"चाचा चाय पियो हमारे साथ आज, क्या पता कल दुबारा तुमसे मुलाकात हो भी या नहीं!" तिवारी जी ने रहीम डाकिया को अपनी चाय की दूकान पर आने को कहा।
रहीम चाचा का आज आखिरी दिन था इस नौकरी में। आज वो सेवा निवृत्त हो रहे थे। 30 साल तक भारत सरकार को सेवा दी थी अपनी। तक़रीबन पुरे समय वो इसी तहसील में रहे थे। उस तहसील की तक़रीबन हर गांव में उन्होंने चिट्ठी पहुँचायी थी। इस तहसील का लगभग हर आदमी उन्हें जानता था।
रहीम चाचा इस क्षेत्र में चिट्ठी का एक पर्याय बन गए थे। चिट्ठिओं के बहाने वो हर घर के सुख दुःख के साथी थे। लोग चिट्ठी सिर्फ लेते ही नहीं थे उनसे, बल्कि वो चिट्ठी पर विमर्श भी करते थे। इस पुरे क्षेत्र में लगभग 3000 घर थे। नहीं भी तो वो आधे लोगों को तो जानते ही थे और लगभग हर घर में इन 30 वर्षों में चिट्ठी पहुंचाई थी। ये पूरा क्षेत्र हिन्दुओं का था। मुसलमानों के गिने चुने ही घर थे। लेकिन रहीम चाचा सब के अपने घर के व्यक्ति थे। उनकी पहचान धर्म नहीं डाकिया होना था। उन्हें सब से एक सा ही स्नेह मिलता था।
यह चाय का निमंत्रण भी इनके लिए एक सामान्य सी बात थी। चाय के बहाने वो लोगों के सुख - दुःख का हिस्सा बन जाते थे। कई लोगों को यहाँ से निकल कर बड़े ओहदे पर जाते देखा था। कई लोगों के परिवार को बढ़ते फिर बिखरते देखा था। कई फसलों को पकते और कई किसानों को निखरते देखा था।
ये तिवारी जी का भी एक भरा पूरा परिवार था। आज उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से इनका बेटा निकल कर एक बड़ी कंपनी में प्रतिष्ठित पद पर मुंबई में काम कर रहा है। तिवारी जी का अपना खेत है और खेत आज भी उतना ही उपजाता है की इनका गुजर बसर हो जाता है। बेटे पर आज भी वो और उनकी पत्नी बोझ नहीं है। मुंबई जाते हैं तो अपनी जमीन का प्रसाद भी ले कर जाते हैं बेटे के पास।
तिवारी जी ने चाय का गिलास रहीम चाचा को बढ़ाते हुए एक मुस्कान दी।
"चाचा समय लगेगा नयी परिस्थितिओं में जमने में। 30 बरस से निरंतर काम कर रहे हो। तुम चिट्ठी नहीं लाते थे हमारे यहाँ, तुम खुद एक खबर थे। चिट्ठी में जो कभी खराब खबर भी आती थी, तुम अपना कंधा हमें दे देते थे। हमारी खुशियों में हम से ज्यादा तुम खुश होते थे। कभी लगा नहीं के ये सिलसिला कभी ख़त्म होगा। देखो आज ख़त्म हो ही रहा है। शायद कल से कोई और हमारी सुख - दुःख का हिस्सा बने, बन भी पाए या ना। हम फिर भी हर चिट्ठी में तुम्हे ही ढूँढेगें।" कहते कहते तिवारी जी थोड़े भावुक हो गए।
चाय लगभग खत्म होने को आयी थी। शायद रहीम चाचा के साथ का ये सफर भी। भावुकता ना सिर्फ तिवारी जी में थी, उस चाय की दूकान पर बैठा हर शख्स थोड़ी भावुकता महसूस कर रहा था। रहीम चाचा भी। शायद कल से उनकी ज़िन्दगी थोड़ी अलग होगी ... या एकदम ही अलग होगी। कल मुहरों की ठक - ठक नहीं सुनाई देगी, कल चिट्ठिओं के बोर से गिरने की आवाज़ नहीं होगी, ना उन खतों को छंटाई कर उन्हें श्रेणीबद्ध करने का कोई बड़ा काम होगा। न कोई अधूरे पते की ख़त को उनके सही जगह पर पहुँचाने की कोई कवायद। दिन पूरा सुकून भरा होगा। लेकिन ये सुकून रहीम चाचा को चाहिए भी या नहीं, ये तो कल से पता चलेगा।
रहीम चाचा अपनी तंद्रा मे ही थे। साइकिल की घंटी की आवाज से उसका ध्यान भटका। देखा वहां का नया डाकिया, सुभाष उस चाय की दुकान के सामने अपनी साइकिल खड़ा कर के घंटी बजा रहा था। रहीम चाचा ने एक मुस्कान बिखेरी और बोला, "आओ सुभाष, अब ये पूरा इलाका तुम्हारे हवाले। ये सब मेरे परिवार ही हैं। सो तुमसे उम्मीदें थोड़ी ज्यादा हैं।"
"चाचा, कोशिश करूँगा आपकी जगह भरने की। फिलहाल मेरी पहली चिट्ठी की डिलीवरी करनी है। आपके नाम की ही चिट्ठी है, सो आपको देने आ गया हूँ।"
रहीम चाचा थोड़ा चौंक गए। "मेरे नाम की चिट्ठी! मुझे कौन खत भेजेगा? अगर भेजा भी तो मेरे घर के पते पर भेजेगा ना!"
"चाचा ये लो तुम्हारी चिट्ठी।" उसकी बातों को लगभग अनसुना करते हुए सुभाष ने रहीम चाचा के सामने अपनी चिट्ठिओं का बोरा पलट दिया। तक़रीबन 400 - 500 पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय और लिफाफे थें। सब पर रहीम चाचा का नाम लिखा था पते की जगह पर। और कोई और विवरण नहीं। हाँ, भेजने वाले का नाम और ग्राम लिखा था। उन सब को रहीम चाचा पहचानते थे। रहीम चाचा के कार्य क्षेत्र में 3 ग्राम पंचायत आते थे। ये सब प्रेषक इन्ही 3 ग्राम पंचायत के विभिन्न गावों के लोग थे। कभी ना कभी या अक्सर रहीम चाचा ने इनके घर पर डाक या पार्सल पहुंचाया था। इन सब चिट्ठियों पर उन लोगों के रहीम चाचा के साथ के अनुभव लिखे थे। सब पर उन खास मौकों का विवरण था जब उनके सुख - दुःख का हिस्सा बने थे।
रहीम चाचा ने दोनों हाथों से उन चिट्ठियों को पकड़ रखा था। जो भावुकता अब तक एक अहसास की तरह वो महसूस कर रहे थे, उसने अब आँखों का रास्ता अख़्तियार कर लिया था। अपनी भावनाओं को काबू करने की नाकाम कोशिश भी की चाचा ने लेकिन सफल ना हो पाए। इन चिट्ठियों को पढ़ते पढ़ते अब उनकी बाकी की ज़िन्दगी गुजर जाएगी। उन्होंने सिर्फ ख़त नहीं बाटें थे, हर परिवार के सुख - दुःख के साझेदार बने थे। आज इस चाय की दूकान पर चाय की चुस्कियों के बीच वो अपने भरे पुरे परिवार के फिर से अपने हो गए थे।
तिवारी जी मुस्कुरा रहे थे। सुभाष खुश था की इन ख़तों के बहाने वो शायद अपने नए कार्य क्षेत्र पर रहीम चाचा सी प्रसिद्धि और स्नेह पा ले।
- अमितेश
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें