आओ माधव! फिर से तुम, गांडीव थमा दो जीवन में,
भटक रहा इंसान आज फिर, आधुनिकता के रण में।
चारों ओर कुरुक्षेत्र बना है, मन में युद्ध निरंतर है,
तृष्णा, चिंता, होड़, व्यथा का, छाया हुआ बवंडर है।
यंत्र बने हैं हाथ हमारे, संवेदना पर ताला है,
सुख की अंधी दौड़ में हमने, घट में विष ही ढाला है।
मोह-पाश के कठिन जाल में, फिर से अर्जुन हार रहा,
अपने ही संशयों का विषधर, हृदय उसी का मार रहा।
पार्थ जगाओ फिर से माधव! निष्काम कर्म बतलाओ तुम,
"कर्म करो, मत फल की सोचो", यही महामंत्र फिर गाओ तुम।
जय-अपजय से पार ले चले, समता का वह भाव सिखा,
भीड़ भरे इस कोलाहल में, धीरज की अमृत छांव दिखा।
देह अनित्य, अमर आत्मा, फिर से यह विश्वास जगा,
भौतिकता के इस कलयुग में, अलौकिक वह आस जगा।
छोड़ के सारे भय और संशय, स्वधर्म पर निज कदम बढ़ा,
हे मुरलीधर! हे जगदीश्वर! नव जीवन की राह दिखा।
बनकर सारथी थामो डोरी, इस बिखरे कुरुक्षेत्र में,
फिर से गीता का ज्ञान जगा दो, पीड़ित मानव-नेत्र में।
गूंजे फिर से अनहद नाद, हटे तिमिर, उजियारा हो,
माधव! तेरा नाम जपे जग, सत्य का ही सहारा हो।
- अमितेश