वो वहम पुराने थे कि, दीवारों के कान होते हैं,
खामोश ईंटों के पीछे, छुपे कुछ इंसान होते हैं।
मगर अब वक्त बदला है, हवा का रुख भी नया है,
ये राज़ का दरिया अब, दीवारों से नहीं बहता है।
दीवारें तो अब बस, मर्यादा की लकीरें हैं,
असली शोर तो ऊपर, छतों की जागीरें हैं।
जब बंद कमरों में कोई, धीरे से फुसफुसाता है,
वो धुआं बनकर सीधा, मुंडेरों तक ही जाता है।
छत से झांकती आँखें, और खुले हुए ये रोशनदान,
यहीं से होकर गुज़रते हैं, हर घर के गुप्त बयान।
न कोई परदा ठहरता है, न कोई ओट रुकती है,
बात जब ऊपर पहुँचती है, तो पूरी बस्ती झुकती है।
नीचे सब चुपचाप हैं, जैसे गहरा कोई सन्नाटा हो,
पर ऊपर छत पे चर्चा है, चाहे जो भी नाता हो।
संभल कर बोलना 'राही', यहाँ पत्थर भी सुनते हैं,
मगर खबरें तो अब ये आसमां, छतों से ही चुनते हैं।
- अमितेश
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