सोमवार, 28 नवंबर 2011

फिर मत रोना गार्गी

इंसान कई दफा परिस्थितियों को अपना दास बना देता है. कई दफा इंसान परिस्थितियों का दास बनने को विवश हो जाता है. गार्गी से अच्छा इसे कौन समझ सकता था. एक छोटी सी ज़िन्दगी में ही कई बार उसने इंसान और परिस्थितियों को ऐसी आँख मिचोली करते देखा था. वक़्त को पकड़ने की कवायद में हमेशा उसके सामने ऐसे हालात पैदा होते गए की उसने अपने आप को वक़्त के सामने विवश ही होता पाया. अपने माँ बाप की राजकुमारी हमेशा वक़्त की दासी - सी ही बनी रही.

कैसे भूल सकती है अपने वो दिन, बचपन के दिन, जब वह अल्हड़ सी अपने बंगले के बड़े से बाग़ में भागा करती और उसके माँ-बाप अपनी इस प्यारी राजकुमारी के हर नाज़ों - नखरे उठाते नहीं थकते थे. कभी कूद कर वह गेंदें की बड़ी सी झाड़ के पीछे छुप जाती और उसके पिता यूँ ही झूठ - मुठ के उसे ढूंढने की कोशिश में कभी आम के पेड़ के पीछे तो कभी सूरजमुखी की क्यारिओं में उसे ढूंढ़ते फिरते. फिर अचानक वह खिलखिला कर हंस देती. उसकी हंसी की खनखनाहट से जैसे सारा बाग़ झूम उठता. उसके पिता की रगों में तो मानो ये हंसी रक्त के साथ एक नयी उर्जा का संचार कर जाता. गार्गी भी अपने लाल बोर्डर वाले सफ़ेद फ्राक में परी-सी ही दिखती. उसके बाग़ में इधर-उधर भागने से जैसे सारा बाग़ झूम उठता. अपने पिता की उस कोठी की सबसे बड़ी संपत्ति थी गार्गी. नाजों से पली. अपने माता - पिता के पलकों पे झूलती - खेलती.

वक़्त यूँ ही गार्गी की दासी बना उसके इर्द- गिर्द घूम रहा था. वक़्त भी गार्गी के साथ जवान होता जा रहा था. उधर वक़्त के चेहरे पे झुर्रियां पड़ती जा रही थी इधर गार्गी की खूबसूरती अपनी चरम को पाने को बेताब होती जा रही थी. अपनी कक्षा में हमेशा अव्वल आना गार्गी की आदत बन गयी थी. कल तक अपने माता - पिता की लाडली, अपने स्कूल - कॉलेज के शिक्षकों के भी आँखों का तारा बन गयी थी.
जब गार्गी ने अपनी जवानी में कदम रखा तो जैसे उस छोटे शहर में चर्चा का विषय बन गयी.  हर इंसान उसे अपनी संगीनी बनाने की कामना करने लगा. गार्गी भी कभी बंद आँखों तो कभी खुली आँखों से अपने सपनों के राजकुमार के सपनों में खोने लगी थी. काले घोड़ें पे झक सफ़ेद कपड़े पहने और हाथों में तलवार लिए उसके सपनों का राजकुमार अक्सर उसे दूर से आता दिखता.  उस एक ख्याल भर से ही वह शर्म से सुर्ख लाल हो जाया करती. हर बार अपने सपनो के राजकुमार के चेहरे को देख पाने की चेष्टा में वह उसकी आँखों से ओझल हो जाया करता. उसके पिता ने भी अपनी परी के लिए उसके सपनों के राजकुमार को खोज निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
वो दिन भी आ गया जब गार्गी के लिए सचमुच उसके सपनों का राजकुमार मिल गया था. हां, शायद यही था वह सपनों का राजकुमार. काले घोड़े पर झक सफ़ेद कपड़े पहने. चेहरा तो नहीं देख पायी थी उस राजकुमार का गार्गी पर शायद इस जैसा ही था वह सपनों का राजकुमार. सब कुछ परी - कथाओं जैसा बीत रहा था गार्गी की ज़िन्दगी में. वक़्त भी गार्गी की दासी बना उसके नखरे उठा रहा था.

वह बचपन की अल्हड़ गार्गी अब एक पूर्ण नारी बन गयी थी.

गार्गी के अपने ससुराल जाते ही जैसे उसके पिता की वह आलिशान कोठी सुनसान हो गयी. अब तक जो वक़्त उस कोठी में दासी बना फिरता था वह अपने शबाब में आने लगा था. गार्गी के पिता के चेहरे पे हावी होता सा. अचानक ही जैसे वो बूढ़े हो गए थे. साड़ी ऊर्जा क्षीण सी होती जा रही थी. जो बाग़ गार्गी के क़दमों की एक आहट पे अपने पुरे शबाब पे आ जाता था आज उजाड़ हो गया था. गार्गी अपने ससुराल जाते - जाते वक़्त को भी साथ ले गयी थी.
लेकिन परिस्थितियां और वक़्त आज भी गार्गी के इर्द - गिर्द बांदी बना घूम रहा था. सब कुछ ठीक - ठाक ही चल रहा था. परी - कथाएं अब भी गार्गी की ज़िन्दगी की घटनाओं से कहानियां चुरा कर अपनी एक मुकम्मल कहानी बना रही थी. गार्गी ने जिस सपनों के राजकुमार की कामना की थी, यह लगभग वैसा ही था.

कई दफा हम समझ बैठते है की अगर वक़्त हमारे कदम से कदम मिला रहा है तो हम उसकी चाल को अपने हिसाब से निर्णय ले कर गढ़ सकते है. लेकिन वक़्त बड़ा ही शातिर होता है. वो तो अपनी अलग ही बिसात बिछा कर कोई और ही खेल खेलने की तैयारी करता रहता है. और हम समझ बैठते है की ये हम है जो सारी कहानी बना रहे है. ये सोच हमें वक़्त के उस खेल में और भी उलझाती चली जाती है. फिर एक समय ऐसा आता है की हम बस मोहरे बने रह जाते है वक़्त की उस बिसात पर.
आखिर वक़्त भी कब तक गार्गी की मर्जी का दास बना रहता. उसने एक करवट बदली. अब गार्गी की जीवन की परी कथा का वो आसमानी प्यार वास्तविक प्यार का जामा पहनने लगा था. गार्गी परिस्थितियों को समझ कर अपने आप को अनुकूल बनाने की हर संभव कोशिश करती रही. अपने पिता की राजकुमारी ससुराल की दासी बन गयी थी. कोई शिकायत नहीं था उसे फिर भी इस बदली ज़िंदगी से. खुश थी वो. जिस प्यार में वो कभी खोयी रहती थी वो प्यार अब बस बंद कमरे की चारदीवारी तक रह गया था. धीरे - धीरे उसका विवाह निर्वाह बनता जा रहा था. गार्गी फिर भी खुश थी. वह हर संभव कोशिश करती अपने सपनों के राजकुमार जैसे दिखते पति को खुश रखने की. 
वक़्त ने कई करवटें बदली इस दौरान. हर बदलता लम्हा गार्गी को और मजबूती दे जाता. बस फर्क अब इतना आ गया था की जो वक़्त गार्गी की दासी बना फिरता था, आज उसने गार्गी को अपनी दासी बना लिया था. इन दो वर्षों में गार्गी अपनी उम्र से कहीं ज्यादा बड़ी हो गयी थी. महज २३ की उम्र में वक़्त और परिस्थितिओं के हर रंग से रूबरू हो गयी थी वो.

***

जब सबकुछ अच्छा हो रहा हो तो हम आगे की कभी ज्यादा फ़िक्र नहीं करते. बस बहते चले जाते है उस अच्छे वक़्त के साथ. जब परिस्थितियां प्रतिकूल हो जाती है तब हम अचानक धरातल पर आ जाते है. लेकिन कुछ ऐसे भी सशक्त इंसान होते है जो उन प्रतिकूल परिस्थितियों से भी दो-चार कर लेते है और हर लम्हे वक़्त के लिए भी एक चुनौती कड़ी करते जाते है. गार्गी वैसे ही इंसानों में एक थी. बदलते हालत में वक़्त से भी तेजी से सपने आप को बदलते जाना जैसे उसकी आदतों में शुमार था.
लेकिन किसी भी परिस्थिति की एक पराकाष्ठा होती है. और इन दो वर्षों में शायद वो पराकाष्ठा आने लगी थी. गार्गी जितना रिश्तों को सुलझाने की चेष्टा करती उसका वास्तविकता का राजकुमार उसे और उलझाता जाता. और फिर वह एक पल आ गया जब परस्थितियों की पराकाष्ठा ने अपनी सारी सीमाएँ तोड़ डाली. पता नहीं गार्गी एक बंधन से आज़ाद हुई थी या बंधन ने उसे और उलझा दिया था.

***

उसके पिता की कोठी में वापस वह की सबसे प्यारी राजकुमारी आ गयी थी. लेकिन उसकी इस उपस्थिति ने किसी के मन में उल्लास पैदा नहीं किया था. कोठी के बड़े बाग़ के सारे पेड़ - पौधों में एक नयी जान फिर आ गयी थी पर अब वो उस उत्साह से झूम नहीं पा रहे थे. आखिर उनकी सबसे खुबसूरत राजकुमारी के चेहरे पर जब वो मुस्कान और चाल में वो चंचलता न रही हो तो ये पेड़ भी कैसे मदमस्त हो झूम सकते थे.
कोठी में वो ख़ुशी फिर से वापस नहीं आ पाई इस राजकुमारी के आने के बाद भी. गार्गी के माँ-बाप की आँखों के आंसू अपनी प्यारी राजकुमारी की आँखों के सूनेपन को देख कर सूख नहीं पा रहे थे. एक अजीब सन्नाटा सा छा गया था कोठी में. ऐसा सन्नाटा तो तब भी नहीं पसरा था जब गार्गी इस घर को छोड़ कर अपने सपनों से दिखते राजकुमार के साथ गयी थी.

***

इन बदलते हालत में गार्गी के पिता के मन में अपनी राजकुमारी के भविष्य को लेकर कसमसाहट पैदा हो गयी थी. एक दुविधा जैसे उनके दिलो - दिमाग में घर करता जा रहा था. गार्गी खुद भी अपनी जीवन में आये इस अकस्मात बदलाव से हतप्रव्ह थी. ज़िन्दगी जैसे ख़तम होने की कग़ार पर दिखती जा रही थी. पता नहीं चला कब दो महीने बीत गए इन परिस्थितिओं से दो-चार होते होते.

***

गार्गी अपने बाग़ में बैठी शुन्य को निहार रही थी. इस तंद्रा में वो किसी और ही दुनिया में चली गयी थी. एक ऐसी दुनिया जहाँ सब कुछ मौन था. सब कुछ धुंधला - धुंधला. हवा का हल्का - हल्का झोंका गार्गी के तन - बदन में एक सिहरन पैदा कर रहा था. वो अपने पश्मीना शाल को कुछ और मजबूती से जकड़ कर उस दुनिया की सैर कर रही थी - ख़ामोशी से. अचानक पास के पलाश के पेड़ की एक घनी डाल से गौरये का घोसला निचे धप्प से आ गिरा. उसके नीचे गिरते ही गौरये की एक तेज़ चहचहाहट उसे वापस इस भौतिक दुनिया में वापस खिंच लाया. गार्गी ने अपने ह्रदय में एक तेज़ चुभन महसूस की. लगा शायाद उसकी अपनी दुनिया फिर से उजड़ गयी हो इस घोंसले के साथ. वो गौरैया अपने उजड़े आशियाने के चारो ओर बड़ी बेचैनी से चहल कदमी कर रही थी. कुछ पल को ऐसा ही चलता रहा. फिर अचानक उस गौरैये ने अपने उजड़े आशियाने से एक  तिनका उठाया और उड़ गयी वापस पलाश की उसी डाली पर. और फिर अगले एक घंटे तक गौरैये का तिनका उठाने और उड़ने का यही सिलसिला चलता रहा. गार्गी एक मूक गवाह बनी उस गौरैये के उजड़ने और बसने का यह पूरा मंजर देखती रही, ख़ामोशी से. अचानक वो कड़ी हो गयी अपनी कुर्सी से. उसकी पैरो में फिर से वो मजबूती आ गयी थी. एक आत्मविश्वास से भरी मजबूती. पलाश के उस पेड़ ने शायद अपनी राजकुमारी को वापस अपने अस्तित्व में आते पहचान लिया था. गार्गी के इस आत्मविश्वास भरी भंगिमा ने उस पलाश में भी मस्ती भर दिया. इस ठण्ड की शांत शाम में वह अचानक अपने पत्ते खड़खड़ाकर झूम उठे. पेड़ पौधे भी शायद इंसान के सुख से सुखी और दुःख से दुखी हो उठते है. कई बार हम इंसान, इंसानों की भावनाओ को समझ नहीं पाते और कई बार पेड़ - पौधे हमारे खयालातों से ज्यादा वाकिफ़ हो जाते है. पलाश के इस अचानक से झूम उठने से सारा बाग़ झूम उठा. ऐसा लगा मानो दो वर्षो के बाद वापस उस बड़े से बाग़ में बसंत आ गया हो. 

***  

आज अचानक अपने बीते दिनों के सारे घटनाक्रम गार्गी की आँखों के सामने बिखर से गए. आज फिर वो जीवन के अजीब से दोराहे पर खड़ी थी. समझ नहीं पा रही थी क्यों बार बार परिस्थितियां उसकी भावनाओ को अग्नि परीक्षा देने को मजबूर करती है. हर बार वो अपने जीवन को व्यवस्थित करने की कोशिश करती और हर बार वक़्त फूंक मार कर उसकी व्यवस्थित जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता. अचानक से बिखर गए अपने जीवन को तिनका - तिनका सम्हाल रही थी वो.

***

अजीब सी कश्मकश से गार्गी की ज़िन्दगी गुज़र रही थी. इतने दिनों में वो खुल के हँसना भूल गयी थी वो. आज हँसते हँसते उसकी आँखों में पानी भर आये. पिछले कुछ दिनों से वो काफी खुश महसूस कर रही थी. उसकी ख़ुशी उसकी उन सपनीली आँखों से रिसती सी नज़र आती. जैसे उसकी खोई खुबसुरती फिर से वापस आने लगी थी. वापस वही बाल सुलभ चंचलता ने उसके पलों को और भी खुबसूरत बना दिया था. गार्गी की ख़ुशी और खुबसूरती तब और भी बढ़ जाती जब वह सुबीन के साथ होती.
सुबीन, एक बहुत ही आम सा लड़का जो उसके साथ काम करता था. कोई जयादा दिखावा नहीं, कोई खास शक्लो सूरत नहीं. शायद ही कोई लड़की सुबीन जैसे लड़के को अपने सपनों में सफ़ेद घोड़े पर हाथ में तलवार लिए देखने की कल्पना करती हो. उसकी मध्यम काया में जो सबसे जयादा निखर कर दिखती थी वो थी उसकी जिंदादिली. हंसमुख, हमेशा मुस्कराता सा लड़का. उसके होने भर से गार्गी अपने में एक सकारात्मक ऊर्जा महसूस करती थी. ऐसा लगता जैसे उसकी निर्मल उपस्थीति गार्गी के खालीपन को खुशियों से लबरेज़ कर जाता.
गार्गी कुछ दिनों से अपने में एक अजीब परिवर्तन महसुस कर रही थी. पिछले पांच सालो में उसने अपने अतितको हर रोज़ जीया था. हर बार उसका बीता हुआ अतित उसकी आँखों को नम कर के चला जाता था. तब जब वह परिपक्वता को प्राप्त कर रही थी, वक़्त ने उसे ऐसे मुकाम दिए की अपनी उम्र से जयादा परिपक्व हो गयी थी. जवानी का अल्हड़पन कभी देखा ही नहीं था उसने अपने जीवन में. अब जैसे वो अल्हर्पण फिर वापस आ गया था उसका सुबीन के साथ. जब जब वह सुबीन के साथ होती तो गार्गी और भी गार्गी-सी हो जाती. सुबीन भी उसे उसकी ज़िन्दगी की हर ख़ुशी देने में कमी नहीं छोड़ता. हँसता- हंसाता. गाता - गवाता. हर वो बदमासियाँ करता गार्गी के साथ मिलकर जो शायद गार्गी नहीं कर पायी थी, ज़िन्दगी को समझने की कवायद में. फिर बैठ कर घंटो हँसते दोनों. इतना की हँसते हँसते गार्गी की आँखों में पानी भर आता. जैसे इस ख़ुशी की आंसू में गार्गी के अतित के दर्द धुलने से लगे थे.

***

गार्गी भी अनजान नहीं थी अपने भीतर के इस बदलाव से. सतही तौर पे हो वो काफी खुश थे अपने भीतर के इस बदलाव से, या यूँ कह लें कि अपने आप में वापस आने से।  पर भीतर से वो अब भी उबर नहीं पाई थी अपने अतीत के  उन लम्हों से  जिसने उसे उससे छीन-सा लिया था। डरती थी, कही यह दौर भी जल्दी खत्म न हो जाए और फिर वो अलग थलग ना महसूस करने लगे दुनिया से। शायद इस बार वो सम्हाल नहीं पायेगी वक़्त के खिलवाड़ को।

कई दफा हँसते - हँसते वो खो - सी जाती शुन्य  में और सुबीन भौंचक सा देखता रह जाता गार्गी को अचानक किसी और जहाँ में चले जाते हुए।

सुबीन जानता था की भले ही वह और गार्गी बड़े अच्छे दोस्त बन गए थे, पर आज भी वो गार्गी को अच्छी तरह जान नहीं पाया था। गार्गी हमेशा उसे रहस्यमी सी दिखती थी। जैसे एक बंद किताब की तरह हो जिसका पहला पन्ना तो रंग - बिरंगी तस्वीरों से भरी हो पर हर पन्ने में कई राज छिपी हो। गूढ़ रहस्य। सुबीन यूँ तो गार्गी के साथ बिताये हर पल को जम कर जीता था पर हमेशा एक खिचाव महसूस करता था गार्गी और अपने रिश्तों के बीच। ये हमेशा एक खलल पैदा करती सुबीन के मन में। पर गार्गी को धो देने के डर से कभी भी अपने को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर पाता था।

***

वक़्त यूँ ही कटता जा रहा जा रहा था। वक़्त आपस में जुड़ कर दिन और दिन महीने बनते जा रहे थे। गार्गी और सुबीन आपस में और भी अच्छे दोस्त होते जा रहे थे। उनके बीच का विश्वास और भी बढ़ता जा रहा था। इन सारी  वजहों से वक़्त ने सुबीन को अपने आप को व्यक्त करने का आत्मविश्वास दे दिया था।

अपने रिश्तों के इसी बढ़ते आत्मविश्वास में एक दिन उसने गार्गी से पूछ  ही डाला -
"गार्गी, मेरा नाम सुबीन है। तुम कौन हो गार्गी?"
"ये कैसा सवाल है सुबीन। कहीं तुमने कुछ खा तो नहीं लिया है जो ऐसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो!" - गार्गी लगभग हंसते हुए - सी बोली।
"नहीं गार्गी मैं बिलकुल होंश में हूँ। लगभग एक वर्ष होने को आयें हैं हमारी दोस्ती को। इस एक वर्ष में तुम शायद सब कुछ जानती हो मेरे बारे में। मेरे अतीत मेरा वर्तमान और मेरे भविष्य के सपने। सब कुछ। लेकिन मैं सिर्फ तुम्हारा नाम और तुम्हारी अचानक ही पैदा हो जाती ख़ामोशी के अलावा कुछ नहीं जानता तुम्हारे बारे में। कौन हो तुम गार्गी? क्या तुम अपनी पहचान मुझसे नहीं करवाओगी गार्गी? क्या अब भी मैं इतना अनजाना हूँ तुम्हारे लिए की तुम वैयक्तिक तौर पर मुझसे दूरी बनाए रखना चाहती हो? क्या इस एक वर्ष में भी मैं तुम्हारे भरोसे के लायक नहीं हो पाया हूँ गार्गी? बोलो गार्गी, कौन हो तुम?"

"मैं एक पारी हूँ और दूर पारी लोक से आये हूँ" और खिल्ख्ला कर हँस  पड़ी थी गार्गी. लेकिन इस बार हँसते -  हँसते उसकी आँखों में पानी की जो महीन परत जम आयी थी उसके पीछे की भावानाओं को नहीं छुपा पायी वो सुबीन से।
सुबीन ने भी दुबारा उससे नहीं पूछा उसके बारे में। बस ख़ामोशी से उस शाम को बिता डाला दोनों ने। हाँ, एक मानसिक द्व्न्द ज़रूर चलता रहा दोनों के मस्तिष्क में पूरी शाम।

***



























शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

You n Me!

When life seems moving in slow motion,
When the time flows in aberration,
When I feel its too late to be in action,
Its you who let me feel Yes I am!
Yes I am!

-Amitesh

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

The Power of Thee

I was in Puri for some meeting. The time had been adjusted in such a way that we should get lots of leisure time to enjoy and celebrate the success that we had achieved in last month.

To use this time wisely, Temple tour of Puri had been planned. It was so much a fun of visiting the temple that this entire trip had acted as a stress buster for me.

There was a tree called Magical Tree inside the premises of the temple that is said to be fulfilling 3 boons a year if you tie a thread on it. I am a kind of person who does not try to test the power of Thee just to verify common belief. It does not mean that I do not believe on the Supreme Power.

There was a lady in our team who was going near the Magical Tree to tie thread. I asked her if she is really going to tie the thread and ask for 3 wishes, her reply was very strange. She said, “Someone once had told me that don’t be so much proud of your self that you could not ask favor from God even”.

No words to say. I had always seen her as a very professional kind of person. But this was a very contrasting side of her. I really liked this gesture.

Still testing the power of God is something I am not comfortable with.

Ecstatic

At times it feels a little different. At times we feel that we are coming out of the cocoon and trying to spread our wings to fly high, higher, even higher that the world looks much clearer to us. At times it feels like every thing is prettier than ever.

Don’t know why this feeling is coming to me. It’s like I am not walking on road but just gliding. Every work I am doing these days makes me work with much more interest. It’s like I have started feeling a little more responsible for my surroundings, the people and for everything happening around me. Sometimes feel that I should smile for no reason, and at other time feels that seriousness is very much required. Don’t know why all these feeling. But there is something that is making me feel good from within. And I am happy for this good feeling.



शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

याद तुम्हारी

जब गुलमोहर पुरवाई में मदमाता है
जब जिस्म उस ठंडक में सिहर जाता है
जब शरद की धूप चेहरे को सहलाता है
तुम्हारी याद सताती है

जब चाँद अपनी शबाब पे इठलाता है
जब रातें वक़्त के साथ गहराता है
जब अरमां क्षितिज को छु जाता है
तुम्हारी याद सताती है

जब भीड़ में भी दिल अकेला पाता है
जब हसीं सपनो से मन भरमाता है
जब नींद न सोने की हद तक सताता है
तुम्हारी याद सताती है

जब हसीं भी आँखों में नमी भर जाता है
जब भावनाएं शब्द न गढ़ पाता है
जब चेतना खुमारी से निश्चेतन हो जाता है
तुम्हारी याद सताती है

- अमितेश

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

तृष्णा

कभी खुले आस्मां में 
परों को खोल कर उड़ने की चाहत
फिर शाम ढले अपनी नीड़ में लौट जाना.

कभी चाँद को देख कर 
उसकी तरह चमकने की चाहत
फिर यूँ ही अपने कहे पे सकुचा जाना.

कभी हर बंद डब्बे के राज़ तक पहुचना
कभी अनमने से ख़ुद डब्बे में बंद हो जाना. 
ज़िन्दगी के गूढ़ रहस्य से 
मुझे रू-ब-रू  कराना
कभी ज़िन्दगी से भी जटिल बन जाना.

कभी पूरी कायनात 
अपनी हथेली पे समेट लेना
कभी खुली हथेली आस्मां की ओर कर सो जाना.

कभी भरी नज़रों से एक टक देखना 
कभी मेरी नज़रों से मुझे ही छुपाना.

कभी हौले से मेरे क़रीब आना
कभी चुपके से मुझसे दूर चले जाना.

कई दफा देखा है तुझे अपने आप के भीतर
कई दफा देखा है मैंने  
अपने आप को तेरे भीतर
कई दफा देखा है तुझे
मुझमे सिमटते हुए
कभी मेरी ज़िन्दगी से रेत सी फिसलते हुए.

तुम मरीचिका हो
मेरे जीवन के तपते रेगिस्तान की
जो मुझमे और दूर जाने का ज़ज्बा भरती है.

शायद मैं पा न सकूँ तुमको
पर तुम्हे पाने की लालसा
बनी रहेगी जीवन भर मुझमे
हमेशा.
शायद मेरी साँसों के
आखरी कतरे तक

- अमितेश

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

दस्तक

प्यार
गोधुली के सिहरते सूरज सा एहसास
और वक़्त के साथ सघन होती उसकी तपिस

महुआ की चमकीले पीले फूलों सी नाज़ुक
और फैलती उसकी मदमाती महक.

एक अव्यक्त एहसास
सर्दी के गीले दिनों में भी
जो गुनगुना एहसास भर जाता है
दिलों के रस्ते.

यु ही बेवजह
मुस्कान फ़ैल जाना चेहरे पर,
चहकना हर छोटी-सी बात पे भी,
मुट्ठी भर ख़ुशी
सैलाब सी ज़िन्दगी पर फैलती सी,
जब ज़िन्दगी बदलती सी लगती है.

दिलों को दिलेरी सिखाता सा.

क्या मुझे फिर ये एहसास दे रहा है
अपने आने का
मेरे ह्रदय पर दस्तक दे कर!

- अमितेश

रविवार, 11 सितंबर 2011

Retirement : Threshold in The Imaginary Wall

Many a times we feel very lonely in life. Lonely, as if the world is running fast giving us a kind of stagnation. As if the world is conspiring to exclude us. And during that time, we try being very resistive or rather develop a little low profile, snatches some time from the world for us, to retrospect, relive, and cherish what we had done for the world and what good we got from world in return, as a souvenir… that we could keep with us for the lifetime.

Retirement from the professional life is one such moment when we ask ourselves, is retirement creating a kind of wall between us and the world? During that time, people really start recollecting the goods’ that he had done in the past to let his soul pat on his back of doing good job. This is probably another quest to make a threshold in that imaginary wall between us and the world, to avoid any situation of being solely and also to create a situation when we easily can keep ourselves separated or mingled at our will.

Though mostly being retire from the professional world do not much changes views of the people about us, except for the fact that we restrict ourselves of creating any situation when any financial burden should not get passed on to the retired person.

My dad is probably facing the same kind of situation. He is going to retire from his job by the end of September ’11. This somewhere had started creating a kind of insecurity in him. Though I am constantly talking to him to let him not at all feel lonely.

While talking to him today, he told me about lot of opportunities available with the government for the retired persons to work for the government and get some monetary benefits as well. When I told him to work just to get engaged and not for money, his view was, “Money is important. We do need money on every walk of our life”.

I was just listening to him. I wanted to let him speak and speak out whatever was their in his mind. He was speaking about what good he did in these thirty years and he feels he is very much satisfied with his this long career.

I feel relieved and happy once he said, “I think this is first time when I am talking to you so much”.


Dad, you need not have to justify what good you have done in your professional life. I am the witness of that. I am probably as old as your career and I have seen you working. I tried inculcating the same thing in me as well. Whatever I am today, that is just because of you giving me that traits of working hard till the task get accomplished. And please never feel lonely in your life.

Thank You So Much Dad.

रविवार, 24 जुलाई 2011

मैं और मुझमे मैं

सुरज
जब सात घोड़ों पे सवार
जहाँ को रोशन करता है
और मैं
उस रोशनी मे
अपने आप को धुला सा महसूस करता हूँ
तब एहसास होता है 
मेरे होने का। 

जब मेरी परछाइयाँ यु ही 
मेरा अनुशरण करती हैं
अपनी काली काया ले कर,
एहसास होता है मेरे भीतर छुपे 
मेरे मैं के होने का। 

जब
अपनी उम्मीदों में,
बादल के खुरदरे सीने पर 
अपने पैरों के अनदिखे निशान छोड़ता हूँ 
आभास होता है 
जहाँ के ज़र्रे ज़र्रे मे मैं हूँ, 
ज़र्रा ज़र्रा ज़हाँ का
मुझमे आत्मसात है। 

शायद मैं न लिखा जाऊं 
इतिहास के सुनहरे पन्नों पर
फिर भी
हाँ वज़ूद है मेरा इस जहां में कहीं.
मैं हूँ इस जहां  में कहीं
अपनी एक छोटी-सी दुनियां को समेटे
अपने आप में कहीं। 

हाँ मेरा भी वज़ूद है 
इस जहाँ में कहीं। 

-अमितेश  

रविवार, 13 मार्च 2011

Vibes of City

It was 4th March 2009 when I came to Raipur in a very wet Sunday when the Sun was trying hard to get out of those mid sky clouds. By the time I reached hotel, I started loving the city. Without meeting any person in particular how come someone start loving any city? Perhaps it’s the vibes of the city that was syncing with me. And that has bought me to feel a little affectionate about the city by spending just 20 minutes while traveling a distance of about 18 km.

The first impression of city for me was that I have started loving the city. So, I was seeing everything of the city through those spectacles only. While encountering any situation, I was feeling like, its OK it happens and I will face the situation of the city because I like this place. I have faced many tough times in this place but I never have felt frustrated of the situations since I loved this place.

Now it’s 20th February 2011. It again was a Sunday, but a little cold evening. It was a time to bid Adieu to Credible Raipur (What the CG Government says in its advertisement). I got transferred to Kolkata from Raipur. This is the third time when I would be coming to Kolkata. Once in 1996 when I came here to appear in some entrance exam and second time in 2005. The second time I came here just till airport as my connecting flight from Patna to Mumbai was via Kolkata. I still remember my 3 hour stay here at Kolkata Airport. The time gap of 3 hour between my connecting flights had forced me to stay here at the airport, a little captive kind of situation where the time was not that much to enjoy the city. So the world for me was airport for those 3 hours. My experience during that 3 hours was, God, its so very dirty airport with lot of flies keeping you engage with them. The floor of the airport with lot of dirty black spots that even after cleaning had stayed in my memories.

So again I reached the City of Joy. It was a low flying ATR flight that actually gives you a clear view of the ground while flying. As I was nearing Kolkata, those beautiful city lights started sparkling. The sparkling city light scattered in a very maverick manner. The first impression during that time was, Oh what a beautiful independent city that is. A city of Joy in real sense. Where even the lights are so joyously sparkling independently.

With the announcement of Pilot about our landing in the city, I already had developed a kind of Goosebumps. Another new experience is waiting for me. This time in a city that is know for its traditions; the soothing music; the joyous attitude of people; the yellow taxi; white dressed policemen; the 2 coach trams; the women with cotton sari, big bindi and curly hair – perhaps the most sensuous ladies of the world; the men with kurta with a nice embroidery near its buttons, a little talkative; the land of Rabindra Sangeet and lots of talent and the land of communists. The nearer the carriage bus was coming to the terminal, the more my heart started skipping some of the beats. The nearer the bus coming to the terminal, my past two experiences started flashing in front of eyes – the beautiful city, flying pigeons, metro trains, trams, low fare buses, and dirty airport. And to my utter surprise, the Kolkata Airport didn’t have changed much in these 5 – 6 years. It was not that clean, flies were still there. The only different was stains on the floor. It was not there, perhaps because the flooring was new.

After a waiting of around an hour for the cab, I actually had started running on the roads of City of Joy. Can’t believe that. Once again, I started feeling the vibes of the city was syncing with my vibes. Same kind of feeling as it was when I was in Raipur. Hope to see lot of good experiences and memories I could treasure during my stay here in the City of Joy.