मंगलवार, 9 जून 2026

वियोग

उठ चला चरण, छू अवध-धूल,

रो पड़ी चेतना, मुरझाईं कुल;

दृग-कोर खुले, फूटी सावन,

बह चली तमस की एक पवन।


लोचन-मद से घुल मिला सघन,

अंजन का वह श्यामल सावन;

गंगा-यमुना का श्वेत हास,

बन गया आज कज्जल-विलास!


वह बह निकली अविरल धारा,

जिसमें डूबा साकेत सारा;

थी सरयू निर्मल, शांत, शुचि,

पर पा न सकी अपनी मरुचि।


मूर्छित तरंग, कंपित विहान,

काली लहरों का हुआ गान;

सरयू में मिलकर कृष्ण-धार,

बन गई शोक का हाहाकार!


यह तिमिर-सिंधु का पैरहन,

लो, लील रहा भू का स्पंदन;

पल्लव-पल्लव पर विषाद-राग,

धरती पर सोई आज आग।


थी विकल धरा, व्याकुल गगन,

घुट घुट रोता था कण-कण मन;

इस महा-शोक की कालिमा से,

संसार हुआ ज्यों तमस-मगन!


रजनी का क्रंदन फैला अनंत,

हे राम! तुम्हारा यह कैसा वसंत?

भू काली, अंबर काल-रूप,

छाया विराग का महा-कूप!


वह चली धार साकेत छोड़,

अंबर का कज्जल-मुँह मरोड़;

थी चली जहाँ राघव-चरण-धूल,

पर विकल हुए गिरिवर के शूल!


थी विकल धरा, व्याकुल गगन,

घुट घुट रोता था कण-कण मन;

इस महा-शोक की कालिमा से,

संसार हुआ ज्यों तमस-मगन! 



लो, चित्रकूट का हरित-हास,

क्षण भर को भूल गया विकास;

निर्झर के स्वर में थमा गान,

तरु-तरु ने तज दिया दिव्य तान!


मंदाकिनी की वह स्वच्छ धार,

श्यामल विषाद का बनी हार;

पायस्वनी का कंचन शरीर,

शोक की कालिमा से हुआ अधीर!


गिरि-शृंगों पर जो धूप-केश,

पहने थे स्वर्णभ अमित वेश;

उन पर भी बिखरा अंजन-शोक,

धुंधला सा दीखा सिद्ध-लोक!


काले तरु की कातर पुकार,

जैसे विलाप की हो कतार;

पशु-पक्षी का थमता विहंग,

छू गया तमस का क्रूर ढंग!


कण-कण में व्यापे राम-नेह,

पर विरह-बाण से विद्ध देह;

चित्रकूट भी अवध-शोक से,

घिर गया तनिक परलोक से!


थी विकल धरा, व्याकुल गगन,

घुट घुट रोता था कण-कण मन;

इस महा-शोक की कालिमा से,

संसार हुआ ज्यों तमस-मगन! 


वह व्याकुल जन का महा-नाद,

ले चला साथ सृस्टि - विषाद;

'हा राम! लौट आओ' पुकार,

नभ को देती शायक की मार!


हर कंठ बना था करुण राग,

उर में सुलगती विरह-आग;

क्या वृद्ध, युवा, क्या विवश बाल,

सब झेल रहे थे वज्र-काल!


चिल्ला उठी अवध की धरा,

उन्नत मस्तक, भय से भरा;

फैली बाहें नीले अनंत,

लौटा दो हमारा वह वसंत!


आँखों में नीर, है मन अधीर,

अंबर से टकराता शरीर;

शून्यत्व चीरती जैसे वह पुकार,

जैसे विलाप का वहां हो ज्वार!


हे देव! सुनो यह आर्त-दान,

क्यों रूठ गया हमसे विहान?

तज कर साकेत का राज-वेश,

क्यों चला गया वह प्राण-ईश?


थी विकल धरा, व्याकुल गगन,

घुट घुट रोता था कण-कण मन;

इस महा-शोक की कालिमा से,

संसार हुआ ज्यों तमस-मगन! 


- अमितेश 


# मरुचि - कान्तिहीनता 

# पैरहन - पोशाक (फ़ारसी)

# पायस्वनी - मन्दाकिनी नदी का प्रर्यायवाची 

# शायक - बाण / तीर 

# मही - पृथ्वी / धरा 


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