अब तक तो तुम प्यादे थे, हालातों की बिसात पर,
पर अब हुकूमत तुम्हारी होगी, अपनी हर एक बात पर।
वो जो मन की अंधेरी कोठरी में, तुम घुटने टेके बैठे थे,
वो वक़्त गया जब तुम हार को, तकदीर समझ बैठे थे।
उठो कि अब तुम्हें, अपना खोया हुआ राज्य पाना है,
उस गुलाम को मारकर, अब भीतर का 'सुल्तान' जगाना है।
तुम्हारे संकल्प की तलवार पर, अब किसी का ज़ंग नहीं,
तुम अकेले ही लश्कर हो, तुम्हें चाहिए कोई संग नहीं।
ये जो खौफ का किला था, ये तो बस रेत का शेर है,
तुम्हारी एक गर्जना के आगे, ये सन्नाटा भी ढेर है।
वो जो 'शायद' और 'मगर' की, धुंध मन में छाई थी,
काट दो उसे बिजली बनकर, जो तुम्हारी अपनी परछाई थी।
अपने वजूद के परचम को, अब अर्श तक फहराना है,
गुलामी की हर एक राख से, अब नया सूरज बनाना है।
अब खौफ सजदा करेगा, उस इंसान के हुजूर में,
जो तपकर कुंदन हुआ है, अपने ही आत्म-नूर में।
न कोई जंजीर दिखेगी, न कोई कैद का साया होगा,
तुमने खुद को जीतकर, आज पूरे जहान को पाया है।
शतरंज पलट चुकी है, अब चाल तुम्हारी अपनी है,
ये जो नई जागृति है, ये मिसाल तुम्हारी अपनी है।
- अमितेश
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