शनिवार, 7 मार्च 2026

खामोश बस्तियों के नाम

ये शहर नहीं, पत्थर का एक समंदर है,

जहाँ बाहर सन्नाटा और शोर दिल के अंदर है।

दीवारें बहरी हैं, लोग अंधे हैं यहाँ, 

यहाँ हर शख्स अपनी ही तन्हाई का पैगंबर है।


दिखाई जो न दे, उस दर्द का मंजर हैं हम,

अपनों के बीच भी खुद से बेखबर हैं हम।

पुकारते रहे जिसे, वो मुड़कर भी न देख सका,

शायद इस अंधी बस्ती के सबसे पुराने खंडहर हैं हम।


आईने बेचकर अब हम क्या पाएंगे भला,

जब आंखों से ही रोशनी का नूर चला गया।

वो चीखते रहे मदद को, और लोग गुजरते रहे,

शायद दीवारों के साथ अब खुदा भी बहरा हो गया। 


- अमितेश 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें