जो ज़ंजीर थी चाहत की, वो अब तोड़ दी मैंने
तेरी गली को जाती, हर राह मोड़ दी मैंने
मिन्नतें करता था कभी, कि तुझे खो न दूँ कहीं
तेरी याद भी अब अपने ज़हन से छोड़ दी मैंने
तू लौट कर भी आए, तो क्या हासिल होगा?
मेरे ज़मीर में अब तेरी, कोई क़ीमत भी नहीं
जा कि अब मुझे, तेरी कोई ज़रूरत नहीं।
- अमितेश
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