मंगलवार, 26 मई 2026

एक कप ईश्वर

अमित पिछले सात दिनों से बनारस की गलियों में भटक रहा था। किसी ने कहा था काशी के हर कंकड़ में शंकर का वास है। मोक्ष का द्वार है ये शहर। जीवन में कई उतार चढ़ाव के बाद उसे एक आत्मिक शांति चाहिए थी। इसी अभिलाषा में वह काशी में आ गया। अपना बचा हुआ सबकुछ छोड़ कर। 


वह यहाँ ईश्वर को ढूंढने निकला था। उसने घाटों पर संन्यासियों के प्रवचन सुने, घंटों आंखें बंद करके ध्यान लगाया, विश्वनाथ मंदिर की मंगला आरती में कतारों में खड़ा रहा, लेकिन उसके अंदर की बेचैनी शांत नहीं हुई। उसे हर जगह सिर्फ मंत्रों का शोर और अनुष्ठानों की औपचारिकताएं दिखाई दे रही थीं। ईश्वर का दर्शन जिसके लिए वह सब कुछ छोड़कर आया था, अब भी एक अधूरा ख्वाब था।


मणिकर्णिका पर जलती चिता से उठते धुँए में वो ईश्वर की आकृति ढूंढता। योग करते हुए ध्यान में वो ईश्वर को देख पाने के कोशिश करता। गंगा में नाव पर सवार हो गंगा आरती में ईश्वर को तलाशता। हर इंसान, हर साधू, हर अघोरी, हर नागा साधु में वो शंकर को देखने की कोशिश करता।  लेकिन इस एक हफ्ते में उसे कहीं कुछ नहीं  मिला, सिवाय निराशा के।  


एक ढलती शाम, जब गंगा की लहरों पर दीयों की रोशनी तैर रही थी, अमित थका - हारा अस्सी घाट की एक सीढ़ी पर बैठ गया। वहां बैठे बैठ वो अपने पिछले कुछ वर्षो को याद कर रहा था और सोंच रहा था कहाँ उसने गलती कर दी। कब उसे ईश्वर के दर्शन होंगे जो उसे उसकी इस परिस्थिति से निकालेंगे। कब वो वापस पहले जैसी ज़िन्दगी जी पायेगा। वो अपनी गहन सोंच में था। तभी उसकी नाक से एक सोंधी, कड़क खुशबू टकराई। पास ही एक बूढ़े बाबा अपनी छोटी सी दूकान पर पीतल के बड़े से डोंगे में चाय खौला रहे थे। ये सोंधी खुशबु ऐसी थी जैसे उसे अपनी ओर खींच रही हो। 


अमित उठकर वहाँ गया और बोला, "बाबा, एक चाय देना।"


बाबा ने उसकी तरफ देखा। उनकी आँखों में गजब की चमक थी और चेहरे पर बनारसी बेफिक्री। उन्होंने बिना कुछ बोले मिट्टी का एक साफ कुल्हड़ उठाया, उसमें खौलती हुई अदरक-इलायची वाली गाढ़ी चाय छानी और अमित की तरफ बढ़ा दी।


अमित ने कुल्हड़ को दोनों हाथों में पकड़ा। मिट्टी की सोंधी महक और चाय की गर्माहट ने उसकी उंगलियों के जरिए उसके पूरे शरीर को छुआ। उसने पहली चुस्की ली। चाय का स्वाद सीधे उसकी रूह तक गया।


"चाय कैसी है बाबू?" बाबा ने अपनी धोती का कोना संभालते हुए पूछा।


"बहुत अच्छी है बाबा। काशी में हर जगह चाय अच्छी ही मिलती है, पर इस चाय में कुछ अलग सुकून है," राघव ने थके हुए स्वर में कहा। फिर एक ठंडी सांस लेकर आगे बोला, "पर मन का सुकून गायब है बाबा। सात दिन से काशी में हूँ, हर घाट छान मारा, हर मंदिर हो आया, पर ईश्वर का कोई दर्शन, कोई अहसास नहीं हुआ।"


बाबा मुस्कुराए। उन्होंने अंगीठी में एक कोयला और डाला और बोले, "बाबू, तुम ईश्वर को देखने आए हो या ढूंढने? जो ढूंढने निकलता है, वह अपनी धारणाओं का चश्मा पहन कर निकलता है। वो ईश्वर की एक तस्वीर दिमाग में रख कर आता है। वैसी ही तस्वीर जैसी घर के कैलेंडर या नाटकों में दिखाया जाता है। वह सोचता है कि ईश्वर किसी खास भेष में मिलेंगे जो बाकियों से अलहदा होगा।"


बाबा ने अमित के कुल्हड़ की तरफ इशारा किया, "इस चाय को देखो। इसमें दूध, पानी, चायपत्ती, अदरक, चीनी... सबने अपना अस्तित्व मिटा दिया, तब जाकर यह अमृत बनी। जब तक तुम खुद को, अपने अंदर बसे अहंकार को, इस काशी की गंगा में पूरी तरह विसर्जित नहीं कर दोगे, तब तक उसका दर्शन कैसे होगा? विसर्जन ही तो दर्शन की पहली सीढ़ी है।"


अमित बाबा की बात सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने चाय का दूसरा घूंट लिया। इस बार स्वाद और गहरा लगा।


घाट पर शंख की आवाजें गूंजने लगी थीं। गंगा आरती शुरू हो चुकी थी। अमित ने सामने देखा, जहाँ हज़ारों लोग हाथ जोड़े खड़े थे। कोई अमीर था, कोई गरीब, कोई विदेशी सैलानी था, तो कोई सन्यासी। लेकिन बिना किसी विद्वेष के सब एक ही कतार में खड़े थे। वैसे ही अभिभूत हो हाथ जोड़े जैसे उन्होंने ईश्वर को खुद के भीतर पा लिया हो। 


बाबा ने अमित के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "बाबू, इस घाट पर देखो। एक तरफ महाश्मशान पर चिताएं जल रही हैं, जो सत्य का अंत हैं। दूसरी तरफ गंगा की लहरें हैं, जो जीवन का प्रवाह हैं। और इन दोनों के बीच यह चाय की दुकान है, जहाँ हर कोई एक समान है। यहाँ राजा आए या रंक, कुल्हड़ सबको मिट्टी का ही मिलता है। चाय सबके लिए एक ही डोंगे में बनाई जाती है। चाय भी अपना रंग उनके आर्थिक या सामाजिक स्थिति को देख कर नहीं बदलती।"


बाबा ने अपनी दार्शनिक आवाज़ में कहा, "ईश्वर कोई मूर्ति नहीं है बाबू जो कहीं छिपी है। वह इस चाय के स्वाद की तरह है - जो अदृश्य है, पर जिसका अहसास हर घूंट में है। वह इस चाय बेचने वाले में भी है, उस चिता की राख में भी है, और इस बहती गंगा में भी है। सब एक ही तो हैं। इसी को तो बनारस में 'अद्वैत' कहते हैं।"


अमित ने कुल्हड़ की आखिरी चुस्की ली। चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन उसका स्वाद और बाबा के शब्द उसके भीतर एक अद्भुत शांति भर चुके थे। उसकी सातों दिन की थकान और छटपटाहट गायब हो चुकी थी।


उसने जेब से पैसे निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, तो बाबा ने हंसकर मना कर दिया, "अरे छोड़ो बाबू! आज की चाय का पैसा नहीं, बस प्रसाद समझो। जब ज्ञान मिल जाए, तो गुरु दक्षिणा में अपनी चिंताएं यहीं छोड़ दी जाती हैं।"


अमित ने झुककर बाबा के पैर छुए। जब वह सीधा हुआ, तो उसे लगा कि सामने खड़े बूढ़े चाय वाले के भीतर से साक्षात शिव मुस्कुरा रहे थे। उसे मंदिर के गर्भगृह में जो गर्माहट महसूस नहीं हुई थी, वह उस मिट्टी के कुल्हड़ को छूकर मिल गई थी।


उसने खाली कुल्हड़ को जमीन पर पटका। कुल्हड़ टूटकर वापस मिट्टी में मिल गया - ठीक वैसे ही, जैसे अमित का भ्रम टूटकर बनारस की मिट्टी में विलीन हो चुका था।


आरती के दीयों की रोशनी में गंगा माँ मुस्कुरा रही थीं, और अमित को उसका दर्शन एक कप चाय के बहाने मिल चुका था। आज उसका काशी भ्रमण पूरा हो गया था, या शायद वो काशी का ही हो गया था। 



 - अमितेश 

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