राघव अपने कमरे की बालकनी में बैठा हुआ था। हाथ में लैपटॉप था, लेकिन ध्यान स्क्रीन पर नहीं, बल्कि सामने की दीवार पर था। पिछले कुछ महीनों से उसके और उसकी पत्नी, अंजलि के बीच बातचीत जैसे खत्म ही हो गई थी। ऐसा लगने लगा था जैसे वो दोनों अपने रिश्ते की आखिरी पड़ाव पर हों। शायद ये ज्यादा ना चले अब। छोटी छोटी बातें भी बतंगड़ बन जा रही थी। दोनों ही किसी भी बात को नज़रअंदाज़ करने के मूड में नहीं होते थे।
दोनों एक ही घर में रहते थे, लेकिन दो अलग-अलग द्वीपों की तरह। ऑफिस का तनाव, आगे बढ़ने की होड़ और रोज़मर्रा की भागदौड़ ने उनके बीच एक खामोश दीवार खड़ी कर दी थी। अब बस निभ रही थी। कब तक निभेगी पता नहीं। दोनों ही जैसे पति पत्नी होने का किरदार अदा कर रहे हो जैसे। जो कोई एक दूसरे की मदद भी करता तो एक्टिंग लगती। भाव मरते जा रहे थे दोनों के बीच। एक ही बेड पर सोते पर एक दूसरे की ओर पीठ कर के।
अंजलि रसोई में थी। शाम के छह बज रहे थे। वह जानती थी कि राघव के सिर में दर्द है, और इस वक्त उसे किसी दवा से ज़्यादा एक कप कड़क चाय की ज़रूरत है।
अंजलि ने गैस पर सस्पेन चढ़ाया। पानी उबलने लगा। उसने उसमें चायपत्ती, थोड़ी सी चीनी और कूटकर अदरक डाली। अदरक की वो चिरपरिचित खुशबू पूरे घर में फैलने लगी। यह वही खुशबू थी, जिसने कभी उनके नए-नवेले रिश्ते में मिठास घोली थी।
चाय उबल रही थी और अंजलि की आँखों में पुरानी यादें तैर रही थीं। उसे याद आया जब वे दोनों कॉलेज में थे। टपरी की वो ₹5 वाली चाय, जिसे वो दोनों एक ही कुल्हड़ में शेयर करते थे। बारिश के दिनों में राघव का भीगते हुए सिर्फ इसलिए आना कि वे साथ में चाय पी सकें।
"चाय सिर्फ एक ड्रिंक नहीं है अंजलि, यह दिल की बात कहने का एक बहाना है," राघव अक्सर कहा करता था। कितना पसंद था उसे चाय पीना। वो चाय पीता नहीं था लगता एन्जॉय करता था। कहता, "अंजलि, चाय महज एक चाय नहीं, एक पूरी feeling है। इसे पियोगे तो मजा नहीं देगी, इसे किसी के साथ पियोगे तो ज्यादा स्वाद लगेगा, चाय का ही नहीं, ज़िन्दगी का भी।"
अंजलि इस बेमतलब की philosophy पर एक ठंडी मुस्कान देती और बोलती, "चाय पीने वालों को बस बहाना चाहिए। क्या ही बेमतलब की philosophy है। मेरे लिए चाय बस तुम्हारा साथ है। जब तुम्हारे साथ चाय पीती हूँ तो तुम्हारे ज्याद पास महसूस करती हूँ अपने आप को।"
पर आज? आज दोनों के पास महँगी से महँगी जगह पर चाय पीने के पैसे थे, लेकिन साथ बैठकर बात करने का वक्त नहीं था।
अंजलि ने चाय छानी। दो कप। उसने ट्रे उठाई और भारी कदमों से बालकनी की तरफ बढ़ी।
राघव ने सिर उठाकर देखा। अंजलि ने बिना कुछ बोले एक कप उसकी तरफ बढ़ा दिया। राघव ने कप थामा। चाय गर्म थी, बिल्कुल वैसी ही जैसी उसे पसंद थी—कम चीनी, तेज़ पत्ती और अदरक का तीखापन।
राघव ने पहला घूंट लिया। चाय के उस गर्माहट भरे घूंट ने जैसे उसके भीतर जमी बर्फ को पिघला दिया। उसने अंजलि की तरफ देखा, उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, जो शायद उसकी अनदेखी और थकान की गवाही दे रहे थे।
"चाय बहुत अच्छी बनी है," राघव की आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था।
अंजलि ने अपनी चाय का कप होठों से लगाया, "तुम्हारे सिर में दर्द था ना, इसलिए थोड़ी कड़क बनाई।"
दोनों चुप थे, लेकिन यह वो दम घोटने वाली खामोशी नहीं थी। इस खामोशी में चाय की भाप के साथ दोनों के दिल के जज्बात बह रहे थे।
राघव ने लैपटॉप बंद करके साइड में रखा। उसने अंजलि का हाथ थामा, जो कप को पकड़े रहने के बावजूद थोड़ा ठंडा था।
"आई एम सॉरी अंजलि," राघव ने धीरे से कहा। "मैं काम में इतना उलझ गया कि यह भूल ही गया कि इस चाय का स्वाद तुम्हारे साथ के बिना अधूरा है।"
अंजलि ने राघव की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक आँसू तैर गया, जो मुस्कुराते ही गालों पर ढलक गया। उसने राघव के कंधे पर अपना सिर रख दिया। अपनी आवाज पर थोड़ा काबू पा कर बोली, "आई एम सॉरी राघव। गलती मेरी भी है। मैंने भी कभी तुम्हे समझने की कोशिश नहीं की। हमेशा वही कॉलेज वाला राघव ढूंढ़ती रहती तुममे। जो नहीं मिलता तो तुम्हारे प्रति कुंठा से भर जाती। मैं समझ चुकी हूँ अब की मैं तुम्हारे बिना शायद नहीं रह सकती।"
शाम ढल रही थी, आसमान में परिंदे अपने घरों को लौट रहे थे, और बालकनी में रखे उन दो कपों से उठती हुई चाय की भाप, दो अजनबियों को फिर से एक कर रही थी।
कभी-कभी जिंदगी की बड़ी से बड़ी उलझनें, चाय के एक छोटे से प्याले और थोड़े से वक्त और थोड़ी बातों से सुलझ जाती हैं।
- अमितेश
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