गुरुवार, 5 मार्च 2026

बेड़ियाँ

बाहर की दुनिया तो अब तुमसे हार मान चुकी है,

पर भीतर की उस बस्ती में, अब भी जंग पुरानी है।

वो जो मन की कोठरी में एक अदृश्य सा पहरा है,

वही गुलामी सबसे घातक, वही जख्म सबसे गहरा है।


लोहे की कड़ियाँ टूटीं, तो लगा कि हम आजाद हुए,

पर खुद की ही नजरों में, हम कब के बर्बाद हुए?

वो कहता है "तुम नहीं सकोगे", तुम चुपचाप मान लेते हो,

अपनी असीमित शक्ति को, तुम सीमाओं में तान लेते हो।


निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,

मगर मन की इस गुलामी को, जड़ से उखाड़ना बाकी है।


ये मन जो कल का डर चबाता, और बीता कल उगल देता है,

तुम्हारी हर ऊँची उड़ान को, संशयों में बदल देता है।

तुम कैदी नहीं हो हालात के, तुम गुलाम हो अपनी सोच के,

जी रहे हो एक अधूरा जीवन, हर लम्हे को खरोंच के।


तोड़ दो उस दर्पण को, जिसमें खुद को लाचार देखते हो,

मिटा दो उस लकीर को, जिसमे अपनी हार देखते हो।

हुकूमत तुम्हारी हो खुद पर, न कि यादों के सायों की,

धज्जियां उड़ा दो अब तुम, इन मनहूस परछाइयों की।


खौफ को पता चले कि अब, इंसान जाग उठा है,

मन का वो पुराना गुलाम, अब कहीं भाग उठा है।

अब न कोई समझौता होगा, न कोई गिड़गिड़ाहट होगी,

जब तुम चलोगे, तो कायनात में सिर्फ तुम्हारी आहट होगी।



-अमितेश 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें