लोग ढूँढते हैं तुझमें प्रेमी, मैं अपना यार देखता हूँ,
तेरी बाँसुरी की तान में, सखा का प्यार देखता हूँ।
नहीं चाहिए मुझे वो पूजन, जिसमें डर और दूरी हो,
मुझे तो वो रिश्ता भाए, जो आधा और अधूरा हो।
तू ईश्वर होगा जगत का, पर मेरा तो बस मीत है,
हार में जो साथ खड़ा हो, तू मेरी वो जीत है।
न मैं राधा की व्याकुलता हूँ, न मीरा का वैराग्य हूँ,
मैं सुदामा की फटी पोटली, तेरा ही सौभाग्य हूँ।
तू द्वारकाधीश बने, या कुरुक्षेत्र का सारथी,
मेरे लिए तू वही कान्हा है, जो चुराता मेरी आरती।
जब थक कर मैं गिर जाऊँ, तू कंधा बनके आता है,
बिन कहे तू मन की बातें, चुपके से सुन जाता है।
लोग झुकते हैं सामने तेरे, मैं तुझ पर हाथ धरता हूँ,
तू भगवान है दुनिया का, मैं तुझे सखा मीत कहता हूँ।
छोड़ दे ये रेशमी आडंबर, आ धूल में साथ खेलते हैं,
दुनिया की इन रीतियों को, हँस कर साथ झेलते हैं।
तू मेरा साया, मैं तेरी परछाईं, यही अपनी रीत है,
कृष्ण सिर्फ प्रेम नहीं, कृष्ण सबसे गहरी प्रीत है।
सखा तू मेरा, तू ही मेरा मीत है।
होगा तू राधा का कृष्ण, पर मेरा तो अप्रतिम गीत है।
जब घने अंधेरों ने घेरा, और सूझती न कोई राह थी,
तब मस्तक पर था हाथ तेरा, बस तेरी ही चाह थी।
मैं अर्जुन सा द्वंद्व में उलझा, गांडीव हाथ से छूट गया,
अपनों की इस कुरुक्षेत्र में, मेरा ही धीरज टूट गया।
तब तूने ही तो कहा था सखा— "उठ, ये मोह का बंधन तोड़ दे,"
"जो तेरा है वो साथ रहेगा, बाकी सब मुझ पर छोड़ दे।"
तूने ही उंगली पकड़ कर, कांटों से मुझे निकाला है,
जब-जब मैं लड़खड़ाया हूँ, तूने ही तो संभाला है।
पर तू केवल लाड़ न करता, तू कड़वी सच्चाई भी कहता है,
जब भटकूँ मैं गलत राह पर, अंकुश बनकर तू रहता है।
तेरी झिड़की में भी प्यार है, तेरी सीख में एक नैया है,
तू केवल मुरली वाला नहीं, तू मेरा सखा कन्हैया है।
तूने धर्म का ज्ञान दिया, और बताया कर्म की क्या परिभाषा,
तू ही मेरी जीत का साहस, तू ही मेरी अंतिम आशा।
जहाँ ज़रूरत पड़ी तूने, डाँट कर मुझे सुधारा है,
मेरा ईश्वर बाद में है तू, पहले यार हमारा है।
- अमितेश
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