शनिवार, 28 मार्च 2026

गुमान

उतर के आ भी जा 

अब चांदनी की सीढ़ी से,

बहुत हुई ये दूरियां, 

कई सदी, कई पीढ़ी से। 


ये दाग़ - वाग छोड़ दे 

तू आसमां के सीने पे,

आ, एक शाम तो बिता, 

मेरे आँगन के दरीचे पे। 


मेरे सिरहाने बैठ, 

ज़रा अपनी भी तू सुना,

कि कैसा लगता है 

तन्हा रात भर जगने में। 


तुमने तो देखे होंगे 

ऊपर से हसीं मंज़र हज़ारों,

पर क्या सुनी भी है 

कभी धड़कन हमारे?


तू कहता है कि तुझे देख 

दुनिया सुकून पाती है,

पर तेरी शीतलता तो बस 

आंखों तक ही आती है। 


ठहर... तुझे आज एक 

राज़ की बात बताता हूँ,

चल तुझे आज मैं 

अपने चाँद से मिलवाता हूँ। 


वो देख, जो कोने में 

हया का आँचल ओढ़े बैठी है, 

जिसकी एक झलक को, 

ये रात सदियों से प्यासी है। 


तू तो पत्थर है, बेजान है, 

बस धूप का मारा है,

वो तो मेरे जीने का ज़रिया, 

मेरा अप्रतिम सहारा है। 


तेरी चांदनी में ठंडक की 

एक मर्यादा, एक सीमा है,

उसकी नज़रों का सुकून, 

रूह तक धीमा - धीमा है। 

 

वो जो ज़ुल्फ़ें संवारती है, 

तो घटायें शरमाती हैं,

तेरी अद्भुत चमक भी 

उसकी एक मुस्कान से मात खाती हैं। 


मेरा चाँद, जो बादलों के पीछे 

कभी नहीं छुपता,

जिसका नूर ढलती अमावस में

भी नहीं रुकता। 


उसमें कोई दाग नहीं, 

एक सादगी का घेरा है,

उसकी एक झलक से 

मेरी दुनिया में सवेरा है। 


ओ  फ़लक के चाँद! 

देख और ख़ुद फैसला कर,

किसे मुकम्मल कहूं, 

तू ही ज़रा गौर कर। 


तू चमकता है की 

दुनिया तुझे देख सके,

वो चमकती है की 

रोशन मेरी दुनिया हो सके।


तू है फ़लक का सुल्तान, 

पर मेरा दावा सच्चा है,

मेरा ये अपना चाँद, 

तुझसे लाख गुना अच्छा है।


अब  जा, वापस लौट जा 

अपने सूने वीरान गगन में,

कि तेरा गुमान टूट गया है 

आज मेरे आँगन में। 


- अमितेश 


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