बुधवार, 25 मार्च 2020

एकांकी

कब देखा था
उस नीलाभ की
नीले से भी रंग परे हैं। 

कब देखा था
सुबह की किरणें
झिर्री से रिस घर भरते हैं। 

कब देखा था
झुंड में नभचर
गाते समरस उड़ते जाते। 

नीड़ से वो झांकते खगेन्द्र वो
माँ की अपनी वाट जोहते

कब देखा था
प्रेम प्रणय में
मैना के जोड़े को लिपटे। 

आज पृथक और एकांकी हो
जब माँ की झुर्रियां गिने हो 
आज वो मौका ऐसा आया
माँ की अंक में तुम सोये हो
कब देखा था पापा ने
छत पे फूलों को सहज खिलाए
कब यूं चाय की चुस्कियों में सुने
अतित की सारी कथा कहानी। 

कब देखा था
बेटे ने तुम्हारे अक्षऱ लिखना सीख लिया है
उसकी पेन्सिल उसके बस्ते
अब वो खुद ही समेट के रखता

कब देखा था
पत्नी तुम्हारी रोटी पतली सी बनाती
थाली में अक्सर वो
तुम्हारी पसंद के व्यंजन लाती। 

आज जो यह समय मिला है
झांक के देखो खुद के अंदर
कब तुमने छोड़ा था अपने
शौक के लिए मीलों जाना
वो कोने में जो गिटार पड़ा है
ले आओ कोई धुन बजाओ
अरसे से जो नहीं लगाया
आज फिर वो मल्हार लगाओ।

वो जो कविता अधूरी छोड़ी थी
आज उसे पूरा कर जाओ
उस अधूरी कहानी के किरदारों को
आज मंजिल तक उनकी पहुँचाओ

आज पृथक और एकांकी हो
जो छोड़ा था, सब कर जाओ। 


- अमितेश









बुधवार, 15 जनवरी 2020

सेकुलरिज्म

गाजर के हलवे के साथ
पालक साग खाना पड़ता है,
क्या कहें ज़नाब, इन दिनों
हर रोज secularism दिखाना पड़ता है.


बात राम की करो तो
पूजा को इबादत बताना पड़ता है,
क्या कहें ज़नाब, इन दिनों
हर रोज secularism दिखाना पड़ता है.


जाऊं जो दरग़ाह पे कभी
मत्था टेक के आना पड़ता है,
क्या कहें ज़नाब, इन दिनों
हर रोज secularism दिखाना पड़ता है.


त्याहारों का भी कुछ यों हुआ कि
दिवाली में अली और रमज़ान में राम बताना पड़ता है,
क्या कहें ज़नाब, इन दिनों
हर रोज secularism दिखाना पड़ता है.


सूरज, चाँद, गाय और गिरगिट का भी
आज धरम मज़हब बताना पड़ता है,
क्या कहें ज़नाब, इन दिनों
हर रोज secularism दिखाना पड़ता है.



- अमितेश 

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

वो लड़की

हाँ ये मैं हूँ। मेरा कोई भी नाम हो सकता है। अगर नाम होना अपने होने के एहसास को जीवित रखता है तो मेरा नाम कामना है। हालाँकि इन दिनों नाम को आत्मसात करने की भावना अब मर चुकी है मुझमें।  ऐसा नहीं कि ये हमेशा से था।  पर अब बस मर गई सो मर गई।  

क्यों... 

इसका जवाब नहीं है मेरे पास। मैं ढूँढना भी नहीं चाहती। पता नहीं मेरी जीवन से क्या अभिलाषा है। नहीं जानती मैं हर एक व्यक्ति से क्या चाहती हूँ। पता नहीं मेरी हर क्षण से क्या अपेक्षाएं हैं। कभी - कभी लगता है कि  मैं सच में जीवित हूँ भी या बस ऐसे हीं एक मृत शरीर और मृत मन लिए घूम रही हूँ। ऐसा लगता कि मैं अदृष्य हूँ इस जहाँ में। किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता मेरे होने और ना होने से। शायद मुझे भी फ़र्क़ नहीं पड़ता इस बात से अब। 

ऐसा भी नहीं कि मैं हमेशा एक मृत देह, मृत मन हुआ करती थी। मेरे भीतर भी जीवन था कभी। एक सतरंगी जीवन... सौ रंगों वाला जीवन। कामनाओं से भरा जीवन। कामनायें इतना कि लगता एक जीवन थोड़ा कम हीं पड़ेगा मुझे। माँ भी मुस्करा देती ये सुन कर। हाँ तब मैं बस 15 की थी। एक उम्र जो बचपन और जवानी के बीच की दहलीज़ होती है। जब लड़की अपने लड़कपन और परिपक़्वता के बीच झूलती रहती है। कई दफा अल्हड़पन में भी परिपक़्वता दिख जाती तो कभी परिपक़्वता भी अल्हड़ लगती। माँ जानती थी इस अवस्था को। अनुभव था उन्हें इस बात का। हां मैं भले नहीं समझ पाती उस समय इन बातों को।

अक्सर माँ से कहती - "माँ तुम बहुत भोली हो, बिलकुल भी नासमझ हो।"

आज समझती हूँ इस बात को जब मेरी बेटी मुझे ये सुना जाती। हाँ मैं भी अब बस मुस्करा देती उसकी इस बात पे। शायद मैं भी अब अनुभवी हो गई हूँ।

हमेशा लगता कि एक रिक्तता है मेरे जीवन में। पापा और माँ की मैं लाड़ली थी। उनकी अपनी जान से भी ज्यादा अनमोल। शायद इसी वजह से मैं उनकी अकेली संतान थी। वो अपना प्यार किसी से भी बांटना नहीं चाहते थे। ऐसा नहीं कि मुझे इस बात का इल्म नहीं था। पर पता नहीं क्यों हमेशा ऐसा लगता की मैं इससे भी कहीं ज्यादा की हकदार हूँ। शायद यही वजह थी कि मेरा नाम माँ - पापा ने कामना रखा था। हालांकि मुझे लगता है कि मेरा नाम कामना है इसलिए मैं ऐसी हूँ।

ओह ऐसी ही सारी बातें मुझे दिन भर घेरे रहती। इसका मतलब ये नहीं कि मैं पागल हूँ या पागलपन की ओर उन्मुख हूँ। बस अपेक्षाएं थोड़ी ज्यादा हैं मेरी... हर चीज से।

***

15 की उमर बड़ी खतरनाक होती है। मैं दिखने में ठीक - ठाक सी थी, सो अक्सर कॉलेज में चर्चा में रहती। मुझे चर्चा में बने रहना अच्छा भी लगता। कि मैं जहाँ से गुजरूं, हज़ारो आँखे मेरे रस्ते फूलों से भर दे। कि मैं मदमाती, लुभाती उन फूलों से भरे रस्ते पर बलखाती चलूँ। इसका मतलब ये नहीं की मैं चरित्रहीन हूँ। बस थोड़ी ज्यादा तवज्जो की चाहत थी। मिली भी।

वो तो जैसे मेरे रस्ते पर अपनी निगाहों के पुष्प हमेशा से ही बिछा कर रखता था। बहुत प्यार करता था मुझे। शायद मैं भी। शायद इसलिए की ये मेरा पहला प्यार था और मैं प्यार सीख रही थी। माँ - पापा का तो आपस में स्नेह ही देखा था... प्यार नहीं।

ऐसे ही हम रोज कॉलेज में मिलते। वो मुझे खूब हँसाता। मैं भी खुब ठठा कर हंसती। लगता कि शायद ये ख़ुशी मुझे पहली बार मिली है। वो मुझे हँसते देख कर किसी और ही लोक में चला जाता। कई दफा चुप हो कर, कभी शर्मा कर उसे वापस लाती उसके स्वप्नलोक से। 

दूसरा साल आते - आते ऐसा लगने लगा कि उसकी सारी बातें पुरानी हो गयी है। उसकी हर नयी बात में मैं पुराने शब्द तलासती। अब उसकी हर हरकत पहचानी सी लगती।  यहाँ तक की उसकी आवाज़ की तरंगों तक का मिलान करने लगी पिछले साल से। वो बड़ा ही पूर्वानुमानित हो गया था मेरे लिए।

जब रिश्ते इतनी हद तक पुनरावृत्तिक लगने लगे तो उसकी गर्माहट कमजोर होती जाती है। यही वह क्षण होता है जब वो रिश्ता बस एक पहचान भर बन कर रह जाती है। सो कल का प्यार आज एक पहचान बन गया था हमारे लिए। उसे भी ये बात समझ में आने लगी थी। वो भी अब मिलने - बैठने - बातें  करने और हंसाने की आवृत्ति को कम करता गया। फिर तो उसका मिलना इतना कम हो गया कि वो अब एक अजनबी हो गया था मेरे लिए। हालाँकि मैं इस परिस्थिति से पूर्णतः सहमत थी। बस एक असहमति कचोटती थी... ख़त्म मुझे करना था, उसने कर दी।

कॉलेज के 5 सालों में भी मुझे कोई मंजिल मय्यसर नहीं हो पायी। भागी तो हर बार मैं। जैसे पूरी दुनिया रेगिस्तान बनी हो मेरे लिए और मैं अकेली हिरणी, मृगतृष्णा के पीछे भागती फिर रही थी। पता हीं न चला कि मुझे क्या चाहिए, किस मंजिल की कामना कर रही हूँ मैं।

***

यह सिलसिला आज भी बद्दस्तूर चला आ रहा है। पति तो बहुत प्यार करता है मुझे। मेरे अतीत को भी जानता है फिर भी मुझे प्यार करने में कोई कमी नहीं छोड़ता है। कई दफा... करीब - करीब हर बार मैं उसकी हर बात से असहमत होती, तब भी। पता नहीं वो कौन है जो अक्सर मुझपर हावी रहता है और मुझसे ऐसे काम करवाता रहता है। कई बार... कई कई बार लगता कि मेरी असहमति बेमानी है, अनावश्यक है, फिर भी मेरी अपेक्षाएं मेरा पीछा नहीं छोड़ती।

पता नहीं मेरी ये अतृप्ति कब शांत होगी। पता नहीं मेरा ये बेचैन मन कब तक यूं हीं बेचैन रहेगा। एक अनाम मंजिल की तलाश कभी इस जन्म में पूरी हो पायेगी या ये जन्म भी व्यर्थ ही चला जायेगा।

पता नहीं ऐसी सोंच के साथ मैं अकेले ही पैदा हुई थी या कई और हैं मेरे जैसे। बस अपूर्ण जीवन जिए जा रही हूँ इन्ही जवाबों की आस में।




- अमितेश 

सोमवार, 23 दिसंबर 2019

बूटी

थांजिंग पहाड़ी की तराई का  छोटा सा गांव था मोइरांग। छोटा सा गांव जहाँ प्रकृति ने अपनी सबसे बेहतरीन खूबसूरती बिखेरी थी।  कहते हैं ये गांव द्वितीय विश्वयुद्ध के समय योद्धाओं के गांव के नाम से जाना जाता था।  कई युवा जय हिन्द का उद्घोष लिए आज़ाद हिन्द फौज में भर्ती हुए थे उस दौरान।  दीवानों का गांव था ये।  फर्क नहीं पड़ता कि किस देश की सेना से वो लड़े, पर मर मिटे वो अपने देश पर ही।  

सामजाई ऐसा ही एक दीवाना था। दिनभर खेतों में काम करता और दोपहर बाद अपनी छोटी नांव में खु - इचिंगवा लिए लोकटक तालाब में पहुंच जाता। रोज़ इतनी मछली तो पकड़ ही लाता कि दो वक़्त का खाना हो जाये और थोड़ी मछलियां सूखने को डाल दे - बाद के दिनों के लिए। उसकी पत्नी नाउतन तो थोड़ी सूखी मछलियां हाट में बेच भी आती, कि कुछ ऊपर की जरूरतों के पैसे बन जाते। जिंदगी खुशहाल और अच्छी चल रही थी उनकी। उनका खेत भी लोकटक तालाब के पास था सो ढ़ाई फसल निकाल लेता था वो अपने खेतों से। तब भी जब गांव में पानी की थोड़ी कमी हो जाती। सामजाइ अक्सर कहता की उसकी खेत अगर उसकी माँ है तो लोकटक उसके पिता की तरह है जो उसकी खेत को कभी बंजर होने नहीं देता। 

जिंदगी यूँ ही चल रही थी। सामजाई और नाउतन यूं ही जिंदगी की जद्दोजहद में खपते जा रहे थे।  पता नहीं कोई उमंग उनकी ज़िन्दगी की डोर को बेहतर बना रहा था या जीवन जीने की जिजीविषा। पर ज़िन्दगी बेहतर ही थी उनकी। अक्सर सामजाई बातों बातों में कहता कि मेरा बेटा अरूज़वान इम्फाल में पढ़ाई करेगा, बेहतरीन योद्धा बनेगा और भारतीय सेना में जायेगा। अरूज़वान हालाँकि अभी पैदा भी नहीं हुआ था। वो एक भरोसे में था कि जब नाउतन माँ बनेगी तो अरूज़वान ही होगा। 

***

नया दौर लोगों में नए तौर तरीके ले आता है। मोइरांग इस से अछूता नहीं था। नई तकनीक ने मोइरांग को वृहत्त पटल पे ला कर रख दिया था।  उसने इनका इस्तेमाल कर खेती शुरू कर दी थी। अब पैदावार और भी बेहतर हो गयी थी।

सामजाई उन कुछ लोगों में था जिसने आरंभ से ही नए तरीकों का प्रयोग शुरू कर दिया था। वो अब ना सिर्फ मछलियां पकड़ता बल्कि मछलियों के अच्छे बीज भी लोकटक में डालता। बेहतर नस्ल की मछलियों के बीज। इस वजह से वो कई दफा इम्फाल भी घूम आया था। अब उसकी मछलियां ज्यादा बेहतर होती और ज्यादा मछलियां भी पकड़ पाता। नाउतन ने भी अपनी पुरखों की मछलियों के अचार बनाने की कला का सदुपयोग करना शुरू कर दिया था। अब वो कई किस्म की मछलियों के अचार छोटे - छोटे मर्तबान में पैक कर पास के बाजार में बेचने लगी थी। उसकी कला ने उसे पहचान और पैसा, दोनों ही देना शुरू कर दिया था। सामजाई ने अब स्मार्ट फ़ोन खरीद लिया था। सो जो समय अपने सारे काम करने के बाद वो अपने परिवार और नाउतन को देता था, अब अपने फ़ोन को देना शुरू कर दिया था। उनसे इंटरनेट पर जैविक खेती के बारे में पढ़ा और देखा की एक छोटा सा कुनबा काफी तेजी से इसे अपना रहा है। धीरे - धीरे उसके उत्पादों का बाजार भी बड़ा होता जा रहा है। उसने भी जैविक खेती के तरीके को अपनाने का सोंचा। शुरू भी कर दिया और सफलता मिलनी भी शुरू हो गयी। तो पैसे और भी बढ़ने लगे घर में। कुल मिला कर वो कर तो आज भी वही रहा था, बस करने का तरीका बदल डाला था। घर की आमदनी में लगातार इजाफा होने लगा था। हालाँकि ज्यादा पैसे की उसकी या नाउतन की जरुरत नहीं थी पर अगर ये बढ़ रहा है तो इसमें हर्ज़ क्या है। सो दोनों जो अब तक ज़िन्दगी कमा रहे थे, अब पैसे कमाने लगे थे। 

कहते हैं ज्यादा पैसा नयी विसंगतियाँ लाता है। वो विसंगतियाँ कैसी भी हों, उनसे निकल पाना मुश्किल ही होता है।  सामजाई और नाउतन भी इसके शिकार होने से अपने आप को बचा नहीं पाए। उनमे ज्यादा पैसे कमाने का उन्माद पैदा होने लगा था। अब वो ज्यादा समय पैसे बनाने के तरीकों को देने लगे बजाय एक दूसरे को देने के। और पैसा था कि और बढ़ता जा रहा था, उन्हें अपने मजबूत पाश में और भी जकड़ता जा रहा था। अब द्वितीय विश्वयुद्ध के एक वीर योद्धा का बेटा सामजाई एक व्यापारी बन गया था। और भी बड़ा बनने होड़ में उसने रंगून जाने का निर्णय लिया। उसे अपनी मछलियों और जैविक उत्पाद के लिए और भी बड़ा बाजार चाहिए था। इम्फाल उसे अब बड़ा बाजार नहीं लगने लगा था। एक बार तो नाउतन ने उसे समझाया भी की अरूज़वान अब आने ही वाला है। शायद अगले दो महीने में वो कोख की काली लेकिन ममतामयी दुनिया से इस नयी रुपहली दुनियाँ में अपनी किलकारियां भरना शुरू कर देगा। सो थोड़ा रुक कर रंगून जाये। पर जब पैसा नशे की तरह चढ़ना शुरू हो जाये तो इतना आसान भी नहीं होता उसके चंगुल से छूट पाना। फिर ये नशा तो मोहिनी की तरह थी। जिसके प्यार में सामजाई अंधा ही हो गया था। उसे नहीं मानना था, सो नहीं माना।


***
रंगून में सामजाई करीब महीने भर रहा। जितना ज्यादा संपर्क लोगों और बाजार के साथ वो साध सकता था, साधा। उद्देश्य सिर्फ एक था, अपने उत्पाद के लिए ज्यादा बड़ा और ज्यादा मुनाफा वाला बाजार देखना और बनाना। रंगून ने भी उसकी मछलियों और कृषी उत्पाद की खासी सराहना की। इस एक महीने में उसने ठीक ठाक बाजार बना लिया था खुद के लिए।

जब वापस आया तो उसे अपना मोइरांग छोटा लगने लगा। इतने छोटे से जगह में बड़ा होना मुश्किल है। जो मोइरांग और लोकटक आज तक उसे अपने माँ बाप लगते थे, वो अब उसे सुकून नहीं दे पा रहे थे। आज वो माँ का आँचल उसे छोटा लगने लगा था और बाप के आँखों का पानी भी उसे बहा नहीं पा रहा था। इन्ही तनाव के क्षण में उसे रंगून से लायी वो बूटी अपने शरण में ले गयी। ये सफ़ेद बूटी जो सिर्फ इंसान ही नहीं उसके पुरे वजूद को अपने में समेट लेने की क्षमता रखती थी। वो सफ़ेद बूटी जो धीरे धीरे मोइरांग में अपना पैर जमाने लगा था। सामजई जैसे कई युवा जो अपनी जमीन से भी ज्यादा बड़ा बनना चाहते थे, उसे अपनाने लगे थे। बड़ा बने या ना बने, पर वो अब जमीन को दोष मढ़ने की कला सीखने लगे थे इस बूटी की शरण में।

सामजई अपवाद नहीं था इन बदली हुई परिस्थितियों का। अब तक जो सामजई एक लड़ाका की तरह जीता था वो अब तनावों में रहने लगा था। बड़े बनने की चाहत और बड़े शहर की चकाचौंध ने उसे अपने छोटेपन का एहसास कराना शुरू कर दिया था। हालाँकि वो इतना भी छोटा नहीं रहा था अब। अपनी मेहनत और दक्षता के दम पर उसने अच्छा नाम कमाया था। पैसे भी बनाये थे उसने जो शायद उसकी ज़रूरतों के हिसाब से ठीक ही थे। पर और बड़ा बनने की कोई सीमा थोड़े ना होती है। उसे तो और भी बड़ा बनना था। उसकी इस चाहत ने उसे किसी और ही जहाँ का बाशिंदा बना दिया था। अब उसका ज्यादा समय चरस और चिंता में ही बीतने लगा।

नाउतन ने उसे काफी समझाने की कोशिश की लेकिन वो शायद उस समझने की अवस्था से काफी आगे निकल आया था। नाउतन की भी उम्मीदी के दिन नजदीक आ रहे थे। सामजई इन जिम्मेदारियों से भी भागने लगा था। जैसे - तैसे दिन गुजर रहे थे। आखिर अरुजवान ने इस नयी दुनिया में कदम रख ही दिया। समय की विडम्बना ऐसी की उस समय भी सामजई अपने आपे में नहीं था। वो चरस में डूबा थांजिंग की एक पहाड़ी पे पड़ा था। नाउतन अब धीरे धीरे ये समझ गयी थी कि अब उसका सामजाई से ज्यादा उम्मीदें और वास्ता रखना अपने आप को तकलीफ देने जैसा ही होगा। लिहाजा उसने अपने सारे व्यवसाय को खुद अपने हाथों में लेना शुरू कर दिया था।

***

जिस घर में अबतक खुशियां और संतोष अपना आसियाना बनाये हुई थी वहां कलह ने घर कर लिया था। रोज सामजाई नाउतन से पैसे को ले कर झगड़ता। पैसे भी किस लिए, उस पावडर के लिए जो सामजाई से उसका अस्तित्व ही छीनने लगा था। अरुजवान भी इन्हीं माहौल और परिस्थितियों में बड़ा हो रहा था। नाउतन यूँ ही घर चलाने लायक पैसे बना ले रही थी। पर अब सब कुछ पहले जैसा तो रहा नहीं था। सो मेहनत भी थोड़ा कम होने लगा था काम में। खेती तो ठप्प ही हो गयी थी। इसलिए नहीं की धरती बंजर हो गयी थी, पर इसलिए की धरतीपुत्र नाकारा हो गया था। कहाँ तो सामजाई आसमान को अपनी झोली में भरने निकला था और कहाँ ये जमीन भी उसकी हाथ से रेत की तरह फिसलने लगी थी। ऐसा नहीं की सामजाई कोशिश नहीं करता अपनी इस परिस्थिति से बाहर निकलने की। पर उस पाउडर की आगोश में कुछ ज्यादा ही आगे निकल आया था वो। इतना आगे कि अब उसे अपना घर परिवार भी धुंधला - धुंधला - सा दिखने लगा था, भविष्य तो दिखता भी नहीं था। जो अरुजवान अपने पैदा होने से पहले ही उसके खयालों में किलकारियां भरता था, आज जैसे उसे अजनबी की तरह देखता था। अपने कलेजे के टुकड़े को जैसे जी भर कर कलेजे से लगा भी नहीं नहीं पाया था।

पता नहीं दिन भर उसके दिमाग में कैसी - कैसी बातें चलती रहती। कभी अरुजवान तो कभी नाउतन उसकी आँखों के सामने से तैरते से निकल जाते। कभी लगता की लोकटक में वो गहराई तक उतरता जा रहा है और उसकी साँसे फिसल रही हैं उसकी शरीर से तो कभी लगता की थांजिंग की चोटी से वो बेलौस लुढ़कता चला जा रहा है, रंगून की तरफ और चाह कर भी अपने आप को रोक नहीं पा रहा है। उसे कुछ समझ नहीं आ  रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है। सामने से आते एक बस में वो बैठ गया। कहाँ जाना था, पता नहीं। कब तक चलता रहा, पता नहीं। उसे बस अपने साथ उड़ाती चली जा रही थी। दूर तक बस धूल का गुबार दिख रहा था, आसमान तक पहुंचने की आस में रास्ते में दम तोड़ते हुए।

***

काफी खोज खबर हुई गांव में और आस - पास के इलाके में सामजाई की। पर कहीं कुछ पता नहीं चला। लोगों ने सोचा की ये तो होना ही था, सो हो गया। नाउतन ने भी इसे अपनी नियति मान ली। हालाँकि ये नियति तो पहले ही लिखी जा चुकी थी और वो इस नियति के साथ पिछले कुछ सालों से रह भी रही थी। अब पूरी दुनियां में जैसे वो और अरुजवान ही रह गए थे। उसने कुछ कमी भी नहीं छोड़ी थी अरुजवान की परवरिश में। समय अपनी रफ़्तार में था। वो अपनी जवानी को ले रहा था और अरुजवान को भी वही जवानी दिए जा रहा था। आज तो बारहवीं का परिणाम भी आ गया उसका। अच्छे अंक आये थे उसके। माँ को गले लगाते हुए जब उसने अपना परिणाम बताया तो नाउतन की ख़ुशी का पारावार ही नहीं था। जैसे अरसे बाद ख़ुशी इस घर में आयी थी। उसकी वो छोटी छोटी मिचमिचाती आँखें और भी छोटी हो गयी थी। ना जाने कहाँ से उनमे जमा पानी रिस आया। जो बहा तो ऐसे बहा की जहाँ भर के पानी के सोते भी उन्हें जमा न कर पाएं। अरुजवान उन अनमोल मोतियों को जैसे अपनी यादों की तिजोरी में जमा करता जा रहा था। उन मोतियों को करीने से रखते रखते उसने अपनी माँ से बोला - "माँ, मैं भारतीय सेना में जाना चाहता हूँ। एन डी ए का फॉर्म भी भरा है। पहला राउंड क्लियर हो गया है। अब साक्षात्कार के लिए जाना है। जाऊं ना।"
नाउतन को अचानक सामजाई की याद आ गयी। यही तो वो चाहता था, कि उसका बेटा योद्धा बने। अपने पुरखों और गांव का नाम रोशन करे। आज तो मानों खुशियों ने फिर अपना ठिकाना बदल लिया था। जो इतने वर्षो से रूठी थी, आज जी भर कर बरस रही थी। आज सामजाई होता तो कितना खुश होता। पता नहीं कहाँ है। जिन्दा भी है या नहीं। काश ज़िंदा ही रहे।

***

आज 6 वर्षों के बाद अरुजवान वापस आ रहा था। अब तो इम्फाल तक ट्रेनें चलने लगी थीं। उसे लेने के लिए नाउतन इम्फाल स्टेशन आयी थी। अरसों बाद वो अपने योद्धा बेटे को देखने वाली थी। बड़ी सज संवर कर आयी थी वो। बेटा सेना का बड़ा अफसर बन कर आ रहा था। पुरे यूनिफार्म में होगा। लोग देखते हीं सलामी ठोंकेंगे। मोइरांग में अरसों बाद कोई योद्धा कदम रखेगा। वो भी बड़ा रंगरूट बन कर।
उसकी सोंच में ही ट्रेन स्टेशन पे आ गयी। तक़रीबन शांत से पड़े स्टेशन में अचानक ही गहमा - गहमी बढ़ गयी। लोग जाने क्यों इधर से उधर भाग रहे थे। अजीब ही अफरा - तफरी का माहौल तिरा था चारो तरफ। इसी अफरा - तफरी में ख़ाकी वर्दी में एक बांका नौजवान दिखा। बड़ा ही तेजस्वी दिख रहा था। नाउतन ने उसे दूर से देख कर भी अपने कलेजे से लगा लिया था। वो अपनी सधी चाल में नाउतन के करीब तो बस अब आया था। दोनों ही अपने अपनत्व की भावनाओं में चरम पे थे। उनकी तन्द्रा तभी टूटी जब अचानक ही कोई बार - बार अनुग्रह कर रहा था। "बाबा पैसे... बाबा पैसे..."

एक आकृति, गंदे - फटे कपड़े पहने हुए चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ी और लट बने बाल लिए बार - बार उनसे कुछ पैसे देने की गुहार कर रहा था।

दोनों की आँखें उस भिखारी पर जम गयी। अरुजवान उसे देख कर समझ नहीं पा रहा था की कैसे रियेक्ट करे। वहीं नाउतन की आँखे चौकने लगी थी... ये आदमी पहचाना सा लग रहा था। अरे ये तो सामजाई जैसा दिखता है। शायद सामजाई है। सामजाई ही तो है। एक झटके में उसकी सारी स्मृतियाँ चारो ओर घूम गयी... उसकी जिंदगी के बेहतरीन पल से ले कर दुखदाई पल तक... सारे पल। अरुजवान ने शायद उसे नहीं पहचाना था। पहचानता भी कैसे। जब सामजाई भागा था घर से तब वो महज़ दो साल का था। उसने तो सारी ज़िन्दगी नाउतन में ही अपने माँ और बाप दोनों को देखा था।

नाउतन को एक बारगी लगा कि उसकी भावनाएं उफ़ान लेकर बाहर आ जाएँगी। पर पिछले 18 - 20 वर्षों में उसने उन पर काबू पाना सीख लिया था। एक बार उसने अपने योद्धा बेटे अरुजवान को देखा, फिर उस कायर सामजाई को। फिर अपना पर्स खोला, सौ का एक नोट निकाला और उस बुड्ढ़े को देते हुए बोली -"बाबा, ये मेरा योद्धा बेटा है। इसकी लम्बी आयु की दुआ करना अपने ईश्वर से।"

"ईश्वर इसे लम्बी उम्र दे।" छलकते आँखों से उसने हाथ उठा कर दुआएँ दी और पैसे नाउतन से लेकर अरुजवान के हाथ पे रख दिया। बिना कुछ और बोले वो वहां से चला गया... उस अफरा तफरी की भीड़ में... दूर एक आकृति दिख रही थी अब उसकी, अपने आँसुओं को पोछते हुए भागा - भागा दूर जाते हुए। इन दोनों की नज़रों से दूर... शायद उनकी ज़िन्दगी से भी...


- अमितेश 

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

अपने घर

वो माँ की गोद में सो जाना
वो उसका मनुहार कर खिलाना
वो मेरी झिड़कियां, वो उसका मुस्काना
वो शाम ढले घर से निकलना
वो माँ का चुपके से कुछ सिक्के मेरी जेब में डालना
वो दिन सुनहले, वो रातें रुपहली
आ अब वापस लौट चलें,
अपने घर के रास्ते.

वो पापा का डाँटना
वो उनका बात बात पे चिढ जाना
कभी गुस्से में हाथ उठाना
फिर सकुचा कर प्यार जताना
वो मेरी एक ख़ुशी को,
उनका कई मौत मर जाना
वो अहले सुबह उनका भजन गुनगुनाना
वो दिन सुनहले, वो रातें रुपहली
आ अब लौट भी चलें
अपने घर के रास्ते.

वो यारों की यारी
वो बिन बात उनसे भिड़ जाना
वो साफ़ कपड़ो में स्कूल जाना
वो शर्ट के कॉलर का काला पड़ जाना
वो दिन सुनहले, वो रातें रुपहली
आ अब चल हीं चले फिर
अपनें घर के रास्ते.

ये दुनियाँ की मुश्किल
ये रिश्तों की जटिलता
ये दफ़्तर की परेशानियाँ
ये दिन बोझिल, ये रातें पहेली
ये बनावटी मुस्कान
ये हाल बेहाल
ये दौलत कमाना और खुशियां बटोरना
ना जाने कहाँ रखें वो
वो दिन सुनहले, वो रातें रुपहली
आ अब वापस लौट चलें
अपने घर के रास्ते.


- अमितेश 

शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

औंधा चाँद

चाँद को एकटक
निहारने की अभिलाषा में
जो गया छत पे अपने
देखा चाँद को तेरे छज्जे पे अटका हुआ सा।
अपनी पूरी ताकत लगा जो
चाह रहा था रोशनी की पराकाष्ठा को पाना
कि छुपा ले शायद
अपनी दाग़ उस रोशनी से।
शायद वो भी कुंठित था
तेरी चमक देख कर।

वो भी एक दिन थे
जब मैं ईद मनाता था
तुम्हे देख कर
साल में कई बार
तोड़ हर बार अपना रोज़ा।

जब तुम्हारे सानिध्य में
कई आकाश गंगा घूम आता था।
और तुम
मेरे अचंभित भाव को
मन ही मन
मनाती थी, मुस्काती थी।

जब तुम्हारी खुशबु
मेरी धमनियों में बस बहती
मेरे रक्त का हिस्सा बन कर
मुझे प्राण वायु देती
मुझमे ज़िन्दगी भर कर।


आज जो फिर धर आया
चाँद को
तेरे छज्जे पे औंधे मुँह
कि फिर वो दिन वापस ला दे
कि फिर मैं आज ईद मना लुं अपनी
कि फिर कुछ ज़िन्दगी जी लुं
तेरी आस, तेरे सानिध्य में।


- अमितेश 

मंगलवार, 14 मई 2019

मीत

जेम्स परेरा कॉफिन सेलर - ख़ासी हिल्स की तराई में बसा एक छोटा सा गांव "रिंग्दोह" और रिंग्दोह की एक छोटी सी दुकान। जेम्स का वैसे तो यह पुश्तैनी व्यवसाय नहीं था पर एक जीवन में कई मौत देखने के बाद उसे मौत से लगभग प्यार सा हो गया था।  सो यह दुकान उसके उसी प्यार की अभिव्यक्ति भर थी।

जन्म से तो वो बढ़ई था, पर हुनर से "बेहतरीन कॉफिन" बनाने वाला। उसकी बनाई कॉफिन इतनी designer और खुबसूरत होती की मौत के इस माहौल में भी जब कोई उससे कॉफिन लेने आता, मुस्कुराये बिना नहीं रह पाता।

अज़ीब philosophy थी जेम्स की - "सारी ज़िन्दगी इस आस में अपने कर्मों का लेखा जोखा लेते रहते हैं कि हम स्वर्ग के क़रीब पहुँच रहे हैं या नर्क के।  कि अगर कुछ गलत हो जाए तो चर्च में जाकर confess कर आते हैं इस उम्मीद में कि परवरदिगार हमें, हमारे sin को माफ़ कर heaven का रास्ता तैयार कर रहा है।  तो इस हसीन राह की सवारी भी हो बेहतरीन होनी चाहिए ना।" इसलिए सारी हुनर, अपनी सारी रचनात्मकता वह इन 6*2 के बक्से में डाल देता।

खासा प्रसिद्द हो गया था वो ख़ासी हिल्स के कई गावों में।  दूर दूर से लोग उसकी कॉफिन खरीदने आते - एकाध तो बस उस दुकान में यूँ ही चले आते - मानों कॉफिन संग्रहालय जा रहे हो घुमने के लिए। और कला के इन बंद बक्से की कीमत - बस एक शर्त, कि किसी वैसे दो लोगों की उस आखरी क्रिया को करनें की शर्त जो शायद ईश्वर के Destiny Child नहीं हो पाए। और हां उससे उसका धर्म ना पूछना।  वो बॉडी है अब, बिना सांस की बॉडी।  उसका अब कोई धर्म नहीं रहा है।  बस वैसे ही उसका अंतिम संस्कार करना जैसे उसके घरवाले कहते है - क्योकिं घरवालों की साँसे अभी भी चल रही है।

अलग ही व्यक्तित्व था जेम्स का।  उम्र कुछ ज्यादा नहीं थी - कुछ 38 - 40 का था वो।  बेहद हंसमुख।  उसकी Sense Of Humor भी बड़ी कमाल की थी।  लोग अक्सर उसकी संगत पसंद करते थे, शिवाय उन मौकों के जब वो अपनी दुकान में होता।  क्योंकि वो बिलकुल ही बदल जाता जब अपनी कॉफिन की दूकान में होता।  मतलब उसकी Sense Of Humor थोड़ी Dark हो जाया करती।  उसकी बातों में मौत को मीत के तरह देखने का वर्णन होता। देखने वालों को लगता जैसे उसका स्वरुप ही बदल गया है। यमराज सा दिखने लगता।  अब भला यमराज के अलावा कौन है जिसे मौत से प्यार हो।  लोग अक्सर इसे सत्य से किनारा ही रखना चाहते हैं।  जो रूबरू ही हो जाये  ये सत्य तो लोग आँखें चुराने लगते - जैसे देखा ही नहीं हो।
जेम्स अक्सर कहता - कब तक बचेगा इससे। ये जब आएगी तब अहसास होगा कितनी प्यारी सी चीज है ये।  तब लगेगा कि ख्वामख्वाह ही भागे जा रहे थे इस सत्य से उम्रभर।

"जेम्स तुम ऐसे बात करता है जैसे तुझे मरने का Experience है।"

"हा हा हा हा. कई बार मरा हूँ मैं इस ज़िन्दगी में।  जब कोई किसी के लिए कॉफिन खरीदने आता और जैसे बोझ उतारने सा व्यवहार करता - तब मैं मरता हूँ।  जब कोई किसी अनजान के लिए Final Rite की तैयारी करता - तब मैं मौत से रूबरू होता। जब कोई बेटा अपने माँ - बाप के लिए यहाँ आता और कॉफिन ले जाने तक भी यह मानने को तैयार नहीं होता की अब उसके सर से उसके माँ - बाप का साया उठ गया है - तब मरता हूँ मैं।  और जब कोई कॉफिन खरीदने में भी Bargain करता - तब मरता हूँ मैं।"

"यार तुझसे बात करना भी बेकार है।"

"हा हा हा हा"

ऐसे ही बातों और बतकही में दिन बीत रहा था। ऐसे ही जेम्स कॉफिन बना रहा था। ऐसे ही लोग उसकी प्रशंसा कर रहे थे।  पर अक्सर लगता जेम्स को कि कुछ कमी है उसकी ज़िन्दगी में। कि  उसकी कला अभी भी अपनी पराकाष्ठा को नहीं पा पायी है। लगता की कभी ऐसा कॉफिन बनाये कि लोग देखते रह जाएँ। कि लोग उस कॉफिन में सोने के सपने बुने। ताज़महल से भी बेहतर। हां, शायद ये बेहतर होगा। शायद यही उसे आत्मिक संतुष्टि दे पाए। हां वो एक बेहतरीन कॉफिन बनाएगा। अपनी सारी कला, सारी Creativity लगा देगा उसमे। और ये उसके लिए बनाएगा जो मौत को मीत मानता हो। मेरी तरह। अजीब सी बात है, हो होने दो। जहाँ मेरा हुनर है, वहीँ तो बेहतरीन करूंगा ना।
जब  आपके अनुराग आपकी ऊंचाई से कुछ ऊँची हो जाए तो थोड़ी व्यथा तो होती है ना। फिर जेम्स को वो व्यथा क्यों नहीं हो रही। वो तो कुछ ज्यादा ही जज़्बाती होता जा रहा था अपने जूनून के लिए।

वो लग गया अपने जीवन का सबसे बेहतरीन कॉफिन बनाने में। वो अहले सुबह निकल जाता जंगल में - सही लकड़ी की तलाश में। कई पेड़ को ठोकता, बजाता, उसकी छाल छिलता, सूंघता फिर आगे बढ़ जाता। ऐसा कई महीनों तक चलता रहा। आखिरकार उसे सही लकड़ी मिल ही गयी। फिर उसे काट छील कर कई आकार बनाता, कुछ रखता कुछ फेंक देता। आसपास के लोगों को लगने लगा कि शायद जेम्स पागल हो गया है। चर्च के फ़ादर ने भी समझाने की कोशिश की, पर वो लगा रहा अपने धुन में। हालाँकि गांव वालों को पता था कि जेम्स जो कर रहा है वो ज़रूर कुछ नायाब फल देगा। शायद ताज़महल भी इसी जूनून से बनाया गया होगा। पर लोग नायाब और कॉफिन को एक साथ नहीं समझ पा रहे थे। तभी लोग उसे थोड़ा सनकी समझने लगे थे। अब भला कौन ऐसी इच्छा रखता है की मरने के बाद मैं सबसे बेहतरीन कॉफिन में जाऊं। मतलब शायद ही कोई अपनी कॉफिन की कल्पना अपनी कल्पना में भी करता होगा। मुमताज़ ने भी ताज़महल की कल्पना खुद नहीं की थी। अब कोई इसे कैसे समझाए कि हुनर का बेजाँ इस्तेमाल, हुनर का अपमान ही है।

पर जेम्स उस मिट्टी का नहीं बना था कि लोगों की बातें उसके सांचे का स्वरुप बदल सके। वो तो रमा था अपने काम में। जो एक धुन सवार हो गयी तो हो गयी। बात सिर्फ कॉफिन की नहीं थे। बात थी इसकी कि उस कॉफिन की सवारी कौन करे। कैसे ढूंढे उसे जो मौत को मीत मानता हो। जिसे मौत से बेइन्तहाँ प्यार हो। हाँ ये बात उसने सब को कह रखी थी कि अगर किसी को वो इंसान मिल जाये तो जरूर बताये। जेम्स खुद उसके परिवार से मिल अपनी सबसे बेहतरीन कलाकारी उन्हें गिफ्ट करेगा।

वो लगा रहा अपने काम में। यूँ हीं दिन आपस में जुड़ कर महीनें और फिर साल बनते रहे। और जेम्स वैसे ही अपने सपने को आकार देने में लगा रहा। तरह तरह के पत्थर, धातु जो जहाँ से मिल जाता जमा करता जाता। क्या पता कौन सी चीज उसके सपनों के जिगसॉ पज़ल को आकृति दे जाये। ऐसे ही उसके सपने हिस्सों में अपने आकार को लिए जा रहे थे।

***

हम हमेशा जो सोंचते हैं वैसा ही, उसी स्वरुप में हमेशा नहीं होता। शायद कोई है ऊपर में जो अपनी अलग ही रचनात्मकता दिखाता रहता है। जो हर चीज को Perfection के चश्मे से नहीं देखता। जो गर देखता तो क्यों लोग कहते की काश थोड़ा वक़्त और दिया होता तो अच्छा होता। वो बार बार लोगों को बताता रहता की Perfection कई बार Imperfection में भी होता है। बस नज़रिए चाहिए। बस हम यहाँ ये समझ नहीं पाते और अक्सर उसको कोसते रहते।

आज शायद गांव वाले ऐसा ही सोच रहे थे - जेम्स के बनाये बेहतरीन कॉफिन को अपने कंधे पे उठाये। काश कुछ वक़्त और दिया होता परवरदिगार ने जेम्स को तो जेम्स इस कॉफिन में लगभग जान ही दाल देता।
जेम्स था की अपने बनाये इस ताज़महल में लेटा था, निश्चेतन। उसे शायद परवाह नहीं थी कि ये कॉफिन सच में दुनिया की सबसे बेहतरीन कॉफिन है भी या नहीं। हाँ गांव वालों को ये जरूर पता था कि जेम्स से बड़ा मौत का प्रशंसक कोई नहीं है इस दुनियां में। इस ताज़महल का हक़दार सिर्फ जेम्स ही है, और कोई नहीं।


- अमितेश 

बुधवार, 21 जून 2017

A Date With Indian Railway

So it is not so often happens to travel in Train. Mostly once or twice a quarter kind of experience I get these days. It came this time a little early. Was traveling to Howrah from Jamalpur station. Jamalpur is one very beautiful city in India, with world class infrastructure and ITC's state of the art cigarette factory. The city have another industry that makes world class gun and sell it to the world. The climate is no less than any city of Switzerland. Duh, I don't know how much lie a man can speak when it comes to explaining his "In Laws" place.

So the context here is not date with same old young Wife but with ageing and growing beautiful Indian Railways.

How it feels when you see a station cleaner than even thought off is beyond the explanation. My marriage is as old as this "Nationalist" government and so is the time I am traveling to Jamalpur. Every time I have seen this station and its platform, it is getting cleaner than last time. What behavioural changes observed in these time is shift of Rail Employees thought to justify what they are meant for. Cleaning was happening in Platform on a very pattern based frequency. What hasn't changed was every time they broom, they collect lots of garbage. Means the garbage box was used mostly by Rail Employees and not so often by the passengers. What if the station has not been clean and passengers would have to jump over garbage to catch the train. I think the civilised Citizen of India would have thrashed the government and the Railways Ministry so bad that would even has raised brow on government making money from our taxes by doing corruption and not service. Irrespective whether they pay taxes or not.

Out of that "Keeda" in me, I met the Station Master there and have expressed my happiness for keeping the station so very clean. He was so happy to hear, and said that I am the first person in his 2.5 year tenure in this station who came to congratulate than complain. When I asked for the comment / complaint book to write this, he said that its complaint book and not book of appreciation as we hardly get. I said that I really don't have complaints regarding the cleanliness and want to write that but at the same time have complain that ever since this government is in power, I hardly have heard train coming on time.

So after a wait of around 3 hour, my train came. I went to my designated berth. To my surprise, the compartment was filled with unauthorized occupants, so called "Local Passengers" traveling till Bhagalpur or so. Somehow I managed to atleast sit till their destination arrives. What next was usage of social media to kill time. So I opened Twitter and went to @RailMinIndia handle. Raised my concern regarding the situation I am in. In 7 min, I got a reply on that and in the next station two uniformed person came to fix my issue and let me stretch my leg on my berth. I thanked them and felt pity about those full compartment or perhaps full bogie "Local Passengers". Even my fellow "authorised" passengers thanked me. While I have made discomfort for the local passengers, what if they were me and I was them? Perhaps would have traveled with them as second class citizen, which we at times often experience.

I thought that after all these experiences, my date with Indian Railways is now going to be smooth and memorable. Huh, but few more was planned by surprise me and write longer.
This train was coming from Gaya so the linens were being used by passengers boarded in Gaya and would have alighted in between. I asked attendant to provide me fresh linen, he said that the bed cover lying on the berths has not been used by the previous passengers for much longer period of time and why can't I use them. He gave all the irrelevant logic to let me use soiled linens. When I insisted to use fresh one, he finally gave a packed one.

I think to all these incidents during my this date with the Indian Railways, what came out very prominently is that things would not change until and unless we do not change. Government again is the bunch of people coming from within us only. If that are showing signs of changes, why can't we! How much time we require to be the change from being the problem.

Anyways my date with Railways has always been adventurous and this Journey also have lived up to the expectations, without being exception.

मंगलवार, 20 जून 2017

Archived

बाइस की उम्र तक पढ़ाई फिर नौकरी और पैंतालीस तक आते आते रिटायरमेंट। हां तब तक इतने पैसे बना लो की रिटायरमेंट वाली लाइफ बिना किसी उलझन के बीते। हसरतें पूरी करने के लिए कई दफा सोचना ना पड़े. नाही हसरतों को Replace करना पड़े किसी अन्य हसरत से. 

सब कुछ वैसे ही Planned Way में हो रहा था प्रवीर की लाइफ में. पहले IIT कानपुर  फिर IIM कोलकाता और 23 - 24 की उम्र तक एक MNC में नौकरी हो गयी थी. 35 तक तो वो उस कंपनी का GM बन गया था और 40 तक Global GM. करियर के इस पड़ाव तक आते प्रवीर अरबपति बन चुका था. अब वो अपना रिटायरमेंट प्लान कर सकता था सो जैसा सोचा वैसा किया. 45 की उम्र में उसने VRS ले लिया था. उसकी कंपनी ने ससम्मान उसे रिटायरमेंट दे दिया था. अब आगे जो था वो अपनी बीबी के साथ समय बिताना और अपने बेटे के लिए हर वो सुविधाएँ जमा करना जो उसे उससे भी बेहतर भविष्य दे पाए. प्रवीर अपनी जिम्मेदारियों से कभी भागा नहीं. हर वो बात जो ज़रूरी थी, किया। रिटायरमेंट का पहला साल तो कब निकला पता भी नहीं चला. 

पता नहीं क्यों आज वो एक छुट्टी पे जाना चाहता था... अकेले. कहाँ पता नहीं, क्यों, शायद उसका जवाब नहीं था उसके पास या जवाब वो खुद को भी नहीं देना चाहता था. रचना भी उसे समय देना चाहती थी. वो प्रवीर को उस वक़्त से जानती थी जब से उसमे ये ज़िन्दगी वाली फिलॉसोफी बन रही थी. 
कई दफा ज़िन्दगी के भाग दौड़ में हम कुछ छोटी लेकिन अहम् बातों को miss कर जाते हैं जो गाहे बगाहे ज़िन्दगी की सम्पूर्णता को मुँह चिढ़ा जाती है. रचना इस बात को भली भांति जानती थी. सो उसने प्रवीर की इस एक इच्छा को पूरी करने को तथास्तु कह दिया. शायद उसकी ज़िन्दगी की वो कुछ छोटी छोटी बातें जो miss हो गई थी प्रवीर समेटना चाहता था. 

***

बाहर का मौसम जैसे भीतर सिहरन पैदा कर रही थी. बाहर झक सफ़ेद बर्फ की चादर फैली थी. पूरा हिमालयन रेंज जैसे सफ़ेद चादर ओढ़े सुस्ता रहा था. एयरलाइन्स वालों ने लेह जाने के लिए ATR उपलब्ध करवाया था. सो ज्यादा ऊंचाई पर नहीं उड़ने की वजह से जैसे प्रवीर उन हिमालयन रेंज का एक अविभाज्य हिस्सा बना हुआ था पुरे रस्ते. जैसे वो हर नॉटिकल माइल्स के साथ inseparable होता जा रहा था उस आदि हिमालय से. 

लेह... यह जगह उसके Archived Mail का एक अहम् हिस्सा था. Archived Mail... हाँ ये उसकी आदत से थी की जो काम वो शायद बाद में करना चाहता था उसे Archived कर देता था. हाँ हमेशा ध्यान रखता था की Mail उसके Archive Folder में ज्यादा समय तक ना रहे. बस ये लेह वाला Mail ही कई अरसों से उसके Archive में पड़ा था... शायद 20 - 22 वर्षों से. पता नहीं क्यों वो इतने समय तक वहां पड़ा था... ना जाने ये वक़्त सही था क्या की उसे un-archive किया जाए... क्या ये सच में un-archive हो भी पायेगा... ना जाने कितनी बातें, कितने विचार उसके मन में तैर रहे थे. हर बीतते वक़्त के साथ वो उन सफ़ेद पहाड़ों में घुलता जा रहा था, उनका और भी अपना हिस्सा होता जा रहा था. वो समझ नहीं पा रहा था की वो उस Archive Mail के बारे में कुछ जयादा ही सोच रहा है या उसका मस्तिष्क शुन्य में जाता जा रहा है. उसकी यह तंद्रा Air Hostess की आवाज़ के बाद ही भंग हुई - "देविओं और सज्जनों, लेह के Kushok Bakula Rimpochee Airport में आपका हार्दिक स्वागत है. इस समय बाहर का तापमान 7 Degree Celsius है. यह एक सैनिक हवाई अड्डा है और यहाँ तस्वीरें लेना वर्जित है. जब तक कुर्सी की पेटी बांधने का संकेत बंद ना हो जाये, कृपया अपनी जगह पर बैठे रहें... "

प्रवीर अपनी तंद्राओं में ही दिल्ली से लेह पहुंच गया था. हालाँकि मानसिक तौर पर तो अब तक वह लेह में भली भांति घुल मिल भी चुका था, बस शरीर अभी पंहुचा था. एयरक्राफ्ट का दरवाज़ा खुलते ही जो सिहरन अब तक आँखों में थी, वो अच्चानक ही पुरे शरीर में फैलने  लगी थी. 

***

यह एक छोटा सा गेस्ट हाउस था मॉल रोड के एक छोर पे. हालाँकि यह गेस्ट हाउस प्रवीर की हैसियत से कहीं छोटा था. किसी भी एंगल से वो प्रवीर के स्टैण्डर्ड का नहीं था. यह सब प्रवीर को गेस्ट हाउस पहुंचने के बाद पता चला हो ऐसा भी नहीं था. यह गेस्ट हाउस खुद उसने ही Book की थी, Online App से. उसे इस गेस्ट हाउस और इसमें उपलब्ध होने वाली सुविधाओं के बारे में पहले से ही इल्म था. यहाँ रुकने का एक उद्देश्य था. इस गेस्ट हाउस के पास ही एक Cafeteria थी, जहाँ बैठ कर लोग किताबें पढ़ सकते थे, और अपने भीतर पनपते किताबों को लिख भी सकते थे. 

***

"Bookworm Cafeteria" - अजीब सा नाम था ये. असल में अजीब सी जगह भी थी ये. एक Cafeteria जो घर सा लगता था. दीवारों पर Designer Book Shelf लगे थे जिन पर करीने से हिंदी और अंग्रेजी की पुस्तकें रखी हुई थी. साहित्य, यात्रा वृतांत, इतिहास, मनोविज्ञान और न जाने क्या क्या. कई विषयों की कई किताबें. जगह - जगह कुर्सियां लगी थी, आराम कुर्सियों जैसी. कुछ ज़मीन पे गद्दे रखे थे. उनपे साफ़ सुन्दर चादर बिछी हुई थी. कहीं छोटी चटाई बिछी थी दीवारों से लग के. हर जगह एक या दो लोगों के बैठने की जगह थी. हर जगह पर लगभग एक जैसी ही Coffee Table राखी हुई थी. तिकोने Coffee Table. उस पर एक छोटा सा एक पन्ने का लैमिनेटेड मेनू कार्ड रखा था - बहुत ही सीमित मेनू थी - कॉफ़ी, चाय, निम्बू चाय, Fresh Lime Water / Soda, क्लब सैंडविच और ब्रेड बटर बस. लिहाजा आपके पास कुछ ज्यादा Choice नहीं थी खाने पीने की. अगर भूख लग जाए किताबें पढ़ते - पढ़ते तो सामने के होटल से खाना पार्सल करवा कर टेरेस पे खा सकते थे. बस साफ़ - सफाई का ध्यान आपको रखना होगा. 
कुल मिला कर यह जगह Book Worm के लिए ज्यादा और कॉफ़ी पीने वालों के लिए थोड़ी काम थी. और ये सब एक 20 - 21 साल की लड़की मैनेज कर रही थी. 

प्रवीर जब पहली बार उससे मिला तो लगा ये शायद उसी का एक हिस्सा सा है. वो एक Missing हिस्सा जो अनायास ही प्रवीर को एक पूर्णता दे गया था. 

"Hi, मेरा नाम प्रवीर है." 

"Hello Sir, welcome to Navya's Bookworm Cafeteria."

नव्या... अच्छा नाम था... आज का नाम... आधुनिक वाला नाम. वो एक नयी लड़की ही थी. 20 - 21 साल की. तक़रीबन पांच फिट लम्बी और पहाड़ी नैन नक्श. उसकी लुक में थोड़ी से उत्तर भारतीयता भी झलकती थी. वैसे भी हमारे बड़े ही Clear Sorting Mechanism हैं लोगों को ले कर. पहले देश, फिर क्षेत्र, फिर प्रान्त और फिर जाति। और इस पुरे Sorting Process में हम एक स्टेप भी miss नहीं करते. प्रवीर का मस्तिष्क ना चाहते हुए भी उस Sorting Process को Follow कर रहा था. 

"Sir..." उस एक आवाज़ ने फिर से खींच कर उसे वापस खड़ा कर दिया था इस Cafeteria में. 

"Sir, feel comfortable here. Treat this as your own house and select what you want to read today. हम सिर्फ कॉफ़ी और सैंडविच का चार्ज करते हैं. किताबें और समय एकदम फ्री है."

"Umm, हाँ... Thank You." प्रवीर फिर वापस वहीँ चला गया था जहाँ वो कुछ क्षण पहले तक था. काफी Mechanized तरीके से वो उस Cafeteria की दिवार  दर दिवार घूमता रहा, अनायास ही एक किताब उठाई और एक कोने में बैठ गया. थोड़ी देर में एक कप कॉफ़ी आ गयी उसकी कॉफ़ी टेबल पर. उस कफ मग पर "Bookworm Cafeteria" लिखा था और एक किताब पे कुछ Silver Fish की तस्वीर भी छपी थी. प्रवीर ने जो किताब उठाई थी उसे खोल कर अपना अतीत पढ़ने लगा. लगा वो पढ़ कुछ और रहा है और उसकी आँखों के आगे चल कुछ और रहा है. कभी वो अपने IIT के दिन याद करता, कभी अपनी Archive Mail में खो जाता. क्या मालूम वो जिस Archive Mail को पिछले 20 - 22 साल से Track कर रहा था, ये वही है. क्या 20 - 22 साल पहले वीर्य दान से जन्मे बच्चे पर भी आपकी भावनाएं जागृत हो सकती हैं? क्या नव्या उसी का एक हिस्सा है? क्या सच में नव्या के प्रति उसके मन में पितृत्व की भावना है भी की नहीं. क्या यह सही है की 20 - 22 साल पहले किये गए किसी कृत्य को इस हद तक Track किया जाये?... पता नहीं क्या - क्या सोचे जा रहा था वो... न जाने कितनी ही भावनाओं के उछाह को वो महसूस कर रहा था अपने भीतर. हालाँकि कोई भावना सैलाब बन अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर रही थी. शायद उम्र हममें इतनी परिपक्वता दे जाती है कि जो अंदर चल रहा होता है उसे हम अंदर ही समेट - सहेज पाते हैं. जो बाहर निकलने की उछृंखलता नहीं दिखा पाता। 

***

कुछ दिनों तक... शायद 7 - 8 दिनों तक ऐसा ही चलता रहा. प्रवीर रोज कुछ घंटों के लिए Bookworm Cafeteria आता और किताबें चाहे कोई भी उठाता, पढ़ता अपना अतीत ही था. इतने दिनों में वो एक बात तो ज़रूर समझ गया था कि ऐसा ही Cafeteria कभी उसका एक ख्वाब हुआ करता था. शायद ऐसा Cafeteria खोलना उसका अपना Retirement Plan था. आज न जाने कैसे उसी का एक अनाम - सा या यों कहें की अनायास सा हिस्सा उसके इस चिरस्वप्न को पूरा कर रहा था. प्रवीर अपने इसी Retirement Plan को पूरा करने के लिए पिछले कई वर्षों से किताबें इकट्ठा कर रहा था. की आज विभिन्न विषयों की 3 - 4 हज़ार किताबें उसकी अपनी लाइब्रेरी में थी. तक़रीबन सभी किताबें प्रवीर ने पढ़ी हुई थी. 

***

"Hi नव्या, मैं अब वापस जा रहा हूँ जहाँ का मैं हिस्सा हूँ. हाँ मुझे तुम्हारी यह जगह बहुत  ज्यादा पसंद आयी. मैं यहाँ आया था क्योकिं कहीं न कहीं यह मेरे सपनों का मूर्त रूप है. यहाँ आ कर मुझे लगा की वर्षों से मेरे भीतर सोये से मेरे सपनों को  मुकाम मिल गया है. जाते - जाते मैं अपनी लाइब्रेरी तुम्हे भेंट करना चाहता हूँ. लोगी ना तुम... "

"क्यों नहीं सर. यह तो मेरे लिए बहुत बड़ी बात होगी. आपकी दी हुई किताबें शायद कइयों के काम आये. It would be my privilege to have your books here in my small cafeteria."

"हाँ, इतनी किताबें रखने के लिए शायद तुम्हे कुछ ज्यादा जगह चाहिए होगी. मैंने एक लिफाफा तुम्हारे टेबल पे रख छोड़ा है. शायद वो तुम्हारे इस सपने को सतरंगी करने में मदद करे."

"Thank You Sir..."

बात ख़त्म होते होते ही प्रवीर वहां से जा चुका था. 

नव्या ने अपनी टेबल पर पड़े लिफाफे को खोला तो लगा चेक पर जो Amount लिखी है वो लाइब्रेरी के एक्सटेंशन में होने वाले खर्चे से कहीं ज्यादा है. उसे समझ नहीं आ रहा था की वो अपने पास इसे रखे या वापस कर दे मिस्टर प्रवीर को. कुछ क्षण इसी उहा पोह में बिताने के बाद उसने Decide किया की वो इस चेक को बैंक में जमा नहीं करेगी... शायद किसी और से लाइब्रेरी के लिए किताबें ले लेना ही काफी है. रुपये वैसे भी नव्या की Priority List में सबसे नीचे आता है. अपने माँ - बाबा की मौत के बाद उसने अपनी देखभाल खुद ही की है. उसने खुद ही अपने घर को इस Cafeteria में convert किया था. इस जगह से इतना पैसा तो आ ही जाता है की उसकी ज़िन्दगी अच्छे से चल पाए और महीने की आखिर में कुछ पैसे और किताबें खरीदने के लिए बचा पाए. लेकिन मि. प्रवीर ने इतनी रकम और इतनी किताबें मुझे क्यों दान कर दी है? क्या हम किसी भी तरीके से एक दूसरे से जुड़े हैं या ये इंसान यूँ ही Charity कर के चला गया? समझ नहीं पा रही थी वो इन परिस्थितिओं और इसे पैदा करने वाले उस सक्स प्रवीर को. तभी उसकी Cafeteria में काम करने वाला लड़का राजू ने उसका दरवाजा खटखटाया और नव्या को सवालों के समुन्दर से बाहर निखला... कुछ और नए सवालों के थपेड़े देने के लिए. 

"दीदी, बाहर एक ट्रक खड़ा है. बोल रहा है आपके नाम से प्रवीर साहब ने कुछ किताबें भेजी हैं... चलो देखो तो... ढेर सारी किताबें हैं... ट्रक भर के..."

"अरे, इतनी जल्दी किताबें भी आ गयी. इसका मतलब मि. प्रवीर ने ये सब पहले से ही प्लान कर रखा था. पर क्यों..."

***
वापस जाते वक़्त फिर से ATR ही मिला था प्रवीर को. नीची ऊंचाई पे उड़ने वाला एयरक्राफ्ट. शायद जो जुड़ा था उसे वापस वहीं छोड़ देने के लिए समय ने उसे इस जहाज में डाला था. लेकिन वो जो जुड़ा था वो तो अरसे पहले जुड़ा था प्रवीर से. आज तो बस प्रवीर ने उसे और करीब से महसूस किया था. 
पता नहीं जो सिहरन यहाँ आते समय फ़ैल रही थी प्रवीर में वही सिहरन अब जैसे अपना रास्ता बदल चुकी थी. जैसे हर छूटते Nautical Miles के साथ प्रवीर का एक बड़ा हिस्सा पीछे छूटता जा रहा था. पता नहीं क्यों इस Archived Mail को un-archive कर के प्रवीर को उतना सुकून... उतनी शांति नहीं मिल रही थी. लगा जैसे ये Mail Archive Folder में ही रहता तो अच्छा होता. 

"देविओं और सज्जनों, कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे में आपका स्वागत है... "


- अमितेश 

शनिवार, 3 जून 2017

मस्तमौला

बादल का वो टुकड़ा जो मुँह चिढ़ा गया 
सूरज को ढक कर उसकी अगन बढ़ा गया 

वो था बड़ा ही नटखट, वो था ज़रा मस्तमौला 
देख कर उसकी चंचलता, सूरज का ताप था खौला 

माँ ने उससे कहा था सूरज से दूर ही रहना 
था वो बड़ा ही शरारती, कहाँ मानता माँ का कहना 

चाह थी उसकी ढक ले सूरज की वो ऊर्जा 
इस बात से ही थी सूरज को बादल से ईर्ष्या 

गर्व नन्हे बादल का अभिमान में था बदला 
सूरज की चाह थी की मिले सबक उसे तगड़ा 

भाप का बना वो बादल भाप बन बिखर गया 
सूरज ने दिखाई जब ताकत, बादल न था वहां अब 

वो नन्हा वीर बादल यूँ ही टुकड़ों में बिखर गया था 
मिल फिर से वो अपनों में, वो सब का हो गया था 

एक दिन फिर एक नन्हा बादल अपनों से बिछड़ गया
एक और नन्हा बादल फिर मुँह चिढ़ा रहा था 
सूरज को ढक कर उसकी अगन बढ़ा रहा था 

- अमितेश