मंदोदरी की व्यथा
सोने की लंका जलती थी,
मैं भीतर ही भीतर घुटती थी
पति का गर्व बड़ा था इतना
मैं पल - पल हाथ मलती थी।
मैंने रोका था, मैंने टोका था
सीता को भेजो हर बार कहा था
पर दशानन के अहंकार ने
हर सीख को ठोकर मारा था।
मैं मयासुर की बेटी थी
विद्वान की भार्या, राज - रानी थी
पर विधि का लिखा देखो जरा
मेरी किस्मत में वीरानी थी।
मेरा बेटा गया, मेरे भाई गए
एक जिद ने सबको निगल लिया
जिस महल में गूंजती खुशियां थी
वहां मौत ने डेरा डाल लिया।
मैं सती थी, मैं पावन थी,
फिर भी ये कैसा अन्याय हुआ?
रावण के पापों के प्रतिफल में
मेरे सुहाग का ह्राष हुआ।
लोग कहते थे वो असुर था
पर मेरे लिए मेरा संसार था वो
उसकी हर भूल के पीछे कहीं
मेरा खामोश सा प्रतिकार था।
हाय राम तुम क्यों आये हो
मेरे सिंदूर को हरने को
ले जाओ सिया को संग अपने
मेरे सुहाग का प्रतिदान करो।
जो रावण को सजा दी तुमने
एक वाण मुझपे भी तज देना
संग अपने मैं भी पिया के फिर
मर के मुक्ति पाऊँगी।
सीता संवाद
अशोक वाटिक की उस छांव में
मंदोदरी जब सिया से मिलने आयी थी
एक तरफ था राज - वैभव
एक तरफ व्यथा परायी थी।
मंदोदरी बोली -
हे मैथिली! हे जनकनंदनी!
लंका पर क्यों ये कहर ढाया है?
लौटा दो मेरे पति का गर्व
क्यों इस क्रोध को जगाया है।
मैं जानती हूँ तुम सती हो
तुम्हारे चरण में पावन धार है
पर मेरे पति का मोह देखो
उसे विनाश से ही प्यार है।
एक बार कह दो तुम राम से
की लौट जाएं वो वन की ओर
मैं बाँध लुंगी रावण को
मेरी ममता की कच्ची डोर।
सीता ने तब आँखें खोली
शांति की एक मूरत थी वो
मंदोदरी के दुःख को देख
करुणा की एक सूरत थी वो।
हे देवी! तुमने सही कहा
पर धर्म की मर्यादा न्यारी है
रावण ने जो पाप किया है,
अब उसके अंत की बारी है।
तुम्हारा सुहाग तुम्हे है प्यारा
पर जगत का हित भी देखना है
अहंकार की इस लंका को
अब मिट्टी में ही मिलना है।
तुम धान्या हो, तुम ज्ञानी हो
पति - धर्म तुमने खूब निभाया है
पर विधि का लिखा अटल है देवी,
जो आया है, उसे अब जाना है।
तुम जीवन अपना सफल ही मानो
रावण को मुक्ति पुरुषोत्तम देंगे
अहंकार का अंत सुनिश्चित
ज्ञान प्रभु यह जग को देंगे।
तुम्हारी सतित्व अमर रहेगी
कुल का नाम तुम्ही से रोशन
तुम इस काल को अमिट ही मानो
समय ने लिखा जिसे, अचल है।
मंदोदरी का तांडव
लंका की रानी गरजी तब
हे जनक - सुता ये क्या कह डाला?
एक तपस्वी के कारण तूने,
सोने की पुरी को जला डाला।
मेरे पति का बल पवन - वेग
कैलाश उठाया जिसने भुज - बल से
तुम राम - राम की रट लगाए
जीतोगी कैसे इस छल से।
युद्ध की भेरी बज चुकी है
रक्त की नदियां बहेंगी अब
यदि प्राण बचाना चाहती प्रभु की
शरण में रावण के दोनों आओ अब।
मंदोदरी मैं, दैत्य - राज की
पति - धर्म में हूँ बन ढाल खड़ी
सीता! लौटा दो मेरा सुहाग,
वर्ना तेरी मृत्यु मैं बनु अभी।
सीता की आँखों में ज्वाला थी
मर्यादा की वो हाला थी
बोली वो - सुनो लंकेश्वरी
ये पाप की काली माया थी।
राम का धनुष जब खींचेगा
ब्रह्माण्ड थर - थर कांपेगा
रावण का दस शीश अब तो
धरती की धूल ही चाटेगा।
मैं अबला नहीं, मैं शक्ति हूँ
मैं रघुवंशी की शान हूँ
तुम्हारे पति के काल का,
मैं ही तो प्रथम निशान हूँ।
युद्ध नहीं ये न्याय है देवी
अधर्म का सर कुचलना है
अब रावण को मरना होगा
लंका को अब जलना होगा।
रण भेरी का उद्घोष
मंदोदरी की आंख जली
"सीते! तुमने काल बुलाया है
लंका के इस वीर - भूमि पर
क्यों मृत्यु का जाल बिछाया है।
मेरे दशानन के आगे
टिक पायेगा वो वनवासी?
जिसने इन्द्र को जीत लिया
उसे डराती है ये अबला नारी।
अभी समय है, मान लो मेरी
शरणगति ही एक साधन है
वर्ना ये लंका रक्तरंजित
और विधवाओं का ये क्रंदन है।
मेरा पुत्र मेघनाद खड़ा है
इंद्रजीत वो वीर कहलाये
राम के लक्ष्मण को पल भर में
यमराज के द्वार वो पहुंचाए।
सीता का स्वर तब गूँज उठा,
जैसे कर्कश बिजली कड़की हो
बोली - मंदोदरी! सुन लो ध्यान से
अब न्याय की ज्वाला भड़कायी हो।
जो इंद्र को जीता, वो अभिमान था
पर नारायण से जो टकराएगा
वो दशानन हो या त्रिलोक - विजयी
मिटटी में ही मिल जायेगा।
तुम्हे पुत्र का दम्भ बड़ा है
पर मेरा लखन शेषनाग खड़ा
लक्ष्मण के एक ही वाण से अब
वो होगा धरती पर पड़ा।
ये युद्ध नहीं, ये शुद्धिकरण है
पाप का घड़ा अब भरना है
मंदोदरी! अब देखो तुम
कैसे अधर्म को मरना है।
सत्य का बोध
मंदोदरी ने जब देखा
सीता का रुप विराट हुआ
क्षण भर में उसके भय का
सिद्ध - शुद्ध साक्षात हुआ।
सीता बोली - सुनो रानी!
ये युद्ध नहीं, ये काल है
जो रावण ने है बुना
ये उसकी मौत का जाल है।
तुम कहती हो वो विजयी है
जिसने देवों को जीता है?
पर वो भूल गया की उसने
स्वयं जगदम्बा को खिंचा है।
वो दस - शीश का ज्ञान कहाँ
जब बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है?
जब पाप का पर्वत बढ़ता है
तब पृथ्वी स्वयं घबराती है।
मंदोदरी का मस्तक झुका
आंखों में नीर की धारा थी
जो गर्व अभी तक बोल रहा था
अब हार की उसमे प्रतिछाया थी।
हे जानकी! मैं हार गयी अब
मेरा पति मोह ही अंधा था
मैं बचाने आयी थी जिसे
उसने स्वयं बुना मौत का फंदा था।
तुम राम की शक्ति, तुम ही धरा
इस सृस्टि की आधार प्रभु
मेरे सुहाग की रक्षा कर दो
हे करुणामयी! कर दो विभु।
सीता ने तब करुणा दिखाई
मंदोदरी! तुम धन्या हो
पति के पाप प्रचंड सही
पर तुम अचल प्रेम का अन्या हो।
विधि का विधान न टलता है
पर तुम्हारा नाम अमर होगा
जब - जब होगी सतियों की बात
मंदोदरी का सम्मान प्रथम होगा।
रावण वध
रणभूमि में धुल उड़ी
जब दशानन धरती पर गिरा
धर्म की विजय हुई आज
और अधर्म का ध्वज थमा
मंदोदरी यह सुन दौड़ी आयी
अश्रुपूरित हो देख पति की ये दशा
हे नाथ! मैंने रोका था
बोली वो करुणा में अपनी व्यथा।
रावण ने तब आँखे खोली
मुख पर अब वो गर्व न था
एक महा - पंडित पड़ा था वहां
जो अब तक केवल राक्षस था।
मंदोदरी! तुम सत्या थी
मैं मोह के अंधेरे में था
जिस सीता को मैं लाया था
वो मेरे काल का घेरा था।
मेरा ज्ञान, मेरी शक्तियां
सब मिटटी में मिल गयी आज
मैंने अपने ही हाथों से
उजाड़ दिया अपना घर, अपना राज।
मुझे क्षमा करो हे देवी!
मैंने तुम्हारे दुःख को ना जाना
एक जिद्द के पीछे मैंने
तुम्हें विधवा होना माना।
तुमने हर पल राह दिखायी
मैंने अहंकार में ठुकराया
आज जब मैं हूँ मृत्यु सय्या पर
मैंने अपना दोष ही पाया।
मंदोदरी की गोद में सर रख
दशकंध ने ली अंतिम सांस
एक युग का अंत हुआ तब
टूट गया जो झूठा अहंकार।
सीता संवाद
दैत्येन्द्र के वध से लंका में
घनघोर मेघ गर्जन हुआ
लंका की उस स्वर्ण - पुरी में
एक भयंकर क्रंदन हुआ।
मंदोदरी आयी सीता के पास
आंखों में अश्रु - धार थी
जो कल तक लंकेश्वरी थी
आज वो एक विधवा की पुकार थी।
मंदोदरी तब बोली -
"हे मैथिलि! देखो जरा
मेरे सुहाग का क्या अंजाम हुआ
जिसके जिद्द ने तुम्हे यहाँ लाया
उसके अंत से मेरा जीवन समसान हुआ।
आज मैं सब कुछ हार गयी
मेरा वंश, मेरा मान गया
एक नारी के अपमान के बदले,
आज मेरा स्वाभिमान गया।
सीता ने करुणा से देखा
मंदोदरी का हाथ थामा
बोली - हे देवी! इस विषाद में
सृस्टि का ही नुकसान हुआ
रावण ज्ञानी था, स्वाभिमानी था
पर ज्ञान का उसने दुरुपयोग किया
जन कल्याण के काम आना था
उसने ज्ञान का स्वयं उपभोग किया।
रावण ने जो किया अधर्म
उसका दंड तो निश्चित था
पर तुम्हारी भक्ति और मर्यादा
लंका का असली अमृत था।
तुम शोकाकुल अब ना हो मंदोदरी
तुम्हारा नाम अब अमर रहेगा
सतियों की गाथा में
तुम्हारा स्थान प्रथम होगा।
मंदोदरी इस दुःख विषाद में
सीता के चरणों में पसर गयी
मिल जाये उसको अब तर्पण
अभिलाषा में वो अशर गयी।
उत्तरार्द्ध
सोने की लंका राख हुई अब
और राख हुआ वो अभिमान
मंदोदरी खड़ी थी अकेली
लेकर अपना बिखरा जहान।
पति - वध का वो आक्रांत दृश्य
आंखों में अब भी बाकी था
किसने काल को कभी बांधा था
आज वो मृत्यु का साथी था।
वो रोती, वो चिल्लाती थी
हे नाथ! ये क्या अनर्थ हुआ?
मेरी हर सीख, मेरी हर प्रार्थना
सबका अर्थ ही व्यर्थ हुआ।
पर नियति का खेल बड़ा निष्ठुर
अब रोने से क्या होना था?
जिसने अधर्म का बीज बोया
उसका यही फल तो होना था।
राम ने तब संदेशा भेजा
बिभीषन को बुलाया पास
"मंदोदरी का मान ना टूटे
वरना होगा धरम का नाश।
मंदोदरी ने देखा नया सवेरा
पर उसमे वो अब चमक न थी
लंका का राज - पाट तो मिला
पर रावण की वो खनक न थी।
नियति ने उसे बनाया
विभीषण की परम - परामर्शदाता
लंका को पुनःस्थापित करने में
वही बनी अब भाग्य विधाता।
सीता के आशीष के चलते
पंचकन्या में उसका नाम हुआ
अपने सतित्व से वापस उसने
लंका में धर्म का काम किया।
स्त्रित्व का हमेशा मोल बहुत है
पुरुषत्व में है अहंकार बसा
रावण जलता हर वर्ष अब भी
मंदोदरी है पर्याय सतित्व का।
आज वैभव और सुख की
चारो और बौछार बहुत है
मंदोदरी के हिय के अंदर
एकांकी ही वो रावण बिन है।
- अमितेश
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