सिद्धार्थ 35 साल का था। एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में मिडिल लेवल मैनेजर था। काफी नाम और पैसा कमा रहा था। जीवन में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। लेटेस्ट iPhone, महंगी कार, शहर के पॉश इलाके में 3 - BHK फ्लैट, महँगी क्लब मेम्बरशिप, वीकेंड पर गोल्फ खेलना, साल में दो बार solo trip पर देश विदेश में घूमना और इंस्टाग्राम पर "Living My Best Life" हैशटैग वाली तस्वीरें। सब कुछ तो था उसके पास। दुनिया की नजरों में सिद्धार्थ 'successful professional' था।
अक्सर रात 2 - 3 बजे, जब नींद नहीं आती, वो अपनी 30वें माले की फ्लैट से नीचे देखता। पूरा शहर जगमग जगमग करता लेकिन फिर भी सिद्धार्थ खुद में एक अंधेरापन ही महसूस करता। लगता सीने में एक अजीब सी घुटन हो रही हो। उन शांत रातों में भी सिद्धार्थ के अंदर में एक कोलाहल होता रहता। लगता वो आगे बढ़ने की होड़ में कुछ तो पीछे छोड़ता जा रहा है। सबकुछ हो है उसके पास, फिर भी अंदर से वो बिलकुल खाली है। उसे समझ नहीं आता कि वह भाग किस चीज के पीछे रहा है। फिर अगले दिन के काम याद आ जाते। लगता अभी लैपटॉप खोले और कल के काम में लग जाए। रातें ऐसे ही उहापोह में बीतती। कभी नींद आ जाती कभी हल्की नींद में ही रात कटती।
सिद्धार्थ रोबोट बन गया था सफलता के पीछे भागते भागते। जिंदगी नीरस हो गयी थी और दिन मैकेनिकल।
नए प्रोडक्ट लॉन्च की वजह से उसपर बहुत प्रेशर था। वो अपना सबकुछ इस प्रोजेक्ट पर लगा चूका था। कंपनी की उम्मीदें भी सिद्धार्थ से थोड़ी ज्यादा थी। ठीक प्रोडक्ट लॉन्च से पहले कुछ तो गलत हुआ और पूरा प्रोजेक्ट ही फेल हो गया। सिद्धार्थ अकेला उसको हेड कर रहा था। इस असफलता की सारी जिम्मेदारी उसपे आ गयी। बॉस सिद्धार्थ पर बुरी तरह चिल्लाया। बातें इस हद तक पहुँच गयी की बॉस ने सिद्धार्थ के professionalism पर ही सवाल उठा दिया। सिद्धार्थ अपनी गलतियों से भाग नहीं सकता था। उसे उस एक पल में लगा की उसकी सारी सफलता, सारा अनुभव बस मिथ्या ही है।
वो ऑफिस से थोड़ा जल्दी निकाल गया, अपनी गाड़ी निकाली और पता नहीं किस ओर चलने लगा। शहर की संकरी गलियों से बस अपनी गाड़ी निकाल रहा था। पूरी ख़ामोशी तिरी थी गाड़ी में। सिद्धार्थ अपने ख्यालों में था। आज पहली बार वो काम नहीं, खुद के बारे में सोच रहा था।
जाना कहाँ था पता नहीं, मंजिल क्या थी नहीं मालुम। जैसे जिंदगी गुजर रही थी वैसे ही अभी उसकी गाड़ी चल रही थी। कुछ घंटे ऐसे ही वो शहर की सड़कों पर गाड़ी चलती रही बिना किसी मंजिल की तलाश में। रास्ते में उसे "शर्मा टी स्टॉल" का बोर्ड दिखा। अनमने मन से सिद्धार्थ ने अपनी कार वही लगा दी। ये काफी मशहूर चाय की दूकान थी शहर की। अमूमन यहाँ रहती है। लेकिन इस वक़्त थोड़ा खाली रहता है यह दूकान। सिद्धार्थ बड़े ही अनमने मन से अपनी कार से निकला और वही एक खाली पड़ी बेंच पर बैठ गया।
"चाय पियोगे बाबू।" शर्मा जी ने चूल्हे के पास बैठे बैठे आवाज़ लगाई। सिद्धार्थ ने बस हामी में सिर हिलाया।
शर्मा जी खुद ही चाय ले कर आये। अभी उनकी दूकान में काम करने वाले सारे लड़के खाना खा रहे थे। चाय की कुल्हड़ सिद्धार्थ को देते हुए बोले, "सब ठीक है ना बाबू?" सिद्धार्थ की मनःस्थिति उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। उस एक अपनापन भरी बात ने उसकी आंखों में आँसू भर दिया। वो फूट - फूट कर रो पड़ा। शर्मा जी ने उसके कंधे पर हल्के हाथ रखा। इस एक स्पर्श ने जैसे उसके अंदर के बच्चे को जगा दिया था। "काका मैं थक गया हूँ। दिन रात भाग रहा हूँ, पर लगता है मैं पीछे छूटता जा रहा हूँ। एक पल को लगता की पतंग सी ऊँची उड़ान भर रहा हूँ, आसमान से बात कर रहा हूँ, और दूसरे पल आभास होता की मेरी डोर तो कब की कटी हुई है और मैं ऐसे ही बेवजह उड़ रहा हूँ, शायद कुछ समय में मैं जमीन पर आ गिरूं। क्या फायदा ऐसी जिंदगी का?" अपने सारे विषाद सिद्धार्थ ना जाने क्यों शर्मा जी के सामने निकाल रहा था।
शर्मा जी ने अपनी हाथ के दबाव को उसके कंधे पर थोड़ा बढ़ाते हुए दूसरे हाथ से पकड़ी चाय की कुल्हड़ उसे दे कर बोले, "बेटा, मुझे नहीं मालुम तुम इस समय किस दौर से गुजर रहे हो? पहले तो ये चाय पियो, ये तुम्हारी मन की थकान को थोड़ा सम्हालेगा। और रही बात जिंदगी की तो ये तो तुम्हे ईश्वर ने उपहार में दिया है। कुछ फायदा ऊपर वाले ने देखा होगा तभी तो तुम्हे यह जीवन मिला है। बस यही सवाल खुद से पूछो की क्या जीवन के उस फायदे को तुम समझ भी पा रहे हो या नहीं। तुम ज़िन्दगी काट रहे हो या जी रहे हो ये तो तुम्हे ही सोचना होगा।"
शर्मा जी की चाय और शर्मा जी की बातें जैसे सिद्धार्थ के लिए pain killer का काम कर गयी। थोड़ी देर के लिए वो अपने आप में आ गया था।
शर्मा जी ने थोड़ी सुक़ूनियत उसके चेहरे पर देखी। वो बोले, "बेटा अपने काम से थोड़ा छुट्टी लो। खुद के लिए समय निकालो। खुद से बातें करो। ढूंढो क्या गलत हो रहा है, क्या गलत हो गया है। कैसे वो ठीक होगा। बात बन जाएगी। दौड़ना महत्वपूर्ण नहीं है, कहीं पहुंचना जरुरी है। ढूंढो कहाँ पहुंचना चाहते हो। सब ठीक हो जायेगा। तुम सब ठीक कर लोगे। खुद पर और उसपर भरोसा रखो।" बोलते हुए शर्मा जी ने ऊपर की ओर देखा।
सिद्धार्थ शर्मा जी की बात सुन रहा था या नहीं, वो खुद से जरूर बात कर रहा था उन चाय की घूंटों के साथ।
"काका, एक और चाय मिलेगी क्या?"
"बिलकुल मिलेगी बेटा।" बोलते बोलते शर्मा जी चले गए एक और चाय लाने।
माहौल खुशनुमा हो गया था उस टी स्टॉल का। शर्मा जी के चेहरे पर वो सुकून साफ़ झलक रहा था। सिद्धार्थ इन पंद्रह मिनट की बातों और चाय के दो प्यालों में कुछ और खुद में आ गया था।
सिद्धार्थ समझ गया था की इस Rat Race में भागने का कोई मतलब नहीं है। वो अपने खुद के pressure में आ गया था। उसे अब एक ठहराव की जरुरत थी कि खुद को समेट सके। उसे घर जाना है, घर जहाँ उसके मम्मी पापा हैं, अरसा हो गया है उनसे मिले हुए। बाकी ये जो हुआ है कंपनी में उसे तो वो जल्द ही सही कर लेगा। इतना तो वो जानता ही है।
सिद्धार्थ बेंच से उठा, अपनी कार में बैठा और निकल पड़ा। वो इस दफा अपनी मंजिल जानता था। बस गाड़ी उसी मंजिल की ओर मोड़ दी।
- अमितेश
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