दीवारें बहरी हैं, लोग अंधे हैं यहाँ,
पत्थरों के शहर में, पिघलता दिल कहाँ?
चीखती हैं हसरतें, पर कोई सुनता नहीं,
मलबों के ढेर में, अब ख़्वाब कोई बुनता नहीं।
खिड़कियाँ तो बहुत हैं, पर झांकता कोई नहीं,
भीड़ बहुत है सड़कों पर, पर साथ चलता कोई नहीं।
दिखता है सबको तमाशा, पर दर्द दिखता नहीं,
अंधों के इस बाजार में, आईना बिकता नहीं।
गूँगी है जुबां सबकी, और बहरे कान हैं,
ऊँची इमारतों में कैद, छोटे-से इंसान हैं।
अपनी ही प्रतिध्वनि से, डरने लगा है आदमी,
दूसरों की आग में, हाथ सेंकने लगा है आदमी।
वक़्त की धूल ने, सब चेहरों को ढँक दिया,
इंसानियत को हमने, तिजोरी में पटक दिया।
पर याद रखना ऐ मुसाफ़िर, ये सन्नाटा बोलेगा,
जब वक्त अपनी आँखें, और ये दीवारें कान खोलेगा।
-अमितेश
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