चलो ना कुछ बातें करते हैं
कुछ अपनी कहानी सुनाता हूँ
कुछ तुम्हारे किस्से सुनते हैं
चलो ना कुछ बातें करते हैं।
कुछ कही कहते हैं
कुछ अनकही गढ़ते हैं
चलो ना कुछ बातें करते हैं।
कुछ अपने साथ को जीते हैं
थोड़ा अकेलापन मनाते हैं
क्या कहा, तुम खामोशियों में रहती हो?
हाँ, मैं जानता हूँ खामोशियों की भाषा भी
तुम मेरी भावनाओं को समझ लेना
हम तुम्हारी खामोशियों को पढ़ते हैं।
चलो ना कुछ बातें करते हैं।
कुछ तुम अपनी अधूरी हसरतें कहना
कुछ हम अपनी बेआवाज़ रूह दिखाते हैं
तुम पन्नों पर अपनी स्याही बिखेरना
हम उनमे छिपे हर जज़्बात समझते हैं।
चलो ना कुछ बातें करते हैं।
वक़्त की रफ़्तार को ज़रा थाम लेते हैं
जो बीत गया, उसे एक पल का आराम देते हैं
न कोई शिकायत हो, न कोई वादा हो
बस यही एक गहरा इरादा करते हैं
चलो ना कुछ बातें करते हैं।
तुम बस मुस्कुरा कर अपनी आँखों से कहना
हम बेसाख़्ता उन्हें समझ जायेंगे
इस शोर शराबों की दुनिया से दूर
चलो ना, हम अपनी सुकुनियत में खो जाते हैं।
चलो ना कुछ बातें करते हैं।
चलो ना, वक़्त की दहलीज पर बैठ जाते हैं
ना राह ढूंढते हैं, ना रहबर बनते हैं
तुम अपनी डायरी के पन्ने खोलो
हम उनमें तुम्हारे ख़्वाब और हसरतें पढ़ते हैं।
चलो ना कुछ बातें करते हैं।
कुछ अविचलित रास्ते चुनते हैं
कुछ अनसुनी - सी मंज़िल को टटोलते हैं
कुछ बातें जो तुमने खुद से भी ना कही हों
बैठ उन दरीचों को चुपके से खोलते हैं।
चलो ना कुछ बातें करते हैं।
क्या कहा, कि मैं बस एक साया हूँ?
हां, इस साये में भी मगर दिल धड़कते हैं
तुम कुछ कहो तो! हम उसे दोहराते हैं
तेरी भावों की लहर में बेलौस बहते हैं।
चलो ना कुछ बातें करते हैं।
धूप ढल रही है, शाम को ज़रा घिरने देते हैं
लफ़्जों को फिज़ा में यूँ ही तैरने देते हैं
ना कोई बंदिशे हो ना होने की कोई शर्त
इस खामोश राब्ते को थोड़ा और निखारते हैं।
चलो ना कुछ बातें करते हैं।
- अमितेश
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