गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

रेशमी साड़ी

जब तुम रेशमी साड़ी के पल्लू को 

अपने बाएं कंधे पर डाल देती हो,

लगता है जैसे किसी निर्मल धारा ने 

पहाड़ की ढलान से दोस्ती कर ली हो। 


सिले हुए कपड़ो के बंधन से परे,

ये छह गज का विस्तार तुम्हारे अंगों पर 

जब सरसराता हुआ लिपटता है,

तो समय की गति थोड़ी धीमी हो जाती है 

और फ़िजा में एक अनकही सुगंध घुल जाती है। 


तुम्हारी कमर पर नज़ाकत से बंधी वो नाजुक सिलवटें,

मानो तीस्ता की बेपरवाह लहरें हों

जो बलखाती है तुम्हारे हर कदम के साथ

बड़े ही अदब से, छोड़ अपनी रौबदार रवानी

और मुझे बहा ले जाती है एक अपार मंजिल तक। 


वो रेशम की चमक तुम्हारी त्वचा से 

एक गहरा संवाद करती है।

मेरी आंखों की चुगली कर जाती है,

जब चमकती सी वो रेशम 

मेरे चेहरे पर अपना प्रभाव फैलाती है। 

 

जब तुम अपनी बिखरी हुई जुल्फों को 

एक झटके से पीछे कर लेती हो,

और साड़ी का वो चमकता हुआ किनारा 

तुम्हारे मुखड़े को घेर लेता है, 

तो पूनम का चाँद भी पिघल कर बरस जाता है बेनूरी में। 


आंखों में काजल, माथे पर बिंदी 

और वो धानी रंगों वाली साड़ी,

बहार में भी फुहार ला देती हैं इस प्रकृति में। 

ये लिबास नहीं, एक पूरी सृष्टि है 

जो खुद को तुम्हारे व्यक्तित्व में समाहित कर जाती है।  


वो तेरी पाज़ेब की रुनझुन - रुनझुन 

और साड़ी के रेशमी घेरे का जमीन को चूमना 

मेरे मन के कवि को और आशिक बना जाता है 

जब तुम्हारी लचक से बलखाती वो साड़ी 

वातावरण में एक संगीत बिखेर जाती हैं। 


तुम्हारी उँगलियाँ जब साड़ी की चुन्नटों को 

सवांरती है बड़े इत्मिनान से,

कोई कलाकार अपनी अनुपम कृति को 

आखरी रूप दे रहा हो मानो 

और खुद को आत्मसात कर रहा हो उन चुन्नटों में। 


श्रृंगार रस के सारे रंग फीके हैं 

जब तुम उस सादगी में सामने आती हो। 

तुम एक साड़ी नहीं पहनती 

बल्कि साड़ी तुम्हे धार कर 

धन्य हो जाती है। 


- अमितेश 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

कृष्ण द्वन्द

मौन खड़ा है स्वर्ण द्वारका, रत्नों का अम्बार यहाँ 

शीतलता ढूँढ रहा है मन की, शीतल यमुना - धार कहाँ?

नीलम - सा यह वक्ष आज क्यों, विरह - ताप में जलता है?

मृदु स्मृतियों के झोंको से, उर का धीरज ढलता है। 


वो माखन की मटकी टूटी, वो गोधूलि की बेला,

सहस्त्र भीड़ में भी, मन आज खड़ा है अकेला। 

अधरों पर वह वेणु सोई, जिसमें गूंजती थी राधा,

राजमुकुट की भारी गरिमा, बनी ह्रदय की अथक बाधा। 


झिलमिल करते नयन - नक्षत्रों में, गोकुल का आभास बसा 

उमड़ रहा है अब रह - रह कर, अंतर्मन में उच्चवास बड़ा। 

क्या वे कुंज अभी भी वैसे, विहंगो से भर भर जाते होंगे?

क्या बाल - सखा अब भी मुझको, वन - पथ पर बुलाते होंगे?


मैं जग का स्वामी, पर स्वयं से आज पराया हूँ 

कंचन कानन में भी बैठ कर, बस अपनी ही छाया हूँ 

नीरव रजनी की ओट में, सिसक रही मेरी तरुणाई 

आज द्वारका के वैभव पर, ब्रज की धूलि ही है सुखदाई। 

***

अंशुमाली की स्वर्ण - रश्मियाँ, द्वारका के प्रासाद पर,

पर मन का पंछी अटका है, यमुना के उस पार पर। 

एक ओर है पट्टमहिषी, मर्यादा का स्वर्ण - पाश 

एक ओर वह मयूर - पंख, विरह - भरा विस्तृत आकाश। 


एक जो सत्य है, अधिकारी मेरी अर्द्धांगिनी 

एक जो स्वप्न है, सिहरन है मेरी अनुरंजिनि 

एक मांगती वर्त्तमान है, सेवा और समर्पण का दान 

एक ले गयी छीन ह्रदय से, वामषि की मीठी तान। 


जब रुक्मिणी के कर - कमल, चरणों को सहलाते हैं 

तब ब्रज के काँटों के छाले, रह - रह टीस जगाते हैं 

राजमहिषी के स्वर्ण - कंगन की, जब झंकार गूंजती है 

कानों में राधा की पायल, मौन खड़ी कुछ पूछती। 


"हे नाथ! पुकारती रुक्मिणी, जब आदर के घेरे में, 

मैं खो जाता हूँ, "कान्हा" पुकार में, उस ऊषा के अँधेरे में 

एक ओर विधि का विधान है, महल और सिंहासन है,

एक ओर वह निश्छल प्रेम, वह अकुलाता यौवन है। 


कैसी विवशता है मेरी, कैसा यह विस्तार है?

एक को दे दी देह अपनी, एक में संसार है 

रुक्मिणी की आँखों में दिखता, मुझमे मेरी आत्मा 

राधे के आँसू कहते हैं, तुम ही मेरी अखंड आत्मा। 


दो पाटों के बीच पीस रही, मेरी मोहन - मुरली आज,

एक ओर है प्रेम की पीड़ा, एक ओर है कुल का लाज। 

मैं द्वारकाधीश होकर भी, सबसे बड़ा दरिद्र हूँ,

स्वयं के ही दो रूपों में, बँटा हुआ चरित्र हूँ। 

***

ना कोई राधा, ना रुक्मिणी, न मोहन का आधार 

मिट गया सब नाम - रूप, बस शेष रहा विस्तार 

एक बिंदु पर आकर थमी, तीनों दिशाओं की धार 

जहाँ ना विरह की वेदना, ना मिलन का उपहार। 


एक जो देह की छाया बनकर रक्षक खड़ी 

एक जो प्राणों की लय बन स्मृति तंतु में जड़ी 

दोनों के मध्य खड़ा वह, नीलम - सा अविनाशी,

एक का है वो द्वारकाधीश, एक का ब्रजवासी। 


जब राधा की सिसकी गूँजी, यमुना के सूखे तट 

रुक्मिणी के नयनों से छलका, पीड़ा का मधु - घट 

रुक्मिणी ने जब थामा हाथ, प्रभु का करुणा से भर,

राधा ने महसूस किया वहां, अपना ही सुखद अधर। 


"मैं कौन हूँ?" पूछता कान्हा, स्वयं के अंतर में,

एक अंश मेरा महल में, एक वन के निर्झर में। 

देखो जब ध्यान से, तो तीनों एक ही सार,

जैसे एक ही सिंधु की, हों लहरें अपरम्पार। 


रुक्मिणी का त्याग बना, राधा का अमिट सुहाग,

राधा का वैराग्य बना, रुक्मिणी का अनुराग। 

दो दीप जल रहे, एक ही ज्योति की लौ बनकर,

कृष्णा बिखर गए चराचर में, प्रेम की परिभाषा बनकर। 


- अमितेश  


मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

पंचकन्या

मंदोदरी की व्यथा


सोने की लंका जलती थी,

मैं भीतर ही भीतर घुटती थी 

पति का गर्व बड़ा था इतना 

मैं पल - पल हाथ मलती थी। 


मैंने रोका था, मैंने टोका था 

सीता को भेजो हर बार कहा था 

पर दशानन के अहंकार ने 

हर सीख को ठोकर मारा था। 


मैं मयासुर की बेटी थी 

विद्वान की भार्या, राज - रानी थी 

पर विधि का लिखा देखो जरा 

मेरी किस्मत में वीरानी थी। 


मेरा बेटा गया, मेरे भाई गए 

एक जिद ने सबको निगल लिया 

जिस महल में गूंजती खुशियां थी 

वहां मौत ने डेरा डाल लिया। 


मैं सती थी, मैं पावन थी,

फिर भी ये कैसा अन्याय हुआ?

रावण के पापों के प्रतिफल में 

मेरे सुहाग का ह्राष हुआ। 


लोग कहते थे वो असुर था 

पर मेरे लिए मेरा संसार था वो 

उसकी हर भूल के पीछे कहीं 

मेरा खामोश सा प्रतिकार था। 


हाय राम तुम क्यों आये हो 

मेरे सिंदूर को हरने को 

ले जाओ सिया को संग अपने 

मेरे सुहाग का प्रतिदान करो। 


जो रावण को सजा दी तुमने 

एक वाण मुझपे भी तज देना 

संग अपने मैं भी पिया के फिर 

मर के मुक्ति पाऊँगी।  


सीता संवाद 


अशोक वाटिक की उस छांव में 

मंदोदरी जब सिया से मिलने आयी थी  

एक तरफ था राज - वैभव 

एक तरफ व्यथा परायी थी। 


मंदोदरी बोली -

हे मैथिली! हे जनकनंदनी!

लंका पर क्यों ये कहर ढाया है?

लौटा दो मेरे पति का गर्व 

क्यों इस क्रोध को जगाया है। 


मैं जानती हूँ तुम सती हो 

तुम्हारे चरण में पावन धार है 

पर मेरे पति का मोह देखो 

उसे विनाश से ही प्यार है। 


एक बार कह दो तुम राम से 

की लौट जाएं वो वन की ओर 

मैं बाँध लुंगी रावण को 

मेरी ममता की कच्ची डोर। 


सीता ने तब आँखें खोली 

शांति की एक मूरत थी वो 

मंदोदरी के दुःख को देख 

करुणा की एक सूरत थी वो। 


हे देवी! तुमने सही कहा 

पर धर्म की मर्यादा न्यारी है 

रावण ने जो पाप किया है,

अब उसके अंत की बारी है। 


तुम्हारा सुहाग तुम्हे है प्यारा 

पर जगत का हित भी देखना है 

अहंकार की इस लंका को 

अब मिट्टी में ही मिलना है। 


तुम धान्या हो, तुम ज्ञानी हो 

पति - धर्म तुमने खूब निभाया है 

पर विधि का लिखा अटल है देवी,

जो आया है, उसे अब जाना है। 


तुम जीवन अपना सफल ही मानो 

रावण को मुक्ति पुरुषोत्तम देंगे 

अहंकार का अंत सुनिश्चित 

ज्ञान प्रभु यह जग को देंगे। 


तुम्हारी सतित्व अमर रहेगी 

कुल का नाम तुम्ही से रोशन  

तुम इस काल को अमिट ही मानो 

समय ने लिखा जिसे, अचल है।  


मंदोदरी का तांडव 

लंका की रानी गरजी तब 

हे जनक - सुता ये क्या कह डाला?

एक तपस्वी के कारण तूने,

सोने की पुरी को जला डाला। 


मेरे पति का बल पवन - वेग 

कैलाश उठाया जिसने भुज - बल से 

तुम राम - राम की रट लगाए 

जीतोगी कैसे इस छल से। 


युद्ध की भेरी बज चुकी है 

रक्त की नदियां बहेंगी अब 

यदि प्राण बचाना चाहती प्रभु की 

शरण में रावण के दोनों आओ अब। 


मंदोदरी मैं, दैत्य - राज की 

पति - धर्म में हूँ बन ढाल खड़ी 

सीता! लौटा दो मेरा सुहाग,

वर्ना तेरी मृत्यु मैं बनु अभी। 


सीता की आँखों में ज्वाला थी 

मर्यादा की वो हाला थी 

बोली वो - सुनो लंकेश्वरी 

ये पाप की काली माया थी। 


राम का धनुष जब खींचेगा 

ब्रह्माण्ड थर - थर कांपेगा 

रावण का दस शीश अब तो 

धरती की धूल ही चाटेगा। 


मैं अबला नहीं, मैं शक्ति हूँ 

मैं रघुवंशी की शान हूँ 

तुम्हारे पति के काल का, 

मैं ही तो प्रथम निशान हूँ। 


युद्ध नहीं ये न्याय है देवी 

अधर्म का सर कुचलना है 

अब रावण को मरना होगा 

लंका को अब जलना होगा। 


रण भेरी का उद्घोष    


मंदोदरी की आंख जली 

"सीते! तुमने काल बुलाया है 

लंका के इस वीर - भूमि पर 

क्यों मृत्यु का जाल बिछाया है। 


मेरे दशानन के आगे 

टिक पायेगा वो वनवासी?

जिसने इन्द्र को जीत लिया 

उसे डराती है ये अबला नारी। 


अभी समय है, मान लो मेरी 

शरणगति ही एक साधन है 

वर्ना ये लंका रक्तरंजित 

और विधवाओं का ये क्रंदन है। 


मेरा पुत्र मेघनाद खड़ा है 

इंद्रजीत वो वीर कहलाये 

राम के लक्ष्मण को पल भर में 

यमराज के द्वार वो पहुंचाए। 


सीता का स्वर तब गूँज उठा, 

जैसे कर्कश बिजली कड़की हो 

बोली - मंदोदरी! सुन लो ध्यान से 

अब न्याय की ज्वाला भड़कायी हो। 


जो इंद्र को जीता, वो अभिमान था 

पर नारायण से जो टकराएगा 

वो दशानन हो या त्रिलोक - विजयी 

मिटटी में ही मिल जायेगा। 


तुम्हे पुत्र का दम्भ बड़ा है 

पर मेरा लखन शेषनाग खड़ा 

लक्ष्मण के एक ही वाण से अब 

वो होगा धरती पर पड़ा। 


ये युद्ध नहीं, ये शुद्धिकरण है 

पाप का घड़ा अब भरना है 

मंदोदरी! अब देखो तुम 

कैसे अधर्म को मरना है। 


सत्य का बोध  


मंदोदरी ने जब देखा 

सीता का रुप विराट हुआ 

क्षण भर में उसके भय का 

सिद्ध - शुद्ध साक्षात हुआ। 


सीता बोली - सुनो रानी!

ये युद्ध नहीं, ये काल है 

जो रावण ने है बुना 

ये उसकी मौत का जाल है। 


तुम कहती हो वो विजयी है 

जिसने देवों को जीता है?

पर वो भूल गया की उसने 

स्वयं जगदम्बा को खिंचा है। 


वो दस - शीश का ज्ञान कहाँ 

जब बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है?

जब पाप का पर्वत बढ़ता है 

तब पृथ्वी स्वयं घबराती है। 


मंदोदरी का मस्तक झुका 

आंखों में नीर की धारा थी 

जो गर्व अभी तक बोल रहा था 

अब हार की उसमे प्रतिछाया थी। 


हे जानकी! मैं हार गयी अब 

मेरा पति मोह ही अंधा था 

मैं बचाने आयी थी जिसे 

उसने स्वयं बुना मौत का फंदा था। 


तुम राम की शक्ति, तुम ही धरा 

इस सृस्टि की आधार प्रभु 

मेरे सुहाग की रक्षा कर दो 

हे करुणामयी! कर दो विभु। 


सीता ने तब करुणा दिखाई 

मंदोदरी! तुम धन्या हो 

पति के पाप प्रचंड सही 

पर तुम अचल प्रेम का अन्या हो। 


विधि का विधान न टलता है 

पर तुम्हारा नाम अमर होगा 

जब - जब होगी सतियों की बात 

मंदोदरी का सम्मान प्रथम होगा। 


रावण वध 


रणभूमि में धुल उड़ी 

जब दशानन धरती पर गिरा 

धर्म की विजय हुई आज 

और अधर्म का ध्वज थमा 


मंदोदरी यह सुन दौड़ी आयी 

अश्रुपूरित हो देख पति की ये दशा 

हे नाथ! मैंने रोका था 

बोली वो करुणा में अपनी व्यथा। 


रावण ने तब आँखे खोली 

मुख पर अब वो गर्व न था 

एक महा - पंडित पड़ा था वहां 

जो अब तक केवल राक्षस था। 


मंदोदरी! तुम सत्या थी 

मैं मोह के अंधेरे में था 

जिस सीता को मैं लाया था 

वो मेरे काल का घेरा था।  


मेरा ज्ञान, मेरी शक्तियां 

सब मिटटी में मिल गयी आज 

मैंने अपने ही हाथों से 

उजाड़ दिया अपना घर, अपना राज। 


मुझे क्षमा करो हे देवी!

मैंने तुम्हारे दुःख को ना जाना 

एक जिद्द के पीछे मैंने 

तुम्हें विधवा होना माना। 


तुमने हर पल राह दिखायी 

मैंने अहंकार में ठुकराया 

आज जब मैं हूँ मृत्यु सय्या पर  

मैंने अपना दोष ही पाया। 


मंदोदरी की गोद में सर रख 

दशकंध ने ली अंतिम सांस 

एक युग का अंत हुआ तब 

टूट गया जो झूठा अहंकार। 


सीता संवाद  

दैत्येन्द्र के वध से लंका में 

घनघोर मेघ गर्जन हुआ 

लंका की उस स्वर्ण - पुरी में 

एक भयंकर क्रंदन हुआ। 


मंदोदरी आयी सीता के पास 

आंखों में अश्रु - धार थी 

जो कल तक लंकेश्वरी थी 

आज वो एक विधवा की पुकार थी। 


मंदोदरी तब बोली -

"हे मैथिलि! देखो जरा 

मेरे सुहाग का क्या अंजाम हुआ 

जिसके जिद्द ने तुम्हे यहाँ लाया 

उसके अंत से मेरा जीवन समसान हुआ। 


आज मैं सब कुछ हार गयी 

मेरा वंश, मेरा मान गया 

एक नारी के अपमान के बदले,

आज मेरा स्वाभिमान गया। 


सीता ने करुणा से देखा 

मंदोदरी का हाथ थामा 

बोली - हे देवी! इस विषाद में 

सृस्टि का ही नुकसान हुआ 


रावण ज्ञानी था, स्वाभिमानी था 

पर ज्ञान का उसने दुरुपयोग किया 

जन कल्याण के काम आना था  

उसने ज्ञान का स्वयं उपभोग किया। 


रावण ने जो किया अधर्म 

उसका दंड तो निश्चित था 

पर तुम्हारी भक्ति और मर्यादा 

लंका का असली अमृत था। 


 तुम शोकाकुल अब ना हो मंदोदरी 

तुम्हारा नाम अब अमर रहेगा 

सतियों की गाथा में 

तुम्हारा स्थान प्रथम होगा। 


मंदोदरी इस दुःख विषाद में 

सीता के चरणों में पसर गयी 

मिल जाये उसको अब तर्पण 

अभिलाषा में वो अशर गयी। 


उत्तरार्द्ध 

सोने की लंका राख हुई अब 

और राख हुआ वो अभिमान 

मंदोदरी खड़ी थी अकेली 

लेकर अपना बिखरा जहान। 


पति - वध का वो आक्रांत दृश्य 

आंखों में अब भी बाकी था 

किसने काल को कभी बांधा था 

आज वो मृत्यु का साथी था। 


वो रोती, वो चिल्लाती थी 

हे नाथ! ये क्या अनर्थ हुआ?

मेरी हर सीख, मेरी हर प्रार्थना 

सबका अर्थ ही व्यर्थ हुआ। 


पर नियति का खेल बड़ा निष्ठुर 

अब रोने से क्या होना था?

जिसने अधर्म का बीज बोया 

उसका यही फल तो होना था। 


राम ने तब संदेशा भेजा 

बिभीषन को बुलाया पास 

"मंदोदरी का मान ना टूटे 

वरना होगा धरम का नाश। 


मंदोदरी ने देखा नया सवेरा 

पर उसमे वो अब चमक न थी

लंका का राज - पाट तो मिला 

पर रावण की वो खनक न थी। 


नियति ने उसे बनाया 

विभीषण की परम - परामर्शदाता 

लंका को पुनःस्थापित करने में 

वही बनी अब भाग्य विधाता। 


सीता के आशीष के चलते 

पंचकन्या में उसका नाम हुआ 

अपने सतित्व से वापस उसने 

लंका में धर्म का काम किया। 

स्त्रित्व का हमेशा मोल बहुत है 

पुरुषत्व में है अहंकार बसा 

रावण जलता हर वर्ष अब भी 

मंदोदरी है पर्याय सतित्व का। 


आज वैभव और सुख की 

चारो और बौछार बहुत है 

मंदोदरी के हिय के अंदर 

एकांकी ही वो रावण बिन है। 


 - अमितेश 


  

 




कैकेयी का पश्चाताप

वरदान के उस भयंकर क्षण में,

मैं क्या थी और क्या हो गयी?

पुत्र - मोह की अंधी आंधी में 

मैं अपना सर्वश्व ही खो गयी। 


रघुवर को वन भेज मैंने 

कैसा ये कर्कश काम किया?

अयोध्या की खुशिओं का सूरज 

मैंने ढलने पर मजबूर किया। 


दुनिया मुझे मंथरा कहेगी 

मंथरा बन रहूंगी यादों में 

पर कौन देखेगा वो आंसू 

राम के मोह में जो बहती रातों में। 


भरत ने मुझको त्याग दिया 

मुझे माँ कहने से इंकार किया 

स्वर्ण महल अब समशान लगे 

मैंने कैसा ये संसार किया। 


मैं दोषी हूँ, मैं पापी हूँ 

सरयू की धारा से भी ना धूल पाऊँगी 

राम की ममता के छाँव बिन 

मैं चैन से कैसे सो पाऊँगी 


राम अगर तुम सुन पाते हो 

तुम ही मेरा उद्धार करो 

जैसे अहल्या को छु तुमने ताड़ा 

मुझे मुक्ति दे मेरा शापोद्धार करो। 


- अमितेश 




Deep Fake

ना राशन की चिंता, न भाषण का डर है 
अब तो बस Data ही असली ज़हर है 
पेट खाली है, पर Mobile में Reels का मेला है,
इंसान भीड़ में खड़ा हो कर भी, Internet पर अकेला है। 

Smart City तो बन गई, पर नाली अभी भी जाम है 
WhatsApp University में सुबह - शाम काम है 
सत्य वहां मिलता नहीं, बस Narrative बिकता है 
जो सच बोले दे ज़रा, वो Gen X सा दिखता है। 

नेताजी अब संसद में काम, Insta पे ज्यादा आते हैं 
मुद्दों को छोड़, अब वो नए नए Filter लगाते हैं 
गरीब का बच्चा अब school में कम जाता है 
समय बचा वो Influencer बन ठुमकना चाहता है। 

इंसान की अक्ल पर अब AI का पहरा है 
मशीन तो हंस रही है, पर दर्द हमारा गहरा है 
Deep Fake के दौर में, चेहरा भी उधार है, 
झूठ के बाज़ार में, सच का हो रहा बहिष्कार है। 

धर्म की बहस है, Degree का अकाल है 
बधाई हो दोस्तों, अब यही अमृत काल है 
Credit Card की किस्तों में ज़िंदगी कटी है,
भारत की आत्मा अब Like में बटी है। 


- अमितेश  

मेकओवर

एक बार एक नेता जी हमसे बोले -

कवि जी, अब हम भी Digital हो गए हैं 

पुराने वाले घोटाले अब पूरी तरह Virtual हो गए हैं 

अब जनता के बीच जाने का हमें कोई शौक नहीं, 

क्योंकि जनता Gen Z है, Reels पे हमारे जैसा कोई Rock नहीं 


कल तक जो विपक्षी दल को यमराज बताते थे,

आज वही उनके साथ बैठ कर तंदूरी चिकन खाते हैं 

मैंने पूछा - नेताजी ये पाला बदलना कैसा है?

हंसकर वो बोले - बीटा, ये Ideology नहीं, बस गाँधी छाप पैसा है 

इधर से डालो दागी विधायक, उधर से माननीय निकलता है 

आजकल राजनीति में गिरगिट भी, रंग देख कर जलता है। 


Manifesto ऐसा बनाया है कि स्वर्ग ज़मीन पर ला देंगे 

हर घर के नल में पानी नहीं, सीधे Cold Drink पहुंचा देंगे 

बेरोजगारी का हल हमने बड़ा सटीक बनाया है 

पकौड़े टालने वालों के लिए, Non Stick pan मंगवाया है 

गरीब की थाली में अब बस Data की भरमार है 

पेट भरे न भरे, पर फोन में Hi Speed Internet की बहार है। 


विपक्ष कहता है - महंगाई ने कमर तोड़ दी है 

हमने कह दिया - हमने विलासिता की आदत छोड़ दी है 

अगर सिलेंडर महंगा है, तो मिट्टी के चूल्हे पर आओ 

धुएँ से जो आंख लाल हो, तो इसे देशभक्ति बताओ 

सत्य को हमने इतना Edit किया कि पहचान में न आये,

वो झूठ ही क्या, जो दो - चार Million Views न दिलाये 


- अमितेश  

द ग्रेट इंडियन सर्कस

सिद्धांतों की चादर को अब खूंटी पे टांग दिया है 

कल जिसे कोसा था, आज उसी का हाथ मांग लिया है 

विचारधारा तो बस अब कपड़ों का एक ब्रांड है 

जिधर सत्ता की मलाई, उधर ही सारा स्टैंड है। 


सुबह जो क्रांतिकारी था, शाम को संस्कारी हो गया 

जादू ऐसा चला कि सारा पाप, गंगा - धारी हो गया 

अब Election नहीं, Selection का दौर है

मंच पर चेहरा कोई और, पर्दे के पीछे कोई और है। 


सड़क में गड्ढा है या गड्ढे में सड़क, ये पता नहीं 

पर होर्डिंग पर नेता जी की मुस्कान में कोई खता नहीं 

GDP गिरे या बढे, पर IT Cell का ग्राफ ऊंचा है 

सच्चाई पूछने वाले के पास, अब सिर्फ एक ही कूचा है। 


जाति का चश्मा पहन कर, वो वोट की फसल काटते हैं 

मुफ्त की रेवड़ियों में, वो जनता की अक्ल बांटते हैं 

मुद्दे गायब हैं - बेरोजगारी, शिक्षा और थाली से,

अब बहस शुरू होती है गाली से, और खत्म ताली से!


जनता बेचारी आज भी 'अच्छे दिनों की कतार में है 

और नेता जी अपनी अगली flight और सरकार में हैं 

लोकतंत्र का मंदिर अब एक भव्य शोरूम जैसा है,

यहाँ जीतता वही है, जिसकी पॉकेट में पैसा है। 


- अमितेश 

 

शनिवार, 6 दिसंबर 2025

शराबी

कहती है दुनियां शराबी मुझको 

पर जब तेरी याद सताती मैं बस तब पीता

जो वक़्त गुजारे साथ थे हम 

वो याद जो आती, मैं बस तब पीता 

जो गम के बादल छा जाते हैं 

उनसे भाग हो जाना, मैं बस तब पीता 

जब कुछ खुशियां झोली भर जाती हैं 

उनको मनाना हो, तो बस तब पीता 

जब यार जो मिल जाएं गुजरे दिन के 

उनका साथ निभाने को बस पीता 

जो बैठे बैठे अकेलापन सताए 

उनसे पार हो पाना तो बस तब पीता 

कहती है दुनियां शराबी मुझे 

बस कुछ खास हो मौके तभी पीता। 


- अमितेश  

मुझमें मैं कुछ बाकी है

कई सफर किये हैं अब तक मैंने 
कई राहें अब तक नापी है 
कुछ सफलताओं के किस्से लिखे 
कुछ असफलताएं मैंने पायी है
पर फिर भी मुझमें अब भी 
मेरा मैं कुछ बाकी है। 

कई ज़ख्म मेरे दिल पे लगे
कई सुन्दर यादें बनाई है 
कुछ बातों ने गहरे मारा 
कुछ मुस्कानों ने जीवन भरे 
पर इन बातों के दरमियां भी 
मेरा कुछ मैं अभी बाकी है। 

कुछ दिन बेहाली में गुजरे 
कुछ अच्छे पल मैंने भी बिताए हैं 
कुछ दिन जेबें थीं खाली सी 
कुछ दिन दिल भरे रहे मेरे 
पर इन खट्टे मीठे अनुभवों में भी 
मेरे मन का मैं अभी बाकी है। 

कई आलोचनाएं मुझको मिले 
कई बार मुझे समझा सा गया 
कई बार विभेद हुआ मेरा 
कई राय मेरे लिए अच्छे से बने 
पर इन दुविधाओं में भी 
मेरे अंदर का मैं अभी बाकी है। 

कुछ लोग मुझे अपने से मिले 
कुछ लोगों ने भितराघात किया 
कुछ पराए  भी अपने से लगे 
कुछ अपने पराए बन से गए 
इन रिश्तों के जंजालों में भी 
मुझमे मेरा मैं अभी बाकी है। 

कई बार समय ने ख़त्म किया 
कई बार वक़्त ने सम्हाला मुझको 
कई बार वीरानी दुनिया हुई 
कई बार जहां आबाद रही 
इन जीवन की आपाधापी में भी 
मैं ख़त्म अभी भी नहीं हुआ। 

मेरी सांसें अभी मुखर ही है 
मैं रहूंगा हमेशा अनंत तलक 
अपने आत्मविश्वास को समेटे हुए 
मैं प्रयास अनवरत करता रहूँगा 
जब भी सब कुछ खत्म सा होगा 
मेरा मैं फिर भी बाकी होगा 
मुझमे मेरा मैं बाकी होगा। 

- अमितेश 

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

साथ

तुम साथ जो मेरे आ जाते 
तो अच्छा होता 
तुम साथ मेरा निभा जाते 
तो अच्छा होता। 

तुमसे मिलना तेरा हो जाना 
मेरी नियति थी 
तुमने मुझे ना अपनाया 
तेरी नियति थी 
कुछ पल और साथ निभा जाते 
तो अच्छा होता।  

तुम साथ जो मेरे आ जाते 
तो अच्छा होता। 

तेरी मुस्कान में रूमानी सुबह मैंने देखी थी 
तेरी आँखों का काजल 
मेरी जीवन रेखा थी 
उन्हें मेरी लक्ष्मण रेखा बना जाते 
तो अच्छा होता। 

तुम साथ जो मेरे आ जाते 
तो अच्छा होता। 

तेरी आगोश में जीना मेरी चाहत थी 
हर जनम में तेरा होना मेरी हसरत थी 
तेरी सांसें मेरी सांसों में भर जाती 
तो अच्छा होता। 

तुम साथ जो मेरे आ जाते 
तो अच्छा होता। 

एक साथ ना जीवन जी पाए 
कोई रश्क़ नहीं 
जो मेरी मौत मुकम्मल दे जाते 
तो अच्छा होता। 

तुम साथ जो मेरे आ जाते 
तो अच्छा होता। 


- अमितेश