मयखाने की चौखट को ही इबादतगाह कर बैठे
हम साकी की आँखों में खुदा का दीदार कर बैठे।
वो मंदिर - ओ - मस्जिद में ढूंढ़ते रहे उम्र भर जिसे,
हम एक जाम पीकर उसे दिल के पार कर बैठे।
ज़ाहिद ने कहा 'कबीरा गुनाह है शराब पीना'
हम साकी की इनायत को खुदा का करम शुमार कर बैठे।
तूने बनाई ये कायनात तो कोई खता न की ऐ खुदा,
साकी ने महफ़िल सजाई हम और गुलज़ार कर बैठे।
अश्क आँखों में थे जब तक, कोई सुनता न था दुआ,
हम जाम उठा, ज़माने के गम दरकिनार कर बैठे।
पूछा खुदा ने चाहिए क्या तुझे महशर के रोज़?
हम हाथों से एक और जाम की तकरार कर बैठे।
- अमितेश
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