मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

पारकर पेन

कब पापा सुपर हीरो से सुपर जीरो हो गए थे, सुकृत को पता भी नहीं चला. 

याद है ना कैसे पापा अपनी साइकिल में आगे की रॉड पे एक छोटी सीट लगा लाये थे. तब सुकृत कितना खुश हुआ था. लगा की पापा कितना ध्यान रखते हैं उसका. जब वो उस छोटी सीट पर बैठ कर शहर घूम जाता था, दोनों हाथ हवा में फैलाये, उसे लगता की उस एक पल को वो सुकृत नहीं सुपर कमांडो ध्रुव हो गया है. पापा साइकिल पर पैंडल भी जब मारते तो साइकिल हवा से बात करती. सुकृत उस छोटी सीट पर बैठ जैसे हवा में उड़ रहा होता. कभी एक हाथ से अपने उड़ते बालों को आँखों से हटाता कभी पीछे छूटते लोगों को मुँह चिढ़ाता. तब लगता पापा सच में सुपर हीरो हैं. उसके किसी भी दोस्त के पापा की साइकिल में आगे की रॉड पर छोटी सीट नहीं लगी थी. वो इस मामले में खुद को अपने सब दोस्तों से बेहतर मानता था. 

जब स्कूल में Attendance लगाई जाती और उसका नाम "सुकृत" पुकारा जाता तो कितना गर्व से खड़ा हो कर वो "Present Miss" बोलता. गर्व क्योंकि उसका नाम क्लास में सबसे अलग था और शायद सबसे बेहतर भी, कम से कम वो तो यही सोचता था. यह नाम भी उसके पापा ने ही दिया था - सुकृत. उस दौर में जब सबके नाम प्रसून, मिथिलेश, रामेश्वर होता था, उसके पापा ने कितना नया नाम रखा था... एकदम Unique, कितने अलग थे ना उसके पापा. सबसे अलग, सबसे अच्छे. 

सबसे अच्छा तो उसे तब लगता जब नयी क्लास में जाने पर उसकी सारी कॉपी क़िताब नयी होती और एक Sunday को बैठ कर पापा उसकी सारी कॉपी क़िताब पे रंग बिरंगे जिल्द लगाते थे. पता नहीं कहाँ कहाँ से रंग बिरंगे मोटे कागज पापा खरीद कर लाते थे, जिल्द लगाने के लिए. एक Subject की कॉपी - किताब पे एक रंग का ही कवर लगाते थे. फिर उस पर सलीके से Name Plate चिपकाते और सब पर स्केच पेन से उसका नाम, स्कूल का नाम, कक्षा  और सब्जेक्ट लिखते थे. कितनी अच्छी Handwriting थी पापा की. फिर उस कवर के ऊपर सैलोपिन पेपर का कवर लगाते कि कवर समय के साथ गंदा ना हो जाये. तीन तीन के सेट बन जाते थे रंग बिरंगे कॉपी किताबों की - एक CW, एक HW और एक उस सब्जेक्ट के किताब की. फिर उसे सिर्फ सब्जेक्ट के कवर का कलर याद रखना होता था - और झट से वो कॉपी बैग से बाहर. बार बार उसे कॉपी निकाल निकाल कर खोल कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी की सही सब्जेक्ट की कॉपी निकाली है या नहीं. कितने अलग थे ना पापा. शायद सुपर हीरो से भी बेहतर. उसकी देखा देखी उसके कुछ दोस्तों ने भी Colorful कवर लगानी शुरू कर दी थी अपनी पुस्तकों पर. लेकिन वो कवर ख़ुद लगाते थे उनके पापा नहीं और फिर उनमे वो बात भी नहीं होती थी जो सुकृत की पुस्तकों में होती थी.

फिर उसके पास मार्बल पेन्सिल थी जो पापा ने ला कर दिया था - वो भी Colorful - Orange, Yellow, Green कलर की. उसके पीछे Eraser भी लगा था. कितना ध्यान रखते थे वो उसका. सुकृत भी पापा से चिपके बिना सो नहीं पाता था. उसे लगता की एक दिन वो भी पापा की तरह ही सुपर हीरो बनेगा. सबका ख्याल रखने वाला. हर चीज को अलग ढंग से करने वाला.

आज भी याद है उसे जब पापा ने Second Hand Scooter ख़रीदा था. Bajaj का Scooter. हालाँकि तब तक उसके कुछ दोस्तों के पिता ने भी Scooter खरीद लिया था लेकिन उसके पापा का Scooter सबसे Best था.
वो एक समय था जब पापा की हर बात अलग लगती थी, निराली लगती थी. और आज वो समय है जब लगता है की व्यर्थ ही पापा को सुपर हीरो समझते रहे थे. पापा सुपर हीरो बिलकुल नहीं हैं. वो एक आम इंसान हैं. सड़क पे चलते किसी भी इंसान की तरह. पापा की साइकिल पे तेजी से चलते समय पीछे जाते किसी भी इंसान की तरह... जिसका वज़ूद उतनी ही देर तक रहता है जितनी देर तक नज़र उस पर टिकी रहती है. मेरे पापा सच में एक Ordinary Man हैं. कोई सुपर हीरो नहीं हैं. बेकार ही उन्हें इतना Importance देता रहा था मैं.

पता नहीं ऐसी कितनी बातें सुकृत के दिमाग में चल रही थी. वो अपनी काले पीले रंग वाली Street Cat Cycle पे पैंडल मारता हुआ तेजी से घर की तरफ जा रहा था.
Street Cat Cycle भी तो पापा ने ही खरीद कर दी थी ना उसे. जब ये साइकिल घर आयी थी तो जैसे वो सातवें आसमान पे था. कितने शान से पापा ने कहा था - "अब तुम हाई स्कूल में आ गए हो, तो अब इस साइकिल से स्कूल जाना."
सुकृत तो अचानक ही अपने स्कूल में सबसे अलग लोगों में शामिल हो गया था. कुछ ही बच्चे थे स्कूल में जिनके पास सीधी हैंडल वाली साइकिल थी और उनमे से भी दो - एक लड़कों के पास Street Cat Cycle. उन दो - एक लड़कों में वो एक हो गया था. रोज वो सुबह सुबह अपनी साइकिल को ग्रीस से चमकाता था. और स्कूल जाने से पहले भी एक बार साफ़ करता था. हालाँकि उसे उस वक़्त ये समझ में नहीं आया की घर में साइकिल आते ही पापा का स्कूटर क्यों घर से बाहर नहीं निकलने लगा था. क्यों स्कूटर की थोड़ी सी Servicing का काम पापा ताल रहे थे? क्यों पापा अब ऑफिस आधा घंटा पहले निकलने लगे थे. असल में वो अब कोई सुपर हीरो नहीं थे, शायद इसलिए.

क्या माँगा था उसने पापा से - एक पारकर पेन ही ना. कौन सी दौलत मांग ली थी उसने पापा से. सौ रुपये की भी नहीं थी वो पेन. सिर्फ 99 रुपये की थी. पिछले एक महीने से टाल रहे थे - अच्छा कल ले आऊंगा, परसों मैं पैसे देता हूँ तुम खुद खरीद लेना.

पापा जितना ध्यान पहले रखते थे मेरा अब नहीं रखते. परकार पेन तो सिर्फ एक चीज है. ऐसी छोटी छोटी कई चीजों को पापा टालने लगे थे. पिछली दफा जब मैंने Super Commando Dhruv और नागराज के Comics Digest की बात की थी तो भी वो टाल गए थे. अब मेरे पापा सुपर हीरो नहीं रहे थे. वो सुपर जीरो हो गए हैं.

यही सोचता सोचता कब वो अपने पापा के ऑफिस के सामने से निकल गया पता ही नहीं चला. सुकृत को पापा की ऑफिस से घर का एक शार्ट कट रास्ता पता था. सोचा चलो उस रास्ते से घर चला जाता हूँ. ऐसे तो 8 KM का रास्ता है, इधर से निकला तो लगभग 6 KM में ही पहुँच जाऊंगा. यही सोचते सोचते उसने उस रास्ते पर अपनी साइकिल घुमा ली. साइकिल अपनी रफ़्तार में चल रही थी. उसके खयाल भी उसी रफ़्तार में चल रहे थे. हर वो उदाहरण जो पापा को सुपर हीरो से सुपर जीरो साबित करे उसके दिमाग में Slides की तरह चल रहे थे. जितना ही वो सोचता उतना ही उसका विश्वास अपने पापा से उठता जाता. तभी उसे दूर एक पहचानी सी आकृति आगे जाती दिखाई दी. अरे, ये तो पापा हैं शायद. पापा ही हैं. ये पैदल कहा जा रहे हैं. अचानक सुकृत की पैरों की रफ़्तार पैंडल पे धीमी हो गयी, और साइकिल भी. वो जानना छटा था की पापा पैदल कहाँ जा रहे हैं. वो छुपता छुपाता धीरे धीरे साइकिल चलाता पापा का पीछा करने लगा. पापा घर की ओर जा रहे हैं. वो सन्न रह गया. पापा ऑफिस से घर पैदल जा रहे हैं. तो क्या पापा रोज़ ऑफिस पैदल आने जाने लगे हैं? तभी वो ऑफिस के लिए थोड़ा पहले निकलते हैं इन दिनों. रोज 6 KM सुबह, 6 KM शाम को पैदल चल रहे हैं. किसलिए, की रोज ऑटो का 14 - 15 रुपये बचा पाएं. अब तो सुकृत को काटो तो खून नहीं. पता नहीं किन परेशानियों से गुजर रहे हैं पापा. एक बार मन किया की पीछे से पापा के पास पहुँच कर बोले की पापा आ जाओ, आप मेरी साइकिल की कैरियर पे बैठ जाओ, आज मैं आपको शहर की सैर करा लाऊँ. लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी पापा तक जाने की. उसने घर के पास के दूसरे रास्ते से तेजी से साइकिल निकाल ली. शायद इतनी रफ़्तार से सुकृत ने कभी साइकिल नहीं चलाई थी. आँखों से झर झर आंसू बहे जा रहे थे. लगा की सारी फसाद की जड़ वही है. समझ नहीं पा रहा था क्या करे की पापा को कोई तकलीफ ना हो. उन्हें ऐसा करने पर मज़बूर ना होना पड़े. लेकिन ये परिस्थितियां भी तो उसने ही पैदा की है. उसकी मांगें इतनी बढ़ गयी है इन  दिनों की पापा को एक - एक पैसा जोड़ने के लिए आज इतना पैदल चलना पड़ रहा है. स्कूटर नहीं बनवा पा रहे हैं.
अपने आंसुओं के समुन्दर में डूबता उतरता सोचता संभलता आखिर घर पहुँच हीं गया, पापा से पहले. साइकिल लगाया और दौड़ते हुए छत पे जाने लगा. माँ ने आवाज़ भी लगाई, पर अनसुना कर भागा वो. छत पे जा कर वो फूट फूट के रोने लगा. नहीं मेरे पापा आज भी सुपर हीरो हैं. और हमेशा रहेंगे. सुपर जीरो तो मैं हूँ. कितना कष्ट दिया है मैंने पापा को और पापा ने कभी उसे अभिव्यक्त नहीं किया, कभी उसे जानने भी नहीं दिया की वो कैसे दौर से गुजर रहे हैं. आज अचानक ही उसे लगने लगा की वो बड़ा हो गया है, सचमुच का. आज वो असल में हाई स्कूल का स्टूडेंट हो गया था. अब वो हर वो काम करने की कोशिश करेगा जो उसके पापा को ख़ुशी दे, सच्ची वाली ख़ुशी.
तभी माँ की आवाज़ आई - "सुकृत नीचे आ जा बेटा, पापा बुला रहे हैं तुझे. देख तेरे लिए क्या ले कर आये हैं."
जैसे तैसे अपनी सिसकियों पे काबू पा कर सुकृत ने अपना चेहरा धोया और भारी क़दमों से नीचे आ गया.
पापा ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठे हुए थे. उनके हाथ में एक लिफाफा था. वो उसे सुकृत की और बढ़ाते हुए बोले - "देख सुकृत, कलर तो पसंद है ना तुझे. नहीं तो मैं Return करवा कर तुम्हारी पसंद वाली रंग की ले आऊंगा."
कांपते हाथों से उसने लिफाफा ले कर खोला. एक खुबसूरत प्लास्टिक बॉक्स में नीले रंग का पारकर पेन था. 99 रुपये वाला नहीं, 199 रुपये वाला. पारकर पेन देखते ही न जाने कहाँ से उसकी आँखों से अश्रु की अविरल धारा बहने लगी. वो कस के पापा से लिपट गया. लगातार रोये जा रहा था. पापा उसके सर पे हाथ रखे उसके बाल सहला रहे थे.

- अमितेश  


शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

कुबूल है... कुबूल है... कुबूल है...

अलिका - अली की नेमत। मोहब्बत का पैग़ाम। हाँ, यही सोच कर तो नाम रखा था उसके अब्बा ने उसका - अलिका। 

होनहार लड़की जो पूर्णतया आत्मनिर्भर थी. समाज बदल रहा था, मुसलमान भी. सो उसके अब्बा ने उसे मदरसा नहीं कॉन्वेंट में भेजा था पढ़ने के लिए. सारी सुविधाएँ दी थी अपनी एकलौती औलाद को. एक मामूली सरकारी कर्मचारी होते हुए भी कभी कोई कसर नहीं छोड़ी थी अलिका के अब्बा ने उसकी परवरिस में. समाज बदल रहा था, शायद उनका समाज भी बदल रहा था. अलिका के अब्बा इन बदलावों का फायदा उठाना चाहते थे, अपनी गुड़िया के जीवन में बदलाव ला कर - एक सकारात्मक बदलाव ला कर. 
उसे और पढ़ाना चाहते थे. और बढ़ाना चाहते थे. अभी बारहवी में थी, अभी तो सिर्फ सत्रह की ही थी. अभी तो उसे और आगे जाना था - इतना आगे की किसी दिन उनकी department में Under Secretary बन जाये, B.P.S.C. निकाल ले. 
अलिका ने भी कभी निराश नहीं किया था अपने अब्बा को. खुब मेहनत कर के पढ़ती थी. उसकी दुनिया में हर चीज पढ़ाई के बाद आती थी. उसके अब्बू ने उसे बड़े ही आज़ाद माहौल में पाला था. सो क्या पहनना, कैसे रहना, किससे बात करना जैसी बंदिशें नहीं थी उस पर. हालाँकि इस आज़ादी ने उसमे और भी नम्रता, और भी शालीनता भर दी थी. 

बेटियां अक्सर वक़्त की रफ़्तार से भी तेज़ बड़ी हो जाती हैं. अलिका अपवाद नहीं थी. सत्रह की उमर तक पहुंचते - पहुंचते घर वालों के ताने मिलने शुरू हो गए थे. उनका बहनोई अपने लड़के से अलिका का निक़ाह पढ़वाने पर जोर देने लगा था. उनके बहनोई के बेटे शौफान ने बारहवी तक की पढ़ाई की थी. थोड़ी अंग्रेजी बोल लेता था. इलेक्ट्रॉनिक की दूकान कर रखी थी चांदनी चौक में. कम भी कमाता तो महीने का 25 - 30 हज़ार कमा लेता. 25 का हो गया था. सो उसके बाप को लगता की कहीं हाथ से निकल ना जाये लड़का. कही किसी ग़लत संगत में चला गया तो अच्छा न होगा. वैसे भी मुसलमानो को अपने बच्चों के ग़लत संगत में पड़ने का अंदेशा ज्यादा ही रहता है. ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी डालना ही एक तरीका है की लड़का हाथ से निकल ना पाए. 

अलिका के अब्बा उसका निक़ाह कतई इतनी जल्दी नहीं करवाना चाहते थे. अभी तो लड़की नाबालिग़ है. फिर उसके सपने भी अभी कहाँ जवां हुए हैं. लाख कोशिशों के बावजूद वो अलिका के निक़ाह को नहीं रोक पाए. शौफान के घर वाले अंततः इस्तिख़ारा करवा ही आये. न चाहते हुए भी इमाम ज़मीन की रश्म अदायगी करनी पड़ी अलिका के परिवार को. फिर मंगनी  और परिवार में शादी का माहौल. अलिका हालांकि थी तो आज की लड़की, लेकिन थी तो लड़की ही ना. हिंदुस्तान में महिलाएं भले ही पूज्यनीय हो पर बूत ही बनी रहती है. आवाज़ उनकी हमेशा दबाई ही जाती है. मुसलमानो में भले ही बुतपरस्ती न हो लेकिन उनकी धर्म ग्रन्थ की सारी रवायतें महिलाओं को ले कर और महिलाओ के लिए ही बनाये गए हैं. कितनों से लड़ती, सो अंततः हथियार डाल दिए अलिका ने. वैसे भी कोई वो पहली लड़की तो थी नहीं इस जहाँ में जिसके सपनों को परवाज़ नहीं मिल पाया. कई हैं सो वो भी है. उसके सपनों के टूटने से समाज को तो कोई फर्क पड़ता नहीं सो किसी ने परवाह की नहीं. 
मौत भले ही इंसान को क़ब्रिस्तान में ले जाये, जीते जी वो ख़ुद ही क़ब्रगाह बन कर घूमता है - जहाँ कई अरमान, कई सपने उसके अपने ही भीतर किसी कोने में दफ़न होते रहते - और ये सिलसिला उसके शरीर के अंत में क़ब्रिस्तान में जाने तक चलता रहता. 

दिन के नज़दीक आने तक बहनों - सहेलियों की चुहलबाज़ी शुरू हो गयी थी. देखते - देखते मंझा का दिन आ गया और हल्दी में लिपटा उसका सुर्ख़ शरीर पीला सा हो गया था. अब तो उसका कमरे से निकलना भी बंद हो गया. यही मंझा की रवायत थी. फिर मेहंदी और संचक की रश्में. शुरू - शुरू में तो अलिका ने प्रतिरोध किया चीजों का, पर धीरे धीरे उसे भी सब ठीक ही लगने लगा. शायद इसी वज़ह से शादी - निक़ाह की रश्मों - रिवाज़ कई दिनों के होते है की उत्सव सा माहौल सारे संताप को धो डाले और आप बस उन रश्मों रिवाज़ की गंगोत्री में बह वो अपने अतीत को भूल जाये. 

फिर पता ही न चला कब बरात आ गयी दरवाज़े पर और कब अलिका और शौफान दो अहलदा प्राणी से एक होने की राह पर चल निकले. अलिका की आँखों के सामने उसका सत्रह बरसों का अतीत और मृत सुनहरा भविष्य तैरने लगा. लगा जैसे बीच में लगी उस सितारों वाली चादर पे उसकी जीवन की फिल्म चल रही है, Sad Ending वाली फिल्म. वो समझ नहीं पा रही थी की दोनों मौलवी ख़ुतबा पढ़ रहे थे या कोई दर्द के गीत चल रहे थे. उसकी तन्द्रा तब टूटी जब मौलवी ने निक़ाह के कुबूलनामे के लिए अलिका की इज़ाज़त मांगी. 

कुबूल है... कुबूल है... कुबूल है... इस तीन बार के कुबुलनामे ने अचानक ही अलिका को एक लड़की से औरत बना दिया. बधाईयों के दौर चल रहे थे नेपथ्य में और अलिका हर बधाई के साथ परिपक़्वता लेती जा रही थी जैसे. एक अल्हड़ से उम्र में जब दिमाग़ सौ आसमान और कई तारे घूमता फिरता है, अलिका आरसी मुसाफ़ कर रही थी. वो क़ुरान - ए - पाक़ हाथ में लिए अपने धर्म और परिवार के लिए खुद को क़ुर्बान करने की कसमें खा रही थी. 

बदलते वक़्त ने अलिका को एक ठेंठ मुस्लिम औरत बना दिया दिए. था. लेकिन फिर भी उसकी दिल के किसी स्याह से कोने में आगे पढ़ने, B.P.S.C. निकालने की चाह हिलोरे मार ही देता. शौफान ने शुरू शुरू में तो अलिका की मदद की. उसे ग्रेजुएट बना दिया. लेकिन उसे यह भय था कि अलिका कहीं B.P.S.C. न निकाल ले. फिर तो समाज में शौफान की खिल्ली ही उड़ाई जाने लगेगी. ये सोच कर उसने अलिका  को कभी B.P.S.C. की परीक्षा में बैठने नहीं दिया. पहली बार जब अलिका ने B.P.S.C. का फार्म भरा, वो पेट से थी और चौथा महीना चल रहा था. लिहाजा परीक्षा में बैठ नहीं पाई. दूसरी दफा फिर शौफान ने उसी बहाने से उसका B.P.S.C. में बैठना टाल दिया. जब तीसरी बार अलिका ने फार्म भरा तो शौफान ने अपना आपा खो दिया. जम के लड़ाई हुई दोनों के बीच. इन सारी चीजों ने फिर दोनों के रिश्ते पहले जैसे नहीं रहने दिए. घर में तनाव बढ़ने लगा. इतना ज्यादा की शौफान के घरवालों ने एक तरकीब निकाल ली. शौफान घर में दूसरी औरत को ले आये. वैसे भी शरीयत के तहत वो ऐसा दूसरी बार ही नहीं, चार बार कर सकता था. हालाँकि ऐसा करने के लिए कुरान - ए - पाक़ ने कुछ नियम भी रखे हैं. पर नियम से क्या लेना देना. हम तो वही करते हैं जितना हम क़ुरान को समझना - आत्मसात करना चाहते हैं. वर्ना तो क़ुरान - ए - पाक़ का अक्षरसः अनुपालन करने लगे तो हम ही ख़ुदा न बन जाये. 

दूसरी शादी, नहीं, अलिका को ये कतई गवारा नहीं था. वो अपने शौहर को किसी और के साथ बांटना नहीं चाहती थी. सो तनाव घटने की बजाय और बढ़ता चला गया दोनों के बीच. वैसे भी वैवाहिक जीवन में तनाव - मनमुटाव दलदल की तरह होते हैं. समय रहते उससे निकला नहीं गया तो निकलना मुश्किल हो जाता है. अलिका और शौफान उसी मुश्किल वाले स्तर तक पहुँच चुके थे. तनाव के उसी आलम में अनायास ही शौफान के मुँह से निकल गया - तलाक़... तलाक़... तलाक़...
इन तीन शब्दों ने जैसे अलिका के कानों में कई लीटर पिघला इस्पात डाल दिया. अचानक ही उसे लगा की उसके घुटने कमज़ोर हो गए हैं. लगा जैसे वही बैठ जाये जमीन पर, या शायद धरती फट जाये और वो समाहित हो जाये धरती में. पर वो तो मुसलमान थी ना. वहां तो हिन्दू धर्म वाली चीजें न सोची जाती है ना की जाती है. 

एक वो समय था जब क़ुबूल है... क़ुबूल है... क़ुबूल है... की तीन शब्दों ने उसकी ज़िन्दगी बदल दी थी. हालाँकि उसे तब भी क़ुबूल नहीं था ये कुबूलनामा. बेमन से उसने क़ुबूल किया था. मौलवी ने उस वक़्त समझाया था कि इस्लाम तभी किसी निक़ाह को निक़ाह मानता है जब लड़का - लड़की दोनों क़ुबूल करें. बिना दोनों के कुबुलनामे के दो लोग साथ रह कर इस्लामी रवायतों को पूरा नहीं कर सकते. कितनी तो बधाइयाँ बटी थी उस वक़्त पे. फिर आज ऐसा कैसे हो गया कि सिर्फ एक इंसान यह निर्णय ले ले की दोनों के बीच अब कोई रिश्ता नहीं रहा. आज क्यों कोई मौलवी उससे पूछता नहीं की तुम्हे भी तलाक़... तलाक़... तलाक़... बोलना चाहिए इस रिश्ते को ख़तम करने के लिए. कि सिर्फ एक इंसान का बोलना नाकाफ़ी है. कि आज वो सारे रिश्तेदार, पड़ोसी कहाँ गए जो पिछली दफ़ा के इक़रारनामे पर खुशियाँ और बधाइयां बाँट रहे थे. 

न जानें वो क्या बड़बड़ा रही थी, कब तक बड़बड़ा रही थी. उसके अब्बा का कन्धा अलिका की अश्कों के सैलाब में गीला हो चुका था. अपनी गुड़िया को सीने से लगाए न जाने शुन्य में वो क्या ढूंढने की कोशिश कर रहे थे. शायद उसका निक़ाह से पहले का सुनहरा भविष्य वो तलाश रहे थे और जो देख पा रहे थे वो तलाक़ के बाद का अँधेरा ही था. अलिका के दोनों बच्चे टुकुर - टुकुर इन दोनों को देख रहे थे कि आख़िर उसकी अम्मी रो क्यों रही है, कि नानू चुपचाप क्यों हैं, कि क्या अब अब्बा का नाम सिर्फ़ स्कूल Admission Form तक ही सीमित रह जायेगा. शायद शांति से ही सही, पर इस तलाक़ के लिए सारे लोग कुबूलनामा कर रहे थे. क़ुबूल है... क़ुबूल है... क़ुबूल है... 


- अमितेश 

रविवार, 29 जनवरी 2017

देश

वो अहले सुबह की प्रभात फेरियां
वो झण्डोत्तोलन के बाद की जलेबियाँ
वो यादों के गलियारे से निकलते राष्ट्रगान
वो झंडे की सलामियां
वो गणतंत्र दिवस का फ्लैग मार्च
वो प्लास्टिक के मेड इन चाइना तिरंगा
बच्चो के हाथों में फहरते देख
देश तुम बहुत याद आते हो.

वो पल पल बदलते सामाजिक समीकरण
वो बनते बिगड़ते मानवीय मूल्य और मंत्र
वो बदलते शिक्षक और शिक्षा के स्तर
वो एक ही ज़मीन पे खिंचती धर्म - जाति की लकीरें
वो सन्नाटे में गूंजती तुम्हारी सिसकियों को सुन
देश तुम बहुत याद आते हो.

वो सत्तर की हो चुकी स्वतंत्रता
और सत्तर को छूती गणतंत्रता
शायद तुम्हारी बढ़ती उम्र ने
तुम्हे अप्रासंगिक कर दिया है
रोज़ तुम्हे क्षण क्षण, तिल तिल मरता देख
देश तुम बहुत याद आते हो.

- अमितेश



गुरुवार, 29 सितंबर 2016

साक्ष्य

बादल जहाँ आसमाँ से मिलते हो गले
और वृक्ष हों साक्षी इस मिलन के
आओ करे ऐतवार हम एक दूसरे में होने का.

बहती हो जहाँ पहाड़ी नदी लपलपाती सी
कुछ मचलती कुछ बलखाती सी
कुछ पन्ने अपने सपनों से निकाल कर
चलो बनाये कागज़ की कश्ती
और छोड़ दे तिस्ता की लहरों तले
अपने सपनों की दुनियां तक पहुच जाने को

दूर जो आसमां दिख रहा है ना धरती से लिपटा हुआ
हाथ पकड़ एक दूसरे का
चलो उसके पार पहुँच जाएँ
और बना ले आशियाँ अपने सपनों का

तुम जानना चाहती थी ना मेरे प्यार की गहराई
वो जो अनंत तक रस्ता जाता है ना
वो मेरे दिल की गहराइयों से हो कर गुजरता है
जिसे जहाँ के सारे प्रेमी अपने प्यार से
हज़ारों बरसों में भी ना भर पाएं

चलो कर लें एक दूसरे को आत्मसात
टेसूओं के लाल लहक़ते पुष्पों के फेरे लगा कर
साक्षी मान इन पलाश के रूमानी छाओं को
की एक होने की पराकाष्ठा तक
हम सत्तावन जन्मों तक एक बन जाएँ।

- अमितेश  

बुधवार, 17 अगस्त 2016

किन्चे

आज फिर वो किन्चे मेरे पैर के अंगूठे में चुभ गयी. एक छोटा चमकीला किन्चा. बड़ा अजीब लगता था जब वो कुछ किन्चे अनायास ही घर के किसी हिस्से में चमक उठते थे. मैं चिढ़ जाया करता था उन से. तुम अक्सर मुझे चिढ़ा देख कर और भी चिढ़ा देती - देखना ये किन्चे हमेशा हुम्हे मेरी याद दिलाती रहेंगी. ये किन्चे तो आस पास दिख जायेंगे तुम्हे पर मैं नहीं रहूंगी आस पास. फिर देखती हूँ किसपे चिढ़ते हो. 

मैं अगूंठे में चुभी उन किन्चो को निकाल कर बालकॉनी से इतनी जोड़ से फेंकता की कभी गलती से भी वापस घर में ना आ जाये. 

तुम्हे इन किन्चे  - सितारों वाली साड़ियाँ कितनी पसंद थी. मैं अक्सर कहता की कुछ और भी तो एथनिक वेअर हैं, वो क्यों नहीं लेती. तुम बस हँस कर यही कहती - साड़ी से ज्यादा एथनिक वेयर और क्या हो सकता है मिo कश्यप. 
मैं बिना जवाब दिए बिल देने चला जाता. 

जाने क्या बदल गया इतने दिनों में की आज किन्चे तो आसपास मिल जाती है पर दूर दूर तक देखनें पर भी तुम नज़र नहीं आती. तुम कहीं खो गयी हो. घर की हर चीज़ में तुम्हारा अहसास मिल जाता है बस तुम कहीं खो गयी हो. 

हम साथ थे क्योंकि हम एक जैसे थे. चीजो को देखने का नज़रिया एक था. विचार एक से थे, शौक एक से थे. याद है ना तुम्हें जब घंटो मिंटो की कहानियों पे Discussion करते, जब साथ में मन्ना डे के गाने गाता. जब बात समाज के बदलते मूल्यों की होती कितनी दफा किसी एक ही शब्द को दोनों एक साथ में बोलते और तुम न जाने क्या आँखे बंद कर बुदबुदाती और मैं तुम्हे देखता रह जाता. तुम्हारे लॉजिक भी अजीब होते कभी कभी - जब दो लोग एक ही शब्द एक साथ बोले तो भगवान से कुछ मांग लेना चाहिए, इच्छा पूरी हो जाती है. सच बताना हर बार तुम मुझे ही मांगती थी ना भगवान से. 

छुट्टियाँ तो तुममें न जाने कहाँ से इतनी ऊर्जा भर देती की उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता था. वही छुट्टी मुझ में सौ वर्षों की सुस्ती ला देती थी. लगता बस अज़गर की तरह एक जगह पे ही पड़ा रहूँ. तब तक ना उठूं जब तक छुट्टियां खत्म ना हो जाए. और तुम मुझे देख कर कितना गुस्सा होती ऐसे में. क्या नहीं करती तुम मुझे उठाने के लिए अपनी जगह से - सोना आज तुम्हारे हाथ की कॉफ़ी पीनी है, चलो ना कोई मूवी देख कर आते हैं - मैं स्पॉन्सर करुँगी, अच्छा चलो अब नास्ता तो कर लो - तुम्हारी पसंद का चिला बनाया है... 
और मैं बस ऐसे ही झूठमूठ के सोने का नाटक कर के तुम्हारी बात अनसुनी कर देता. 

कितना तो प्यार था हममें. फिर क्या बदल गया की तुम वापस लखनऊ चली गयी. ऐसी कौन सी बात तुम्हे नापसंद आ गयी - इस कदर नापसंद की उसके एवज में रिश्ता ही तोड़ लिया. क्या सचमुच रिश्ता तोड़ लिया या बस वैसे ही झूठमुठ का रूठी हो जैसे मैं बहाने बनाता था. 

याद है ना जब मैंने एक बार रोटी बनाने की कोशिश की थी और मेरी बनायी रोटी का आकर देख कर तुम्हारी हँसी रुक ही नहीं पा रही थी. तब मैंने कहा था कि रोटी गोल नहीं दिल के आकार का बनाया है - मेरे दिल के आकार का. तब तुमने गौर से देखा था रोटी के आकार को. कितना कस कर लिपटी थी तुम तब मुझसे. लगा की मेरी सांस रुक जाएगी. जब तुमने मुझे छोड़ा तो मेरे कंधे भींगे हुए थे. जब मैंने पूछा कहीं नाक तो नहीं पोंछ लिए तुमने मेरे कंधे पर, कैसे तुम फ़क्क से हंस दी थी. आँखे तो तुम्हारी तब भी नम ही थी. न जाने उस एक पल में ऐसी कौन सी भावनाएं तुम्हारी आँखों से पिघली थी. 

तो फिर अब क्या हो गया की तुमनें मुझे एकदम ही एकांगी छोड़ दिया है. क्या अब कोई भावना मुझे लेकर नहीं बची है तुममे, क्या अब वो तुम्हारी आँखों से पिघलती नहीं हैं. क्या हम सच में इतने अंजाने हो गए हैं एक दूसरे से. 

सज़ा तो सुना दिया तुमने, पर अपराध तो बताया ही नहीं मेरा. सज़ा दी भी तो ज़िन्दगी भर की दे दी. क्या मेरी ये गलती थी की मैंने तुम्हे बेइंतेहा प्यार किया था या ये की तुम्हारी साड़ी से टूट कर घर में बिखरे किन्चे मुझे पसंद नहीं थे. या शायद ये कि मैं इस साथ रहने के रिश्ते को सामाजिक मान्यताओं के अनुसार कुछ नाम देना चाहता था. हाँ शायद यही अपराध हो गया था मुझसे. तुम अभी स्वतंत्र रहना चाहती थी. किसी भी परिभाषित बंधन में बंधना नहीं चाहती थी. बंधन, ये बंधन तो कतई नहीं होता. क्या बदल जाता इसके बाद या शायद तुमने भविष्य में कुछ बड़े बदलाव की अपेक्षा रखी हुई थी. 

रोज एक पत्र लिखता हूँ तुम्हे. इन्हें लिखने के बाद घंटो घूरता रहता हु लेकिन कुछ पढ़ नहीं पाता. रख देता हूँ तुम्हारे बिस्तर के सिरहाने. शायद वापस आओगी कभी और पढ़ लोगी इन सारे पत्रों को. 
और हाँ, अब तो मुझे वो किन्चे भी अच्छे लगने लगे हैं. चुभते नहीं अब वो मुझे. हाँ पैरों में लगते ही कुछ भावनाएं पिघल जाती हैं और आँखों का रास्ता पकड़ लेती हैं. 


- अमितेश

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

Integration King

बार बार एक ही आवाज़ कानों में गूंज रही थी - उसे Integration King बोलते हैं लोग उसके Institute में। जितना ही मैं अपने कानों पर जोर लगा कर हथेली रखता उतनी ही तेज आवाज़ में Integration King वाली आवाज सुनाई देती। 
आखिर आजिज़ आकर घर से बाहर निकल आया. कहाँ जाना था, क्या करना कुछ नहीं मालूम. बस अपनी क़दमों का गुलाम बन कर निकल पड़ा कहीं भी. दिमाग अभी भी एक अजीब उलझन में था. जैसे कुछ जाले लग गए हों और हम उससे निकलने की कोशिश कर रहे हों. एक दम Maze Game जैसा. 

अनायास नजर उठा कर देखा तो लगा जैसे उलझन और बढ़ गयी. जिससे भाग रहा था वही अचानक सामने आ खड़ा हुआ हो।   
                                                           भवानी किराना
                                  गृह प्रयोग के सारे सामान उचित मूल्य पर उपलब्ध है 

कदम ठिठक गए वहाँ पर जैसे. अब तक जो दिमाग में गूंज रहा था लगा अब चारो ओर से आवाज आने लगी - Integration King... Integration King. इस आवाज को पकड़ कर जैसे मैं अतित की ओर डूबता चला गया. 

***

तब मैं भी Medical Entrance की तैयारी कर रहा था. वो वक़्त यूं था कि लोग कम होते तो जानकारियाँ और उसके स्रोत भी सीमित ही होते थे. तब गूगल बाबा की खोज नहीं हुई थी. सो तब लोग डॉक्टर - इंजिनीअर नहीं - Cardiologist, IITians जैसे लक्ष्य रखा करते थे. मैं कौन सा अलग था. तो मैं भी Medical Entrance की तैयारी नहीं बल्कि Cardiologist बनने की तैयारी कर रहा था. औसत छात्र था सो तैयारी भी औसत ही स्तर पर हो रही थी. माँ - पापा ने तो कुछ ख़ास अपेक्षाएं नहीं रखी थी लेकिन खुद की ही अपेक्षाएं बहुत थीं. फिर भी पढ़ाई उतनी ही करता जितनी क्षमता थी. ऐसे में जब मुहल्ले के कोई अंकल अपनें बेटे की तारीफ़ कर देते तो लगता जैसे उल्टे पाँव घर लौटूं और किताबें खोल लूँ।  पढ़ु या ना पढ़ु पर तसल्ली तो हो की मैंने उस एक उत्प्रेरणा के क्षण को जाया नहीं होने दिया. 

कुछ ऐसे ही थे गुप्ता जी. कभी किसान थे लेकिन बेटे को साहब बनाने की ख्वाहिस में पटना आ गए थे. वैसे भी किसानी अब उतना बेहतर व्यवसाय तो रह नहीं गया था. व्यवसाय तो ये पहले भी बेहतर नहीं था. जब किसान की जरूरतें बढ़ जाती हैं तो किसानी अपनी अक्षमता दिखा देती हैं. तब रबी और खरीफ़ के बीच ज़िन्दगी जमीन पे बिता पाना थोड़ा कठिन ही हो जाता है. सो जमीन बेच दी और पटना में दूकान खोल लिया. हालाँकि परिस्थितियां फिर भी ना बदली. हाँ जाते - जाते भले ही जमीन गुप्ता जी के बचत खाते में कुछ रुपये जोड़ गयी. 

शहर वो इसलिए नहीं नहीं आये थे की किसानी में लाभ नहीं था पर इसलिए आये थे कि एक दूसरी फसल को बेहतर करना था - हरीश गुप्ता. गुप्ता जी का एकलौता बेटा. गाँव की पाठशाला में बेहतर कर रहा था और आगे चल कर सुपरिटेंडिंग इंजीनियर बनना चाहता था - सिंचाई विभाग के श्रीवास्तव जी जैसा. मैट्रिक की परीक्षा के दौरान देखा था उन्हें जब मधेपुरा आया था अपने Examination Center पर. 

गुप्ता जी को भी लगा कि बेटा पढ़ने में ठीक ही है. इंटर की पढ़ाई के लिए पटना चले जायेंगे फिर किसी कॉलेज से इंजीनियर बन कर सुपरिटेंडिंग इंजीनियर बन जायेगा. 

जब जानकारियां कम होती है तो चीज़े ज्यादा आसान दिखती हैं - चुटकियों में होने जैसा. कुछ ऐसा ही हाल गुप्ता जी और उनके बेटे का था. फिर क्या था, हरीश के अपरिपक़्व दिमाग़ और गुप्ता जी के अनभिज्ञ मस्तिष्क ने यह निर्णय ले लिया की अब बस पटना जाना है. 

यह जमीन जो खुद अपना भविष्य नहीं जानती, हमें क्या बेहतर भविष्य दे पायेगी. सो जो थोड़ी सी जमीन थी उसे भारी मन से ही सही, बेच कर निकल दिए हरीश के सपनों की तलाश में. 

***

गुप्ता जी की अम्मा का नाम भवानी था सो उनके नाम का बोर्ड लगवा लिया अपनी दुकान पर. पटना ने जैसे हरीश को पर दे दिया था. भले ही दूकान कुछ धीमी रफ़्तार से चल रही थी लेकिन हरीश की पढ़ाई बेहतर होती चली गयी. शायद इसलिए भी की जो खोना था वो तो अपने गाँव में ही खो आये थे. अब जो बचा था वो सिर्फ पाना ही बचा था. 

मेहनत से पढ़ाई कर रहा था वो. इधर मैं भी पढ़ ही रहा था. कभी कभार दुकान से कुछ लाना होता तो गुप्ता जी कुछ उत्प्रेरणा के क्षण पैदा कर देते हरीश की कहानियाँ सुना कर. 

***

हरीश को उसके इंटर कॉलेज के दोस्तों ने बताया की पटना की पढ़ाई अब वैसी नहीं रह गयी है. इतने डॉक्टर, इंजीनियर, आय ए एस दे दिए हैं की पटना की प्रतिभा पैदा करने की जमीन बंजर हो गई है. अगर IIT निकालना है तो पटना से निकलना होगा. आजकल कोटा से बड़े सारे लड़के IIT Qualify कर रहें हैं. वहीं जा कर पढ़ना उचित होगा. 

"कोटा... वो तो राजस्थान में है. फिर वहां जा कर पढ़ना रहना तो थोड़ा महंगा होगा ना. और Coaching का Fee तो अलग है." 

"हाँ, लेकिन कई Institute Coaching में Scholarship भी देते हैं. अगर लड़का अच्छा रहा तो पूरा Fee भी माफ़ कर देते है."

"हम्म्म... लेकिन फिर भी खर्च कितना आएगा?" 

"Coaching का १००% Fee है 40000 रुपये, छः महीने की कोचिंग है सो हर महीने कम से कम 3 - 4 हजार तो लगेगा ही हॉस्टल - खाना मिला कर. 70 - 75 हजार का खर्चा है वहाँ पर."

"70 - 75 हजार तो बहुत ज्यादा है. मेरे बाउजी तो Afford नहीं कर पाएंगे."

"भाई IIT निकालने की probability भी तो ज्यादा है ना."

"ठीक है. बात करता हूँ बाउजी से. हालाँकि उम्मीद कम है कि वो तैयार होंगे." 

***

हरीश ने रात में खाना खाते खाते  गुप्ता जी को सारी बात बताई. गुप्ता जी कुछ बोले नहीं. बस खाते रहे. शायद एक रोटी काम ही खाई उस रात. 

खेती की जमीन तो मिट्टी के भाव में ही बिकती है. शहरो में उसे Real Estate कहते हैं. सो वो कुछ पैसे तो यूँही ख़तम होते जा रहे थे. अब 75 हजार - लाख रुपये और कहाँ से लाए. पता नहीं सही है या नहीं लेकिन यह आखरी कदम तो उठानी ही पड़ेगी. आखिर फसल को बीच में ही तो बर्बाद होते नहीं देख सकता ना. पैसा तो जुटाना ही पड़ेगा. कैसे भी. अगर ऐसे नहीं तो यही सही. 

***

"आइये आइये. क्या लेना है."

"ये लिस्ट है गुप्ता जी. थोड़ा जल्दी कर दीजियेगा. Coaching के लिए निकलना है."

"हाँ हाँ झोला ले दीजिये."

और वो सामान निकालने लगे. 

"और पढ़ाई कैसा चल रहा है."

"ठीक ठाक" अनमने से जवाब दिया. 

"हरीश तो काफी अच्छा कर रहा है Coaching में. सब कहते हैं की IIT में होना सतप्रतिशत तय है. लोग तो उसको वहाँ Integration King कहते हैं. Integration के सवाल तो मुहजवानी बनाता हैं."

"वाह, फिर तो अच्छा है ना."

"हाँ दुःख दूर हो जायेंगे सारे. उसकी कोटा और Coaching में गाँव का घर भी बेचना पड़ गया."

वो लगातार बोलते जा रहे थे और मैं अनमना सा सुनता जा रहा था या शायद कुछ भी नहीं सुन रहा था. 
वैसे भी हम मध्यम वर्गीय लोगों की तकलीफे उसके परिवार को छोड़ कर सब को मालुम होता है. भले ही बाहर वाले इन परेशानियों को सुन कर कुछ न करे पर हम बड़ा हल्का महसूस करते हैं."

अब ये सारी बातें बोल कर भले ही गुप्ताजी अपना भारीपन कम कर रहे थे पर ये उत्प्रेरणा के क्षण मुझ पर बोझ बढ़ाते जा रहे थे. लगा जैसे सामान बाद में ले जाऊं, अभी दौड़ कर अपनी पढ़ाई में लग जाऊं. 

***

अगले दो महीनों में मुझे एक मेडिकल कॉलेज में दाख़िला मिल गया. Cardiologist बनूं या ना बनु पर डॉक्टर तो बन ही जाऊंगा अब. कुछ Scholarship भी मिल गया सो पापा को सिर्फ अपना Provident Fund ही लगाना पड़ा मेरी पढ़ाई में, घर बेचने की नौबत नहीं आयी. औसत दर्जे का Student एक औसत दर्जे के मेडिकल कॉलेज में पढ़ने चला गया. 

दिन बीतने लगे. शुरू शुरू में जहाँ घर पर हर रोज़ 10 मिनट बात हुआ करती थी अब हफ्ते में 10 मिनट बात होने लगी. इन 10 मिनटों में तो ज्यादातर खाना खाया - पैसे तो नहीं चाहिए और सब कुशल मंगल है जैसे वार्तालाप ज्यादा होते. कौन - कहाँ - क्या - कैसे जैसी बातें नहीं होती. सो धीरे धीरे मैं परिवार से तो जुड़ा रहा पर मोहल्ले से कट गया था. छुट्टियों पर भी आता तो हर रोज की 10 मिनट की जो बातें नहीं हो पाई थीं, उन्ही में निकल जाता. पापा भी मुझे ले कर रिश्तेदारों के घर ऐसे जाते जैसे कोई तमगा ले कर जा रहें हो. 

धीरे धीरे बीतते वक़्त ने मुझे डॉक्टर बना दिया. मैंने निर्णय लिया की दस बरस बाहर रहने के बाद अब तो वापस पटना आ जाना चाहिए. वहीं Practice करूँगा. MD था सो बीमारों को आकर्षित करने के लिए काफी था ये डिग्री बोर्ड पे लिखवाना. मम्मी पापा खुश थे की चलो अब हफ्ते में 10 मिनट नहीं, हर रोज बेटे से बात कर पाएंगे. अपनी आँखों से देख पाएंगे की बेटा सही ढंग से खा पी रहा है कि नहीं. मैं खुश था की मम्मी - पापा को जब शायद मेरी सबसे ज्यादा जरुरत है, तब मैं उनके पास रह सकुंगा। 

***

माँ मेरे बालों में तेल लगा रही थी. हम इधर उधर की बातें कर रहे थे उस दोपहरी. तभी अचानक ही मैंने पूछ लिया - "माँ, Integration King के क्या हाल हैं? अब तक सुपरिटेंडिंग इंजीनियर तो बन ही गया होगा. है ना?"

बालों को सहलाते सहलाते अचानक माँ के हाथ रुक गए थे. अचानक एक चुप्पी तिर आयी चारो ओर. चुप्पी अपना साम्राज्य फैलाती जा रही थी और इस हर एक पल के साथ मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. 

"माँ...!"

"हूँ..."

"क्या हुआ, क्या सोचने लगी."

"हरीश नहीं रहा..."

"क्या... क... कैसे... क्या हुआ... था..." बहुत मुश्किल से मैं कुछ बोल पाया था. अचानक उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने घूम गया. नज़र शून्य में थी लेकिन उसका चेहरा चारो ओर नज़र आ रही थी. 

"उसने आत्महत्या कर ली..."

"ओह... क्यों... कब हुआ ये... क्यों...!" अभी भी समझ नहीं पा रहा था की ऐसे में सही सवाल क्या होने चाहिए. 

"बेटा वो इतनी उम्मीदे ले कर गया था कोटा की वही उसका काल बन गया. गुप्ता जी ने क्या नहीं किया उसको पढ़ाने के लिए. जमीन बेचीं, घर बेचा, गाँव तक को छोड़ दिया. खुद को भी गिरवी रख दिया था बेचारे ने. First Attempt में IIT में नहीं हुआ उसका. अब क्या मुँह ले कर वो अपने बाप के पास आता. जितने पैसे थे गुप्ता जी के पास वो सब तो उसकी कोचिंग में खर्च हो गए. अब Next Attempt के लिए कहां से पैसे लाते. बेचारे ने कभी भी अपने या अपनी बीबी के लिए कुछ नहीं किया. उनके सारे शौक हरीश पे ही आ कर ख़तम हो जाती थी. ऐसे में हरीश को लगा की बेहतर है की ऐसे में वो लौटे ही नहीं. अपने कमरे में ही लटक गया. नहीं रहा वो. भगवान् उसकी आत्मा को शांति दे. किसी को भी दाता ऐसे दिन ना दिखलाये. बेचारे गुप्ता जी बार बार एक ही बात दोहराते रहे... इससे अच्छा तो किसान ही था. लटकना होता तो मैं लटक जाता. मेरी पूरी फसल बर्बाद हो गयी... 
च..  च..  च...

... ... 
... ... 
... ... 

Integration King... Integration King... ना जाए कितनी देर से ये आवाज मेरे कानों में गूंज रही थी. जितना ही मैं अपने कानों पर जोर लगा कर हथेली रखता उतनी ही तेज़ आवाज़ में Integration King वाली बात सुनाई देती. 



- अमितेश 

रविवार, 14 अगस्त 2016

एक छोटी सी कविता

कुछ बिखरे से अल्फ़ाज़
कोरे सादे डायरी के पन्ने
अधूरी सी ज़िन्दगानी
कुछ अधूरी लिखी कहानी
थोड़े रूमानी ग़ज़ल
कुछ अपरिपक्व कविताएं
कभी नम आँखें
कभी गर्वान्वित सीना
कुछ खाली हाथ
कभी भरे भरे से जज़्बात
कुछ सुहाने सपने
कुछ अनजाने अपने
बस इतनी से है मेरी ज़िन्दगानी
बस इतनी सी है ज़िंन्दगी की कहानी



-अमितेश 

बुधवार, 25 नवंबर 2015

Ravan Vadh

It was such a hectic day for me even after a long holiday of 7 days. Like every year, I was much engrossed in preparing for the “Ravan Vadh” on the Vijayadashami. It’s the symbol of showing winning of good over evil. I am one very active member of our “Vishwa Vijay Samati” which every year celebrates Ravan Vadh in the Main Field of our city. This group meets only during the Dasahara festival as almost all the member of our group are into some or the other job / business. Ravan Vadh has always been very special to every group members and every member is having some memories attached with it. After all we all had seen it since our childhood days and are inculcating the same to our future generation. Ravan is being killed every year since last 2000 years. I still remember going to Gandhi Maidan with my dad just for seeing burning of Ravan after a short drama of Ram – Ravan War. My dad use to take me there on his Atlas Cycle. While I could not be able to see Ravan burning with lot of crackers, my father use to let me stand on the small seat of the cycle to get the view. Seeing Ravan burning and the body parts falling on the ground was always giving me a great pleasure. With Ravan’s effigy getting soiled after burning, I was always feeling relieved that once again Ravan is being killed and we would live happily atleast for one year till the time again we would have to kill him.

Even now, the way we prepare this occasion, it always was giving us same feeling as if “Chalo iss baar phir Ravan ko maar diya, ab kam se kame k saal to sukoon se rah sakenge”.
Silly thought, but let it be.

Tomorrow is the final show. We this time had made effigy of Ravan, Bibhishan and Kumbhkarna the tallest one. This was a symbolic representation of increasing evil in our society. We wanted to give this message to society that if we do not kill the evil within, we would keep increasing the height of the Ravan. All the preparation was completed well on time. Not even a single item on the check list was unmarked. We left for our houses in the evening to see a better tomorrow. I was so very tired that after having my dinner, I directly went to bed to have a good sleep as tomorrow was the D – Day for us.

“Get up son… you’ll have to kill me to make this world free of Ravan for a year atleast”

“Who is this…” and I got up of bed.

Oh it was a 6 ft tall good muscled person standing in front of me. He was wearing a saffron dhoti, a gold tiara and lot of jewelries.

“Who are you” – I asked with a very strong voice.

“You don’t recognize me? I am the one whom you kill every year. I am Ravan.”

“What… why you came here? Are you here to ask for the mercy of your life!”

“Hahahaha” – It was a loud laughter that I felt that it me blow my ear drum.

“I am Ravan, I haven’t asked for the mercy even when I knew that I am dying and Lord Ram was standing in-front of me. And you feel that now I ask mercy of my life from you. I think the human race has developed good sense of humor over these 2000 years’ time”.

“See I came here to ask a question to you. Ram was having reason for killing me. Why you human are killing me every year. What have I done to you?”

I was winking to actually reply with the valid reason. “umm, because, you are an evil… ummm because people like you are dangerous to the society”.

“Hmm, are you sure this is the reason why you guys are killing me every year. Ok give me one answer, have you read Ramcharitmanas or what you popularly called, Ramayan.”

I was thinking for the answer.

“For saying yes or no, you probably need not have to think so hard. So let me tell you that like almost 90% Indian, you also haven’t read it and whatever idea of Satyug you have is through Ramanand Sagar’s serial. Fair enough. So tell me what wrong I did that you say I am the symbol of evil?”

Again searching for an appropriate answer.

“Have you ever heard that I was the king of Lanka. My country was made of Gold. Even much before you guys were praised as “Sone ki chidiya”. In my country, no one, mind it, no one was poor. You guys are still discussing about the eradication of poverty irrespective of the fact that you keep killing me since last 2000 years. I had crossed the line only once when I kidnapped Sita. After that I never have crossed the line. I gave a complete respect to Sita and wooed her instead of being really nasty. You guys… everyday lot of news of kidnapping girls and crossing the lines are filled in the newspaper. I kidnapped a girl who was mature enough. And you guys, oh you don’t even care about the age. How can you guy think that it is ok to cross the line with a 1 – 2 year girl? And you feel that I am the symbol of evil? Huhh.

In my country, there was no instance of class differentiation and everyone was working for the state to maintain it as a country made of gold. And you guys have differentiated Upper and Lower Cast and feel proud of it. A class differentiation is being supported by the kings of your country even now that they make minority commission, SC / ST commission, reservation and whatnot to ensure that this class differentiation should always remain. And you think killing me is a kind of winning on the evil.

We were termed as Rakshak but have you ever heard in Ramayan that we were killing people and eating it. We even were not killing animal for eating. You guys are still struggling on the animal symbol of religion and killing people and doing everything that I think is an evil act. And you still feel that I am the symbol of evil.

I happen to be much educated and even your Ramayan speaks that which is written to praise Lord Ram and tell you about the Satyug. I knew a fact that to make a nation prosperous, the king has to be educated. And what about you? Do I need to tell you that your king cares about the education? An angutha chaap is making policy for the nation to make it prosperous. Hahahaha, the human race has really developed a supreme sense of humor.

Continue killing me. I really don’t have any problem with that as this gives you a heavenly happiness. My only question is do you really feel I am the symbol of evil! I think you guys first will have to clear the fundamentals than think of killing me.”

I was in a Trans hearing these. Not even winking my eyes from him. And suddenly I saw that I am facing the wall of my room. No one was there.

“Get up Amitesh get up. You’ll have to leave for the Main Field. This is your D – Day, isn’t it?” It was my wife who was trying to wake me up.



I felt that I Wake Up today after many centuries.

The Intolerant Indian

So this time it is this guy who possibly hasn’t done anything for the upliftment of the nation except narrating some patriotic dialogues in movies and ads that too for the reason that he was being paid heavily for that.

Why a specific religion people only are coming forward with such an issue knowing the fact that an intolerant majority are working hard to pay for their pilgrimage, knowing that those intolerant majority are threatened to be murdered if they would cross their co – religion people area, that the majority morons accept to bow at their religion, their shrine. And then there are some “intellectual” majority who think being rational is the most important thing and blabber whatever they want to about their own religion, just because of the fact that they can speak anything about that majority religion as they believe in forgiveness and that would not risk their life.

The other day this lady was speaking “I eat beef today, come kill me”. Oh lady just speak again and says that “I did what Sharlie Abdo has done, come kill me”, trust me your wish would be granted within 24 hours.

And then there is this man who inherited the fortune with the surname, but not intellect. Who requires write-up to write even condolence message. He thinks that any such nonsense should be accepted by the majority and it’s all the conspiracy of the ruling party. Would suggest this gentleman to read the history of the dynasty that he inherit and would understand how conspiracy is being made and how suddenly everything comes in favor of his maternal great grandfather, how the nation splits into fragments, how his maternal grandfather suddenly dies without any ailment, how the PM of nation suddenly dies of heart attack during the important overseas travel, how his uncle’s chopper crashes who happen to be a professionally qualified pilot with an eject facility chopper, how suddenly intolerance erupts for a particular “small piece of land” due to falling down of a big tree. This person might have spent maximum of his time in overseas for making girlfriend(s), smuggling antiques, doing meditation and undergoing enlightenment process. But we Indian have experienced everything staying here in this country. So opinion of this inheritor of fortune is insignificant for Indian.
Out of all these, what is important is to know why this is happening. Why suddenly everything happening is categorized as tolerant and intolerant? Why media is too much up to even small incidences and is advertising it in a way that these incidences are going to define the future of this strong nation? Why suddenly there is a kind of mental war going on in every Indian and is visible on the social media? Why anyone speaking against majority are having their right to speak but one speaking anything about their own religion leads to communal thinking as speaking about own religion is actually considered ignoring the minority? Why someone asking about the past is actually considered as dishonoring the Indian History but distorting entire history is considered as actual way of life?

I think society need to rethink who is right and who are wrong. Just because a person is an author, an actor, a politician or an opportunist doesn’t mean that whatever he / she speaks is always right and they have got right to speak anything about anyone / any ethnicity. Think before falling into the trap and following the herd.

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

Intellectually Confused Society

Like once Amir Khan said that he is from Science side, it's better to say that I am from humanity side and not from some particular religious philosophy side. My religion and faith is very personal.
A very important discussion going on in Country that who is the biggest sympathizer of "minority" community. Some very irrelevant cases are being quoted as the reference. These cases seems more of accidental crime than attempt to cease the rights of minority community. The most important of all is for whom these all debates are going on are least interested in all these.
In a nation of 125 bn population, one or two cases cannot be used as reference point to say that country is moving towards religious intolerance.
Moreover, who are these people getting into these debates? If these people are that concern about one particular community, what are their contribution for the upliftment of that particular community? Who hear those people who are giving speech for religious haters? What is their standing in Nation's opinion making? By using there speeches as reference for these religious intolerance, are we not helping them to reach masses that may be a dangerous sign?
Was reading somewhere that in a country that claims to be formed basis religion, making any comment against will land to death warrant. It is India where we have that courage to speak against any religion and sit in debate and become popular.
If our constitution gives right to expression, is it right to paint one religion goddess nude and shout that this is our constitutional right? Have that person any courage to paint something that is prohibited in their own religion and say that see I have added my creativity in the area that I am expert in.
What is most important is not what is cooking in someone's house, but what is important is to be sensible on the fact that the cooking in someone's house should not lead to burning someone's faith.
And we should more be aware on the fact that who are the people around us who are trying to give fuel to the fire of our stove which is not required as this lead to burning the food.
There is a kind of intellectually confused people are budding in the form of authors who are returning their award stating that there is a situation in Country where they are feeling short of oxygen and is a breathlessness kind of situation. But the fact of the matter is that we are use-to of being exploited where a king was deciding what to think and how to write. Now that a kind of "purn swraj" situation is there we are searching for the person who can guide us on our thoughts. This entire situation is leading to an intellectually confused society.
I have lot of friends who belongs to that so called minority group (which is actually not a minority group but are being framed as not the citizen of India but "vote-bank of India") are living their life fearlessly. They are eating what they want to eat. They are living the way they want to live. Nobody actually nobody is interfering in their life and teaching them how to live. In fact one of my friend was mentioning that it is not other religion people but our religion people are making our life worst as they are too much into guiding on how to live.
Now is the time when we should be asking as what our so called sympathizer are doing to uplift our life. What is their contribution to ensure at least something is cooking in our house. What they did to make us a literate community rather than vote-bank community.