चेतना के इस तिमिर झंझावात में,
बुद्धि की नौका डगमगाती जब,
संदेह के घने मेघ अंबर में,
आस्था के दीप को बुझाते तब।
शिथिल पड़ जाते विकल प्राण,
दिशाएं सब मौन हो डसती हैं,
नियति की निष्ठुर, कुटिल रेखाएं,
विवशता पर मेरी हंसती हैं।
तब अंतर के सूने नभ में,
एक नीरव राग झंकृत होता,
मर्यादा का वह महासिंधु,
मेरे अवसाद के आंसू धोता।
न कोई काया, न कोई वाणी,
बस एक दिव्य स्पंदन जगता है,
जो कल तक था उलझन का मरुथल,
वह कल्पवृक्ष की छांव सा लगता है।
समीर का धीमा सा वह झोंका,
कह जाता है - धीर हमेशा धरना तुम।
पल्लव से टपकी ओस की बूंद,
कहती - भीतर शांत ही रहना तुम।
किरण जो चीरती घने तम को,
वह रघुवर का ही तो सांत्वन है,
जो बिखरी राह को सुगम कर दे,
वह प्रभु का ही कर - लोचन है।
अब द्वंद्व नहीं, ना कोई व्याकुलता,
हर उलझन उनकी करुणा का उपक्रम है।
जहां खो जाती हैं जगत की राहें,
वहीं से अनंत 'राम' का उद्ग्म है।
- अमितेश
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