मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

कैकेयी का पश्चाताप

वरदान के उस भयंकर क्षण में,

मैं क्या थी और क्या हो गयी?

पुत्र - मोह की अंधी आंधी में 

मैं अपना सर्वश्व ही खो गयी। 


रघुवर को वन भेज मैंने 

कैसा ये कर्कश काम किया?

अयोध्या की खुशिओं का सूरज 

मैंने ढलने पर मजबूर किया। 


दुनिया मुझे मंथरा कहेगी 

मंथरा बन रहूंगी यादों में 

पर कौन देखेगा वो आंसू 

राम के मोह में जो बहती रातों में। 


भरत ने मुझको त्याग दिया 

मुझे माँ कहने से इंकार किया 

स्वर्ण महल अब समशान लगे 

मैंने कैसा ये संसार किया। 


मैं दोषी हूँ, मैं पापी हूँ 

सरयू की धारा से भी ना धूल पाऊँगी 

राम की ममता के छाँव बिन 

मैं चैन से कैसे सो पाऊँगी 


राम अगर तुम सुन पाते हो 

तुम ही मेरा उद्धार करो 

जैसे अहल्या को छु तुमने ताड़ा 

मुझे मुक्ति दे मेरा शापोद्धार करो। 


- अमितेश 




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