दिसंबर का महीना था। सर्दियाँ अपनी पराकाष्ठा को छु रही थी। एक पल को जो हाथ शॉल से बाहर निकाला तो जैसे जमने को होती थी। रांची स्टेशन के बाहर, सात साल का छोटू और पाँच साल की गुड़िया कड़कड़ाती ठंड में फटे पुराने कम्बल लपेटे बैठे थे। गुड़िया बार बार भाई से भूख लगी है का रट लगा रही थी। उनके माँ बाप थोड़ी देर बाद आने का बोल कर गए थे। उन्हें वहाँ पर बैठा कर छोटू को समझा दिया था की कोई ट्रेन आये और उससे लोग उतरे तो उनसे पैसे मांगने हैं।
माँ बाप को आने में देर हो रही थी। उधर गुड़िया बार बार कुछ खाने की जिद कर रही थी। उसके पास खाने को कुछ नहीं था, उसपर से ठंड इतनी की कोई भी स्टेशन से बाहर नहीं निकल रहा था। सुबह के 5 बजे थे और ऐसा लग रहा था अभी भी आधी रात हो। इतने में एक राहगीर बाहर आया। उसे देखते ही छोटू ने उससे बोला, "बाबू कुछ खाने को दे दो। मेरी बहन बहुत देर से भूखी है।"
उस राहगीर को थोड़ी दया आ गयी और उसे पास की चाय की दूकान से एक चाय और पारले जी बिस्कुट का एक पैकेट पकड़ा दिया। ये कम से कम थोड़ी देर गुड़िया को शांत रखने के लिए काफी था। यही सोचते सोचते छोटू बड़े संभाल के चाय का कागज का कप और बिस्कुट पकड़े गुड़िया के पास आ गया। छोटी सी बच्ची बिस्कुट का पैकेट देख कर खुश हो गयी। छोटू ने बिस्कुट का पैकेट खोला तो उसमे बस 5 बिस्कुट थे। भूख तो उसे भी लगी थी। सोचा की आधे आधे बाँट कर वो खा लेगा गुड़िया के साथ।
छोटू ने पहला बिस्कुट निकाला, चाय में डुबोया और गुड़िया के मुँह में डाल दिया। गुड़िया मुस्कुराई। दूसरा बिस्कुट भी उसने गुड़िया को ही खिलाया। गुड़िया के चेहरे पर अभी भी और खाने की भूख दिख रही थी। उसने दो और बिस्कुट उसे खिला दिया।
अब पैकेट में सिर्फ एक आखिरी बिस्कुट बचा था। गुड़िया ने उस आखिरी बिस्कुट को देखा और अपनी तोतली जुबान में बोला, "भइया, ये आप खा लो। मेरा पेट भर गया।"
हम कोई और बात समझे या ना समझे, भूख की भाषा बहुत जल्दी समझ जाते हैं। फिर छोटू गुड़िया के लिए कभी कभी बाप की तरह बर्ताव करता। था। छोटू को लगा की गुड़िया को अभी और भूख लगी है। वो उस बिस्कुट को गुड़िया को देते हुए बोला, "अरे मुझे उतनी भूख नहीं लगी है। मुझे तो बस ये चाय पीना है। ये तुम खा लो।"
लेकिन गुड़िया ने ज़िद की कि यह भैया खाएगा। छोटू ने बिस्कुट उठाया, चाय में डुबोया और जैसे ही अपने मुँह के पास ले गया, उसने देखा कि गुड़िया की आँखें अभी भी उस बिस्कुट पर टिकी थीं।
छोटू ने हाथ घुमाया और वह आखिरी बिस्कुट भी गुड़िया के मुँह में डाल दिया। गुड़िया खुश होकर बोली, "भैया, आपने क्यों नहीं खाया?"
छोटू ने चाय की कप में देखा की बस एक घूँट ही चाय बची थी। वो उस कप की आखिरी घूँट चाय की भरी और बोला, "मुझे भूख नहीं लगी थी। तुमको खाते देख मेरा मन भर गया गुड़िया।" और प्यार से गुड़िया के गाल पे एक चिकोटी काटी। ऐसा लग रहा था की छोटू बहुत बड़ा हो गया है। वैसे भी गरीबी इंसान को वक़्त से पहले बड़ा बना देता है। छोटू इसका अपवाद नहीं था।
वो राहगीर वहीं खड़ा अपनी टैक्सी का इंतज़ार कर रहा था। उसने ये सारी घटना होती देखी। वो छोटू के पास आया, उसके सर पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, दुनिया में सबसे अमीर वो नहीं जिसके सारी सुख सुविधाएँ हैं। वो भी नहीं जिसके पास दुनिया की सारी खुशियां खरीदने का धन है। दुनिया का सबसे अमीर तुम हो, जो अपनी आखिरी निवाला भी अपनी बहन की मुस्कान के लिए छोड़ सकता है,भले ही खुद भूखा रह जाये। आज तुमने मुझे मेरे जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया है। दूसरों की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी तलाशने का पाठ। खूब खुश रहो।" कहते हुए उसे एक कप चाय और एक बिस्कुट का पैकेट और ख़रीदाते हुए बोला, "ये ले तेरा गुरु दक्षिणा।"
छोटू को उस राहगीर की कही सारी बात तो समझ में नहीं आयी, वो बस एक और बिस्कुट का पैकेट ले कर खुश हो गया था। चलो अब उसकी भूख कुछ कम हो जाएगी। एक बिस्कुट इसमें से वो गुड़िया को भी देगा।
वो बिस्कुट को चाय में डूबा कर खुद भी खा रहा था और गुड़िया को भी खिला रहा था। उस राहगीर को ऐसा लग रहा था की वो सुदामा अपनी झोली का चना जैसे उस बाल कृष्ण को दे कर संतुष्टि पा रहा था और सामने कृष्ण उसके भाव से परे उसे खाने में ख़ुशी महसूस कर रहे हों।
- अमितेश
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