मंगलवार, 31 मार्च 2026

एक कप हौसला

जयंतो दा पिछले 50 वर्षों से इस छोटे से चाय की दूकान से चाय और बातें बांट रहा था। उसकी ये दूकान एक पुरानी, जर्जर ईमारत के एक छोटे से खांचे में था। दुकान के नाम पर एक सायोनारा कंपनी की लकड़ी की रेडिओ, एक केरोसिन का स्टोव और 2 लकड़ी के बेंच लगे थे। दूकान की ये पूरी जायदाद जयंतो दा जितना ही पुराना था। 

यह दूकान जिस ईमारत में थी, कहते हैं वह कभी डॉ कादम्बनी गांगुली की थी। डॉ गांगुली हिंदुस्तान की पहली महिला डॉक्टर थी। जयंतो दा अक्सर कहा करता था की डाक्टर दीदी को उसकी चाय बहुत पसंद थी। वो जब भी घर पे आती, एक चुक्का चाय उससे जरूर पीती थी। 

यह दूकान शहर की भाग दौड़ से थोड़ा परे ही था। शोर के नाम पर इस दूकान की स्टोव का आवाज़ और रेडिओ से आती हुई गाने की आवाज़ के अलावा और कुछ नहीं था। रेडिओ भी गाने ऐसे बजता जैसे ये आखरी गाना बजा रहा हो बंद होने से पहले। 

जयंतो दा हालाँकि अब 70 का हो गया था, पर अभी भी कलकत्ता के लोगों के लिए दादा ही था। अक्सर उसकी दूकान पर थोड़े पुराने लोग ही आते थे। गाहे बगाहे कोई जवान आ जाता तो चाय से ज्यादा जयंतो दा की बातों से प्रभावित हो जाता। 

वो एक उमस भरी दोपहर थी। जयंतो दा की दूकान पे उस वक़्त कोई नहीं था। वो अकेला अपनी लुंगी ऊँची किये बेंच पर बैठा था। अलसायी रेडिओ किशोर दा का गाना पूरी ताकत लगा कर बजा रहा था। तभी एक बड़ी गाड़ी उसकी दूकान पे आ कर खड़ी हो गयी। सूट पहने एक चालीसेक साल का आदमी गाड़ी से उतरा और दूकान पे रखी दूसरी बेंच पर बैठ गया। वो परेशान सा लग रहा था और एकटक आकाश की ओर देख रहा था। ऐसा लग रहा था की ऊपर देख कर अपने आंसुओं को संभालने की कोशिश कर रहा हो। 

जयंतो दा थोड़ी देर उससे देखता रहा। फिर उसके करीब आ कर बोला, "दादा चाय खाबे।"

उसने आसमान से नज़र फेर कर एक बार जयंतो दा की ओर देखा और फिर वापस आसमान पे केंद्रित हो गया। कोई जवाब नहीं दिया। 

जयंतो दा ने थोड़ी और आत्मीयता से बोला, "दादा चाय भले थोड़ी कड़वी लगे लेकिन अभी थोड़ा सुकून देगी।"

वो थोड़ा खीज कर बोला, "मुझे चाय नहीं, पैसे की ज़रूरत है। मेरा पूरा बिज़नेस डूब गया है। मैं सड़क पे आ गया हूँ। शायद ये मेरे जीवन के कुछ आखरी पल हैं जो आपकी दूकान पर बिता रहा हूँ।" बोलते बोलते आंसुओं की एक झड़ी जो अब तक दबी थी अपना दायरा छोड़ बह गयी। 

जयंतो दा ने उससे चाय का गिलास पकड़ाया और बोला, "दादा वो छोटा पौधा देख रहे हो जो मेरी दूकान की दरार में उग आया है।"

उसने इशारे से एक छोटे से पौधे को देखने को बोला जो उस जर्जर मकान के एक दिवार से अपना वजूद दर्ज कर रहा था। 

"इस पौधे की ना तो अपनी जमीन है, ना मिट्टी, ना खाद। फिर भी वो उग गया है। उससे पता है की चाहे कुछ भी उसके पास ना हो, सूरज तो उसका है ना। वो उसे देख कर बढ़ रहा है। उसे यह भी नहीं पता कब तक बड़ा होगा, लेकिन उसने बढ़ना नहीं छोड़ा है। क्या तुम्हारे पास इतना हौसला भी नहीं की अपना सूरज तलाश कर बढ़ पाओ?"


जयंतो दा की इस बात ने उसपे गहरा असर किए। एक घूँट में पूरी चाय ख़तम की, और उठ खड़ा हुआ। अपनी जेब से 50 का नोट निकाला और जयंतो दा को देने लगा। 

जयंतो दा ने वो नोट लिया, उसे तह किया और वापस उसकी जेब में रख दिया और बोलै, "अगली बार लूंगा, जब तुम मुस्कराते हुए मेरी दूकान पे आओगे।" और एक पहचानी सी मुस्कान बिखेर दी। 


वो आदमी वापस अपनी कार की तरफ जाने लगा, लेकिन इस 10 मिनट ने उसमे एक गजब का आत्मविश्वास भर दिया था। 


आज दो बरस बाद फिर वो आदमी जयंतो दा की दूकान पे अपनी पहले से भी बड़ी गाड़ी में आया। गाड़ी खड़ी की और एक भरी मुस्कान में जयंतो दा से बोला, "दादा एक कड़वी चाय पिलाना।"

जयंतो दा ने अपना चश्मा ठीक करते हुए उसे देखा पहचान गया। वो आदमी जयंतो दा के करीब जा कर उसके पैर को छुआ और एक लिफाफा निकाल कर जयंतो दा को देते हुए बोलै, "दादा ये आपके उस चाय का पैसा जिसने मुझे हारने नहीं दिया। आज मेरे पास पहले से ज्यादा पैसे हैं और उससे भी कीमती, आपका दिया हुआ हौसला है। बहुत धन्यवाद दादा। आपने मुझे एक नया जीवन दिया है।"

जयंतो दा ने लिफाफे से एक सिक्का निकाला और लिफाफा वापस उसे दे दिया। "मेरे चाय की कीमत तो तुम्हारे चेहरे पर फैली है, ये एक रुपया मेरा ईनाम है। जीते रहो बेटा।"

सायनोरा रेडिओ पर गाना बज रहा था, वो आदमी जयंतो दा के साथ बेंच पर बैठा चाय पी रहा था और रेडिओ के गाने से तेज उनके खिलखिलाने की आवाज़ उस शांत सी सड़क पर गूंज रही थी।  

 

-अमितेश 

शनिवार, 28 मार्च 2026

गुमान

उतर के आ भी जा 

अब चांदनी की सीढ़ी से,

बहुत हुई ये दूरियां, 

कई सदी, कई पीढ़ी से। 


ये दाग़ - वाग छोड़ दे 

तू आसमां के सीने पे,

आ, एक शाम तो बिता, 

मेरे आँगन के दरीचे पे। 


मेरे सिरहाने बैठ, 

ज़रा अपनी भी तू सुना,

कि कैसा लगता है 

तन्हा रात भर जगने में। 


तुमने तो देखे होंगे 

ऊपर से हसीं मंज़र हज़ारों,

पर क्या सुनी भी है 

कभी धड़कन हमारे?


तू कहता है कि तुझे देख 

दुनिया सुकून पाती है,

पर तेरी शीतलता तो बस 

आंखों तक ही आती है। 


ठहर... तुझे आज एक 

राज़ की बात बताता हूँ,

चल तुझे आज मैं 

अपने चाँद से मिलवाता हूँ। 


वो देख, जो कोने में 

हया का आँचल ओढ़े बैठी है, 

जिसकी एक झलक को, 

ये रात सदियों से प्यासी है। 


तू तो पत्थर है, बेजान है, 

बस धूप का मारा है,

वो तो मेरे जीने का ज़रिया, 

मेरा अप्रतिम सहारा है। 


तेरी चांदनी में ठंडक की 

एक मर्यादा, एक सीमा है,

उसकी नज़रों का सुकून, 

रूह तक धीमा - धीमा है। 

 

वो जो ज़ुल्फ़ें संवारती है, 

तो घटायें शरमाती हैं,

तेरी अद्भुत चमक भी 

उसकी एक मुस्कान से मात खाती हैं। 


मेरा चाँद, जो बादलों के पीछे 

कभी नहीं छुपता,

जिसका नूर ढलती अमावस में

भी नहीं रुकता। 


उसमें कोई दाग नहीं, 

एक सादगी का घेरा है,

उसकी एक झलक से 

मेरी दुनिया में सवेरा है। 


ओ  फ़लक के चाँद! 

देख और ख़ुद फैसला कर,

किसे मुकम्मल कहूं, 

तू ही ज़रा गौर कर। 


तू चमकता है की 

दुनिया तुझे देख सके,

वो चमकती है की 

रोशन मेरी दुनिया हो सके।


तू है फ़लक का सुल्तान, 

पर मेरा दावा सच्चा है,

मेरा ये अपना चाँद, 

तुझसे लाख गुना अच्छा है।


अब  जा, वापस लौट जा 

अपने सूने वीरान गगन में,

कि तेरा गुमान टूट गया है 

आज मेरे आँगन में। 


- अमितेश 


शुक्रवार, 27 मार्च 2026

अच्छा है ना!

भीड़ भरी इस दुनिया में 

कोई अपना सा मिल जाये,

अच्छा है ना!


खामोशी की बातों में भी 

चुपके से जवाब कोई दे जाये,

अच्छा है ना!


कल की उलझने बिसार कर हम 

आंगन की धूप में बैठें 

मिट्टी की सौंधी खुशबू में 

बीते दिन की यादें समेटें। 


बिना किसी मतलब के भी,

एक मुस्कान बिखर जाये,

अच्छा है ना!


आँखों में जो सपने पलते हैं 

हकीकत की उसे रंग दे जायें 

जो बस खयाल थे कल तक 

उन्हें संग अपना दे जायें।  


हार - जीत की इस दौड़ में,

हम खुद ही खुद से जीतें,

अच्छा है ना!


बिना बताये दिल का हाल 

यार कोई समझ जाये,

अच्छा है ना!


जिंदगी की हर उलझन में,

कोई साथ मुस्कुराये 

अच्छा है ना!


 ना कोई औपचारिकता 

ना शब्दों का तोल मोल 

बैठे साथ घंटों तक 

हो हँसी - मज़ाक बेलौस। 


पुरानी यादों के पिटारे से 

वही बचपन निकल जाये 

अच्छा है ना !


दुनिया भले ही रूठे 

पर कंधे पर एक तेरा हाथ हो,

सफ़र चाहे लंबा हो कितना 

एक तू मेरे साथ हो। 


बिन मतलब की इस यारी में 

पूरा जहाँ मिल जाये,

अच्छा है ना!


- अमितेश 


  

गुरुवार, 19 मार्च 2026

हर

हर कण में वह बसता है 
हर मुश्किल को हर लेता है 

बातों में जो हर जाए 
वो जीत की राह वर लेता है 

हर दिशा में नाम है उसका 
जो हर दिल में घर करता है। 


- अमितेश 

पर

उस चिड़िया के पर कटे थे,

पर फिर भी उड़ान ना छोड़ा था। 

जमीन पर गिरा ज़रूर,

पर हौसला उसका ना मुड़ा था। 


 - अमितेश 

हमशक्ल हज़ारों

तर्क - ए - ताल्लुक कर लिया, तेरे शहर को भी छोड़ दिया,

अब बे-सबब चश्म - ए - तर, आख़िर क्यों रोता है?


दावा था तेरा कि मयस्सर होंगे हम-शक्ल मेरे हज़ारों,

गर मिल भी गए वो सब, तो फिर मुझे ही क्यों सोचता है?


गया है जो शख्स मुड़कर न देखने की कसम खाकर,

उसी की याद में तू ये शब् - ए - हिज्र क्यों संजोता है?


गुरुर - ए - हुस्न में कहा था, तुम जैसे बहुत हैं यहाँ,

अब उसी भीड़ में तू अपनी तन्हाई क्यों ढोता है?


- अमितेश 



➡ तर्क - ए - ताल्लुक - रिश्ता तोड़ लेना 

➡ बे-सबब - बिना किसी वजह के 

➡ चश्म - ए - तर - नम आँखें 

➡ शब् - ए - हिज्र - जुदाई की रात 

➡ गुरुर - ए - हुस्न - अपनी खूबसूरती का घमंड 

मेरे जैसे हज़ारो

छोड़ तो दिया तेरे शहर को, अब मेरे लिए क्यों रोते हो,

कहा था ना तेरे जैसे हज़ार मिलेंगे, फिर भी मुझे ही क्यों सोचते हो। 


ज़ब्त की हद से गुज़रे तो फिर मुड़कर नहीं देखा मैंने,

तू जो कहता था बहुत हैं, अब अकेला क्यों सोता है। 


मिसालें मेरी वफ़ा की तू दुनिया को देता फिरता है,

जो क़द्र न थी मेरी, अब ज़ार - ओ - क़तार क्यों रोता है?


खिड़कियाँ भी अब तेरे घर की उदास रहती हैं शायद,

वो जो गुरुर था हज़ारों की, अब वो कहाँ खोता है। 


- अमितेश  

बुधवार, 18 मार्च 2026

Reservation : Food for Thought

 I was in Patna in the last week for one of the family functions. Lots of people were around. Lots of topics were discussed. Starting from family, to kids to profession to politics.

And if few Bihari discuss politics, it is not possible to discuss caste without politics. And when it comes to caste, one discussion that outshine is “Reservation”. This topic is discussed more in the family who are not belonging to the privilege class and have never tasted the magic of reservation.

One of the family members said that if Reservation is that important for the specific group of people (irony is around 65% population of India falls under this so-called specific group) and every government is promoting it, irrespective of their party, why can’t this be seen differently.

Now, this was opening a whole lot of imagination among all around. He continued, “I think, we should make it mandatory for people to use “reservation beneficiary” as suffix after their name to promote why reservation is important and how it is bringing changes in the lives of people getting benefitted with this. Be it a Doctor, an Engineer, an IAS officer or any profession, where people used reservation for their upliftment. It should be made mandatory for them to mention “Reservation Beneficiary” over their name plate board. This is going to encourage more people to study and could lead to an organic upliftment of the people who are suppressed since ages.”

While we all knew what he was saying wasn’t what he meant. It was a sarcasm par excellence. This could require some skill to understand the intensity of sarcasm he meant out of this monologue.

But this has given a food for thought to many who were part of that discussion. Almost everyone was having either a thought or smile over their face hearing this.

Can this be tried? People who are progressing using the reservation, should not feel offended mentioning that over their board. If they can enjoy the success, there is no harm in mentioning the reasons of success and sharing it with people.

What’s your thought on this? Comment to understand and open a debate over this important topic.

शनिवार, 7 मार्च 2026

खामोश बस्तियों के नाम

ये शहर नहीं, पत्थर का एक समंदर है,

जहाँ बाहर सन्नाटा और शोर दिल के अंदर है।

दीवारें बहरी हैं, लोग अंधे हैं यहाँ, 

यहाँ हर शख्स अपनी ही तन्हाई का पैगंबर है।


दिखाई जो न दे, उस दर्द का मंजर हैं हम,

अपनों के बीच भी खुद से बेखबर हैं हम।

पुकारते रहे जिसे, वो मुड़कर भी न देख सका,

शायद इस अंधी बस्ती के सबसे पुराने खंडहर हैं हम।


आईने बेचकर अब हम क्या पाएंगे भला,

जब आंखों से ही रोशनी का नूर चला गया।

वो चीखते रहे मदद को, और लोग गुजरते रहे,

शायद दीवारों के साथ अब खुदा भी बहरा हो गया। 


- अमितेश 

सन्नाटे का शोर

दीवारें बहरी हैं, लोग अंधे हैं यहाँ, 

पत्थरों के शहर में, पिघलता दिल कहाँ?

चीखती हैं हसरतें, पर कोई सुनता नहीं,

मलबों के ढेर में, अब ख़्वाब कोई बुनता नहीं।


खिड़कियाँ तो बहुत हैं, पर झांकता कोई नहीं,

भीड़ बहुत है सड़कों पर, पर साथ चलता कोई नहीं।

दिखता है सबको तमाशा, पर दर्द दिखता नहीं,

अंधों के इस बाजार में, आईना बिकता नहीं।


गूँगी है जुबां सबकी, और बहरे कान हैं,

ऊँची इमारतों में कैद, छोटे-से इंसान हैं।

अपनी ही प्रतिध्वनि से, डरने लगा है आदमी,

दूसरों की आग में, हाथ सेंकने लगा है आदमी।


वक़्त की धूल ने, सब चेहरों को ढँक दिया,

इंसानियत को हमने, तिजोरी में पटक दिया।

पर याद रखना ऐ मुसाफ़िर, ये सन्नाटा बोलेगा,

जब वक्त अपनी आँखें, और ये दीवारें कान खोलेगा। 


-अमितेश 

छत से फैलती बातें

वो वहम पुराने थे कि, दीवारों के कान होते हैं,

खामोश ईंटों के पीछे, छुपे कुछ इंसान होते हैं।

मगर अब वक्त बदला है, हवा का रुख भी नया है,

ये राज़ का दरिया अब, दीवारों से नहीं बहता है।


दीवारें तो अब बस, मर्यादा की लकीरें हैं,

असली शोर तो ऊपर, छतों की जागीरें हैं।


जब बंद कमरों में कोई, धीरे से फुसफुसाता है,

वो धुआं बनकर सीधा, मुंडेरों तक ही जाता है।

छत से झांकती आँखें, और खुले हुए ये रोशनदान,

यहीं से होकर गुज़रते हैं, हर घर के गुप्त बयान।


न कोई परदा ठहरता है, न कोई ओट रुकती है,

बात जब ऊपर पहुँचती है, तो पूरी बस्ती झुकती है।

नीचे सब चुपचाप हैं, जैसे गहरा कोई सन्नाटा हो,

पर ऊपर छत पे चर्चा है, चाहे जो भी नाता हो।


संभल कर बोलना 'राही', यहाँ पत्थर भी सुनते हैं,

मगर खबरें तो अब ये आसमां, छतों से ही चुनते हैं। 


- अमितेश 

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

आत्म युद्ध

 शंख फूँक दो भीतर अपने, अब रण का आगाज हुआ,

गुलाम मरा उस कायरता का, आज पैदा 'महाराज' हुआ!

निकाल लाए हो तन को बाहर, अब मन को भी आज़ाद करो,

जो खौफ पलता था रगों में, उसे आज तुम बर्बाद करो!


गर्जना करो ऐसी कि...

काँप उठे वो डर जो अब तक, तुम पर शासन करता था,

उखाड़ फेंको उस वहम को, जो तुममें तिल-तिल मरता था!


तुम प्यादे नहीं बिसात के, तुम खुद अपनी चाल हो,

तुम काल के भी मस्तक पर, अंकित एक गुलाल हो!

खौफ की औकात क्या, जो आँख तुमसे मिला सके?

कोई बेड़ी बनी नहीं, जो रूह को तेरी हिला सके!


उठो! कि तुम ही शक्ति हो, तुम ही शिव का अंश हो,

तुम अपनी ही विजय-गाथा के, आदि और अंत हो!


न कोई 'शायद', न कोई 'किन्तु', न कोई अब मलाल है,

तेरी रगों में दौड़ता अब, बस विजय का ही उबाल है!

खौफ को अब इंसान के, साये से भी डरना होगा,

तेरे भीतर के सुल्तान को, अब तख्त पर चढ़ना होगा!


ये युद्ध नहीं किसी और से, ये युद्ध स्वयं से स्वयं का है,

जो जीत गया खुद के मन को, वो मालिक पूरे ब्रह्मांड का है!  



- अमितेश 

मन का सम्राट

अब तक तो तुम प्यादे थे, हालातों की बिसात पर,

पर अब हुकूमत तुम्हारी होगी, अपनी हर एक बात पर।

वो जो मन की अंधेरी कोठरी में, तुम घुटने टेके बैठे थे,

वो वक़्त गया जब तुम हार को, तकदीर समझ बैठे थे।


उठो कि अब तुम्हें, अपना खोया हुआ राज्य पाना है,

उस गुलाम को मारकर, अब भीतर का 'सुल्तान' जगाना है।


तुम्हारे संकल्प की तलवार पर, अब किसी का ज़ंग नहीं,

तुम अकेले ही लश्कर हो, तुम्हें चाहिए कोई संग नहीं।

ये जो खौफ का किला था, ये तो बस रेत का शेर है,

तुम्हारी एक गर्जना के आगे, ये सन्नाटा भी ढेर है।


वो जो 'शायद' और 'मगर' की, धुंध मन में छाई थी,

काट दो उसे बिजली बनकर, जो तुम्हारी अपनी परछाई थी।

अपने वजूद के परचम को, अब अर्श तक फहराना है,

गुलामी की हर एक राख से, अब नया सूरज बनाना है।


अब खौफ सजदा करेगा, उस इंसान के हुजूर में,

जो तपकर कुंदन हुआ है, अपने ही आत्म-नूर में।


न कोई जंजीर दिखेगी, न कोई कैद का साया होगा,

तुमने खुद को जीतकर, आज पूरे जहान को पाया है।

शतरंज पलट चुकी है, अब चाल तुम्हारी अपनी है,

ये जो नई जागृति है, ये मिसाल तुम्हारी अपनी है।


- अमितेश 



गुरुवार, 5 मार्च 2026

बेड़ियाँ

बाहर की दुनिया तो अब तुमसे हार मान चुकी है,

पर भीतर की उस बस्ती में, अब भी जंग पुरानी है।

वो जो मन की कोठरी में एक अदृश्य सा पहरा है,

वही गुलामी सबसे घातक, वही जख्म सबसे गहरा है।


लोहे की कड़ियाँ टूटीं, तो लगा कि हम आजाद हुए,

पर खुद की ही नजरों में, हम कब के बर्बाद हुए?

वो कहता है "तुम नहीं सकोगे", तुम चुपचाप मान लेते हो,

अपनी असीमित शक्ति को, तुम सीमाओं में तान लेते हो।


निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,

मगर मन की इस गुलामी को, जड़ से उखाड़ना बाकी है।


ये मन जो कल का डर चबाता, और बीता कल उगल देता है,

तुम्हारी हर ऊँची उड़ान को, संशयों में बदल देता है।

तुम कैदी नहीं हो हालात के, तुम गुलाम हो अपनी सोच के,

जी रहे हो एक अधूरा जीवन, हर लम्हे को खरोंच के।


तोड़ दो उस दर्पण को, जिसमें खुद को लाचार देखते हो,

मिटा दो उस लकीर को, जिसमे अपनी हार देखते हो।

हुकूमत तुम्हारी हो खुद पर, न कि यादों के सायों की,

धज्जियां उड़ा दो अब तुम, इन मनहूस परछाइयों की।


खौफ को पता चले कि अब, इंसान जाग उठा है,

मन का वो पुराना गुलाम, अब कहीं भाग उठा है।

अब न कोई समझौता होगा, न कोई गिड़गिड़ाहट होगी,

जब तुम चलोगे, तो कायनात में सिर्फ तुम्हारी आहट होगी।



-अमितेश 


ख़ुद का खौफ

जंजीरें तो काट दीं, पिंजरा भी तोड़ आए,

अंधेरी उस गुफा को पीछे तुम छोड़ आए।

हाथ-पाँव अब मुक्त हैं, खुली हवा का घेरा है,

पर मन कहता है अब भी, हाँ वहां अंधेरा है।


निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,

अब बस उस खौफ को खुद के भीतर से निकालना है।


वो कांपती सी आहटें, वो सहमी सी यादें,

वो हार मान लेने वाली, खुद से की हुई बातें।

वो अब भी सुलगती हैं, राख के ढेर की तरह,

डराती हैं रातों में, किसी अहेर की तरह।


दीवारें लांघ लीं तुमने, अब धारणाएं तोड़नी हैं,

डर की जो जड़ें जमी हैं, वो जड़ें मरोड़नी हैं।

सिर्फ लड़ना काफी नहीं, अब जीत को पालना है,

उस खौफ को अब उस इंसान के भीतर से निकालना है।


उठो कि तुम्हारी रगों में अब साहस का संचार हो,

हर डर तुमसे नज़रें मिला खुद शर्मसार हो।

तुम वो नहीं जो डरे थे, तुम वो हो जो लड़कर आए हो,

तुम राख नहीं, तुम तपकर कुंदन बनकर आए हो।


खुद को यकीन दिलाओ, कि तुम खुद के मुहाफ़िज़ हो,

अपनी कहानी के तुम ही, आखिरी और मुकम्मल हो।


सूरज को अब आँखों में, मशाल सा ढालना है,

हाँ, अब खौफ को इंसान के वजूद से निकालना है।


निकाल तो लाए हो खुद को उस खौफ के साये से,

अब बस उस खौफ को खुद के भीतर से निकालना है।


- अमितेश 


मंगलवार, 3 मार्च 2026

एक बार

सुनो, इस विमर्श के शोर में मैं एक मशवरा देता हूँ,

तुम जो कहते हो, "सब मुमकिन है", तुम्हे हकीकत से मिलवाता हूँ,

इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो। 


सुबह की पहली किरण से पहले, नींद को त्याग कर देखो,

रसोई की आग में अपनी सारी सुखन बिराग कर देखो,

सबके मनपसंद खाने में अपना स्वाद भूल जाना क्या है,

बिना किसी Thank You की चाह, उम्र भर फर्ज़ संभाल कर देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


वो जो तुम चौराहों पर बेफिक्री से चलते हो,

मेरी बेबसी का मंज़र उन्ही गलियों में उठा कर तो देखो। 

उन हवस भरी नज़रों को अपनी खाल पर महसूस करना,

और फिर अपनी कुंठा, मुट्ठियों में दबा कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


सपनों की उड़ान को, मर्यादा की ज़ंजीर पहनाना,

पैरहन की लंबाई पर हर रोज़ जिरह सह कर तो देखो। 

मायके की याद आए तो चुपके से सिरहाने भिंगोना,

और ससुराल की चौखट पर अपनी पहचान मिटा कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


Career की भागम-भाग में दोहरा बोझ उठाना क्या होता है, 

बच्चों की सिसकी और office की फाइल में खुद को बाँट कर तो देखो। 

दर्द को मुस्कुराहट की ओट में छुपाने का वो हुनर,

तबियत नासाज़ हो तब भी सब का खयाल रख कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


तुम्हें लगता है की ये दुनिया बड़ी हसीन है सब के लिए!

जरा बंदिशों के साये में एक सांस भर कर तो देखो। 

सम्मान बस एक दिन के फूल और तोहफों में नहीं है,

इनकी रूह का बोझ हर रोज़ अपनी रूह पर धर कर तो देखो। 


इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


सिर्फ इनका बखान नहीं, इनका संघर्ष चख कर देखो,

मुश्किल है ये होना, बस एक बार औरत बन कर तो देखो। 

इस Women's Day, बस एक दिन का किरदार बदल कर देखो,

ज़रा दुनिया इनकी नज़र से, एक बार औरत बन कर तो देखो।


- अमितेश 


सोमवार, 2 मार्च 2026

श्याम सखा

लोग ढूँढते तुझमें प्रेमी, मैं अपना यार देखता हूँ,

तेरी बाँसुरी की तान में, सखा का प्यार देखता हूँ।

नहीं चाहिए मुझे वो पूजन, जिसमें डर और दूरी हो,

मुझे तो वो रिश्ता भाए, जो आधी और अधूरी हो।


तू ईश्वर होगा जगत का, पर मेरा तो बस मीत है,

हार में भी जो साथ खड़ा हो, तू मेरी वो जीत है।

न मैं राधा की व्याकुलता हूँ, न मीरा का वैराग्य हूँ,

मैं सुदामा की फटी पोटली, तेरा ही सौभाग्य हूँ।


तू द्वारकाधीश बने, या कुरुक्षेत्र का सारथी,

मेरे लिए तू वही कान्हा है, जो चुराता मेरी आरती।

जब थक कर मैं गिर जाऊँ, तू कंधा बनके आता है,

बिन कहे तू मन की बातें, चुपके से सुन जाता है।


लोग झुकते हैं सामने तेरे, मैं तुझ पर हाथ धरता हूँ,

तू भगवान है दुनिया का, मैं तुझे सखा मीत कहता हूँ।

छोड़ दे ये रेशमी आडंबर, आ धूल में साथ खेलते हैं,

दुनिया की इन रीतियों को, हँस कर साथ झेलते हैं।


तू मेरा साया, मैं तेरी परछाईं, यही अपनी रीत है,

कृष्ण सिर्फ प्रेम नहीं, कृष्ण अथाह अनंत प्रीत है।

सखा तू मेरा, तू ही मेरा मीत है।

होगा तू राधा का कृष्ण, पर मेरा अप्रतिम गीत है। 


जब घने अंधेरों ने घेरा, सूझती न कोई राह थी,

तब मस्तक पर था हाथ तेरा, बस तेरी ही चाह थी।

मैं अर्जुन सा द्वंद्व में उलझा, गांडीव हाथ से छूट गया,

अपनों की इस कुरुक्षेत्र में, मेरा ही धीरज टूट गया।


तब तूने ही तो कहा था सखा— "उठ, ये मोह का बंधन तोड़ दे,"

"जो तेरा है वो साथ रहेगा, बाकी सब मुझ पर छोड़ दे।"


तूने ही उंगली पकड़ कर, कांटों से मुझे निकाला है,

जब-जब मेरी चेतना लड़खड़ाई , तूने ही तो संभाला है।

पर तू केवल लाड़ न करता, कड़वा सच भी कहता है,

जब भटकूँ मैं गलत राह पर, अंकुश बनकर तू रहता है।


तेरी झिड़की में भी प्यार है, तेरी सीख में एक नैया है,

तू केवल मुरली वाला नहीं, तू मेरा सखा कन्हैया है।


तूने धर्म का ज्ञान दिया, बताया कर्म की क्या परिभाषा,

तू ही मेरी जीत का साहस, तू ही मेरी अंतिम आशा।

जहाँ ज़रूरत पड़ी तूने, डाँट कर मुझे सुधारा है,

मेरा ईश्वर बाद में है तू, पहले यार हमारा है।


- अमितेश 

गाँधी जी का डंडा

खादी पहनकर मंचों पर, जो सत्य का राग सुनाते हैं

भीड़ छँटते ही अंधेरों में वो नोटों की रास रचाते हैं 

भूल गए वो सादगी, जो मिला VIP का झंडा है,

याद दिलाओ उन्हें फिर से, ये गाँधी जी का डंडा है। 


धर्मनिरपेक्षता की बात कर, जो नफरत के बीज बोते हैं 

सत्ता की कुर्सी पा कर फिर, चैन की नींद वो सोते हैं 

जनता को आपस में भिड़ाना, बस यही चुनावी फंडा है 

डरना सीखो हमसे सालों, ये गाँधी जी का डंडा है। 


रिश्वत की मेजों के नीचे, फाइले कई दबी पड़ी है 

आम आदमी की ज़िन्दगी, दफ्तरों के चक्कर में मरी पड़ी है 

भ्रष्ट्राचार के साये में जो चलता गंदा धंधा है,

उसे तोड़ने को काफी, गाँधी का ये डंडा है। 


लेफ्ट राइट का चक्कर चला कर, हमको वो भरमा रहे 

हमारी दंगल करा कर फिर, आपस में मौज वो काट रहे

साथ बैठ कर डिनर में फिर वो खा रहे चिकन और अंडा हैं 

समझाओ उन्हें अब, हमारे हाथ में ये गाँधी का डंडा है। 


नारी सम्मान के नाम पर, दीपक जला रहे वो रातों में  

फिर किसी निर्भया, कहीं RG को नोच रहे उजाले में  

दे ताली कर के फिर वो, फैला रहे वितंडा हैं 

संभल जाओ अब भी, यहाँ गाँधी जी का डंडा है। 


- अमितेश 


शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

तमाम

जो ज़ंजीर थी चाहत की, वो अब तोड़ दी मैंने 

तेरी गली को जाती, हर राह मोड़ दी मैंने 


मिन्नतें करता था कभी, कि तुझे खो न दूँ कहीं 

तेरी याद भी अब अपने ज़हन से छोड़ दी मैंने 


तू लौट कर भी आए, तो क्या हासिल होगा?

मेरे ज़मीर में अब तेरी, कोई क़ीमत भी नहीं 


जा कि अब मुझे, तेरी कोई ज़रूरत नहीं। 


- अमितेश 

 

नहीं

तेरे बिन भी कट ही गए शब - ए - रोज़ (दिन और रात) मेरे 

तेरी याद का अब न कोई मरहम, कोई ज़राहट (ज़ख्म) नहीं 

 

ख्वाबों की बस्ती से तेरा अक्स मिटा दिया मैंने 

दिल के उजड़े नगर में, तेरी अब सकूनत (बसेरा) नहीं 


बहुत रोये थे कभी तेरी एक बसारत (eye sight) की खातिर 

अब इन आँखों में, वो पहली सी हसरत नहीं 


गिरना चाहो तो शौक़ से गिरो खुद की नज़रों में 

मेरा हाथ थामने की, अब तुझे इजाज़त नहीं 


खुश हूँ अपनी तन्हाइयों के इस सुकून में अब 

जा कि अब मुझे, तेरी कोई ज़रूरत नहीं। 


- अमितेश 

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

रेशमी साड़ी

जब तुम रेशमी साड़ी के पल्लू को 

अपने बाएं कंधे पर डाल देती हो,

लगता है जैसे किसी निर्मल धारा ने 

पहाड़ की ढलान से दोस्ती कर ली हो। 


सिले हुए कपड़ो के बंधन से परे,

ये छह गज का विस्तार तुम्हारे अंगों पर 

जब सरसराता हुआ लिपटता है,

तो समय की गति थोड़ी धीमी हो जाती है 

और फ़िजा में एक अनकही सुगंध घुल जाती है। 


तुम्हारी कमर पर नज़ाकत से बंधी वो नाजुक सिलवटें,

मानो तीस्ता की बेपरवाह लहरें हों

जो बलखाती है तुम्हारे हर कदम के साथ

बड़े ही अदब से, छोड़ अपनी रौबदार रवानी

और मुझे बहा ले जाती है एक अपार मंजिल तक। 


वो रेशम की चमक तुम्हारी त्वचा से 

एक गहरा संवाद करती है।

मेरी आंखों की चुगली कर जाती है,

जब चमकती सी वो रेशम 

मेरे चेहरे पर अपना प्रभाव फैलाती है। 

 

जब तुम अपनी बिखरी हुई जुल्फों को 

एक झटके से पीछे कर लेती हो,

और साड़ी का वो चमकता हुआ किनारा 

तुम्हारे मुखड़े को घेर लेता है, 

तो पूनम का चाँद भी पिघल कर बरस जाता है बेनूरी में। 


आंखों में काजल, माथे पर बिंदी 

और वो धानी रंगों वाली साड़ी,

बहार में भी फुहार ला देती हैं इस प्रकृति में। 

ये लिबास नहीं, एक पूरी सृष्टि है 

जो खुद को तुम्हारे व्यक्तित्व में समाहित कर जाती है।  


वो तेरी पाज़ेब की रुनझुन - रुनझुन 

और साड़ी के रेशमी घेरे का जमीन को चूमना 

मेरे मन के कवि को और आशिक बना जाता है 

जब तुम्हारी लचक से बलखाती वो साड़ी 

वातावरण में एक संगीत बिखेर जाती हैं। 


तुम्हारी उँगलियाँ जब साड़ी की चुन्नटों को 

सवांरती है बड़े इत्मिनान से,

कोई कलाकार अपनी अनुपम कृति को 

आखरी रूप दे रहा हो मानो 

और खुद को आत्मसात कर रहा हो उन चुन्नटों में। 


श्रृंगार रस के सारे रंग फीके हैं 

जब तुम उस सादगी में सामने आती हो। 

तुम एक साड़ी नहीं पहनती 

बल्कि साड़ी तुम्हे धार कर 

धन्य हो जाती है। 


- अमितेश 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

कृष्ण द्वन्द

मौन खड़ा है स्वर्ण द्वारका, रत्नों का अम्बार यहाँ 

शीतलता ढूँढ रहा है मन की, शीतल यमुना - धार कहाँ?

नीलम - सा यह वक्ष आज क्यों, विरह - ताप में जलता है?

मृदु स्मृतियों के झोंको से, उर का धीरज ढलता है। 


वो माखन की मटकी टूटी, वो गोधूलि की बेला,

सहस्त्र भीड़ में भी, मन आज खड़ा है अकेला। 

अधरों पर वह वेणु सोई, जिसमें गूंजती थी राधा,

राजमुकुट की भारी गरिमा, बनी ह्रदय की अथक बाधा। 


झिलमिल करते नयन - नक्षत्रों में, गोकुल का आभास बसा 

उमड़ रहा है अब रह - रह कर, अंतर्मन में उच्चवास बड़ा। 

क्या वे कुंज अभी भी वैसे, विहंगो से भर भर जाते होंगे?

क्या बाल - सखा अब भी मुझको, वन - पथ पर बुलाते होंगे?


मैं जग का स्वामी, पर स्वयं से आज पराया हूँ 

कंचन कानन में भी बैठ कर, बस अपनी ही छाया हूँ 

नीरव रजनी की ओट में, सिसक रही मेरी तरुणाई 

आज द्वारका के वैभव पर, ब्रज की धूलि ही है सुखदाई। 

***

अंशुमाली की स्वर्ण - रश्मियाँ, द्वारका के प्रासाद पर,

पर मन का पंछी अटका है, यमुना के उस पार पर। 

एक ओर है पट्टमहिषी, मर्यादा का स्वर्ण - पाश 

एक ओर वह मयूर - पंख, विरह - भरा विस्तृत आकाश। 


एक जो सत्य है, अधिकारी मेरी अर्द्धांगिनी 

एक जो स्वप्न है, सिहरन है मेरी अनुरंजिनि 

एक मांगती वर्त्तमान है, सेवा और समर्पण का दान 

एक ले गयी छीन ह्रदय से, वामषि की मीठी तान। 


जब रुक्मिणी के कर - कमल, चरणों को सहलाते हैं 

तब ब्रज के काँटों के छाले, रह - रह टीस जगाते हैं 

राजमहिषी के स्वर्ण - कंगन की, जब झंकार गूंजती है 

कानों में राधा की पायल, मौन खड़ी कुछ पूछती। 


"हे नाथ! पुकारती रुक्मिणी, जब आदर के घेरे में, 

मैं खो जाता हूँ, "कान्हा" पुकार में, उस ऊषा के अँधेरे में 

एक ओर विधि का विधान है, महल और सिंहासन है,

एक ओर वह निश्छल प्रेम, वह अकुलाता यौवन है। 


कैसी विवशता है मेरी, कैसा यह विस्तार है?

एक को दे दी देह अपनी, एक में संसार है 

रुक्मिणी की आँखों में दिखता, मुझमे मेरी आत्मा 

राधे के आँसू कहते हैं, तुम ही मेरी अखंड आत्मा। 


दो पाटों के बीच पीस रही, मेरी मोहन - मुरली आज,

एक ओर है प्रेम की पीड़ा, एक ओर है कुल का लाज। 

मैं द्वारकाधीश होकर भी, सबसे बड़ा दरिद्र हूँ,

स्वयं के ही दो रूपों में, बँटा हुआ चरित्र हूँ। 

***

ना कोई राधा, ना रुक्मिणी, न मोहन का आधार 

मिट गया सब नाम - रूप, बस शेष रहा विस्तार 

एक बिंदु पर आकर थमी, तीनों दिशाओं की धार 

जहाँ ना विरह की वेदना, ना मिलन का उपहार। 


एक जो देह की छाया बनकर रक्षक खड़ी 

एक जो प्राणों की लय बन स्मृति तंतु में जड़ी 

दोनों के मध्य खड़ा वह, नीलम - सा अविनाशी,

एक का है वो द्वारकाधीश, एक का ब्रजवासी। 


जब राधा की सिसकी गूँजी, यमुना के सूखे तट 

रुक्मिणी के नयनों से छलका, पीड़ा का मधु - घट 

रुक्मिणी ने जब थामा हाथ, प्रभु का करुणा से भर,

राधा ने महसूस किया वहां, अपना ही सुखद अधर। 


"मैं कौन हूँ?" पूछता कान्हा, स्वयं के अंतर में,

एक अंश मेरा महल में, एक वन के निर्झर में। 

देखो जब ध्यान से, तो तीनों एक ही सार,

जैसे एक ही सिंधु की, हों लहरें अपरम्पार। 


रुक्मिणी का त्याग बना, राधा का अमिट सुहाग,

राधा का वैराग्य बना, रुक्मिणी का अनुराग। 

दो दीप जल रहे, एक ही ज्योति की लौ बनकर,

कृष्णा बिखर गए चराचर में, प्रेम की परिभाषा बनकर। 


- अमितेश  


मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

पंचकन्या

मंदोदरी की व्यथा


सोने की लंका जलती थी,

मैं भीतर ही भीतर घुटती थी 

पति का गर्व बड़ा था इतना 

मैं पल - पल हाथ मलती थी। 


मैंने रोका था, मैंने टोका था 

सीता को भेजो हर बार कहा था 

पर दशानन के अहंकार ने 

हर सीख को ठोकर मारा था। 


मैं मयासुर की बेटी थी 

विद्वान की भार्या, राज - रानी थी 

पर विधि का लिखा देखो जरा 

मेरी किस्मत में वीरानी थी। 


मेरा बेटा गया, मेरे भाई गए 

एक जिद ने सबको निगल लिया 

जिस महल में गूंजती खुशियां थी 

वहां मौत ने डेरा डाल लिया। 


मैं सती थी, मैं पावन थी,

फिर भी ये कैसा अन्याय हुआ?

रावण के पापों के प्रतिफल में 

मेरे सुहाग का ह्राष हुआ। 


लोग कहते थे वो असुर था 

पर मेरे लिए मेरा संसार था वो 

उसकी हर भूल के पीछे कहीं 

मेरा खामोश सा प्रतिकार था। 


हाय राम तुम क्यों आये हो 

मेरे सिंदूर को हरने को 

ले जाओ सिया को संग अपने 

मेरे सुहाग का प्रतिदान करो। 


जो रावण को सजा दी तुमने 

एक वाण मुझपे भी तज देना 

संग अपने मैं भी पिया के फिर 

मर के मुक्ति पाऊँगी।  


सीता संवाद 


अशोक वाटिक की उस छांव में 

मंदोदरी जब सिया से मिलने आयी थी  

एक तरफ था राज - वैभव 

एक तरफ व्यथा परायी थी। 


मंदोदरी बोली -

हे मैथिली! हे जनकनंदनी!

लंका पर क्यों ये कहर ढाया है?

लौटा दो मेरे पति का गर्व 

क्यों इस क्रोध को जगाया है। 


मैं जानती हूँ तुम सती हो 

तुम्हारे चरण में पावन धार है 

पर मेरे पति का मोह देखो 

उसे विनाश से ही प्यार है। 


एक बार कह दो तुम राम से 

की लौट जाएं वो वन की ओर 

मैं बाँध लुंगी रावण को 

मेरी ममता की कच्ची डोर। 


सीता ने तब आँखें खोली 

शांति की एक मूरत थी वो 

मंदोदरी के दुःख को देख 

करुणा की एक सूरत थी वो। 


हे देवी! तुमने सही कहा 

पर धर्म की मर्यादा न्यारी है 

रावण ने जो पाप किया है,

अब उसके अंत की बारी है। 


तुम्हारा सुहाग तुम्हे है प्यारा 

पर जगत का हित भी देखना है 

अहंकार की इस लंका को 

अब मिट्टी में ही मिलना है। 


तुम धान्या हो, तुम ज्ञानी हो 

पति - धर्म तुमने खूब निभाया है 

पर विधि का लिखा अटल है देवी,

जो आया है, उसे अब जाना है। 


तुम जीवन अपना सफल ही मानो 

रावण को मुक्ति पुरुषोत्तम देंगे 

अहंकार का अंत सुनिश्चित 

ज्ञान प्रभु यह जग को देंगे। 


तुम्हारी सतित्व अमर रहेगी 

कुल का नाम तुम्ही से रोशन  

तुम इस काल को अमिट ही मानो 

समय ने लिखा जिसे, अचल है।  


मंदोदरी का तांडव 

लंका की रानी गरजी तब 

हे जनक - सुता ये क्या कह डाला?

एक तपस्वी के कारण तूने,

सोने की पुरी को जला डाला। 


मेरे पति का बल पवन - वेग 

कैलाश उठाया जिसने भुज - बल से 

तुम राम - राम की रट लगाए 

जीतोगी कैसे इस छल से। 


युद्ध की भेरी बज चुकी है 

रक्त की नदियां बहेंगी अब 

यदि प्राण बचाना चाहती प्रभु की 

शरण में रावण के दोनों आओ अब। 


मंदोदरी मैं, दैत्य - राज की 

पति - धर्म में हूँ बन ढाल खड़ी 

सीता! लौटा दो मेरा सुहाग,

वर्ना तेरी मृत्यु मैं बनु अभी। 


सीता की आँखों में ज्वाला थी 

मर्यादा की वो हाला थी 

बोली वो - सुनो लंकेश्वरी 

ये पाप की काली माया थी। 


राम का धनुष जब खींचेगा 

ब्रह्माण्ड थर - थर कांपेगा 

रावण का दस शीश अब तो 

धरती की धूल ही चाटेगा। 


मैं अबला नहीं, मैं शक्ति हूँ 

मैं रघुवंशी की शान हूँ 

तुम्हारे पति के काल का, 

मैं ही तो प्रथम निशान हूँ। 


युद्ध नहीं ये न्याय है देवी 

अधर्म का सर कुचलना है 

अब रावण को मरना होगा 

लंका को अब जलना होगा। 


रण भेरी का उद्घोष    


मंदोदरी की आंख जली 

"सीते! तुमने काल बुलाया है 

लंका के इस वीर - भूमि पर 

क्यों मृत्यु का जाल बिछाया है। 


मेरे दशानन के आगे 

टिक पायेगा वो वनवासी?

जिसने इन्द्र को जीत लिया 

उसे डराती है ये अबला नारी। 


अभी समय है, मान लो मेरी 

शरणगति ही एक साधन है 

वर्ना ये लंका रक्तरंजित 

और विधवाओं का ये क्रंदन है। 


मेरा पुत्र मेघनाद खड़ा है 

इंद्रजीत वो वीर कहलाये 

राम के लक्ष्मण को पल भर में 

यमराज के द्वार वो पहुंचाए। 


सीता का स्वर तब गूँज उठा, 

जैसे कर्कश बिजली कड़की हो 

बोली - मंदोदरी! सुन लो ध्यान से 

अब न्याय की ज्वाला भड़कायी हो। 


जो इंद्र को जीता, वो अभिमान था 

पर नारायण से जो टकराएगा 

वो दशानन हो या त्रिलोक - विजयी 

मिटटी में ही मिल जायेगा। 


तुम्हे पुत्र का दम्भ बड़ा है 

पर मेरा लखन शेषनाग खड़ा 

लक्ष्मण के एक ही वाण से अब 

वो होगा धरती पर पड़ा। 


ये युद्ध नहीं, ये शुद्धिकरण है 

पाप का घड़ा अब भरना है 

मंदोदरी! अब देखो तुम 

कैसे अधर्म को मरना है। 


सत्य का बोध  


मंदोदरी ने जब देखा 

सीता का रुप विराट हुआ 

क्षण भर में उसके भय का 

सिद्ध - शुद्ध साक्षात हुआ। 


सीता बोली - सुनो रानी!

ये युद्ध नहीं, ये काल है 

जो रावण ने है बुना 

ये उसकी मौत का जाल है। 


तुम कहती हो वो विजयी है 

जिसने देवों को जीता है?

पर वो भूल गया की उसने 

स्वयं जगदम्बा को खिंचा है। 


वो दस - शीश का ज्ञान कहाँ 

जब बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है?

जब पाप का पर्वत बढ़ता है 

तब पृथ्वी स्वयं घबराती है। 


मंदोदरी का मस्तक झुका 

आंखों में नीर की धारा थी 

जो गर्व अभी तक बोल रहा था 

अब हार की उसमे प्रतिछाया थी। 


हे जानकी! मैं हार गयी अब 

मेरा पति मोह ही अंधा था 

मैं बचाने आयी थी जिसे 

उसने स्वयं बुना मौत का फंदा था। 


तुम राम की शक्ति, तुम ही धरा 

इस सृस्टि की आधार प्रभु 

मेरे सुहाग की रक्षा कर दो 

हे करुणामयी! कर दो विभु। 


सीता ने तब करुणा दिखाई 

मंदोदरी! तुम धन्या हो 

पति के पाप प्रचंड सही 

पर तुम अचल प्रेम का अन्या हो। 


विधि का विधान न टलता है 

पर तुम्हारा नाम अमर होगा 

जब - जब होगी सतियों की बात 

मंदोदरी का सम्मान प्रथम होगा। 


रावण वध 


रणभूमि में धुल उड़ी 

जब दशानन धरती पर गिरा 

धर्म की विजय हुई आज 

और अधर्म का ध्वज थमा 


मंदोदरी यह सुन दौड़ी आयी 

अश्रुपूरित हो देख पति की ये दशा 

हे नाथ! मैंने रोका था 

बोली वो करुणा में अपनी व्यथा। 


रावण ने तब आँखे खोली 

मुख पर अब वो गर्व न था 

एक महा - पंडित पड़ा था वहां 

जो अब तक केवल राक्षस था। 


मंदोदरी! तुम सत्या थी 

मैं मोह के अंधेरे में था 

जिस सीता को मैं लाया था 

वो मेरे काल का घेरा था।  


मेरा ज्ञान, मेरी शक्तियां 

सब मिटटी में मिल गयी आज 

मैंने अपने ही हाथों से 

उजाड़ दिया अपना घर, अपना राज। 


मुझे क्षमा करो हे देवी!

मैंने तुम्हारे दुःख को ना जाना 

एक जिद्द के पीछे मैंने 

तुम्हें विधवा होना माना। 


तुमने हर पल राह दिखायी 

मैंने अहंकार में ठुकराया 

आज जब मैं हूँ मृत्यु सय्या पर  

मैंने अपना दोष ही पाया। 


मंदोदरी की गोद में सर रख 

दशकंध ने ली अंतिम सांस 

एक युग का अंत हुआ तब 

टूट गया जो झूठा अहंकार। 


सीता संवाद  

दैत्येन्द्र के वध से लंका में 

घनघोर मेघ गर्जन हुआ 

लंका की उस स्वर्ण - पुरी में 

एक भयंकर क्रंदन हुआ। 


मंदोदरी आयी सीता के पास 

आंखों में अश्रु - धार थी 

जो कल तक लंकेश्वरी थी 

आज वो एक विधवा की पुकार थी। 


मंदोदरी तब बोली -

"हे मैथिलि! देखो जरा 

मेरे सुहाग का क्या अंजाम हुआ 

जिसके जिद्द ने तुम्हे यहाँ लाया 

उसके अंत से मेरा जीवन समसान हुआ। 


आज मैं सब कुछ हार गयी 

मेरा वंश, मेरा मान गया 

एक नारी के अपमान के बदले,

आज मेरा स्वाभिमान गया। 


सीता ने करुणा से देखा 

मंदोदरी का हाथ थामा 

बोली - हे देवी! इस विषाद में 

सृस्टि का ही नुकसान हुआ 


रावण ज्ञानी था, स्वाभिमानी था 

पर ज्ञान का उसने दुरुपयोग किया 

जन कल्याण के काम आना था  

उसने ज्ञान का स्वयं उपभोग किया। 


रावण ने जो किया अधर्म 

उसका दंड तो निश्चित था 

पर तुम्हारी भक्ति और मर्यादा 

लंका का असली अमृत था। 


 तुम शोकाकुल अब ना हो मंदोदरी 

तुम्हारा नाम अब अमर रहेगा 

सतियों की गाथा में 

तुम्हारा स्थान प्रथम होगा। 


मंदोदरी इस दुःख विषाद में 

सीता के चरणों में पसर गयी 

मिल जाये उसको अब तर्पण 

अभिलाषा में वो अशर गयी। 


उत्तरार्द्ध 

सोने की लंका राख हुई अब 

और राख हुआ वो अभिमान 

मंदोदरी खड़ी थी अकेली 

लेकर अपना बिखरा जहान। 


पति - वध का वो आक्रांत दृश्य 

आंखों में अब भी बाकी था 

किसने काल को कभी बांधा था 

आज वो मृत्यु का साथी था। 


वो रोती, वो चिल्लाती थी 

हे नाथ! ये क्या अनर्थ हुआ?

मेरी हर सीख, मेरी हर प्रार्थना 

सबका अर्थ ही व्यर्थ हुआ। 


पर नियति का खेल बड़ा निष्ठुर 

अब रोने से क्या होना था?

जिसने अधर्म का बीज बोया 

उसका यही फल तो होना था। 


राम ने तब संदेशा भेजा 

बिभीषन को बुलाया पास 

"मंदोदरी का मान ना टूटे 

वरना होगा धरम का नाश। 


मंदोदरी ने देखा नया सवेरा 

पर उसमे वो अब चमक न थी

लंका का राज - पाट तो मिला 

पर रावण की वो खनक न थी। 


नियति ने उसे बनाया 

विभीषण की परम - परामर्शदाता 

लंका को पुनःस्थापित करने में 

वही बनी अब भाग्य विधाता। 


सीता के आशीष के चलते 

पंचकन्या में उसका नाम हुआ 

अपने सतित्व से वापस उसने 

लंका में धर्म का काम किया। 

स्त्रित्व का हमेशा मोल बहुत है 

पुरुषत्व में है अहंकार बसा 

रावण जलता हर वर्ष अब भी 

मंदोदरी है पर्याय सतित्व का। 


आज वैभव और सुख की 

चारो और बौछार बहुत है 

मंदोदरी के हिय के अंदर 

एकांकी ही वो रावण बिन है। 


 - अमितेश 


  

 




कैकेयी का पश्चाताप

वरदान के उस भयंकर क्षण में,

मैं क्या थी और क्या हो गयी?

पुत्र - मोह की अंधी आंधी में 

मैं अपना सर्वश्व ही खो गयी। 


रघुवर को वन भेज मैंने 

कैसा ये कर्कश काम किया?

अयोध्या की खुशिओं का सूरज 

मैंने ढलने पर मजबूर किया। 


दुनिया मुझे मंथरा कहेगी 

मंथरा बन रहूंगी यादों में 

पर कौन देखेगा वो आंसू 

राम के मोह में जो बहती रातों में। 


भरत ने मुझको त्याग दिया 

मुझे माँ कहने से इंकार किया 

स्वर्ण महल अब श्मशान लगे 

मैंने कैसा ये संसार किया। 


मैं दोषी हूँ, मैं पापी हूँ 

सरयू की धारा से भी ना धूल पाऊँगी 

राम की ममता के छाँव बिन 

मैं चैन से कैसे सो पाऊँगी 


राम अगर तुम सुन पाते हो 

तुम ही मेरा उद्धार करो 

जैसे अहल्या को छु तुमने ताड़ा 

मेरा भी शापोद्धार करो। 


- अमितेश 




Deep Fake

ना राशन की चिंता, न भाषण का डर है 
अब तो बस Data ही असली ज़हर है 
पेट खाली है, पर Mobile में Reels का मेला है,
इंसान भीड़ में खड़ा हो कर भी, Internet पर अकेला है। 

Smart City तो बन गई, पर नाली अभी भी जाम है 
WhatsApp University में सुबह - शाम काम है 
सत्य वहां मिलता नहीं, बस Narrative बिकता है 
जो सच बोले दे ज़रा, वो Gen X सा दिखता है। 

नेताजी अब संसद में काम, Insta पे ज्यादा आते हैं 
मुद्दों को छोड़, अब वो नए नए Filter लगाते हैं 
गरीब का बच्चा अब school में कम जाता है 
समय बचा वो Influencer बन ठुमकना चाहता है। 

इंसान की अक्ल पर अब AI का पहरा है 
मशीन तो हंस रही है, पर दर्द हमारा गहरा है 
Deep Fake के दौर में, चेहरा भी उधार है, 
झूठ के बाज़ार में, सच का हो रहा बहिष्कार है। 

धर्म की बहस है, Degree का अकाल है 
बधाई हो दोस्तों, अब यही अमृत काल है 
Credit Card की किस्तों में ज़िंदगी कटी है,
भारत की आत्मा अब Like में बटी है। 


- अमितेश  

मेकओवर

एक बार एक नेता जी हमसे बोले -

कवि जी, अब हम भी Digital हो गए हैं 

पुराने वाले घोटाले अब पूरी तरह Virtual हो गए हैं 

अब जनता के बीच जाने का हमें कोई शौक नहीं, 

क्योंकि जनता Gen Z है, Reels पे हमारे जैसा कोई Rock नहीं 


कल तक जो विपक्षी दल को यमराज बताते थे,

आज वही उनके साथ बैठ कर तंदूरी चिकन खाते हैं 

मैंने पूछा - नेताजी ये पाला बदलना कैसा है?

हंसकर वो बोले - बीटा, ये Ideology नहीं, बस गाँधी छाप पैसा है 

इधर से डालो दागी विधायक, उधर से माननीय निकलता है 

आजकल राजनीति में गिरगिट भी, रंग देख कर जलता है। 


Manifesto ऐसा बनाया है कि स्वर्ग ज़मीन पर ला देंगे 

हर घर के नल में पानी नहीं, सीधे Cold Drink पहुंचा देंगे 

बेरोजगारी का हल हमने बड़ा सटीक बनाया है 

पकौड़े टालने वालों के लिए, Non Stick pan मंगवाया है 

गरीब की थाली में अब बस Data की भरमार है 

पेट भरे न भरे, पर फोन में Hi Speed Internet की बहार है। 


विपक्ष कहता है - महंगाई ने कमर तोड़ दी है 

हमने कह दिया - हमने विलासिता की आदत छोड़ दी है 

अगर सिलेंडर महंगा है, तो मिट्टी के चूल्हे पर आओ 

धुएँ से जो आंख लाल हो, तो इसे देशभक्ति बताओ 

सत्य को हमने इतना Edit किया कि पहचान में न आये,

वो झूठ ही क्या, जो दो - चार Million Views न दिलाये 


- अमितेश  

द ग्रेट इंडियन सर्कस

सिद्धांतों की चादर को अब खूंटी पे टांग दिया है 

कल जिसे कोसा था, आज उसी का हाथ मांग लिया है 

विचारधारा तो बस अब कपड़ों का एक ब्रांड है 

जिधर सत्ता की मलाई, उधर ही सारा स्टैंड है। 


सुबह जो क्रांतिकारी था, शाम को संस्कारी हो गया 

जादू ऐसा चला कि सारा पाप, गंगा - धारी हो गया 

अब Election नहीं, Selection का दौर है

मंच पर चेहरा कोई और, पर्दे के पीछे कोई और है। 


सड़क में गड्ढा है या गड्ढे में सड़क, ये पता नहीं 

पर होर्डिंग पर नेता जी की मुस्कान में कोई खता नहीं 

GDP गिरे या बढे, पर IT Cell का ग्राफ ऊंचा है 

सच्चाई पूछने वाले के पास, अब सिर्फ एक ही कूचा है। 


जाति का चश्मा पहन कर, वो वोट की फसल काटते हैं 

मुफ्त की रेवड़ियों में, वो जनता की अक्ल बांटते हैं 

मुद्दे गायब हैं - बेरोजगारी, शिक्षा और थाली से,

अब बहस शुरू होती है गाली से, और खत्म ताली से!


जनता बेचारी आज भी 'अच्छे दिनों की कतार में है 

और नेता जी अपनी अगली flight और सरकार में हैं 

लोकतंत्र का मंदिर अब एक भव्य शोरूम जैसा है,

यहाँ जीतता वही है, जिसकी पॉकेट में पैसा है। 


- अमितेश