मंगलवार, 26 मई 2026

एक कप अकेलापन

आनंद बाबू के लिए ये रोज का नियम था। आज कोई अलग दिन नहीं था। वो अपनी छड़ी टेकते हुए सोसाइटी के बाहर वाले पार्क पर खाली पड़े लकड़ी की बेंच पर बैठ जाते। यह उनके रोज का नियम था, रोज शाम 5 बजे आते और 7 बजे तक वहां बैठे रहते। इस बेंच के ठीक सामने सड़क के उस पार शास्त्री जी की चाय की दूकान थे। कभी कभी शास्त्री जी से बात हो जाती जब वो चाय बनाते बनाते वहीं से आवाज लगते, "आनंद बाबू, चाय पिएंगे?", "बच्चे कैसे हैं?", "आपका स्वस्थ्य ठीक है ना?" ऐसे ही कुछ शब्दों या एक दो वाक्यों में दोनों के बीच बातें हो जाती।  

शास्त्री जी भी करीब करीब उनकी ही उम्र के थे, उम्र के उस पड़ाव पर जब सारे बच्चे अपने अपने काम में लग गए है और अब एक एकांकीपन आ गया है जीवन में। आनंद बाबू 70 वर्ष के थे और उनका एक ही लड़का है जो अब न्यूयोर्क में सेटल हो गया है। हफ्ते में एक दो बार उसका फ़ोन आता और दो एक मिनट की बातें होती। बाते भी "हाऊ आर यू, आप ठीक हैं ना, कोई प्रॉब्लम तो नहीं है" तक ही सीमित रहती। अब वो कैसे बताएं की फ़ोन पर बात करना ठीक है लेकिन साल में एक बार आ जाये तो और भी बेहतर हो जाये। वैसे भी पत्नी के देहांत के बाद जैसे घर काटने को दौड़ता था। उनके बेटे ने कई बार बोला था की वो भी न्यूयोर्क आ जाएं और उनके साथ ही रहें। सारे कागज़ात की जरूरतें वो देख लेगा, लेकिन ये आनंद बाबू की जिद थी की जब पूरी ज़िन्दगी हिंदुस्तान में बितायी है तो अब जीवन के आखरी पड़ाव में यहाँ की मिट्टी नहीं छोड़ना। यहीं की मिट्टी में मिल जाना है। सेना से सेवानिवृत थे तो अपना ध्यान रखना उन्हें आता था। बाकी कभी कभी आर्मी रेजिमेंट में चले जाते तो थोड़ी बहुत इज्जत मिल जाती। पेंशन का इतना पैसा आ जाता था की आज भी अपने बेटे पर आश्रित नहीं थे। कुल मिला कर ज़िन्दगी ऐसे ही कट रही थे। 


आज भी आनंद बाबू अपने रोज के नियम के अनुसार ठीक 5 बजे उसी बेंच पर बैठे हुए थे। शास्त्री जी की चाय की दूकान से इलायची, अदरक, दालचीनी और ना जाने कौन कौन से मसाले से बने चाय की तेज खुशूब सड़क के इस पार आनंद बाबू तक आ रही थी। कभी कभी लगता की चलो एक कप चाय मंगा ही ले फिर लगता चाय अकेले पीना अपने अकेलेपन को सरेआम स्वीकार करने जैसा है। वो यही नहीं करना चाहते थे।  

वो अपने ख्यालों में ही थे। आसपास के लोगों को देख रहे थे, पर ध्यान नहीं दे रहे थे। उनका पूरा ध्यान अपने ही ख्यालों में था। तभी एक 65 - 70 बरस की एक महिला दिखी। हलकी लाल बॉर्डर वाली सफ़ेद सूती साड़ी पहने हुए थी और आँखों पर चश्मा था। सीधी चल रही थी और उनके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था। वो थी सुदेशना जी जो अभी हाल ही में अपनी बेटी के यहाँ रहने आई थी। आसपास कोई बेंच नहीं था और आनंद बाबू बेंच के एक किनारे पर बैठे थी, सो काफी जगह बची थी उस बेंच पर। सुदेशना जी उसी बेंच पर एक किनारे बैठ गयी। एक हल्की सी मुस्कान दोनों ने एक दूसरे को दी जब क्षणिक नजर एक दूसरे पर पड़ी। 

शास्त्री जी ने दो एक मिनट में अपने दुकान में काम करने वाले लड़के को उस बेंच की तरफ भेजा, 2 कप और चाय की केतली के साथ। लड़का आनंद बाबू के पास आया और बोला , "बाऊजी चाय निकलू?"

आनंद बाबू ने चश्मा ठीक करते हुए बोला, "हाँ, दे दो। बहन जी से भी पूछ लो अगर वो चाय पियें तो।" कहते हुए उन्होंने सुदेशना जी की ओर इशारा किया। 

सुदेशना जी ने मुस्कराते हुए कहा, "हाँ हाँ दे दो। और भाईसाहब चाय के पैसे मैं दूंगी।" कहते हुए वो अपने छोटे पर्स से पैसे निकलने लगी। दूसरे तरफ से शास्त्रीजी ये सब देख रहे थे। वहीं से बोले, "अरे आपलोग आज चाय मेरी तरफ से पियें। कल आप पैसे दे देना।"
इस बातचीत में वहां के माहौल में थोड़ा और अपनापन आ गया था। 
 


पार्क में और कोई जगह खाली नहीं थी, इसलिए उन्होंने हिचकिचाते हुए पूछा, "क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?"
आनंद बाबू ने धीरे से सिर हिला दिया। दोनों बेंच के दो अलग-अलग कोनों पर बैठ गए। दोनों के बीच एक गहरी खामोशी थी, जो शायद उनके जीवन के खालीपन से भी गहरी थी।

तभी मिश्रा जी का लड़का हाथ में केतली और दो कुल्हड़ लेकर पार्क की तरफ आया। वह रोज़ आनंद बाबू को देखता था, इसलिए आज खुद ही चला आया।

"बाबूजी, आज मौसम बढ़िया है, एक-एक कुल्हड़ चाय हो जाए?" लड़के ने पूछा।

आनंद बाबू मना करने ही वाले थे कि उनके मुंह से अचानक निकला, "मिश्रा जी, ज़रा पूछो, बहन जी चाय लेंगी?"
सुलोचना जी ने चौंककर आनंद बाबू की तरफ देखा। उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई, "हाँ, पर चीनी थोड़ी कम रखना।"

दो कुल्हड़ चाय बेंच पर आ गई। मिट्टी के कुल्हड़ से सोंधी-सोंधी खुशबू आ रही थी।
आनंद बाबू ने पहला घूंट लिया और बोले, "इस शहर में सब बहुत भाग रहे हैं, बस यह चाय की टपरी ही है जो अपनी रफ्तार से चल रही है।"

सुलोचना जी ने कप थामते हुए कहा, "सही कहा आपने। जब अपने दूर हो जाते हैं, तो यह छोटे-छोटे पल ही जीने का सहारा बनते हैं। मेरी बेटी और दामाद रात के नौ बजे से पहले घर नहीं आते। अकेले घर काटने को दौड़ता है।"
आनंद बाबू की आँखों में चमक आ गई। उन्हें लगा जैसे कोई उनके दिल की बात बोल रहा हो। उन्होंने कहा, "मेरा बेटा भी न्यूयॉर्क में है। हफ़्ते में एक बार फोन आता है—'हॉउ आर यू डैड?' और बस बात खत्म। उन्हें क्या पता कि डैड को 'हॉउ आर यू' से ज़्यादा एक कप चाय पर बात करने वाले साथी की ज़रूरत है।"

उस दिन, चाय की गर्माहट ने दोनों के दिलों के दरवाज़े खोल दिए। आधे घंटे में दोनों ने अपने बचपन, अपनी जवानी, अपने खोए हुए जीवनसाथी और अपनी छोटी-छोटी बीमारियों तक का ज़िक्र कर दिया। जो बातें वे अपने बच्चों से नहीं कह पाते थे, क्योंकि बच्चे 'बिज़ी' थे, वे बातें उन्होंने एक अजनबी से कह दीं।

चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन दोनों के चेहरों पर एक अजीब सा सुकून था।

सुलोचना जी अपनी छड़ी संभालते हुए उठीं और मुस्कुराकर बोलीं, "कल फिर इसी वक्त?"

आनंद बाबू ने अपने जीवन में महीनों बाद इतनी खुशी महसूस की थी। उन्होंने सिर हिलाया, "बिल्कुल। और कल चाय मेरी तरफ से होगी।"

अब पार्क की उस आखिरी बेंच पर सिर्फ दो बुज़ुर्ग नहीं बैठते, बल्कि वहाँ दो कुल्हड़ चाय के बहाने हर शाम ज़िंदगी मुस्कुराती है। बच्चे अपनी दुनिया में व्यस्त रहे, लेकिन चाय के उस एक प्याले ने दो अकेले इंसानों को जीने की एक नई वजह दे दी थी।


- अमितेश 

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