सोचता हूँ लिखूँ कभी ग़ालिब के अंदाज़ में,
वही फलसफा, वही गहराइयाँ हों मेरी आवाज़ में।
कभी दिल चाहता है मीर सा मर्सिआ बन जाऊँ,
या कबीर की साखियों सी कोई खरी बात कह पाऊँ।
मन मचलता कि दिनकर का वीर रस उठा लूँ,
शब्दों में अंगारे भरूँ और सोये वतन को जगा दूँ।
या निराला की 'जूही की काली' जैसी कोई विधा चुनूँ,
महादेवी की तरह विरह का कोई मद्धम सा ख्वाब बुनूँ।
चाहता दुष्यंत की तरह व्यवस्था पर प्रहार करूँ,
या गुलज़ार की तरह 'कांच के टुकड़ो' से शाहकार करूँ।
हर मोड़ पर खड़े हैं मील के पत्थर बनकर ये उस्ताद,
इनके साए में ना जाने रहेगी मेरी कही बात याद?
यहीं आकर थमता है मेरी कलम का बहता हौसला,
ज़हन से शुरू होता है फिर एक अजीब सा फैसला।
परछाइयों का एक भारी सा दबाव रहता है,
दूसरों जैसा दिखने का, हर पल एक तनाव रहता है।
अगर मैं ग़ालिब हो गया, तो "मैं" कहाँ जाऊँगा,
जो दिनकर की आग चुराई, तो अपनी सादगी कहाँ पाऊंगा?
है डर की कहीं मैं महज़ एक नक़ल न बन जाऊँ,
दूसरों को दोहराते - दोहराते, खुद को हीं ना गंवा जाऊँ।
तभी भीतर से एक आवाज़ आती, कि रुक जा मुसाफ़िर,
तेरा अपना भी तो एक दर्द है, एक नज़रिआ है आख़िर।
बेशक सीख हर उस्ताद से, पर स्याही अपनी ही जलाना,
चाहे टूटे - फूटे हों लफ्ज़, पर तुम अपनी ही राग - गीत गाना।
ये विधाओं का दबाव, ये शैलियों का जो घेरा है,
इसे तोड़कर जो चमकेगा, वही सवेरा मेरा है।
इन महान को प्रणाम, पर मैं भी अपनी ज़मीन बनाऊंगा,
मुझमें जो थोड़ा सा "मैं" है, उसे सहेज कर ही गाऊँगा।
- अमितेश
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