शनिवार, 1 जून 2013

अविरल लम्हें

धूप में धुले वो  सुहाने दिन
और चांदनी से नहाई रातें
जब तेरी यादों की चादर ओढ़े
तेरी ख़्वाबों में खोया रहता था
जब सुबह की हवाएं सहला कर मुझे
उस अप्रतिम निंद्रा से खींच लाती
और मैं अनमना सा निकल आता
उन परीकथाओं की निंद्रा से।

जब तेरी नज़र की एक दस्तक
मेरे ह्रदय को चीर जाती
और तेरी आवाज की खनक
कई सरगम छेड़ जाती मेरे जीवन में
मैं मंत्रमुग्ध सा स्थिर हो जाता
जब अपलक निहारता रहता तुम्हे
तुम सकुचाई - सी निःशब्द हो
चूड़ियां घुमाती अपने हाथों में।

तेरी चमकीली हँसी से जब
नक्षत्र अपनी राह बनाते
बस कर तुम्हारी उन आँखों में
मैं जब कई लोक घूम आता
तेरी आँखों के बावस्ता
जब तुम मेरी राहें भर देती
अपनी पलकें बिछा कर
की कोई दू:स्वप्न ना चुभ जाए
मेरी पावों में।

काश
की ख़त्म ना हो ये अविरल लम्हें
आजन्म मेरे जीवन से।


-अमितेश 

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

सुहाने दिन

 वो दिन जाने कहाँ खो गए
लड़कपन के वो प्यारे दिन
जब गर्मी की भरी दोपहरी
जीवन के गूढ़ रहस्यों का आभास होता
छेमी के दानों को पा कर
जैसे किसी खज़ाने को पा लेने का एहसास होता

जब डाकिया घर के दरवाज़े खड़का कर
चिट्ठी आयी है की आवाज़ लगता था
जब वो पंद्रह पैसे का पोस्टकार्ड
अपने अपनों के और क़रीब ले जाया करता था

जब कैरी की सौंधी खुशबू, हममे एक ऊर्जा भर जाता था
जब शाम ढले पापा के घर आने पर मन सांत्वना पता था

वो दिन जाने कहाँ खो गए
जब माँ के साथ बैठ कर चाय की चुस्कियां लिया करते थे
उसकी बातों से कभी सीखते कभी हंस दिया करते थे

जब होमवर्क की याद बड़ा सताती थी
"गुलमोहर इंग्लिश" की किताब खोलते ही
बिल्लू - पिंकी की कॉमिक्स याद आती थी

जब गेंद की ज़िद में
घंटो रूठ कर बैठ जाया करते थे
और माँ जब मनाने की ज़द्दोज़हद में
अपने हाथों से निवाला खिलाया करती थी

वो दिन जाने कहाँ खो गए
जब शाम ढले दोस्तों से लड़ कर आते थे
फिर अगली सुबह उससे नहीं मिल पाने पर
खुद पे गुस्सा कर जाया करते थे

जब लुडो को फैला कर ६ आने की प्रार्थना करते थे
और हार जाने पर खेल छोड़ कर भाग जाया करते थे

वो दिन जाने कहाँ खो गए
जब रोज़ दर्पण के के सामने खड़े हो कर मुह  बनाया करते
और कमरे में अचानक किसी के आ जाने पर
सरमाया सकुचाया करते

जब दोस्तों संग इमली के दाने खा
मुहँ आड़ी तिरछी बनाया करते
फिर उसके बीज़ को मुहँ से दूर फेक पाने के खेल में
जीत जाया करते

वो सुहाने दिन लड़कपन के
जाने कहाँ खो गए हैं
अब तो हम मानो खुद से ही बहुत दूर हो गए हैं।


-अमितेश






हम ज़िंदा हैं

जहाँ के ढेरो थपेड़े हैं
कई मर्यादाओं के घेरे हैं
अनजाने  से जीवन के कई फेरे हैं
कुछ अपेक्षाएं जीवन की कुछ मेरे हैं
डरे डरे  ही सही
पर हां हम ज़िंदा हैं।

सपने कई अधूरे से हैं पड़े हुए
अपेक्षाएं हैं कई यूँ ही धरे हुए
दिल में टूटी उम्मीदों के टुकड़े कई हैं भरे हुए
अपनी ही महत्वाकांक्षाओं से हम है डरे हुए
जीत जाने के ख्वाबों में ही सही
पर हां हम ज़िंदा हैं।

एक छोटी सी ज़िन्दगी और कई जिंदगानी है
हर पल में भरी अनगिनत कहानी है
आँखें नम और होठों पे मुस्कराती रवानी है
कई बीते हुए पल की तरह इस पल को भी कट जानी है
इन उम्मीदों पे ही सही पर
पर हां हम ज़िंदा हैं।

-अमितेश

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

तेरे बिना

तेरे आँखों के दो मोती और उनकी चमक
तेरी सुरीली बोली और तेरी हँसी की खनक
जब राह पर तेरे संग चलना भी भाता था
जब राहें भी हमारे प्रेम गीत गाता था
जब पलकें उठा के तुम दिन में उजाला भर देती थी
जब मुझे छू कर मेरे सारे दुःख हर लेती थी
वो दिन अब जाने कहाँ खो गए हैं
मेरे जीवन के सारे सपने भी अब सो गए हैं

तेरी जुल्फें और उनकी घुंघराली लटें
जब चाँद भी तुम्हारी गेसुओं में अटकता था
जब रात तुम्हारी कजरारी आँखों में सिमटता था
जब सवेरा तुम्हारी मुस्कराहटों से जागता था
जब बाहें  फैला कर तुम दिन को उजाला देती थी
वो दिन अब जाने कहाँ खो गए हैं
मेरे जीवन के सारे सपने भी अब सो गए हैं

जाने कब आएगी अब बसंत मेरे जीवन में
कब फ़ैलेगा उजाला मेरे मन उपवन में
कब मैं अपने जीने का वज़ूद तलाश पाऊँगा
बिन तेरे जाने मैं अधूरा ही मर जाउंगा।
-अमितेश

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

सतरंगी ज़िन्दगी

कई रंग हैं ज़िन्दगी के
कुछ रंग बेगाने से
कुछ के रंग हैं अपने से
कुछ तो बिलकुल अंजाने से
कुछ कुछ जाने पहचाने से
कुछ रंग जीवन से रंगीन
कुछ काले एकदम ग़मगीन
कुछ ख़ुमारी से भरपूर
कुछ यूँ हीं बेकदर बेनूर
कई रंग हैं ज़िन्दगी के.

कुछ मधुर मुस्कान की तरह
कुछ अल्हड़ अंजानी पहचान की तरह
कुछ गुलमोहर के पुष्प की तरह
कुछ खुश्क उस धूप की तरह
कुछ बच्चों की किलकारी की तरह
कुछ सतरंगी पिचकारी की तरह
कई रंग हैं ज़िन्दगी के.


कुछ तपती दोपहरी शीतल झुरमुट की तरह
कुछ अलसाई अल्हड़ बाला की तरह
कई रंग हैं ज़िन्दगी के.


फसल को जीवन देती बारिश की बूंदों की तरह
जीवन भरते उन सफ़ेद धुन्धों की तरह
कई रंग हैं ज़िन्दगी के

कुछ तुम्हारी निर्मल मुस्कान की तरह
कुछ तेरे रूप में मिले वरदान की तरह
कई रंग हैं ज़िन्दगी के.

- अमितेश

रविवार, 17 मार्च 2013

लम्हें

जीवन के अविरल लम्हों में
कुछ ग़म मिले और कुछ खुशियाँ
कुछ  बोझिल पल और कुछ अच्छे
हर लम्हों में जीये हैं कई लम्हे
कुछ हंसी ख़ुशी कुछ अश्कों में धुले
जीवन के अविरल लम्हों में
कुछ ग़म मिले और कुछ खुशियाँ

कुछ राह पथरीली मिली मुझे
कुछ राह पथरीली मैंने चुने
कुछ राहें फूलों से लदे भरे
कुछ राह बड़े ही रूमानी
कुछ पाँव में छाले देते रहे
कुछ मन में खुशियाँ छलकाते से
पर हर पल मैं चलता रहा
कुछ ग़म कुछ खुशियाँ दिल में रखे हुये.
जीवन के अविरल लम्हों में
कुछ ग़म मिले और कुछ खुशियाँ

कुछ दिल में दर्द का सैलाब दिए
कुछ नदियों सी निर्मल कलकल
पर जीवन हर पल चलता रहा
उन हठीली वक़्त से रूबरू हुए
कुछ ने अभिमान को ललकारा
कुछ ने ग़र्व को गौरवान्वित किया
जीवन के अविरल लम्हों में
कुछ ग़म मिले और कुछ खुशियाँ

कुछ वक़्त सिखाया पाठ नए
कुछ यूँ ही अनकहे निकल गए
कुछ ने समझाया रिश्तों को
कुछ मासूम बने ही बिसर गए
जीवन के अविरल लम्हों में
कुछ ग़म मिले और कुछ खुशियाँ

-अमितेश

रविवार, 10 मार्च 2013

पल

पल
तेरे साथ के रूहानी पल
हमारी खुशियों को परवाज़ देते पल
हमारे सपनों को आकाश देते पल
पल
तेरे साथ के रूहानी पल

मद्धिम लम्हों में जब
ह्रदय हिचकोले खाता है
जब कोई साथी नज़र नहीं आता है
तुमने बातों से बहलाया था
मुझको मुझसे ही मिलवाया था
उस पल में मैं सब भूल गया
अपने दुःख और विषाद अपने

पल
तेरे साथ के पल
बीते ना कभी आजन्म ये
तेरे साथ के रूहानी पल.

-अमितेश  

रविवार, 23 दिसंबर 2012

क़ाश तुम बेटा होती

जब तुम्हारी किलकारी गूंजी थी
लगा मेरी सदियों की इच्छा पूरी हो गयी हो।
जब पहली दफा देखा था तुमने मुझे
अपनी अधखुली तिलस्मी आँखों से
ह्रदय के किसी कोने में
जैसे एक नयी सुबह का अहसास हुआ था।

तुम परियों सी मुस्काती थी
मुझे देख कर
और तुम्हारी वो निर्मल मुस्कान
मेरे सारे विषाद धो देता।

तुम्हारा यूँ ठुमक ठुमक के चलना
और फिर शरमा के मुझ से लिपट जाना
तुम्हारी नन्ही हाथों की मेहंदी
जैसे सारे जहाँ के इन्द्रधनुष को
तुम्हारी हथेलियों में समेट लेता।

गर्वित महसूस करता हर पल
तुम्हारी छोटी छोटी खुशियों को पूरा कर।

तुम्हारी हर मुस्कान
मुझे कई जन्मों की खुशियाँ दे जाती।

तुम मेरे आँगन की तिलस्मी परी हो।

हालाँकि
दिल के किसी स्याह से कोने में
अक्सर एक डर पैदा हो जाता
जब जब मैं सुनता
कन्या भ्रूण हत्या
या दहेज़ दहन की बातें।
तब तुम्हे अपने सीने से,
कस के चिपका लेता
और तुम
अचरज से मुझे देखती रहती
मेरे अनजाने भय से अनजान होकर।

जब सुनता
कि शहर में लड़कियों का चलना भी
अब सहज नहीं रह गया
कि लोगों की कुंठित मानसिकता
कन्या और वस्तु में भेद ना कर पाती
कि लड़की होना ही एक अपराध बोध पैदा करता
मेरी अंतरात्मा कांप सी उठती
भय सा लगने लगता तुम्हे देख कर
और तुम फिर
अपनी निर्मल मुस्कान से
मेरे सारे भय हर लेती।

पर
बिटिया
अक्सर सोंचता हूँ
कि  काश तुम बेटा होती
तो शायद बेफिक्र हो
घुमती शहर के चप्पे चप्पे पर
अपने घर के आँगन की तरह।

यह जान कर भी
कि तुम्हे पाने की लालसा
मेरी सदियों की थी
दिल अक्सर सोंचता
क़ाश तुम बेटा होती।


-अमितेश





मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

आओ थोड़ा ग़म मना लें

आओ थोड़ा ग़म मना लें
थोड़े आँसू और बहा लें

बसंत की आस को छोड़ कर थोड़ा
पतझड़ से ही दिल बहला लें
आओ थोड़ा ग़म मना लें
थोड़े आँसू और बहा लें।

जब - जब सुरज वादा कर के
रात की कालिमा बिखेर है जाता
कोयल कूक को छोड़ कर अपने
विरह गीत है गाता जाता
क्यों ना ख़ुशी के पल को भूल हम
थोड़ा ही सही, ग़म मना ले
थोड़े आँसू और बहा लें।

दिल पे हल्की सी दस्तक दे
ख़ुशियाँ जब हैं बिसर सी जाती
याद पुराने लम्हों को कर जब
हँसी के मोती बिखर से जाते
हम क्यों परवाह में ख़ुशियों के
बैठे बैठे दिल जलाएं
आओ थोड़ा ग़म मना लें
थोड़े आँसू और बहा लें।

ख़ुशी के पल की ख़ुशियों को
ग़म के पल हैं और बढ़ाते
फ़िर क्यों हम ग़म को ना मनाएं
आओ थोड़ा  ग़म मनाएं
थोड़ा  आँसू  और बहायें।


- अमितेश

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

सपनीली सफ़ेद आँखें

सपनीली सफ़ेद आँखें

झांकता हूँ जब इनमे
महसूस होती है मुझे
तुम्हारी  रक्त और धडकनों की रवानी
तुम्हारी वो सपनीली सफ़ेद आँखें।

एक दुनिया है बसी
तुम्हारी सपनीली सफ़ेद आँखों में,
अक्सर बहता सा जाता हूँ इनमे
जब जब उतरता हूँ मैं
तुम्हारी आँखों के जरिये
उस सपनीली सी दुनिया में।

जब जब खो जाना लुभाता है
तुम्हारी उन सपनीली सफ़ेद आँखों में
तुम छू कर मुझे
तोड़ देती हो मेरी तंद्र
और दिखाती हो अपने हृदय का रास्ता
अपनी सपनीली आँखों के बाबस्ता।

सपनीली सफ़ेद आँखें

तुम्हारी आँखों के भंवर में
जब डूब जाना नियति सी बनती जाती है,
मेरा हाथ पकड़ कर
जीवनदान देती हो तुम
और मैं शापित सा महसूस करता हूँ
इस जीवनदान को पा कर।

बसाना चाहता हूँ मैं
अपना छोटा सा जहाँ
उन सपनीली सफ़ेद आँखों की दुनिया में,
परवाह किये बगैर
इस दुनिया की कंटीली व्यंगात्मक आँखों का।
धन्य कर दो मुझे अपनी आँखों के एक स्पर्श से
कि आजन्म मैं खोया रहूँ
तुम्हारी उन सपनीली सफ़ेद आँखों में।

- अमितेश