उठ चला चरण, छू अवध-धूल,
रो पड़ी चेतना, मुरझाईं कुल;
दृग-कोर खुले, फूटी सावन,
बह चली तमस की एक पवन।
लोचन-मद से घुल मिला सघन,
अंजन का वह श्यामल सावन;
गंगा-यमुना का श्वेत हास,
बन गया आज कज्जल-विलास!
वह बह निकली अविरल धारा,
जिसमें डूबा साकेत सारा;
थी सरयू निर्मल, शांत, शुचि,
पर पा न सकी अपनी मरुचि।
मूर्छित तरंग, कंपित विहान,
काली लहरों का हुआ गान;
सरयू में मिलकर कृष्ण-धार,
बन गई शोक का हाहाकार!
यह तिमिर-सिंधु का पैरहन,
लो, लील रहा भू का स्पंदन;
पल्लव-पल्लव पर विषाद-राग,
धरती पर सोई आज आग।
थी विकल धरा, व्याकुल गगन,
घुट घुट रोता था कण-कण मन;
इस महा-शोक की कालिमा से,
संसार हुआ ज्यों तमस-मगन!
रजनी का क्रंदन फैला अनंत,
हे राम! तुम्हारा यह कैसा वसंत?
भू काली, अंबर काल-रूप,
छाया विराग का महा-कूप!
वह चली धार साकेत छोड़,
अंबर का कज्जल-मुँह मरोड़;
थी चली जहाँ राघव-चरण-धूल,
पर विकल हुए गिरिवर के शूल!
थी विकल धरा, व्याकुल गगन,
घुट घुट रोता था कण-कण मन;
इस महा-शोक की कालिमा से,
संसार हुआ ज्यों तमस-मगन!
लो, चित्रकूट का हरित-हास,
क्षण भर को भूल गया विकास;
निर्झर के स्वर में थमा गान,
तरु-तरु ने तज दिया दिव्य तान!
मंदाकिनी की वह स्वच्छ धार,
श्यामल विषाद का बनी हार;
पायस्वनी का कंचन शरीर,
शोक की कालिमा से हुआ अधीर!
गिरि-शृंगों पर जो धूप-केश,
पहने थे स्वर्णभ अमित वेश;
उन पर भी बिखरा अंजन-शोक,
धुंधला सा दीखा सिद्ध-लोक!
काले तरु की कातर पुकार,
जैसे विलाप की हो कतार;
पशु-पक्षी का थमता विहंग,
छू गया तमस का क्रूर ढंग!
कण-कण में व्यापे राम-नेह,
पर विरह-बाण से विद्ध देह;
चित्रकूट भी अवध-शोक से,
घिर गया तनिक परलोक से!
थी विकल धरा, व्याकुल गगन,
घुट घुट रोता था कण-कण मन;
इस महा-शोक की कालिमा से,
संसार हुआ ज्यों तमस-मगन!
वह व्याकुल जन का महा-नाद,
ले चला साथ सृस्टि - विषाद;
'हा राम! लौट आओ' पुकार,
नभ को देती शायक की मार!
हर कंठ बना था करुण राग,
उर में सुलगती विरह-आग;
क्या वृद्ध, युवा, क्या विवश बाल,
सब झेल रहे थे वज्र-काल!
चिल्ला उठी अवध की धरा,
उन्नत मस्तक, भय से भरा;
फैली बाहें नीले अनंत,
लौटा दो हमारा वह वसंत!
आँखों में नीर, है मन अधीर,
अंबर से टकराता शरीर;
शून्यत्व चीरती जैसे वह पुकार,
जैसे विलाप का वहां हो ज्वार!
हे देव! सुनो यह आर्त-दान,
क्यों रूठ गया हमसे विहान?
तज कर साकेत का राज-वेश,
क्यों चला गया वह प्राण-ईश?
थी विकल धरा, व्याकुल गगन,
घुट घुट रोता था कण-कण मन;
इस महा-शोक की कालिमा से,
संसार हुआ ज्यों तमस-मगन!
- अमितेश
# मरुचि - कान्तिहीनता
# पैरहन - पोशाक (फ़ारसी)
# पायस्वनी - मन्दाकिनी नदी का प्रर्यायवाची
# शायक - बाण / तीर
# मही - पृथ्वी / धरा
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