शंख फूँक दो भीतर अपने, अब रण का आगाज हुआ,
गुलाम मरा उस कायरता का, आज पैदा 'महाराज' हुआ!
निकाल लाए हो तन को बाहर, अब मन को भी आज़ाद करो,
जो खौफ पलता था रगों में, उसे आज तुम बर्बाद करो!
गर्जना करो ऐसी कि...
काँप उठे वो डर जो अब तक, तुम पर शासन करता था,
उखाड़ फेंको उस वहम को, जो तुममें तिल-तिल मरता था!
तुम प्यादे नहीं बिसात के, तुम खुद अपनी चाल हो,
तुम काल के भी मस्तक पर, अंकित एक गुलाल हो!
खौफ की औकात क्या, जो आँख तुमसे मिला सके?
कोई बेड़ी बनी नहीं, जो रूह को तेरी हिला सके!
उठो! कि तुम ही शक्ति हो, तुम ही शिव का अंश हो,
तुम अपनी ही विजय-गाथा के, आदि और अंत हो!
न कोई 'शायद', न कोई 'किन्तु', न कोई अब मलाल है,
तेरी रगों में दौड़ता अब, बस विजय का ही उबाल है!
खौफ को अब इंसान के, साये से भी डरना होगा,
तेरे भीतर के सुल्तान को, अब तख्त पर चढ़ना होगा!
ये युद्ध नहीं किसी और से, ये युद्ध स्वयं से स्वयं का है,
जो जीत गया खुद के मन को, वो मालिक पूरे ब्रह्मांड का है!
- अमितेश
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