शहर के कोने पर 'मुरली काका' की एक पुरानी चाय की टपरी थी। ये टपरी शहर में मशहूर थी अपनी चाय के लिए। शहर का शायद ही कोई हो जिसने कभी मुरली काका की चाय ना पी हो। वहाँ बड़े-बड़े साहब भी आते और मज़दूर भी। चाय की कीमत ऐसी की कोई भी उसे खरीद ले। स्वाद ऐसा की लोगों की जुबान पे चढ़ जाये।
मुरली काका का एक नियम था - वे अपनी दुकान के एक बोर्ड पर 'किसी की चाय' का हिसाब रखते थे। इसका मतलब था कि कोई अमीर ग्राहक अपनी चाय के पैसे देते वक्त एक अतिरिक्त चाय के पैसे दे जाता, जिसे काका बोर्ड पर एक चॉक से निशान बना देते। जब कोई बेसहारा या भूखा आता, तो वह बोर्ड देखकर एक चाय मांग लेता। उसे वो चाय मुफ्त में दे दी जाती। लोग अक्सर वहां 1 या ज्यादा चाय का पैसा दे कर जाते। मुरली काका नियम से उस एक्स्ट्रा चाय का निशान उस बोर्ड पे लगा देते।
एक दिन एक बहुत ही रईस व्यापारी वहाँ रुका। उसने यह सब देखा और हँसकर बोला, "काका, ये क्या नाटक है? जिसे दान देना है, वो सीधे क्यों नहीं देता? एक कप चाय से किसी का क्या भला होगा?"
काका चुप रहे। तभी एक बूढ़ा, फटेहाल आदमी वहाँ आया। उसने बोर्ड पर नज़र डाली, एक निशान देखा और काका से कहा, "काका, एक चाय पिला दो।"
काका ने बड़े सम्मान के साथ उसे गरम चाय और दो बिस्किट दिए। उस बूढ़े के चेहरे पर जो सुकून और मुस्कान आई, वह देखने लायक थी। वह अपनी फटी जेब से पैसे निकालने की शर्मिंदगी से बच गया था, क्योंकि उसकी चाय का पैसा पहले ही कोई दे चुका था।
जब वह चला गया, तो मुरली काका ने उस व्यापारी से कहा, "साहब, आपने पूछा था कि एक कप चाय से क्या होगा? उस बूढ़े आदमी ने भीख नहीं मांगी, उसने अपना हक माँगा। इस चाय ने उसका पेट ही नहीं भरा, उसकी 'इज़्ज़त' भी बचा ली। दान वो नहीं जो हाथ फैलाकर लिया जाए, दान वो है जो लेने वाले को ये अहसास भी न होने दे कि वो किसी का कर्जदार है।"
व्यापारी की आँखों से अहंकार का पर्दा हट गया। उसने अपनी जेब से पाँच सौ का नोट निकाला और कहा, "काका, आज इस बोर्ड पर पचास चाय के निशान और लगा दो। मैं आज तक सिर्फ दौलत कमा रहा था, आज समझ आया कि दुआएँ कैसे कमाई जाती हैं।"
मदद की कीमत बड़ी नहीं होती, मदद का तरीका उसे महान बनाता है। फिर चाय भी किसी की मदद हो सकती है, मुरली काका पुरे शहर को ये सीखा रहे है, सालों से।
- अमितेश
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