खोता है। 


- अमितेश  

बुधवार, 18 मार्च 2026

Reservation : Food for Thought

 I was in Patna in the last week for one of the family functions. Lots of people were around. Lots of topics were discussed. Starting from family, to kids to profession to politics.

And if few Bihari discuss politics, it is not possible to discuss caste without politics. And when it comes to caste, one discussion that outshine is “Reservation”. This topic is discussed more in the family who are not belonging to the privilege class and have never tasted the magic of reservation.

One of the family members said that if Reservation is that important for the specific group of people (irony is around 65% population of India falls under this so-called specific group) and every government is promoting it, irrespective of their party, why can’t this be seen differently.

Now, this was opening a whole lot of imagination among all around. He continued, “I think, we should make it mandatory for people to use “reservation beneficiary” as suffix after their name to promote why reservation is important and how it is bringing changes in the lives of people getting benefitted with this. Be it a Doctor, an Engineer, an IAS officer or any profession, where people used reservation for their upliftment. It should be made mandatory for them to mention “Reservation Beneficiary” over their name plate board. This is going to encourage more people to study and could lead to an organic upliftment of the people who are suppressed since ages.”

While we all knew what he was saying wasn’t what he meant. It was a sarcasm par excellence. This could require some skill to understand the intensity of sarcasm he meant out of this monologue.

But this has given a food for thought to many who were part of that discussion. Almost everyone was having either a thought or smile over their face hearing this.

Can this be tried? People who are progressing using the reservation, should not feel offended mentioning that over their board. If they can enjoy the success, there is no harm in mentioning the reasons of success and sharing it with people.

What’s your thought on this? Comment to understand and open a debate over this important topic.

शनिवार, 7 मार्च 2026

खामोश बस्तियों के नाम

ये शहर नहीं, पत्थर का एक समंदर है,

जहाँ बाहर सन्नाटा और शोर दिल के अंदर है।

दीवारें बहरी हैं, लोग अंधे हैं यहाँ, 

यहाँ हर शख्स अपनी ही तन्हाई का पैगंबर है।


दिखाई जो न दे, उस दर्द का मंजर हैं हम,

अपनों के बीच भी खुद से बेखबर हैं हम।

पुकारते रहे जिसे, वो मुड़कर भी न देख सका,

शायद इस अंधी बस्ती के सबसे पुराने खंडहर हैं हम।


आईने बेचकर अब हम क्या पाएंगे भला,

जब आंखों से ही रोशनी का नूर चला गया।

वो चीखते रहे मदद को, और लोग गुजरते रहे,

शायद दीवारों के साथ अब खुदा भी बहरा हो गया। 


- अमितेश 

सन्नाटे का शोर

दीवारें बहरी हैं, लोग अंधे हैं यहाँ, 

पत्थरों के शहर में, पिघलता दिल कहाँ?

चीखती हैं हसरतें, पर कोई सुनता नहीं,

मलबों के ढेर में, अब ख़्वाब कोई बुनता नहीं।


खिड़कियाँ तो बहुत हैं, पर झांकता कोई नहीं,

भीड़ बहुत है सड़कों पर, पर साथ चलता कोई नहीं।

दिखता है सबको तमाशा, पर दर्द दिखता नहीं,

अंधों के इस बाजार में, आईना बिकता नहीं।


गूँगी है जुबां सबकी, और बहरे कान हैं,

ऊँची इमारतों में कैद, छोटे-से इंसान हैं।

अपनी ही प्रतिध्वनि से, डरने लगा है आदमी,

दूसरों की आग में, हाथ सेंकने लगा है आदमी।


वक़्त की धूल ने, सब चेहरों को ढँक दिया,

इंसानियत को हमने, तिजोरी में पटक दिया।

पर याद रखना ऐ मुसाफ़िर, ये सन्नाटा बोलेगा,

जब वक्त अपनी आँखें, और ये दीवारें कान खोलेगा। 


-अमितेश