शुक्रवार, 12 जून 2026

विरक्ति

गंगा की लहरों पर बहती, एक ठंडी, निश्छल रात है,

सामने मणिकर्णिका पर सजती, इंसानी औकात है।

लपटें अंबर को छूती हैं, लाल-नारंगी साया है,

ये जलता हुआ शरीर नहीं, जलती हुई एक माया है।


एक चिता पर यौवन जलता, एक पे बूढ़ा बचपन है,

जिस तन पर कल तक नाज़ था, आज वो केवल ईंधन है।

धुएँ के हर एक कतरे में, कोई सपना रूठ रहा,

संसार का सबसे पक्का, हर एक धागा टूट रहा।


क्यों दौड़ रहा था जीवन भर? क्या खोया और क्या पाया है?

मुट्ठी खाली ही आई थी, मुट्ठी खाली ही जाना है।

ये नाम, ये रुतबा, ये कोठी, सब माटी का एक ढेरा है,

जिसे तू अपना कहता था, वो केवल रैन-बसेरा है।

 

देखते-देखते इस सच को, मन भीतर से टूट गया,

जो मोह था इस झूठी जग से, पल भर में वो छूट गया।

लगा कि मैं भी राख ही हूँ, बस थोड़ा सा ठहरना है,

इसी आग की आग़ोश में, एक रोज़ मुझे भी मरना है।


तभी, एक चिता की तपिश ने मुझको दूर से छुआ था,

विरक्ति के उस सन्नाटे में, एक गहरा जुड़ाव हुआ था। 


यह राख जो उड़कर बहती है, इस मिट्टी का ही हिस्सा है,

मैं अलग कहाँ हूँ इस जग से? यह मेरा भी तो किस्सा है!

ये रोते हुए जो लोग खड़े, इनके भीतर भी मैं ही हूँ,

जो जलकर राख हुआ इस पल, उस मंज़र में भी मैं ही हूँ।


दुख-सुख का ये ताना-बाना, हम सबको एक बनाता है,

मरने वाले से भी गहरा, जीने का एक नाता है।

जुड़ाव विरक्ति से जुदा नहीं, दोनों ही एक स्वरुप हैं,

जो खोने के डर से मुक्त हुआ, वो ही तो प्रेम का रूप है।


मणिकर्णिका की आग ने, मुझको मुझसे ही मिलवाया है,

जीने की असली कीमत को, मरते जीवन ने सिखाया है।


- अमितेश 

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