दिल्ली की वो कड़कड़ाती ठण्ड थी, थोड़ी ओस में डूबी, थोड़ी रुमानियत से भरी। सुबह के आठ बज रहे थे। मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन के बाहर कोहरे की एक मोटी चादर पसरी हुई थी। भगवान दास रोड की नुक्कड़ पर हरी भाई की चाय की दूकान से निकलता सफ़ेद धुआं कोहरे के साथ घुल मिल कर अपना वज़ूद खो रहा था। चाय की सोंधी खुशबु कोहरे को सुगन्धित कर रही थी।
तपन अपनी ओवरकोट की जेब में हाथ डाले उस ठंड से दो - दो हाथ कर रहा था। सिकुड़ता - सिमटता वो हरी भाई की दूकान तक पहुंचा की चाय की गर्माहट उसके बर्फ से जमे हाथों और ठन्डे होते जिस्म में कुछ गर्मी दे जाये। तपन नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (NDS) का थिएटर आर्टिस्ट था। उसके दोनों हाथ ओवरकोट की जेब में थे और बगलों में प्ले की स्क्रिप्ट के कुछ पन्ने दबे थे।
"हरी भाई, एक कड़क चाय देना, अदरक मारकर" तपन ने ठण्ड से कंपकंपाती आवाज में कहा।
"और हरी भाई, एक मेरी भी... बिना चीनी और थोड़ी ज्यादा इलायची" पीछे से एक खनकती हुई आवाज आई।
हरी भाई ने मुड़कर देखा। वह रुपल थी। तपन उसे जानता था, वह उसी के नाटक में लीड एक्ट्रेस थी, लेकिन दोनों के बीच अब तक सिर्फ 'हाय-हेलो' वाली ही औपचारिक बातचीत हुई थी। रुपल ने मैरून कलर की सूट पहनी थी जिसपे डीप ग्रीन ओवरकोट पहना था। सिर पर हलकी हरे रंग की मफलर लपेटा हुआ था। ठण्ड के मारे उसका रंग गुलाबी हो गया था उसकी नाक हल्की सी लाल हो रही थी।
हरी भाई ने मिट्टी के दो कुल्हड़ आगे बढ़ा दिए। चाय इतनी गर्म थी कि कुल्हड़ पकड़ते ही दोनों की हथेलियों को एक मखमली गर्माहट का अहसास हुआ।
"उफ़! यह ठंड तो जान ले लेगी" रुपल ने कुल्हड़ से उठती भाप को अपने चेहरे की तरफ लेते हुए कहा।
तपन ने चाय की एक चुस्की ली और मुस्कुराया, "इस ठंड की बस यही एक अच्छी बात है। हल्की सी गर्माहट स्वर्ग का आभास देने लगती है और चाय अमृत जैसी लगती है।"
रुपल ने तपन के हाथ में दबे स्क्रिप्ट के पन्नों को देखा। "सुबह-सुबह डायलाग रटे जा रहे हैं? वैसे, वो तीसरे सीन की जो तुम्हारी लाइनें हैं ना... 'तुम जानती हो तुम मेरे लिए बनी हो। तुम ठहर क्यों नहीं जाती'... वो तुम बहुत जल्दी में बोल जाते हो।"
तपन चौंक गया। "अच्छा? तुम्हें ऐसा लगता है?"
"हां," रुपल ने अपने कुल्हड़ को दोनों हाथों से भींचते हुए कहा, "उस लाइन में एक ठहराव होना चाहिए। जैसे इस चाय को पीने में है। तुम भागते से जाते हो उस लाइन से।"
उस सुबह की चाय के बाद जैसे एक अनकहा सिलसिला शुरू हो गया। थियेटर की रिहर्सल नौ बजे शुरू होती थी, लेकिन कबीर और अहाना दोनों ही सवा आठ बजे मंडी हाउस के उस नुक्कड़ पर मिलने लगे।
वहां कोई रेस्टोरेंट वाली औपचारिकता नहीं थी, कोई महंगी कॉफी नहीं थी। बस मिट्टी के दो कुल्हड़ थे, सर्दियों की गुनगुनी धूप थी और दो दिल थे जो धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आ रहे थे।
बातें नाटक की स्क्रिप्ट से शुरू होतीं और धीरे-धीरे उनकी निजी जिंदगी के पन्नों तक पहुंच जातीं। रूपल को पता चला कि तपन को पुरानी गजलें पसंद हैं, और तपन ने जाना कि रूपल जब बहुत खुश या उदास होती है, तो बहुत तेज - तेज बोलती है।
"तुम्हें पता है तपन?" एक दिन रूपल ने अपनी चाय में डूबा हुआ बिस्कुट बचाते हुए कहा, "मुझे जिंदगी में चकाचौंध से ज्यादा यह सादगी पसंद है। एक गरम कुल्हड़ हाथ में हो, तो लगता है दुनिया की सारी खुशियां बस यहीं सिमट गई हैं। और हाँ, अगर कोई उस चाय में साथ देने वाला मिल जाये तो जैसे जिंदगी पूरी लगने लगती है।"
तपन उसे देखता रह गया। उसने मन ही मन सोचा, 'और मुझे उस कुल्हड़ को पकड़े हुए तुम पसंद हो। मैं हूँ वो साथ देने वाला जो तुम्हारे साथ जीवन भर चाय पीना चाहता है कि तुम खुद को मुकम्मल कर सको।'
लेकिन वह कह नहीं पाया।
लगभग डेढ़ महीने की रिहर्सल के बाद आखिरकार नाटक के मंचन का दिन आ गया। ऑडिटोरियम खचाखच भरा था। नाटक अपने आखिरी मोड़ पर था। मंच पर तपन और रूपल आमने-सामने थे।
नाटक की स्क्रिप्ट के मुताबिक, रूपल को तपन को छोड़कर दूर जाना था, और तपन को उसे रोकना था।
तपन आगे बढ़ा। उसने रूपल की आंखों में देखा। वहां स्टेज की लाइट्स की चमक थी, लेकिन तपन को उस चमक में भगवान् दास रोड के नुक्कड़ वाली रूपल दिखी - मफलर लपेटे, चाय की भाप के पीछे मुस्कुराती हुई।
तपन ने रूपल का हाथ थामा। इस बार उसके शब्दों में कोई जल्दबाजी नहीं थी। उसने पूरी शिद्दत और गहरे ठहराव के साथ अपनी वह अधूरी लाइन बोली:
"तुम जानती हो तुम मेरे लिए बनी हो। तुम ठहर क्यों नहीं जाती... मेरी क्यों नहीं हो जाती, जीवनभर के लिए तुम ठहर क्यों नहीं जाती..."
ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। नाटक खत्म हुआ, पर्दा गिरा। सबने दोनों की अदाकारी की जमकर तारीफ की।
नाटक के बाद, जब सब लोग बैकस्टेज पार्टी की तैयारी कर रहे थे, तपन चुपके से बाहर निकल आया। वह सीधा हरी भाई की दुकान पर गया। कुछ देर बाद रूपल भी अपना कॉस्ट्यूम बदले, वही पुराना मफलर डाले वहां पहुंच गई।
"तो... आखिरकार तुमने वह लाइन सही से बोल ही दी," रूपल ने आते ही कहा। "और वो improvisation क्या था! इन डेढ़ महीनों के रिहर्सल में तो ये लाइन कभी नहीं बोली गयी। स्क्रिप्ट में भी नहीं थी वो लाइन!" रूपल कुछ और भी जानना चाह रही थी।
"पता नहीं कहाँ से आई वो बाद की लाइन। बस बोल दिया।" तपन ने हरी भाई से चाय के दो कुल्हड़ लेते हुए कहा।
रूपल ने कुल्हड़ थामा। तपन ने गहरी सांस ली, अपने दिल की धड़कनों को संभाला और रूपल की आंखों में देखते हुए बोला, "रूपल... वह सिर्फ नाटक की लाइन नहीं थी। मैं सच में चाहता हूं कि तुम... मेरी जिंदगी में हमेशा के लिए ठहर जाओ।"
रूपल ने तपन को देखा। हवा में अदरक और इलायची की सोंधी महक घुली हुई थी। रूपल के चेहरे पर एक हया की खूबसूरत सी लाली दौड़ गई। उसने अपनी चाय की चुस्की ली, तपन के कुल्हड़ से अपना कुल्हड़ हल्का सा टकराया, Cheers बुदबुदाया और धीरे से कहा:
"चाय ठंडी हो रही है तपन... और मैं अब कहीं नहीं जा रही।"
शाम की उस कड़कती ठंड में, चाय के दो गर्म कुल्हड़ों के बीच, एक बेहद मासूम और सुलगते हुए प्रेम का सफर मुकम्मल हो चुका था।
- अमितेश
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