शनिवार, 7 मार्च 2026

छत से फैलती बातें

वो वहम पुराने थे कि, दीवारों के कान होते हैं,

खामोश ईंटों के पीछे, छुपे कुछ इंसान होते हैं।

मगर अब वक्त बदला है, हवा का रुख भी नया है,

ये राज़ का दरिया अब, दीवारों से नहीं बहता है।


दीवारें तो अब बस, मर्यादा की लकीरें हैं,

असली शोर तो ऊपर, छतों की जागीरें हैं।


जब बंद कमरों में कोई, धीरे से फुसफुसाता है,

वो धुआं बनकर सीधा, मुंडेरों तक ही जाता है।

छत से झांकती आँखें, और खुले हुए ये रोशनदान,

यहीं से होकर गुज़रते हैं, हर घर के गुप्त बयान।


न कोई परदा ठहरता है, न कोई ओट रुकती है,

बात जब ऊपर पहुँचती है, तो पूरी बस्ती झुकती है।

नीचे सब चुपचाप हैं, जैसे गहरा कोई सन्नाटा हो,

पर ऊपर छत पे चर्चा है, चाहे जो भी नाता हो।


संभल कर बोलना 'राही', यहाँ पत्थर भी सुनते हैं,

मगर खबरें तो अब ये आसमां, छतों से ही चुनते हैं। 


- अमितेश 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें