आज फिर पापा ऑफिस से आते ही सोफे पर बैठ गए थे। आँखें बंद किये निढ़ाल हो कर बैठे थे और अपने हाथों से अपना सर दबा रहे थे।
रोहन ने पापा को देखा और माँ के पास जा कर लगभग फुसफुसा कर पूछा, "माँ, पापा रोज ऑफिस से लौट कर आँखें बंद कर सोफे पर क्यों बैठ जाते हैं। हमेशा अपने हाथों से अपना सिर दबाते हैं। पापा ऐसा क्यों करते हैं माँ?"
माँ ने प्यार से रोहन के सिर पर हाथ फेरा और बोला, "बेटा पापा को ऑफिस में बहुत काम रहता है। दिन भर काम कर के थक जाते हैं इसलिए सोफे पर थोड़ी देर बैठ कर अपनी थकान मिटाते हैं। उन्हें अभी मैं एक कप कड़क चाय बना कर देती हूँ। उनकी थकान अभी छूमंतर हो जाएगी।" कह कर माँ रोहन को वहीं छोड़ कर किचन में चली गयी।
7 साल के रोहन को यही समझ में आया की चाय एक जादुई दवा है और इसे पीते ही पापा की सारी थकान दूर हो जाती है।
बात आई गयी हो गयी। रोहन चुपके से रोज माँ को चाय बनाते देखता। कभी कभी पापा के पास सोफे पर बैठ कर उनके बालों पर हाथ फेरता और पापा को मुस्कुराते देखता। उसे लगता की कड़क चाय तो पापा की थकान मिटाने की एक जादुई दवा है लेकिन वो तब ज्यादा असर करती जब रोहन पापा के सिर पर हाथ फेर कर उन सिर को दबाता।
उस दिन शनिवार था। पापा का हाफ डे था और पापा दोपहर में ही ऑफिस से आ गए थे। माँ पास के ही आंटी के घर पर गयी हुई थी। पापा घर में घुसते ही अपना बैग टेबल पर रखा और रोज की तरह सोफे पर पसर गए। आँखें बंद कर के अपने हाथ से अपना सिर दबाने लगे।
रोहन को लगा की उन्हें अभी उस जादुई दवा की जरुरत है। माँ घर पर नहीं है। क्यों ना मैं ही एक अच्छी कड़क चाय बना दूँ। यही सोचते सोचते वो किचन में गया। उनसे एक सस्पेन निकला और उसे गैस स्टोव पर चढ़ा दिया। पापा के लिए चाय की कप निकली और एक कप भर कर पानी सस्पेन में डाल दिया और स्टोव जला दिया। पानी उबलने लगी थी। उसने ऊँचे टेबल पर चढ़ कर ऊपर के अलमारी से चाय पत्ती का डब्बा उठाया और चाय में 2 चम्मच चाय पत्ती डाल दी। माँ इतना ही डालती थी। फिर लगा की थोड़ी और चाय पत्ती डाली तो चाय और भी कड़क हो जाएगी और पापा की थकान पर ज्यादा असर करेगी। उसने 2 और चम्मच चाय पत्ती उबलते पानी में डाल दिया। इतनी पत्ती की वजह से उबलता पानी बिलकुल काला हो गया था। उसने काला रंग देखा और मन ही मन सोंचा कि इसे कहते हैं कड़क चाय। माँ से भी बेहतर नुस्खे उसके पास हैं। अपने ख्याल पर वो मन ही मन मुस्काया और चीनी का डब्बा ढूंढने लगा। वहीं पास में वो भी मिल गया। उसने 4 - 5 चम्मच चीनी के भी दाल दिए थे उबलते पानी में। रोहन की जादुई चाय अब तैयार थी। उसे कप में छाना और पापा के पास जाने लगा। तभी उसे याद आया की माँ जब भी चाय बनती है तो कुछ तो कूट कर उसमे डालती है। शायद अदरक डालती है। बहुत ढूंढने पर भी उसे किचन में अदरक नहीं मिला। उसकी नजर इलिचाई पर पड़ी। उसने 2 इलिचाई निकाली और जैसे तैसे कूट कर चाय के कप में डाल दिया।
वो मंद मंद मुस्कुराते हुए पूरी एहतियात के साथ सधे क़दमों से धीरे धीरे ड्राइंग रूम की तरफ जाने लगा। पापा अभी भी आँखें बंद किये सोफे पर बैठे थे। शायद अभी किचन में जादुई चाय के नुस्खे के ढूंढ़े जाने की पूरी प्रक्रिया से पूरी तरह अनजान थे। पापा के नजदीक जा कर रोहन ने आवाज लगाई, "पापा चाय पी लीजिये। आपकी थकान की दवा।"
पापा ने चौंक कर आँखें खोली। "मम्मी तो घर पर नहीं है, फिर ये चाय किसने बनाई?" पापा की आवाज में आश्चर्य था।
रोहन ने एक बड़ी सी मुस्कान बिखेरी और बोला, "ये मैंने बनाई है। ये मम्मी की चाय से भी बेहतर है।"
पारदर्शी कप में काले रंग की चाय देख कर पापा थोड़ा मुस्कुराये, और जल्दी से चाय रोहन के हाथों से ले लिया की उसका हाथ ना जले। चाय में कूट कर ऊपर से डाली हुई इलिचाई के छिलके तैर रहे थे। पापा ने बोला,"बेटा मेरी थकान तो बस तुम्हे देखते ही ख़तम हो जाती है।"
रोहन को उन्होंने खींच कर अपने पास बिठाया और चाय की पहली चुस्की ली। चाय इतनी पत्ती डालने की वजह से करवाहट से भर गयी थी। ऊपर से जरुरत से ज्यादा चीनी ने उसमे एक अलग ही मिठास भर दी थी। रोहन गौर से पापा को देख रहा था की अब पापा कुछ कहेंगे। ये क्या, पापा की आँखों में आंसू छलक आये थे। उन्होंने रोहन को कास कर जकड़ लिया और बोला, "ये दुनिया की बेस्ट चाय है। तुम तो Master Chef हो गए हो। देखो मेरी थकान एक चुस्की में ही उतर गयी।" और धीरे धीरे चाय पीने लगे। शायद कोई और दिन होता और किसी और ने ये चाय बनायी होती तो वो चाय की एक घूँट भी नहीं पीते। लेकिन ये चाय तो उनके छोटे जादूगर ने बनाया था। इसे कैसे छोड़ सकते थे।
रोहन खुशी से उछल पड़ा, "सच में पापा? अब से मैं रोज़ आपके लिए ये जादुई दवा बनाऊँगा!"
पापा ने हँसते हुए कहा, "रोज़ नहीं बेटा, सिर्फ छुट्टी वाले दिन। और अगली बार चीनी थोड़ी कम रखेंगे, नहीं तो पापा बहुत ज़्यादा मीठे हो जाएँगे।"
उस शाम, माँ जब घर लौटीं, तो उन्होंने देखा कि सोफे पर पापा और रोहन दोनों बैठे थे। पापा मुस्कुराते हुए वो कड़क-मीठी चाय पी रहे थे और रोहन उनके चश्मे को अपने कुर्ते से साफ कर रहा था। चाय के उस एक कप ने उस छोटे से घर को दुनिया की सबसे खुशनुमा जगह बना दिया था।
- अमितेश