कल जो उसने चाँद तोड़ कर लाने की ज़िद की,
मैं एक आईना उसके मानिंद रख आया।
वो पूछती थी कैसी दिखती हूँ मैं वस्ल में,
मैं उसकी लब पे अपनी लब का पैबंद रख आया।
उसे शिकायत थी कि रात भर जागती हूँ मैं,
मैं उसकी आँखों में अपनी ख़्वाब का कंद रख आया।
सिमट के आ गयी ज़मीं पे सारी महक उसकी,
मैं उसकी ज़ुल्फ़ में फूलों का गुलकंद रख आया।
कहाँ वो चाँद का टुकड़ा, कहाँ ये हुस्न उसका,
मैं आज जीत के बाजी वो परचंड रख आया।
वो मांगता था वफ़ा की कोई बड़ी दलील,
मैं उसके हाथ में अपना सौगंध रख आया।
# वस्ल - मिलन
# कंद - मिश्री / मिठास
# परचंड - बड़ी जीत
# गुलकंद - महकती हुई मिठास
- अमितेश
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