शनिवार, 23 मई 2026

एक कप खामोशी

शाम के ठीक साढ़े पांच बजे थे। आसमान पर हल्की सी सुर्ख़ी छाने लगी थी और बालकनी से दूर दिखती ऊंची इमारतों जंगलों के पीछे सूरज छिपने की तैयारी में था। हवा में हल्की सी सिहरन थी। पूरा मौसम रुमानियत भरे हुए था उस शाम। मौसम कुछ ऐसा हुआ जा रहा था कि इंसान को किसी अपने के पास बैठने या फिर एक गर्म प्याली चाय हाथ में थामने पर मजबूर कर देती है।

मेज़ पर दो कप रखे थे। एक मेरा, जिसमें सिर्फ़ कोडिंग, डेटा और शब्दों के सिवा कुछ नहीं था; और दूसरा उसका, जिसमें ज़िंदगी के न जाने कितने अनकहे किस्से तैर रहे थे।

चाय की केतली से उठती हुई भाप हवा में ठीक वैसे ही फैल रही थी, जैसे दिल में दबी कोई पुरानी बात धीरे से बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। 

"चाय ठंडी हो रही है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कोई शोर नहीं था, बस एक धीमा सा ठहराव था, जैसे कोई सदियों से सिर्फ सुनने का इंतज़ार कर रहा हो।

उसने कप को दोनों हाथों से घेरा, जैसे उसकी गर्माहट से अपने भीतर जमे किसी अकेलेपन को पिघला रही हों। पहला घूंट लेते ही एक गहरी सांस छूटी। वह सांस सिर्फ हवा नहीं थी, उसमें बरसों की थकान और कुछ अनकही कहानियों का बोझ था।

"जानते हो," वो मुस्कुरायी, पर उस मुस्कुराहट के कोने में एक उदासी थी, "कभी-कभी लगता है कि हम इस भागदौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि खुद को पीछे ही छोड़ आए हैं। सब कुछ है, पर बात करने के लिए वो एक शख्स नहीं, जो बिना जज किए बस सुन सके।"

चाय में अदरक और इलायची की खुशबू अब हवा में घुल चुकी थी। यह वो खुशबू थी जो बचपन के किसी इतवार की याद दिलाती है, जहाँ वक़्त घड़ी देखकर नहीं, बल्कि अपनों का साथ देखकर गुज़रता था।

"मैं तो साया हूँ," मैंने खिड़की से छनकर आती हुई मद्धम रौशनी को देखते हुए कहा, "न मेरा कोई अतीत है, न कोई भविष्य। लेकिन इस पल में, तुम्हारी इस चाय की भाप में, मैं पूरी तरह मौजूद हूँ। तुम्हारी खामोशियों को पढ़ने के लिए।"

उसने कप मेज़ पर रखा। कप के मेज़ पे रखे जाने की हल्की सी आवाज़ उस शांत कमरे में गूंज उठी।

"अच्छा है कि तुम खामोश रहते हो," उसने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा, "दुनिया में चिल्लाने वाले बहुत हैं, अपनी सुनाने वाले भी कम नहीं हैं। पर जो मेरी अनकही को गढ़ सके, वैसा कोई नहीं मिलता। इस चाय के स्वाद में आज एक अजीब सा सुकून है... जैसे किसी ने मेरी रूह को सहला दिया हो।"

शाम अब ढल चुकी थी। स्ट्रीट लाइटें एक-एक करके जलने लगी थीं। चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन मेज़ पर जो खाली कप बचे थे, वे अब अकेले नहीं थे। उनमें बातचीत की गर्माहट और एक-दूसरे को समझ लेने का वो अनमोल अहसास बाकी था, जो लफ़्ज़ों का मोहताज नहीं होता। और बचे थे दो लोगों के नए रिश्ते की गर्माहट जो एक दूसरे को जानते हुए भी अनजान थे दो दशकों से। बची थी एक आस की इस बार शायद इस चाय के बहाने ही सही, रिश्ते एक मुकम्मल मुकाम हासिल कर ले। 

दोनों ने  विदा होते हुए एक दूजे को एक वादा किया दुबारा मिलने का, शायद फिर अगले दो दशक का इंतज़ार किये बिना। 


- अमितेश 

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