बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

कृष्ण द्वन्द

मौन खड़ा है स्वर्ण द्वारका, रत्नों का अम्बार यहाँ 

शीतलता ढूँढ रहा है मन की, शीतल यमुना - धार कहाँ?

नीलम - सा यह वक्ष आज क्यों, विरह - ताप में जलता है?

मृदु स्मृतियों के झोंको से, उर का धीरज ढलता है। 


वो माखन की मटकी टूटी, वो गोधूलि की बेला,

सहस्त्र भीड़ में भी, मन आज खड़ा है अकेला। 

अधरों पर वह वेणु सोई, जिसमें गूंजती थी राधा,

राजमुकुट की भारी गरिमा, बनी ह्रदय की अथक बाधा। 


झिलमिल करते नयन - नक्षत्रों में, गोकुल का आभास बसा 

उमड़ रहा है अब रह - रह कर, अंतर्मन में उच्चवास बड़ा। 

क्या वे कुंज अभी भी वैसे, विहंगो से भर भर जाते होंगे?

क्या बाल - सखा अब भी मुझको, वन - पथ पर बुलाते होंगे?


मैं जग का स्वामी, पर स्वयं से आज पराया हूँ 

कंचन कानन में भी बैठ कर, बस अपनी ही छाया हूँ 

नीरव रजनी की ओट में, सिसक रही मेरी तरुणाई 

आज द्वारका के वैभव पर, ब्रज की धूलि ही है सुखदाई। 

***

अंशुमाली की स्वर्ण - रश्मियाँ, द्वारका के प्रासाद पर,

पर मन का पंछी अटका है, यमुना के उस पार पर। 

एक ओर है पट्टमहिषी, मर्यादा का स्वर्ण - पाश 

एक ओर वह मयूर - पंख, विरह - भरा विस्तृत आकाश। 


एक जो सत्य है, अधिकारी मेरी अर्द्धांगिनी 

एक जो स्वप्न है, सिहरन है मेरी अनुरंजिनि 

एक मांगती वर्त्तमान है, सेवा और समर्पण का दान 

एक ले गयी छीन ह्रदय से, वामषि की मीठी तान। 


जब रुक्मिणी के कर - कमल, चरणों को सहलाते हैं 

तब ब्रज के काँटों के छाले, रह - रह टीस जगाते हैं 

राजमहिषी के स्वर्ण - कंगन की, जब झंकार गूंजती है 

कानों में राधा की पायल, मौन खड़ी कुछ पूछती। 


"हे नाथ! पुकारती रुक्मिणी, जब आदर के घेरे में, 

मैं खो जाता हूँ, "कान्हा" पुकार में, उस ऊषा के अँधेरे में 

एक ओर विधि का विधान है, महल और सिंहासन है,

एक ओर वह निश्छल प्रेम, वह अकुलाता यौवन है। 


कैसी विवशता है मेरी, कैसा यह विस्तार है?

एक को दे दी देह अपनी, एक में संसार है 

रुक्मिणी की आँखों में दिखता, मुझमे मेरी आत्मा 

राधे के आँसू कहते हैं, तुम ही मेरी अखंड आत्मा। 


दो पाटों के बीच पीस रही, मेरी मोहन - मुरली आज,

एक ओर है प्रेम की पीड़ा, एक ओर है कुल का लाज। 

मैं द्वारकाधीश होकर भी, सबसे बड़ा दरिद्र हूँ,

स्वयं के ही दो रूपों में, बँटा हुआ चरित्र हूँ। 

***

ना कोई राधा, ना रुक्मिणी, न मोहन का आधार 

मिट गया सब नाम - रूप, बस शेष रहा विस्तार 

एक बिंदु पर आकर थमी, तीनों दिशाओं की धार 

जहाँ ना विरह की वेदना, ना मिलन का उपहार। 


एक जो देह की छाया बनकर रक्षक खड़ी 

एक जो प्राणों की लय बन स्मृति तंतु में जड़ी 

दोनों के मध्य खड़ा वह, नीलम - सा अविनाशी,

एक का है वो द्वारकाधीश, एक का ब्रजवासी। 


जब राधा की सिसकी गूँजी, यमुना के सूखे तट 

रुक्मिणी के नयनों से छलका, पीड़ा का मधु - घट 

रुक्मिणी ने जब थामा हाथ, प्रभु का करुणा से भर,

राधा ने महसूस किया वहां, अपना ही सुखद अधर। 


"मैं कौन हूँ?" पूछता कान्हा, स्वयं के अंतर में,

एक अंश मेरा महल में, एक वन के निर्झर में। 

देखो जब ध्यान से, तो तीनों एक ही सार,

जैसे एक ही सिंधु की, हों लहरें अपरम्पार। 


रुक्मिणी का त्याग बना, राधा का अमिट सुहाग,

राधा का वैराग्य बना, रुक्मिणी का अनुराग। 

दो दीप जल रहे, एक ही ज्योति की लौ बनकर,

कृष्णा बिखर गए चराचर में, प्रेम की परिभाषा बनकर। 


- अमितेश  


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