शुक्रवार, 29 मई 2026

एक कप इंतजार

यह इंजीनियरिंग कॉलेज का आखिरी साल था। इन चार सालों के दौरान सबने अपने जीवन के संभवतः सबसे बेहतरीन पल बिताये थे। सब के पास किस्सों की पूरी लाइब्रेरी थी। यह देश का सबसे बेहतरीन इंजीनियरिंग कॉलेज था सो पढ़ाई तो सब ने अच्छी की थी। तक़रीबन सभी के अच्छे प्लेसमेंट भी हो गए थे। 

लेकिन इससे भी इतर, सब ने ज़िन्दगी जिया था। वो लाइब्रेरी की आँखों में बातें, वो बड़ी कैंपस में सब की नज़रों से खो जाने के पल, कंबाइंड स्टडी के नाम की दारु पार्टी, कुछ क्लासेज जान कर बंक करना और ना जाने कितने ऐसे पल सब के पास थे की इनकी यादों में ही सारी ज़िन्दगी बीत जाये। 


मायरा और प्रबाल भी इन्ही में से एक थे। कॉलेज के पहले साल में ही इनकी अच्छी जमने लगी थी। ये दोनों एक दूसरे के "बेस्ट फ्रेंड" थे। फोर्थ ईयर में आते आते इन्हे अहसास होने लगा था की इन दोनों में थोड़ा थोड़ा प्यार भी है शायद। बस एक ही समस्या थी की दोनों में से किसी ने इज़हार नहीं किया था, या शायद कर नहीं पाए थे। 


कुछ आखिरी के कुछ महीने बचे थे कॉलेज के। आज मायरा और प्रबाल फिर से अपने पसंदीदा कैफ़े में अपनी पसंदीदा चाय का आनंद ले रहे थे। अजीब ये की चाय में दोनों की पसंद भी एक दम एक सी थी - थोड़ा दूध, ज्यादा अदरक और चीनी बिलकुल नहीं। और हाँ चाय उतारते उतारते उसमे एक तेजपत्ते का तड़का लगना चाहिए। 

उनकी चाय टेबल पर आ चुकी थी। दोनों चुप से थे कैफ़े के उस टेबल पर। वहां सबसे तेज आवाज़ उनके चाय के कप के मेज़ पर रखने की आ रही थी। कुछ देर में प्रबाल को ये चुप्पी काटने को दौड़ने लगी थी। बोला, "अगर ऐसे ही बैठना था तो हम आये क्यों हैं यहाँ पर। अपने अपने कमरे में ही ठीक थे।"

"प्रबाल, कुछ महीने बाद शायद हम मिल ना पाएं। तुम बंगलोर चले जाओगे और मैं दिल्ली में आ जाऊंगी। कुछ समय तक तो हम दोस्ती के बहाने फोन पर बात कर लेंगे, फिर शायद धीरे धीरे वो भी खतम हो जायेगा।" प्रबाल की बातों को नज़रअंदाज़ कर वो अपने ही ख्यालों को शब्द देने की कोशिश कर रही थी। उसकी आवाज में एक ऐसी गहराई थी की प्रबाल को लगा की वो डूब जायेगा इसमें, दम घुट जायेगा उसका। 

वो बैचेन हो गया। ये ख्याल तो कहीं ना कहीं उसके मन में भी आ रहा था, की कैसे एक दूसरे के साथ आजन्म रह पाए। कुछ साल वो दोनों अपनी करियर को देना चाहते थे। किसी प्यार व्यार में नहीं पड़ना चाहते थे। लेकिन आज ऐसा लग रहा था की शायद ये निर्णय गलत था।  शायद कुछ साल में दोनों अपनी अच्छी करियर बना लें, लेकिन उसकी कीमत कुछ ज्यादा ना चुकानी पड़ जाए। 


प्रबाल कुछ बोल नहीं पा रहा था। मायरा ने अपने पर्स से एक लॉकेट निकाला और प्रबाल के सामने रख दिया था। प्रबाल ने उसे देखा और एक हलकी मुस्कान उसके चेहरे पर तैर गयी थी। वह बेअरिंग और बोल्ट्स को जोड़ कर बनाये गए थे। देख कर ही लगा रहा था की किसी मैकेनिकल इंजीनियरिंग स्टूडेंट ने ये बनाया है। हालाँकि ये देखने में काफी अच्छा और कूल लग रहा था। 

मायरा की ओर देख कर प्रबाल बोला, "अच्छा तभी मैं कहूं कुछ बेअरिंग हमारे कॉलेज वर्कशॉप में क्यों नहीं मिल रहे थे। ये तुमने बनाया है?"

"चलो एक दूसरे से एक प्रॉमिस करते हैं। हम हर साल 2 बार मिलेंगे इसी कैफ़े में। हम इतना तो मैनेज कर ही सकते हैं ना की साल में दो बार लखनऊ के इस कैफ़े की चाय एन्जॉय करें और अपनी Nostalgia को एक बार और जी लें।" ऐसा लग रहा था की मायरा आज बस बोलने के लिए आयी थी। प्रबाल क्या बोल रहा है इसमें कोई इंटरेस्ट नहीं था उसका। "एक बार तुम्हारे जन्मदिन वाले दिन, 7 जून को और एक बार मेरी जन्मदिन के दिन, 15 दिसंबर को। बोलो प्रॉमिस करते हो?" प्रबाल कुछ ना बोला, बस सहमति में सिर हिला पाया।  


दोनों ने आँखों ही आँखों में फिर बातें की। चुप्पी भले थी उस टेबल पर, लेकिन बातें काफी हो रही थी। थोड़ी देर बाद दोनों उठे और अपने अपने हॉस्टल चले गए। ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा कुछ और दिनों तक। 


***


"भैया एक चाय बनाना, दूध काम, अदरक थोड़ी ज्यादा, चीनी बिलकुल नहीं और हां आखिर में थोड़ा तेजपत्ता डाल कर उबाल देना।" एक परिचित सी आवाज़ सुनाई दी थी। प्रबाल ने आवाज की दिशा में देखा, उसके पीछे की तरफ की एक टेबल पर एक चिर परिचित सा चेहरा दिखा। अरे ये तो मायरा है। ओह मायरा ही है। 

वह तेजी से अपने टेबल से उठ कर मायरा के टेबल तक गया। उसकी साँसे तेज चल रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी जान हलक तक आ गयी है, इस अति उत्साह में। दिसंबर के महीने में भी उसके माथे पर पसीने की बूंदे चमक रही थी। बोला - "मायरा, मेरी मायरा तुम। मैं तुम्हारा प्रबाल।" इतने वर्षों के बाद मिल रहे थे दोनों। प्रबाल को समझ नहीं आ रहा था कि बोलना क्या है। जो मुँह में आया बोल दिया।  


मायरा ने खूबसूरत गहरे गुलाबी रंग की साड़ी पहनी हुई थी। बाल खुले थे और लगता था शायद बालों की स्ट्रेटनिंग करवाई थी। हलके मेक अप में थी। कॉलेज के दिनों से भी ज्यादा खुबसूरत लग रही थी वो। हालाँकि चेहरे पर एक परिपक्वता आ गयी थी और आँखों पर चश्मा चढ़ गया था। 

उसने नजरे उठाई, देखा प्रबाल था। उसकी धड़कने तेज हो गयी थी। उसने मुस्कुरा कर कहा, "प्रबाल, आज तुम आ ही गए?" और बढ़ कर एक साइड हग दिया। 

प्रबाल थोड़ा असमंजन में आ गया ये सुन कर। फिर भी उसे दरकिनार कर के बोला, "12 बरस हो गए। तुमने आज तक फ़ोन भी नहीं किया मुझे। अपने बेस्ट फ्रेंड को तुम बिलकुल भूल गयी।" वो थोड़ा शिकायती लहजे में था। 


"आज तारीख क्या है प्रबाल?" मायरा आज भी वही "No Nonsense Girl" थी। गैर जरुरी बातों को इग्नोर करना जानती थी। 

प्रबाल इस अचानक के सवाल के लिए तैयार नहीं था। एक क्षण की चुप्पी तिर गई वहां। प्रबाल ने चुप्पी तोड़ते हुए बोला, "आज 15 दिसंबर है, क्यों?" 

"प्रबाल आज मेरा जन्मदिन है, कॉलेज से निकलते समय हमने एक दूसरे से वादा किया था की हम साल में 2 बार जरूर इस कैफ़े में आएंगे और अपनी पसंदीदा चाय पिएंगे एक दूसरे के साथ। पिछले 12 वर्षों से मैं हर साल 7 जून और 15 दिसंबर को आ रही हूँ। मुझे हर बार लगता था की तुम जरूर आओगे। हर बार अकेले ही यहाँ की चाय पी कर मैं लौट जाती थी। मुझे उम्मीद थी, तुम एक बार तो जरूर आओगे यहाँ। देखो आज तुम आ ही गए। मैं तुम्हारे बारे में अक्सर LinkedIn पर पढ़ती थी। तुम काफी successful professional हो गए हो। शायद तुमने मुझे भूल जाना ही बेहतर समझा था। एक बार भी मुझसे बात नहीं की, मिलना तो बहुत दूर की बात है।"

प्रबाल ने मायरा का हाथ पाने दोनों हाथों से पकड़ लिया था। "मायरा, हाँ मैं तुम्हारे जितना expressive आज भी नहीं हूँ। लेकिन मैं हमेशा तुम्हारी खबर रखता हूँ। हाँ मैं मानता हूँ मैं तुमसे बात नहीं कर पाया। करियर ने इतना व्यस्त कर दिया था कि मैं खुद को भी भूल चूका हूँ। आज अचानक यहाँ की factory में जाने का plan बन गया था। हाँ, मैं सच में भूल गया था की हमने कभी मिलते रहने का वादा किया था। हाँ, मैं भूल गया था की आज तुम्हारा जन्मदिन है। ये बस एक संयोग ही है कि आज के दिन मैं यहाँ आ गया। लेकिन अब मैं यहाँ से अकेले तो नहीं जाऊंगा। तुम हमेशा से मेरे जीवन की आखिरी ख्वाहिश थी। मुझे पता है तुम भी अभी तक single हो। लेकिन अब बहुत हो गयी दोस्ती - वोस्ती। अब हम एक दूसरे से एक और वादा करते हैं, आजन्म साथ रहने का वादा। कभी ना बिछड़ने का वादा। तुम्हारा मुझे संभालने के वादा। मेरा तुम्हे संवारने के वाद। बोलो करोगी आज ये वादा?" प्रबाल ने कभी इतना नहीं बोला था मायरा से। थोड़ा मृदुभाषी ही था। लेकिन आज उसने ये सारे दायरे तोड़ दिए थे। 

मायरा की आँखों में आँसू थे। जैसे उसकी बारह साल की तपस्या आज पूरी हो गयी हो। प्रबाल की आँखों में वो कॉलेज की धूप फिर से चमक उठी थी। वेटर चाय ले कर आ गया था। सिर्फ एक कप चाय। आज बारह बरस बाद ये चाय तेजपत्ते की सोंधी खुशबु से इन दोनों के जीवन में एक अमिट खुशबू फैला रहा था। दोनों एक ही कप में चाय पी रहे थे। और चाय उनके जीवन की उलझी गांठों को हर घूँट के साथ सुलझा रहा था। 


- अमितेश 

  

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