गुरुवार, 19 मार्च 2026

हमशक्ल हज़ारों

तर्क - ए - ताल्लुक कर लिया, तेरे शहर को भी छोड़ दिया,

अब बे-सबब चश्म - ए - तर, आख़िर क्यों रोता है?


दावा था तेरा कि मयस्सर होंगे हम-शक्ल मेरे हज़ारों,

गर मिल भी गए वो सब, तो फिर मुझे ही क्यों सोचता है?


गया है जो शख्स मुड़कर न देखने की कसम खाकर,

उसी की याद में तू ये शब् - ए - हिज्र क्यों संजोता है?


गुरुर - ए - हुस्न में कहा था, तुम जैसे बहुत हैं यहाँ,

अब उसी भीड़ में तू अपनी तन्हाई क्यों ढोता है?


- अमितेश 



➡ तर्क - ए - ताल्लुक - रिश्ता तोड़ लेना 

➡ बे-सबब - बिना किसी वजह के 

➡ चश्म - ए - तर - नम आँखें 

➡ शब् - ए - हिज्र - जुदाई की रात 

➡ गुरुर - ए - हुस्न - अपनी खूबसूरती का घमंड 

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