शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

तमाम

जो ज़ंजीर थी चाहत की, वो अब तोड़ दी मैंने 

तेरी गली को जाती, हर राह मोड़ दी मैंने 


मिन्नतें करता था कभी, कि तुझे खो न दूँ कहीं 

तेरी याद भी अब अपने ज़हन से छोड़ दी मैंने 


तू लौट कर भी आए, तो क्या हासिल होगा?

मेरे ज़मीर में अब तेरी, कोई क़ीमत भी नहीं 


जा कि अब मुझे, तेरी कोई ज़रूरत नहीं। 


- अमितेश 

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें