फिर गर्मी की छुट्टियां शुरू होने वाली थी। अलका ने दादा दादी के साथ छुट्टियां मानाने को ले कर पूरा घर सर पे उठा लिया था। उसे पता था, पापा कभी भी उसकी बात को टालेंगे नहीं। उसे पापा को मनाने के सौ नुस्खे पता थे। वो पापा के फेवरेट तेजपत्ते वाली चाय ले कर उनके साथ बैठ गयी।
"पापा, दादी से बात कर रही थी आज। वो बोल रही थी की अल्कु से मिले अरसा हो गया लगता है। मुझे लगा वो कुछ ज्यादा उम्मीद लगा कर बैठी है। मैंने उन्हें समझाया की पापा इतनी आसानी से छुट्टी नहीं ले सकते। हजारो जिम्मेवारियाँ है उनके सर पे। हमसे तो बात भी कर नहीं पाते जो उनके साथ रहते हैं। आपसे कहाँ मिलने आएंगे।" अलका ने अपने पिटारे के सौ नुस्खे में से एक निकाला।
पापा ने चाय की चुस्कियों के बीच बस "हुँह" कहा था। अलका जानती थी की हुँह सिर्फ एक Non-word नहीं था पापा का, अपने आप में एक पूरा वाक्य था, पूरी सोंच थी।
चाय ख़त्म होने तक ना पापा कुछ बोले ना ही अलका। दोनों साथ बैठे होकर भी अपने आप से बातें कर रहे थे।
***
देहरादून की गर्मी प्रकृति की अस्तव्यस्तता भर है। कभी तो गर्मी जान लेने पर उतारू हो जाती है, कभी सौम्य माँ का आँचल बन शीतलता फैलाती है। अलका को देहरादून की ये भ्रम वाली गर्मी बहुत पसंद आती थी। उसे अपना ददिहाल पसंद आता था। उसे अपनी दादी के नजदीक रहना भाता था। इस गर्मी की छुट्टियों में भी वो यहाँ आ गयी थी। हाँ थोड़े हथकंडे अपनाने पड़े थे उसे पापा के साथ। पापा ने कहा था की ग्यारहवीं के बच्चों को कहाँ गर्मियों की छुट्टी मिलती है। ये साल अलका के लिए भविष्य बनाने का साल है। अभी अच्छे से नहीं पढ़ेगी तो Medical Entrance में अच्छी ranking नहीं मिलेगी और बेहतर college भी नहीं मिल पायेगा। लेकिन अलका ने पापा को promise किया की वो अच्छे rank ले कर आएगी। लेकिन गर्मी की छुट्टियों में वो दादी से मिलने इस बार ही नहीं, हर बार जाएगी। थोड़ा मन तो पापा का भी था दादी से मिलने का।
अलका अपना बेहतर समय दादी के साथ गुजार रही थी। अहले सुबह वो दादी के साथ जागती और देहरादून की उबार खाबड़ रास्तों पे morning walk को जाती। घंटो दोनों बातें करते। लगता नहीं दादी - पोती हैं दोनों, लगता दो बूढ़ी महिलाएं जवान हो गयीं हैं। माँ पापा को ये देख कर ठीक ही लगता था। शायद इसी वजह से पापा गर्मियों की छुट्टी में यहाँ आना मान गए थे।
एक तपती दोपहर में जब पूरा मोहल्ला सो गया था, तब अलका को चाय पीने की इच्छा हुई। दादी अपने कमरे में ऊंघती हुई सो गयी थी। अलका चुपके से दबे पाँव रसोई में गयी। चाय के बर्तन को स्टोव पर चढ़ाया। आज सोंचा दादी की लाल चाय बनायी जाये। ऊपर की अलमारी में चाय पत्ती रखी थी। वो उसे निकलने लगी तो बगल में रखा बिस्कुट का डिब्बा उसके हाथ टकरा कर नीचे गिर गया। एक तेज आवाज़ हुई और जमीन पर गिरते ही डब्बे का ढक्कन खुल गया। कुछ बिस्कुट डब्बे बाहर निकल कर टूट गए। आवाज से दादी की नींद भी खुल गयी। इस डर से की रसोई में बंदर तो नहीं आ गए, वो तेजी से वहां आई।
पता नहीं क्यों, अलका को डर सा लग गया कि कहीं दादी बिस्कुट के डब्बे को गिरा देख कर उसे डाँट ना दे। वो कातर हो कभी नीचे गिरे डब्बे को देख रही थी, कभी दादी को।
दादी ने बिखरे हुए बिस्कुट को देखा और मुस्कुरा कर बोली, "अरे! ये बिस्कुट तो टूट गए, अब इन्हें मेहमानों को तो दे नहीं सकते। चल, इन्हें हम दोनों ठिकाने लगाते हैं।"
दादी ने इतनी सहजता से बोला जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। अलका को थोड़ी हिम्मत आई, बोली,"अरे मैंने ये जान बुझ कर गिराया था। आप बड़ी इत्मिनान से सोइ थी। मुझे चाय पीने का दिल कर रहा था, लेकिन आपको उठाने का दिल नहीं किया, सो आपको उठाने का पाप इस डब्बे के सर रख दिया। देखो मैंने आपकी वाली लाल चाय बनायी है। चलो अब साथ बैठ कर पीते हैं।"
दादी उसकी इस चतुरता पर हँस दी, अलका भी ठहाके लगा कर हँस दी, की चलो अब जान बची तो लाखों पाए।
अलका ने चाय के प्याले को ट्रे पर रखा, प्लेट में उन टूटे बिस्कुट को सजाया और दोनों बरामदे में आ कर बैठ गए।
चाय की चुस्कियां लेते लेते अलका ने कहा की "दादी मैं थोड़ा डर सी गयी थी। लगा की इन टूटे बिस्कुट को उठा कर कहीं फेंक दूँ। पता नहीं क्यों मैं इतना डर गयी थी।"
दादी ने चाय में बिस्कुट डुबोया और धीरे से बोलीं, "बेटा, गलतियाँ तो सबसे होती हैं। पर उन गलतियों को छुपाने के बजाय, अगर हम उन्हें सुधार लें या साझा कर लें, तो वो गलती नहीं रहतीं। जैसे ये टूटे बिस्कुट... अकेले शायद अच्छे न लगते, पर चाय के साथ इनका स्वाद दोगुना हो गया है।"
उस दिन अलका ने सीखा कि रिश्ते साबुत बिस्कुटों की तरह चमकने के लिए नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का सहारा बनने के लिए होते हैं। ये एक ऐसी सीख उस भरी दोपहरी उसे मिली थी जो हमेशा उसके साथ रहेगी, ज़िन्दगी भर।
आज कई बरस हो गए हैं। अलका MS कर के अभी अमेरिका से लौटी है। अब गर्मी की छुट्टियों में देहरादून जाना नहीं हो पाता, अब गर्मी की छुट्टियाँ भी कहाँ होती उसकी। दादी अब तस्वीरों में जिंदा हैं।
अलका जब भी चाय पीती, बस पी लेती। आज भी दादी की वो सीख उसे याद है। बस उन टूटे बिस्कुट और दादी के संग चाय का सुकून कहीं खो गया है।
- अमितेश