उंगली पकड़कर चलना सीखा, अब खुद दौड़ लगाता हूँ,
हज़ार उलझने जीवन की अब खुद ही सुलझा लेता हूँ।
वो जो छोटी सी चोट पे रोता था, अब दर्द छुपाना सीख लिया,
भीतर चाहे तूफान उठे, पर बाहर मुस्कुराना सीख लिया।
कंधों पर अब घर का बोझ, उठाना भी मुझे आ गया,
देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ आ गया।
आपकी कमीज़ें अब मेरे बदन पर फिट आने लगी हैं,
दुनिया की कड़वी बातें भी अब मुझको भाने लगी हैं।
कल तक जो बातें आपकी, मुझको लगती थी पाबंदी,
आज समझ में आता, क्यों की थी आपने वो नाकाबंदी।
हवाओं के रुख को मोड़ सकूँ, इतना हुनर मुझमें आ गया,
देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ आ गया।
धूप में जलकर काम करूँ तो आपकी मेहनत दिखती है,
यह मतलबी दुनिया है, यहाँ हर चीज़ की कीमत दिखती है।
पैसे कमाने की दौड़ में जब पांव मेरे थक जाते हैं,
तब आपके फटे हुए पुराने जूते याद आ जाते हैं।
कि कैसे आपने सब सहा, ये अहसास रगों में समा गया,
देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ अब आ गया।
जिद तो अब भी करता हूँ, पर खुद से ही लड़ जाता हूँ,
शाम को जब घर लौटता हूँ, और ज़िम्मेदार बन जाता हूँ।
कद मेरा बढ़ गया आपसे, पर साया आपका ही चाहिए,
इस मतलबी सी दुनिया में पापा, सहारा आपका ही चाहिए।
बचपन पीछे छूट गया, मैं वक्त की धूल में नहा गया,
देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ आ गया।
पर सच कहूँ तो आज भी, वो बच्चा दिल में बाकी है,
आपकी एक शाबाशी मिल जाए, बस इतना ही काफी है।
भले ही दुनिया की नज़रों में, मैं ऊँचे मकाम पर खड़ा हूँ,
पर आपके सामने छोटा रहूँ, तो ही सच में बड़ा हूँ।
ज़िंदगी के इस सफ़र में, मैं अब खुद एक रास्ता पा गया,
देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ अब आ गया।
- अमितेश
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