शुक्रवार, 12 जून 2026

रघुबर

चेतना के इस तिमिर झंझावात में,

बुद्धि की नौका डगमगाती जब,

संदेह के घने मेघ अंबर में,

आस्था के दीप को बुझाते तब।

 

शिथिल पड़ जाते विकल प्राण,

दिशाएं सब मौन हो डसती हैं,

नियति की निष्ठुर, कुटिल रेखाएं,

विवशता पर मेरी हंसती हैं।


तब अंतर के सूने नभ में,

एक नीरव राग झंकृत होता,

मर्यादा का वह महासिंधु,

मेरे अवसाद के आंसू धोता।


न कोई काया, न कोई वाणी,

बस एक दिव्य स्पंदन जगता है,

जो कल तक था उलझन का मरुथल,

वह कल्पवृक्ष की छांव सा लगता है।


समीर का धीमा सा वह झोंका,

कह जाता है - धीर हमेशा धरना तुम।

पल्लव से टपकी ओस की बूंद,

कहती - भीतर शांत ही रहना तुम।


किरण जो चीरती घने तम को,

वह रघुवर का ही तो सांत्वन है,

जो बिखरी राह को सुगम कर दे,

वह प्रभु का ही कर - लोचन है।


अब द्वंद्व नहीं, ना कोई व्याकुलता,

हर उलझन उनकी करुणा का उपक्रम है।

जहां खो जाती हैं जगत की राहें,

वहीं से अनंत 'राम' का उद्ग्म है।


- अमितेश 


विरक्ति

गंगा की लहरों पर बहती, एक ठंडी, निश्छल रात है,

सामने मणिकर्णिका पर सजती, इंसानी औकात है।

लपटें अंबर को छूती हैं, लाल-नारंगी साया है,

ये जलता हुआ शरीर नहीं, जलती हुई एक माया है।


एक चिता पर यौवन जलता, एक पे बूढ़ा बचपन है,

जिस तन पर कल तक नाज़ था, आज वो केवल ईंधन है।

धुएँ के हर एक कतरे में, कोई सपना रूठ रहा,

संसार का सबसे पक्का, हर एक धागा टूट रहा।


क्यों दौड़ रहा था जीवन भर? क्या खोया और क्या पाया है?

मुट्ठी खाली ही आई थी, मुट्ठी खाली ही जाना है।

ये नाम, ये रुतबा, ये कोठी, सब माटी का एक ढेरा है,

जिसे तू अपना कहता था, वो केवल रैन-बसेरा है।

 

देखते-देखते इस सच को, मन भीतर से टूट गया,

जो मोह था इस झूठी जग से, पल भर में वो छूट गया।

लगा कि मैं भी राख ही हूँ, बस थोड़ा सा ठहरना है,

इसी आग की आग़ोश में, एक रोज़ मुझे भी मरना है।


तभी, एक चिता की तपिश ने मुझको दूर से छुआ था,

विरक्ति के उस सन्नाटे में, एक गहरा जुड़ाव हुआ था। 


यह राख जो उड़कर बहती है, इस मिट्टी का ही हिस्सा है,

मैं अलग कहाँ हूँ इस जग से? यह मेरा भी तो किस्सा है!

ये रोते हुए जो लोग खड़े, इनके भीतर भी मैं ही हूँ,

जो जलकर राख हुआ इस पल, उस मंज़र में भी मैं ही हूँ।


दुख-सुख का ये ताना-बाना, हम सबको एक बनाता है,

मरने वाले से भी गहरा, जीने का एक नाता है।

जुड़ाव विरक्ति से जुदा नहीं, दोनों ही एक स्वरुप हैं,

जो खोने के डर से मुक्त हुआ, वो ही तो प्रेम का रूप है।


मणिकर्णिका की आग ने, मुझको मुझसे ही मिलवाया है,

जीने की असली कीमत को, मरते जीवन ने सिखाया है।


- अमितेश 

झल्ली

वह ज़रा सी उलझी, ज़रा सी साफ़ है,

बड़ी अजीब लड़की है, खुदा का इंसाफ़ है।

उसकी आँखों में समंदर है, मगर प्यास भी है,

हँसती है तो लगती है जैसे, कोई पुरानी आस है।


बड़ी अजीब लड़की है,

वो कभी तेज़ हवाओं सी बहती है,

तो कभी ठहरे पानी सी शांत रहती है।

बातों-बातों में दुनिया जीत लेती है,

और तनहाइयों में खुद से ही डरती है।


बड़ी अजीब लड़की है,

उसका होना, न होना, किसी पहेली सा है,

उसका चुप रहना भी, किसी राग-रागिनी सा है।

वो अपनी ही दुनिया की रचयिता है,

जिसमें हकीकत कम और ख्वाबों का रेला है।


बड़ी अजीब लड़की है,

कभी वो चाँद की रौशनी को छूना चाहती है,

तो कभी अपनी परछाईं से ही मुख मोड़ लेती है।

ज़िद उसकी ऐसी कि पत्थर पिघला दे,

और नाज़ुक इतनी कि एक लफ्ज़ पर टूट जाती है।


सब कहते हैं उसे, कि बदल जाना चाहिए,

वक्त के साथ खुद को ढाल लेना चाहिए।

पर वो जो है, उसे वही बनकर रहना है,

अपनी शर्तों पर जीने का उसे जुनून सहना है।


बड़ी अजीब लड़की है,

वो किसी की समझ में नहीं आती,

जैसे किताब हो कोई, जिसे बस पढ़ना है,

मगर जिसका कोई भी पन्ना पूरा नहीं होता।


वो ज़रा सी नादान, ज़रा सी समझदार है,

उसकी खामोशियों में छिपा एक अजब सा प्यार है।

लोग पूछते हैं, "कौन है वो? क्या है वो?"

मैं बस मुस्कुरा देता हूँ,

वो कोई ख्वाब, या बस एक एहसास है...

बड़ी अजीब लड़की है, पर बहुत ही खास है।

 

- अमितेश 


देखो पापा, मैं बड़ा हो गया

उंगली पकड़कर चलना सीखा, अब खुद दौड़ लगाता हूँ,

हज़ार उलझने जीवन की अब खुद ही सुलझा लेता हूँ।

वो जो छोटी सी चोट पे रोता था, अब दर्द छुपाना सीख लिया,

भीतर चाहे तूफान उठे, पर बाहर मुस्कुराना सीख लिया।

कंधों पर अब घर का बोझ, उठाना भी मुझे आ गया,

देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ आ गया। 


आपकी कमीज़ें अब मेरे बदन पर फिट आने लगी हैं,

दुनिया की कड़वी बातें भी अब मुझको भाने लगी हैं।

कल तक जो बातें आपकी, मुझको लगती थी पाबंदी,

आज समझ में आता, क्यों की थी आपने वो नाकाबंदी।

हवाओं के रुख को मोड़ सकूँ, इतना हुनर मुझमें आ गया,

देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ आ गया।


धूप में जलकर काम करूँ तो आपकी मेहनत दिखती है,

यह मतलबी दुनिया है, यहाँ हर चीज़ की कीमत दिखती है।

पैसे कमाने की दौड़ में जब पांव मेरे थक जाते हैं,

तब आपके फटे हुए पुराने जूते याद आ जाते हैं।

कि कैसे आपने सब सहा, ये अहसास रगों में समा गया,

देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ अब आ गया।


जिद तो अब भी करता हूँ, पर खुद से ही लड़ जाता हूँ,

शाम को जब घर लौटता हूँ, और ज़िम्मेदार बन जाता हूँ।

कद मेरा बढ़ गया आपसे, पर साया आपका ही चाहिए,

इस मतलबी सी दुनिया में पापा, सहारा आपका ही चाहिए।

बचपन पीछे छूट गया, मैं वक्त की धूल में नहा गया,

देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ आ गया।


पर सच कहूँ तो आज भी, वो बच्चा दिल में बाकी है,

आपकी एक शाबाशी मिल जाए, बस इतना ही काफी है।

भले ही दुनिया की नज़रों में, मैं ऊँचे मकाम पर खड़ा हूँ,

पर आपके सामने छोटा रहूँ, तो ही सच में बड़ा हूँ।

ज़िंदगी के इस सफ़र में, मैं अब खुद एक रास्ता पा गया,

देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ अब आ गया।


- अमितेश 


गुरुवार, 11 जून 2026

फकीरी

बटुआ मेरा नहीं है भारी, ना ही कोई बड़ी दुकान है,

पर दोस्तों की महफ़िल में, मेरी अपनी ही एक शान है।

महल नहीं है रहने को मेरे, ना कोई मखमली लिबास है,

पर जो मिला सुकून से खाया, यही सबसे खास है।

हाँ, है मुझ में खूब अमीरी, सीखा है मैंने इस फकीरी में। 


गाड़ी मेरी कोई बड़ी नहीं, जो सड़कों पर धुआँ उड़ाए,

पर कंधे मेरे यारों के, हर मुश्किल में साथ निभाए।

कपड़ों पर कोई ब्रैंड नहीं, सादगी का ही चोला है,

दिल में कोई बैर नहीं, यह सबसे सीधा-भोला है।

हाँ, है मुझ में खूब अमीरी, सीखा है मैंने इस फकीरी में।


विरासत में नहीं मिली तिजोरी, नाहीं कोई बैंक बैलेंस है,

माँ-बाप के संस्कार हैं, मेरे व्यक्तित्व का एक्सीलेंस है।

अपनों का हाथ है मेरे सर पर, तो हर मुश्किल आसान है,

इन चंद वफ़ादार चेहरों में ही, बसता मेरा सारा जहान है।

हाँ, है मुझ में खूब अमीरी, सीखा है मैंने इस फकीरी में।


दुनिया नापती होगी अमीरी, पैसों और मकानों से,

मैं दौलत अपनी गिनता हूँ, अपनों की मुस्कानों से।

अगर दिल का अमीर होना ही, सबसे बड़ी जागीर है,

तो सुन लो मेरे यारों, मेरी टक्कर का ना कोई फ़कीर है!

हाँ, है मुझ में खूब अमीरी, सीखा है मैंने इस फकीरी में।


- अमितेश 

बुधवार, 10 जून 2026

एक कप ठहराव

दिल्ली की वो कड़कड़ाती ठण्ड थी, थोड़ी ओस में डूबी, थोड़ी रुमानियत से भरी। सुबह के आठ बज रहे थे। मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन के बाहर कोहरे की एक मोटी चादर पसरी हुई थी। भगवान दास रोड की नुक्कड़ पर हरी भाई की चाय की दूकान से निकलता सफ़ेद धुआं कोहरे के साथ घुल मिल कर अपना वज़ूद खो रहा था। चाय की सोंधी खुशबु कोहरे को सुगन्धित कर रही थी। 


तपन अपनी ओवरकोट की जेब में हाथ डाले उस ठंड से दो - दो हाथ कर रहा था। सिकुड़ता - सिमटता वो हरी भाई की दूकान तक पहुंचा की चाय की गर्माहट उसके बर्फ से जमे हाथों और ठन्डे होते जिस्म में कुछ गर्मी दे जाये। तपन नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (NDS) का थिएटर आर्टिस्ट था। उसके दोनों हाथ ओवरकोट की जेब में थे और बगलों में प्ले की स्क्रिप्ट के कुछ पन्ने दबे थे। 

"हरी भाई, एक कड़क चाय देना, अदरक मारकर" तपन ने ठण्ड से कंपकंपाती आवाज में कहा।

"और हरी भाई, एक मेरी भी... बिना चीनी और थोड़ी ज्यादा इलायची" पीछे से एक खनकती हुई आवाज आई।


हरी भाई ने मुड़कर देखा। वह रुपल थी। तपन उसे जानता था, वह उसी के नाटक में लीड एक्ट्रेस थी, लेकिन दोनों के बीच अब तक सिर्फ 'हाय-हेलो' वाली ही औपचारिक बातचीत हुई थी। रुपल ने मैरून कलर की सूट पहनी थी जिसपे डीप ग्रीन ओवरकोट पहना था। सिर पर हलकी हरे रंग की मफलर लपेटा हुआ था। ठण्ड के मारे उसका रंग गुलाबी हो गया था उसकी नाक हल्की सी लाल हो रही थी।


हरी भाई ने मिट्टी के दो कुल्हड़ आगे बढ़ा दिए। चाय इतनी गर्म थी कि कुल्हड़ पकड़ते ही दोनों की हथेलियों को एक मखमली गर्माहट का अहसास हुआ।


"उफ़! यह ठंड तो जान ले लेगी" रुपल ने कुल्हड़ से उठती भाप को अपने चेहरे की तरफ लेते हुए कहा।

तपन ने चाय की एक चुस्की ली और मुस्कुराया, "इस ठंड की बस यही एक अच्छी बात है। हल्की सी गर्माहट स्वर्ग का आभास देने लगती है और चाय अमृत जैसी लगती है।"


रुपल ने तपन के हाथ में दबे स्क्रिप्ट के पन्नों को देखा। "सुबह-सुबह डायलाग रटे जा रहे हैं? वैसे, वो तीसरे सीन की जो तुम्हारी लाइनें हैं ना... 'तुम जानती हो तुम मेरे लिए बनी हो। तुम ठहर क्यों नहीं जाती'... वो तुम बहुत जल्दी में बोल जाते हो।"

तपन चौंक गया। "अच्छा? तुम्हें ऐसा लगता है?"

"हां," रुपल ने अपने कुल्हड़ को दोनों हाथों से भींचते हुए कहा, "उस लाइन में एक ठहराव होना चाहिए। जैसे इस चाय को पीने में है। तुम भागते से जाते हो उस लाइन से।"


उस सुबह की चाय के बाद जैसे एक अनकहा सिलसिला शुरू हो गया। थियेटर की रिहर्सल नौ बजे शुरू होती थी, लेकिन कबीर और अहाना दोनों ही सवा आठ बजे मंडी हाउस के उस नुक्कड़ पर मिलने लगे।

वहां कोई रेस्टोरेंट वाली औपचारिकता नहीं थी, कोई महंगी कॉफी नहीं थी। बस मिट्टी के दो कुल्हड़ थे, सर्दियों की गुनगुनी धूप थी और दो दिल थे जो धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आ रहे थे।


बातें नाटक की स्क्रिप्ट से शुरू होतीं और धीरे-धीरे उनकी निजी जिंदगी के पन्नों तक पहुंच जातीं। रूपल को पता चला कि तपन को पुरानी गजलें पसंद हैं, और तपन ने जाना कि रूपल जब बहुत खुश या उदास होती है, तो बहुत तेज - तेज बोलती है।


"तुम्हें पता है तपन?" एक दिन रूपल ने अपनी चाय में डूबा हुआ बिस्कुट बचाते हुए कहा, "मुझे जिंदगी में चकाचौंध से ज्यादा यह सादगी पसंद है। एक गरम कुल्हड़ हाथ में हो, तो लगता है दुनिया की सारी खुशियां बस यहीं सिमट गई हैं। और हाँ, अगर कोई उस चाय में साथ देने वाला मिल जाये तो जैसे जिंदगी पूरी लगने लगती है।"


तपन उसे देखता रह गया। उसने मन ही मन सोचा, 'और मुझे उस कुल्हड़ को पकड़े हुए तुम पसंद हो। मैं हूँ वो साथ देने वाला जो तुम्हारे साथ जीवन भर चाय पीना चाहता है कि तुम खुद को मुकम्मल कर सको।' 

लेकिन वह कह नहीं पाया।


लगभग डेढ़ महीने की रिहर्सल के बाद आखिरकार नाटक के मंचन का दिन आ गया। ऑडिटोरियम खचाखच भरा था। नाटक अपने आखिरी मोड़ पर था। मंच पर तपन और रूपल आमने-सामने थे।

नाटक की स्क्रिप्ट के मुताबिक, रूपल को तपन को छोड़कर दूर जाना था, और तपन को उसे रोकना था।


तपन आगे बढ़ा। उसने रूपल की आंखों में देखा। वहां स्टेज की लाइट्स की चमक थी, लेकिन तपन को उस चमक में भगवान् दास रोड के नुक्कड़ वाली रूपल दिखी - मफलर लपेटे, चाय की भाप के पीछे मुस्कुराती हुई।


तपन ने रूपल का हाथ थामा। इस बार उसके शब्दों में कोई जल्दबाजी नहीं थी। उसने पूरी शिद्दत और गहरे ठहराव के साथ अपनी वह अधूरी लाइन बोली:

"तुम जानती हो तुम मेरे लिए बनी हो। तुम ठहर क्यों नहीं जाती... मेरी क्यों नहीं हो जाती, जीवनभर के लिए तुम ठहर क्यों नहीं जाती..."

 

ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। नाटक खत्म हुआ, पर्दा गिरा। सबने दोनों की अदाकारी की जमकर तारीफ की।

नाटक के बाद, जब सब लोग बैकस्टेज पार्टी की तैयारी कर रहे थे, तपन चुपके से बाहर निकल आया। वह सीधा हरी भाई की दुकान पर गया। कुछ देर बाद रूपल भी अपना कॉस्ट्यूम बदले, वही पुराना मफलर डाले वहां पहुंच गई।

"तो... आखिरकार तुमने वह लाइन सही से बोल ही दी," रूपल ने आते ही कहा। "और वो improvisation क्या था! इन डेढ़ महीनों के रिहर्सल में तो ये लाइन कभी नहीं बोली गयी। स्क्रिप्ट में भी नहीं थी वो लाइन!" रूपल कुछ और भी जानना चाह रही थी। 


"पता नहीं कहाँ से आई वो बाद की लाइन। बस बोल दिया।" तपन ने हरी भाई से चाय के दो कुल्हड़ लेते हुए कहा।

रूपल ने कुल्हड़ थामा। तपन ने गहरी सांस ली, अपने दिल की धड़कनों को संभाला और रूपल की आंखों में देखते हुए बोला, "रूपल... वह सिर्फ नाटक की लाइन नहीं थी। मैं सच में चाहता हूं कि तुम... मेरी जिंदगी में हमेशा के लिए ठहर जाओ।"


रूपल ने तपन को देखा। हवा में अदरक और इलायची की सोंधी महक घुली हुई थी। रूपल के चेहरे पर एक हया की खूबसूरत सी लाली दौड़ गई। उसने अपनी चाय की चुस्की ली, तपन के कुल्हड़ से अपना कुल्हड़ हल्का सा टकराया, Cheers बुदबुदाया और धीरे से कहा:

"चाय ठंडी हो रही है तपन... और मैं अब कहीं नहीं जा रही।"


शाम की उस कड़कती ठंड में, चाय के दो गर्म कुल्हड़ों के बीच, एक बेहद मासूम और सुलगते हुए प्रेम का सफर मुकम्मल हो चुका था।


- अमितेश 


मंगलवार, 9 जून 2026

वियोग

उठ चला चरण, छू अवध-धूल,

रो पड़ी चेतना, मुरझाईं कुल;

दृग-कोर खुले, फूटी सावन,

बह चली तमस की एक पवन।


लोचन-मद से घुल मिला सघन,

अंजन का वह श्यामल सावन;

गंगा-यमुना का श्वेत हास,

बन गया आज कज्जल-विलास!


वह बह निकली अविरल धारा,

जिसमें डूबा साकेत सारा;

थी सरयू निर्मल, शांत, शुचि,

पर पा न सकी अपनी मरुचि।


मूर्छित तरंग, कंपित विहान,

काली लहरों का हुआ गान;

सरयू में मिलकर कृष्ण-धार,

बन गई शोक का हाहाकार!


यह तिमिर-सिंधु का पैरहन,

लो, लील रहा भू का स्पंदन;

पल्लव-पल्लव पर विषाद-राग,

धरती पर सोई आज आग।


थी विकल धरा, व्याकुल गगन,

घुट घुट रोता था कण-कण मन;

इस महा-शोक की कालिमा से,

संसार हुआ ज्यों तमस-मगन!


रजनी का क्रंदन फैला अनंत,

हे राम! तुम्हारा यह कैसा वसंत?

भू काली, अंबर काल-रूप,

छाया विराग का महा-कूप!


वह चली धार साकेत छोड़,

अंबर का कज्जल-मुँह मरोड़;

थी चली जहाँ राघव-चरण-धूल,

पर विकल हुए गिरिवर के शूल!


थी विकल धरा, व्याकुल गगन,

घुट घुट रोता था कण-कण मन;

इस महा-शोक की कालिमा से,

संसार हुआ ज्यों तमस-मगन! 



लो, चित्रकूट का हरित-हास,

क्षण भर को भूल गया विकास;

निर्झर के स्वर में थमा गान,

तरु-तरु ने तज दिया दिव्य तान!


मंदाकिनी की वह स्वच्छ धार,

श्यामल विषाद का बनी हार;

पायस्वनी का कंचन शरीर,

शोक की कालिमा से हुआ अधीर!


गिरि-शृंगों पर जो धूप-केश,

पहने थे स्वर्णभ अमित वेश;

उन पर भी बिखरा अंजन-शोक,

धुंधला सा दीखा सिद्ध-लोक!


काले तरु की कातर पुकार,

जैसे विलाप की हो कतार;

पशु-पक्षी का थमता विहंग,

छू गया तमस का क्रूर ढंग!


कण-कण में व्यापे राम-नेह,

पर विरह-बाण से विद्ध देह;

चित्रकूट भी अवध-शोक से,

घिर गया तनिक परलोक से!


थी विकल धरा, व्याकुल गगन,

घुट घुट रोता था कण-कण मन;

इस महा-शोक की कालिमा से,

संसार हुआ ज्यों तमस-मगन! 


वह व्याकुल जन का महा-नाद,

ले चला साथ सृस्टि - विषाद;

'हा राम! लौट आओ' पुकार,

नभ को देती शायक की मार!


हर कंठ बना था करुण राग,

उर में सुलगती विरह-आग;

क्या वृद्ध, युवा, क्या विवश बाल,

सब झेल रहे थे वज्र-काल!


चिल्ला उठी अवध की धरा,

उन्नत मस्तक, भय से भरा;

फैली बाहें नीले अनंत,

लौटा दो हमारा वह वसंत!


आँखों में नीर, है मन अधीर,

अंबर से टकराता शरीर;

शून्यत्व चीरती जैसे वह पुकार,

जैसे विलाप का वहां हो ज्वार!


हे देव! सुनो यह आर्त-दान,

क्यों रूठ गया हमसे विहान?

तज कर साकेत का राज-वेश,

क्यों चला गया वह प्राण-ईश?


थी विकल धरा, व्याकुल गगन,

घुट घुट रोता था कण-कण मन;

इस महा-शोक की कालिमा से,

संसार हुआ ज्यों तमस-मगन! 


- अमितेश 


# मरुचि - कान्तिहीनता 

# पैरहन - पोशाक (फ़ारसी)

# पायस्वनी - मन्दाकिनी नदी का प्रर्यायवाची 

# शायक - बाण / तीर 

# मही - पृथ्वी / धरा 


गुरुवार, 4 जून 2026

एक कप Imperfection

विक्रम और अवंतिका आज के affluent couple थे। हाड़ तोड़ मेहनत कर के अपना एक मुकाम बनाया था। 15 साल लंदन में रह कर आये थे। खूब पैसा कमाया था। जानते थे की हिंदुस्तान में लंदन नहीं मिलेगा फिर भी यहाँ शिफ्ट कर गए थे। पैसे तो यहाँ भी दोनों बहुत ही अच्छा कमा रहे थे। 

विक्रम एक मल्टीनेशनल Hedge - Fund कंपनी में Senior Analyst था। उसकी बीबी अवंतिका दुनिया की जानी मानी Art Curator थी। दोनों ही new age business में थे तो दौलत भी बढ़ती जा रही थी उनकी। गुडगाँव की एक नफीस सी जगह पर 10 करोड़ का पेंटहाउस ख़रीदा था। यही उनका आशियाना था। 

उनकी सुबह उनके स्मार्ट होम के Ambient Wake Up अलार्म से होती थी। 7 बजते ही उनकी पेंटहाउस के automatic पर्दे धीरे से खुल जाते और बैकग्राउंड में बहुत ही धीमा, क्लासिकल जैज़ म्यूज़िक बजने लगता। अवंतिका अपने Carine Gilson के नाईट गाउन को संभालते हुए Ethiopian Roast Coffee Beans को खुद grind करती और एक बेहतरीन कॉफ़ी बनाती महंगी कॉफ़ी मशीन में। वहीं विक्रम Morning Breakfast के लिए आर्गेनिक अवोकार्डो टोस्ट और soaked चिआ सीड्स की प्लेट सजा रहा होता। 

दोनों अपने आलिशान बंगले के गार्डन में महंगे पौधों के बीच अपनी महंगी जिंदगी जी रहे थे। उनकी बातचीत में हिंदी के शब्द उतने ही होते जितने उनकी डाइट में कार्बोहाइड्रेट्स। जिंदगी खुशहाल थी और दोनों एक दूसरे से बेहद खुश थे। यही उन्होंने चाहा भी अपनी जिंदगी से। 

"विक्रम, आज शाम को मिस्टर एंड मिसेस रायचूरकर के साथ हमारा डिनर "The Vintage Hall - Taj" में है। प्लीज समय पर आ जाना। And yes, don't forget to wear that TAG Heuer Signature Carrera Model watch, ये मुझे बहुत पसंद है।" अवंतिका ने अपने iPad पर अपना शेड्यूल चेक करते हुए कहा। 

"Don't Worry Babes, I will ensure looking best for you this evening, बस देख लेना मिसेस रायचूरकर को मुझपे Crush ना हो जाये?" विक्रम ने आँखों में शरारत भरते हुए कहा। 

एक हलकी हंसी तैर गयी उस सुहाने बाग़ में। 

कुछ ऐसे ही उनकी जिंदगी नपी तुली ख़ुशी, सोफिस्टिकेटेड हंसी और नफीस प्यार के साथ गुजर रही थी। 


शाम को दोनों अपनी मर्सिडीज-बेन्ज से डिनर के लिए निकले। दिल्ली की बारिश के बाद मौसम सुहाना था, लेकिन सड़कों पर ट्रैफिक का बुरा हाल था।

अचानक, एक चौराहे पर उनकी गाड़ी के आगे एक ऑटो रिक्शा बंद हो गया। विक्रम ने थोड़ा झल्लाकर हॉर्न बजाया। अवंतिका ने धीरे से कहा, "काम डाउन विक्रम, इट्स सो अनप्रोफेशनल टू हॉंक लाइक दैट।"

तभी सड़क के किनारे, एक पुरानी नीम के पेड़ के नीचे बनी एक छोटी सी टपरी पर विक्रम की नज़र गई। वहां तिरपाल के नीचे एक कोयले की भट्टी सुलग रही थी। मिट्टी के कुल्हड़ों से भाप निकल रही थी। बारिश की बूंदें गरम तवे पर गिरकर छन-छन की आवाज कर रही थीं।

वहां कुछ 'साधारण लोग' एक साथ खड़े होकर कुल्हड़ की चाय हाथ में लिए किसी बात पर हंस रहे थे। एक लड़का जोर-जोर से हंसते हुए अपने दोस्त के कंधे पर हाथ मार रहा था। वहां कोई मैनर्स नहीं थे, कोई क्लासिकल जैज़ नहीं था, लेकिन वहां एक ऐसी चीज़ थी जो विक्रम और अवंतिका के लिविंग रूम में अक्सर गायब रहती थी - बेपरवाह, बेसाख्ता जिंदगी।

पता नहीं क्यों विक्रम ने गाड़ी को साइड में रोका। ये उस नीम के पेड़ के नीचे की टपरी से कुछ पहले था। 

"व्हाट आर यू डूइंग विक्रम? वी आर गेटिंग लेट," अवंतिका ने अपनी रोलेक्स में अपनी कीमती समय को देखते हुए कहा।

"अवंतिका, हमने आखिरी बार बिना किसी एजेंडे के, बिना किसी बिजनेस टॉक के, सिर्फ एक-दूसरे के साथ हंसते हुए वक्त कब बिताया था?" विक्रम ने अवंतिका की आंखों में देखते हुए पूछा।

अवंतिका चुप हो गई। उसके पास इस बात का कोई सोफिस्टिकेटेड जवाब नहीं था।

"चलो, आज कुछ ऐसा करते हैं जो हमारे 'स्टेटस' को सूट नहीं करता," विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा।

दोनों गाड़ी से नीचे उतरे। अवंतिका ने अपनी सैंडल्स को कीचड़ से बचाते हुए टपरी की तरफ कदम बढ़ाए। टपरी वाले ने दो आलीशान कपड़े पहने लोगों को देखकर फौरन स्टूल साफ किया।

"भैया, दो कड़क कुल्हड़ चाय देना। अदरक वाली, "विक्रम ने पहली बार अंग्रेजी लहजा छोड़कर बिल्कुल देसी अंदाज में कहा।

जब गरम मिट्टी का कुल्हड़ अवंतिका के मैनीक्योर किए हुए हाथों में आया, तो पहले तो उसे थोड़ा अजीब लगा। लेकिन जैसे ही उसने पहला घूंट लिया, उसकी आंखें बंद हो गईं। अदरक, इलायची और मिट्टी की वो सोंधी खुशबू... जो किसी फाइव-स्टार होटल की कस्टमाइज्ड Chamomile Tea में कभी नहीं मिल सकती थी।

पास खड़े लोग किसी चुटकुले पर जोर से हंसे, तो इस बार अवंतिका ने नाक नहीं सिकोड़ी। बल्कि उसकी होंठों पर भी एक असली, बिना किसी बनावट वाली मुस्कान आ गई।

विक्रम ने अवंतिका का हाथ पकड़ा। दोनों ने बिना कुछ कहे, सिर्फ चाय की चुस्कियों और बारिश की आवाज़ के बीच बीस मिनट बिता दिए। कोई फोन नहीं देखा गया, कोई शेड्यूल री-चेक नहीं हुआ।

गाड़ी में वापस बैठते हुए अवंतिका ने कहा, "यू नो विक्रम, कभी-कभी बहुत ज्यादा परफेक्ट होने की कोशिश में, हम जीना ही भूल जाते हैं।"

विक्रम ने गाड़ी स्टार्ट की और मुस्कुराया, "तो फिर तय रहा। हर संडे, हमारी सोफिस्टिकेटेड क्रॉकरी को थोड़ा आराम मिलेगा, और हम अपनी औकात से बाहर जाकर... थोड़ी जिंदगी पिएंगे।"

उस रात, मिस्टर एंड मिसेस रायचूरकर के साथ महंगी वाइन पीते हुए भी, विक्रम और अवंतिका के जेहन में उस मिट्टी के कुल्हड़ का स्वाद और उसकी सादगी बनी रही। उन्हें कहीं ये समझ में आ रहा था कि जिंदगी में थोड़ा Imperfection उसे और रोमांचक बना देते हैं। वे समझ रहे थे की जहाँ से उठ कर यहाँ पहुंचे थे, कभी - कभी वहां वापस जाना आपको खुद से, अपने अतीत से जुड़ने में मदद ही करता है।   


- अमितेश 


मंगलवार, 2 जून 2026

एक कप जिंदगी

सिद्धार्थ 35 साल का था। एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में मिडिल लेवल मैनेजर था। काफी नाम और पैसा कमा रहा था। जीवन में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। लेटेस्ट iPhone, महंगी कार, शहर के पॉश इलाके में 3 - BHK फ्लैट, महँगी क्लब मेम्बरशिप, वीकेंड पर गोल्फ खेलना, साल में दो बार solo trip पर देश विदेश में घूमना और इंस्टाग्राम पर "Living My Best Life" हैशटैग वाली तस्वीरें। सब कुछ तो था उसके पास। दुनिया की नजरों में सिद्धार्थ 'successful professional' था। 


अक्सर रात 2 - 3 बजे, जब नींद नहीं आती, वो अपनी 30वें माले की फ्लैट से नीचे देखता। पूरा शहर जगमग जगमग करता लेकिन फिर भी सिद्धार्थ खुद में एक अंधेरापन ही महसूस करता। लगता सीने में एक अजीब सी घुटन हो रही हो। उन शांत रातों में भी सिद्धार्थ के अंदर में एक कोलाहल होता रहता। लगता वो आगे बढ़ने की होड़ में कुछ तो पीछे छोड़ता जा रहा है। सबकुछ हो है उसके पास, फिर भी अंदर से वो बिलकुल खाली है। उसे समझ नहीं आता कि वह भाग किस चीज के पीछे रहा है। फिर अगले दिन के काम याद आ जाते। लगता अभी लैपटॉप खोले और कल के काम में लग जाए। रातें ऐसे ही उहापोह में बीतती। कभी नींद आ जाती कभी हल्की नींद में ही रात कटती। 

सिद्धार्थ रोबोट बन गया था सफलता के पीछे भागते भागते। जिंदगी नीरस हो गयी थी और दिन मैकेनिकल। 

नए प्रोडक्ट लॉन्च की वजह से उसपर बहुत प्रेशर था। वो अपना सबकुछ इस प्रोजेक्ट पर लगा चूका था। कंपनी की उम्मीदें भी सिद्धार्थ से थोड़ी ज्यादा थी। ठीक प्रोडक्ट लॉन्च से पहले कुछ तो गलत हुआ और पूरा प्रोजेक्ट ही फेल हो गया। सिद्धार्थ अकेला उसको हेड कर रहा था। इस असफलता की सारी जिम्मेदारी उसपे आ गयी। बॉस सिद्धार्थ पर बुरी तरह चिल्लाया। बातें इस हद तक पहुँच गयी की बॉस ने सिद्धार्थ के professionalism पर ही सवाल उठा दिया। सिद्धार्थ अपनी गलतियों से भाग नहीं सकता था। उसे उस एक पल में लगा की उसकी सारी सफलता, सारा अनुभव बस मिथ्या ही है। 

वो ऑफिस से थोड़ा जल्दी निकाल गया, अपनी गाड़ी निकाली और पता नहीं किस ओर चलने लगा। शहर की संकरी गलियों से बस अपनी गाड़ी निकाल रहा था। पूरी ख़ामोशी तिरी थी गाड़ी में। सिद्धार्थ अपने ख्यालों में था। आज पहली बार वो काम नहीं, खुद के बारे में सोच रहा था। 

जाना कहाँ था पता नहीं, मंजिल क्या थी नहीं मालुम। जैसे जिंदगी गुजर रही थी वैसे ही अभी उसकी गाड़ी चल रही थी। कुछ घंटे ऐसे ही वो शहर की सड़कों पर गाड़ी चलती रही बिना किसी मंजिल की तलाश में। रास्ते में उसे "शर्मा टी स्टॉल" का बोर्ड दिखा। अनमने मन से सिद्धार्थ ने अपनी कार वही लगा दी। ये काफी मशहूर चाय की दूकान थी शहर की। अमूमन यहाँ  रहती है। लेकिन इस वक़्त थोड़ा खाली रहता है यह दूकान। सिद्धार्थ बड़े ही अनमने मन से अपनी कार से निकला और वही एक खाली पड़ी बेंच पर बैठ गया। 

"चाय पियोगे बाबू।" शर्मा जी ने चूल्हे के पास बैठे बैठे आवाज़ लगाई। सिद्धार्थ ने बस हामी में सिर हिलाया। 

शर्मा जी खुद ही चाय ले कर आये। अभी उनकी दूकान में काम करने वाले सारे लड़के खाना खा रहे थे। चाय की कुल्हड़ सिद्धार्थ को देते हुए बोले, "सब ठीक है ना बाबू?" सिद्धार्थ की मनःस्थिति उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। उस एक अपनापन भरी बात ने उसकी आंखों में आँसू भर दिया। वो फूट - फूट कर रो पड़ा। शर्मा जी ने उसके कंधे पर हल्के हाथ रखा। इस एक स्पर्श ने जैसे उसके अंदर के बच्चे को जगा दिया था। "काका मैं थक गया हूँ। दिन रात भाग रहा हूँ, पर लगता है मैं पीछे छूटता जा रहा हूँ। एक पल को लगता की पतंग सी ऊँची उड़ान भर रहा हूँ, आसमान से बात कर रहा हूँ, और दूसरे पल आभास होता की मेरी डोर तो कब की कटी हुई है और मैं ऐसे ही बेवजह उड़ रहा हूँ, शायद कुछ समय में मैं जमीन पर आ गिरूं। क्या फायदा ऐसी जिंदगी का?" अपने सारे विषाद सिद्धार्थ ना जाने क्यों शर्मा जी के सामने निकाल रहा था। 

शर्मा जी ने अपनी हाथ के दबाव को उसके कंधे पर थोड़ा बढ़ाते हुए दूसरे हाथ से पकड़ी चाय की कुल्हड़ उसे दे कर बोले, "बेटा, मुझे नहीं मालुम तुम इस समय किस दौर से गुजर रहे हो? पहले तो ये चाय पियो, ये तुम्हारी मन की थकान को थोड़ा सम्हालेगा। और रही बात जिंदगी की तो ये तो तुम्हे ईश्वर ने उपहार में दिया है। कुछ फायदा ऊपर वाले ने देखा होगा तभी तो तुम्हे यह जीवन मिला है। बस यही सवाल खुद से पूछो की क्या जीवन के उस फायदे को तुम समझ भी पा रहे हो या नहीं। तुम ज़िन्दगी काट रहे हो या जी रहे हो ये तो तुम्हे ही सोचना होगा।"

शर्मा जी की चाय और शर्मा जी की बातें जैसे सिद्धार्थ के लिए pain killer का काम कर गयी। थोड़ी देर के लिए वो अपने आप में आ गया था। 

शर्मा जी ने थोड़ी सुक़ूनियत उसके चेहरे पर देखी। वो बोले, "बेटा अपने काम से थोड़ा छुट्टी लो। खुद के लिए समय निकालो। खुद से बातें करो। ढूंढो क्या गलत हो रहा है, क्या गलत हो गया है। कैसे वो ठीक होगा। बात बन जाएगी। दौड़ना महत्वपूर्ण नहीं है, कहीं पहुंचना जरुरी है। ढूंढो कहाँ पहुंचना चाहते हो। सब ठीक हो जायेगा। तुम सब ठीक कर लोगे। खुद पर और उसपर भरोसा रखो।" बोलते हुए शर्मा जी ने ऊपर की ओर देखा। 

सिद्धार्थ शर्मा जी की बात सुन रहा था या नहीं, वो खुद से जरूर बात कर रहा था उन चाय की घूंटों के साथ। 

"काका, एक और चाय मिलेगी क्या?" 

"बिलकुल मिलेगी बेटा।" बोलते बोलते शर्मा जी चले गए एक और चाय लाने। 

माहौल खुशनुमा हो गया था उस टी स्टॉल का। शर्मा जी के चेहरे पर वो सुकून साफ़ झलक रहा था। सिद्धार्थ इन पंद्रह मिनट की बातों और चाय के दो प्यालों में कुछ और खुद में आ गया था।   

सिद्धार्थ समझ गया था की इस Rat Race में भागने का कोई मतलब नहीं है। वो अपने खुद के pressure में आ गया था। उसे अब एक ठहराव की जरुरत थी कि खुद को समेट सके। उसे घर जाना है, घर जहाँ उसके मम्मी पापा हैं, अरसा हो गया है उनसे मिले हुए। बाकी ये जो हुआ है कंपनी में उसे तो वो जल्द ही सही कर लेगा। इतना तो वो जानता ही है। 

सिद्धार्थ बेंच से उठा, अपनी कार में बैठा और निकल पड़ा। वो इस दफा अपनी मंजिल जानता था। बस गाड़ी उसी मंजिल की ओर मोड़ दी। 


- अमितेश 


सोमवार, 1 जून 2026

एक कप अधूरी चाय

गुडलक कैफ़े, शहर के एक मशहूर सड़क की सबसे मशहूर कैफ़े। ये ख़ास तौर पर नौजवानों में ज्यादा चर्चित कैफ़े था। इनके बन मस्का और ईरानी चाय का लगभग पूरा शहर दीवाना था। 

कहते हैं की इसका मालिक कुछ 70 साल पहले भारत आया था और पुणे शहर उसे काफी पसंद आ गया था। फिर तो वो पुणेकर ही बन गया। उसने यहाँ पर एक छोटी सी चाय की दूकान खोली थी इसी नाम से। वो बन मस्का और ईरानी चाय बना कर यहाँ बेचता था। ईरानी चाय इस शहर के लिए एक नया जायका था। यह जल्दी ही सबके जुबान पर चढ़ सा गया। पहले तो आर्मी के लोग यहाँ आया करते थे। धीरे धीरे पूरा शहर यहाँ उमड़ने लगा। जल्द ही ये एक छोटी दूकान से ये बड़ा cafeteria बन गया था। हालाँकि पिछले 60 - 65 वर्षों से यहाँ कोई और नया निर्माण नहीं हुआ था। उनका मानना था की वो कैफ़े की बिल्डिंग पर ध्यान देने के बजाय अपनी चाय पर ज्यादा ध्यान देंगे। आज भी वहां लगे बेंच और कुर्सियां 60 - 65 वर्ष पुराने थे।    

दिवाकर जी यहाँ वर्षों से आ रहे थे। ठीक पाँच बजे वो यहाँ आते, सड़क की तरफ की खिड़की के पास लगे टेबल पर बैठते और दो कप ईरानी चाय मंगवाते, थोड़ी कम चीनी वाली। अपनी चाय पीते और कभी अपने सामने की कुर्सी को देख कर मुस्कुरा देते फिर खिड़की से बाहर आती जाती गाड़ियों और लोगों को जैसे पहचानने की कोशिश करते रहते। लगता वो किसी के साथ बैठ कर चाय पी रहे हों और बीच बीच में उसकी बातों पर मुस्कुरा देते हों। घंटे भर तक यही चलता और फिर वो अपनी चाय ख़तम कर के एक भरी ठंडी कप चाय वहीं छोड़ के चले जाते। आसपास के लोगों को लगता की शायद बुढ़ापे और अकेलेपन में वो सठिया गए हों। लेकिन कैफ़े का वेटर जानता था कि यह पागलपन नहीं, प्रेम है, इबादत है। 

ऐसे ही एक शाम दिवाकर जी बैठे अपनी चाय पी रहते थे और खुद में ही खोये थे। पास ही एक जोड़ा बैठा अपनी बातों के बीच में उन्हें देख लेता था। थोड़ी देर तक तो वो बस दिवाकर जी को देखते रहे लेकिन फिर उनसे रहा नहीं गया। वो उनकी टेबल पर आ गए और बड़े ही स्नेह से पूछा, "बाबा मैं आपको कुछ दिनों से देख रहा हूँ, आप आते हैं, दो कप चाय मंगवाते हैं, एक कप पीते हैं और दूसरा छोड़ के निकल जाते हैं। आप किसी का इंतज़ार कर रहे हैं क्या?"

दिवाकर जी ने नज़रे उठाई, जैसे अपनी तन्द्रा से बाहर आये हों। अपना चश्मा उतारा और एक फीकी मुस्कान बिखेरी। बोले, "बेटा मैं और सरिता इसी रोड की कॉलेज में पढ़ते थे। यहाँ हम अक्सर आते, उसकी पसंद की चाय पीते और अपने अपने घर चले जाते। मैं उन दिनों चाय नहीं पीता था। सरिता ने मुझे चाय की आदत लगा दी थी। उन दिनों Love Marriage इतना आसान नहीं था। हमने जमाने से लड़ कर शादी की थी। 40 साल तक हमदोनो साथ थे। 3 साल पहले वो मुझे छोड़ कर कभी वापस नहीं आने के लिए चली गयी।" दिवाकर जी की आँखें थोड़ी नम हो गयी थी। अपनी आँखों के समुन्दर से पार पाते हुए बोले, "लेकिन मेरा दिल आज भी यह मानने को तैयार नहीं की वो अब मेरे साथ नहीं है। मैं रोज उसकी उपस्थिति अपने आसपास ही देखता हूँ। हम आज भी रोज साथ में यहाँ चाय पीते हैं। इस एक घंटे में वो मुझसे बाते करती है, मुझे हंसाती है, चिढ़ाती है, ढ़ेर सारी बाते करती है फिर जाने की ज़िद करने लगती है। बस उसके साथ ये एक घंटा रोज बिताने के लिए यहाँ आ जाता हूँ।"

दिवाकर जी बोलते बोलते अपनी कुर्सी से उठे, सामने की ठंडी हो चुकी प्याली को छूकर महसूस किया और बोले, "यह प्याली ठंडी जरूर हो गयी है लेकिन उसकी यादों की गर्माहट आज भी मैं इनमे महसूस करता हूँ।" बोलते बोलते वो वेटर को दो कप चाय के पैसे दिए और जाने लगे। जाते जाते सामने की कुर्सी को थोड़ा थपथपाया और हल्की आवाज में बोले, "कल फिर मिलेंगे, तुम नाराज़ मत होना।"

खन्ना जी ने चश्मा उतारा और भीगी नज़रों से उसे देखा। उन्होंने कहा, "बेटा, मेरी पत्नी को इलायची वाली कम चीनी की चाय बहुत पसंद थी। चालीस साल तक हमने साथ बैठकर चाय पी। पाँच साल पहले वो चली गई, पर मेरा दिल यह मानने को तैयार नहीं होता।"

वो नौजवान जोड़ा उन्हें जाते हुए बस देख रहा था। अपनी प्रेमिका को उस नौजवान ने कस के पकड़ लिया और बोला, "तुम मुझे छोड़ कर कभी मत जाना। मैं हमेशा तुम्हारे साथ बैठ कर चाय पीना चाहता हूँ।" लड़की की आँखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे। 


- अमितेश