जब तुम रेशमी साड़ी के पल्लू को
अपने बाएं कंधे पर डाल देती हो,
लगता है जैसे किसी निर्मल धारा ने
पहाड़ की ढलान से दोस्ती कर ली हो।
सिले हुए कपड़ो के बंधन से परे,
ये छह गज का विस्तार तुम्हारे अंगों पर
जब सरसराता हुआ लिपटता है,
तो समय की गति थोड़ी धीमी हो जाती है
और फ़िजा में एक अनकही सुगंध घुल जाती है।
तुम्हारी कमर पर नज़ाकत से बंधी वो नाजुक सिलवटें,
मानो तीस्ता की बेपरवाह लहरें हों
जो बलखाती है तुम्हारे हर कदम के साथ
बड़े ही अदब से, छोड़ अपनी रौबदार रवानी
और मुझे बहा ले जाती है एक अपार मंजिल तक।
वो रेशम की चमक तुम्हारी त्वचा से
एक गहरा संवाद करती है।
मेरी आंखों की चुगली कर जाती है,
जब चमकती सी वो रेशम
मेरे चेहरे पर अपना प्रभाव फैलाती है।
जब तुम अपनी बिखरी हुई जुल्फों को
एक झटके से पीछे कर लेती हो,
और साड़ी का वो चमकता हुआ किनारा
तुम्हारे मुखड़े को घेर लेता है,
तो पूनम का चाँद भी पिघल कर बरस जाता है बेनूरी में।
आंखों में काजल, माथे पर बिंदी
और वो धानी रंगों वाली साड़ी,
बहार में भी फुहार ला देती हैं इस प्रकृति में।
ये लिबास नहीं, एक पूरी सृष्टि है
जो खुद को तुम्हारे व्यक्तित्व में समाहित कर जाती है।
वो तेरी पाज़ेब की रुनझुन - रुनझुन
और साड़ी के रेशमी घेरे का जमीन को चूमना
मेरे मन के कवि को और आशिक बना जाता है
जब तुम्हारी लचक से बलखाती वो साड़ी
वातावरण में एक संगीत बिखेर जाती हैं।
तुम्हारी उँगलियाँ जब साड़ी की चुन्नटों को
सवांरती है बड़े इत्मिनान से,
कोई कलाकार अपनी अनुपम कृति को
आखरी रूप दे रहा हो मानो
और खुद को आत्मसात कर रहा हो उन चुन्नटों में।
श्रृंगार रस के सारे रंग फीके हैं
जब तुम उस सादगी में सामने आती हो।
तुम एक साड़ी नहीं पहनती
बल्कि साड़ी तुम्हे धार कर
धन्य हो जाती है।
- अमितेश
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