गुरुवार, 14 मई 2026

टूटा नहीं हूँ

मेरे चारो ओर बिखरे पड़े हैं, 

मेरी ही उम्मीदों के कांच के टुकड़े,

हवाओं ने बड़ी शिद्दत से कोशिश की,

मुझे जड़ों से उखाड़ फेकनें की। 


जिंदगी की इस भारी उठा पटक में, 

मैं थोड़ा झुक जरूर गया हूँ,

थकान के बोझ तले दबे पांवों से 

राह चलते रुक ज़रूर गया हूँ। 


लोग कहते हैं, मैं बिखर गया,

उन्हें मेरी ख़ामोशी में हार सुनाई दी है,

पर उन्हें क्या पता इन प्रतिकूलता में 

मैंने खुद को फिर से पिरोने की कोशिश की है। 


हाँ, मैं थोड़ा सा चूक गया हूँ,

समय की रफ़्तार में पीछे छूट गया हूँ,

पर मेरी रूह की धड़कन अभी बाकी है,

मेरे हौसलों की अगन अभी बाकी है। 


मुझे अभी और चलना है,

खुद को खुद में फिर से ढालना है,

मैं अभी चूका हूँ, शायद थोड़ा थका भी हूँ,

अभी तो निखरना बाकी है, मैं अभी टूटा नहीं हूँ। 


वक़्त ने तोड़ा मुझे तो क्या हुआ?

समय ने फिर तराशा है मुझे,

जिससे चोट खा कर बिखर गया था,

उसी चोट ने मूरत सुन्दर बनाया है मुझे। 


ज़िन्दगी की राह में रोड़े बहुत थे,

मैं लड़खड़ाया जरूर हूँ,

हवाओं के शुष्क थपेड़ों में भी 

थोड़ा झुक कर संभला जरूर हूँ। 


मेरे लड़खड़ाने को मेरा गिरना ना समझ लेना 

ये तो मेरे सीखने की एक कला है 

एक कलाकार का अपने ही सांचे को 

फिर से ढालने का हौसला है। 


अभी तो कई दौड़ बाकी हैं,

अभी उड़ान का असली इम्तहान बाकी है 

रास्ता मुश्किल है, मगर मंज़िल का यकीन है मुझे 

मैं आज लड़खड़ाया भर हूँ, मैं अभी गिरा नहीं हूँ। 


- अमितेश 

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