जंजीरें तो काट दीं, पिंजरा भी तोड़ आए,
अंधेरी उस गुफा को पीछे तुम छोड़ आए।
हाथ-पाँव अब मुक्त हैं, खुली हवा का घेरा है,
पर मन कहता है अब भी, हाँ वहां अंधेरा है।
निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,
अब बस उस खौफ को खुद के भीतर से निकालना है।
वो कांपती सी आहटें, वो सहमी सी यादें,
वो हार मान लेने वाली, खुद से की हुई बातें।
वो अब भी सुलगती हैं, राख के ढेर की तरह,
डराती हैं रातों में, किसी अहेर की तरह।
दीवारें लांघ लीं तुमने, अब धारणाएं तोड़नी हैं,
डर की जो जड़ें जमी हैं, वो जड़ें मरोड़नी हैं।
सिर्फ लड़ना काफी नहीं, अब जीत को पालना है,
उस खौफ को अब उस इंसान के भीतर से निकालना है।
उठो कि तुम्हारी रगों में अब साहस का संचार हो,
हर डर तुमसे नज़रें मिला खुद शर्मसार हो।
तुम वो नहीं जो डरे थे, तुम वो हो जो लड़कर आए हो,
तुम राख नहीं, तुम तपकर कुंदन बनकर आए हो।
खुद को यकीन दिलाओ, कि तुम खुद के मुहाफ़िज़ हो,
अपनी कहानी के तुम ही, आखिरी और मुकम्मल हो।
सूरज को अब आँखों में, मशाल सा ढालना है,
हाँ, अब खौफ को इंसान के वजूद से निकालना है।
निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,
अब बस उस खौफ को खुद के भीतर से निकालना है।
- अमितेश
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