शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

नहीं

तेरे बिन भी कट ही गए शब - ए - रोज़ (दिन और रात) मेरे 

तेरी याद का अब न कोई मरहम, कोई ज़राहट (ज़ख्म) नहीं 

 

ख्वाबों की बस्ती से तेरा अक्स मिटा दिया मैंने 

दिल के उजड़े नगर में, तेरी अब सकूनत (बसेरा) नहीं 


बहुत रोये थे कभी तेरी एक बसारत (eye sight) की खातिर 

अब इन आँखों में, वो पहली सी हसरत नहीं 


गिरना चाहो तो शौक़ से गिरो खुद की नज़रों में 

मेरा हाथ थामने की, अब तुझे इजाज़त नहीं 


खुश हूँ अपनी तन्हाइयों के इस सुकून में अब 

जा कि अब मुझे, तेरी कोई ज़रूरत नहीं। 


- अमितेश 

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