तर्क - ए - ताल्लुक कर लिया, तेरे शहर को भी छोड़ दिया,
अब बे-सबब चश्म - ए - तर, आख़िर क्यों रोता है?
दावा था तेरा कि मयस्सर होंगे हम-शक्ल मेरे हज़ारों,
गर मिल भी गए वो सब, तो फिर मुझे ही क्यों सोचता है?
गया है जो शख्स मुड़कर न देखने की कसम खाकर,
उसी की याद में तू ये शब् - ए - हिज्र क्यों संजोता है?
गुरुर - ए - हुस्न में कहा था, तुम जैसे बहुत हैं यहाँ,
अब उसी भीड़ में तू अपनी तन्हाई क्यों ढोता है?
- अमितेश
➡ तर्क - ए - ताल्लुक - रिश्ता तोड़ लेना
➡ बे-सबब - बिना किसी वजह के
➡ चश्म - ए - तर - नम आँखें
➡ शब् - ए - हिज्र - जुदाई की रात
➡ गुरुर - ए - हुस्न - अपनी खूबसूरती का घमंड
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